Thursday 20 November 2008

फेब्राइल कनवल्शन्स ( बुखार से उत्पन्न मिरगी जैसी ऐंठन )

फेब्राइल कनवल्शन्स शरीर मे उठी एंठन है जो की ऐसे बच्चों में देखी जाती हैं जिनके शरीर का तापमान बुखार की वजह से 39डिग्री सेल्सियस या 102.2 डिग्री फैरनहीट से ज्यादा हो। अक्सर यह खाँसी सर्दी जुकाम के शुरुआत में होता है जब बच्चे के शरीर का तापमान तेजी से बढ़ रहा होता है।


वीडियो देखने के लिए क्लिक करें
http://www.brightcove.tv/title.jsp?title=1078589570

एक नज़र में देखने पर स्थिति भयावह लग सकती है,किंतु विरले ही यह एक गँभीर समस्या बनती है।


पाँच साल से छोटे बच्चों में इसके पाये जाने की सँभावना सबसे अधिक होती है। बच्चों का दिमाग पूरी तरह विकसित और परिपक्व नहीं होता। अधिक तापमान से इनके दिमाग में ऐसे विद्युत के सिग्नल उत्पन्न हो सकते हैं की बच्चे के शरीर में ऐंठन और मरोड़ उठे । करीब तीन प्रतिशत बच्चे इस से प्रभावित हो सकते हैं। छह महीने से तीन साल की इम्र में इनके होने की सँभावना सबसे अधिक होती है। हालांकि छह साल तक इन्हे देखा गया है।

परिवार में अगर किसी को ऐसी तकलीफ रही हो तो इसके होने की सँभावना 20 प्रतिशत तक बढ़ सकती है।

लक्षण

-ऐंठन और मरोड़ बहुत कम समय के लिए होती है। यह कुछ सेकंड से कुछ मिनट तक रह सकती है( पाँच मिनट से कम)

-बच्चा बेहोश हो सकता है, शरीर सख्त पड़ सकता है,साँस 30 सेकंड के लिए बंद हो सकती है, और बच्चा पेशाब और दस्त अनजाने ही कर सकता है।

-हाथ और पाँव में झटके आ सकते हैं। कई बार चेहरे पर भी खिंचाव दिख सकता है। बच्चे की आँखें ऊपर चढ़ सकती है।

-कुछ मिनट बाद बच्चे को होश आ जाता है। होश आने पर बच्चा सुस्त होता है, नहीं तो चिड़चिड़ा हो जाता है। उसे अपने आसपास की बातों का ठीक होश नहीं रहता।

http://www.youtube.com/watch?v=pS6uZYcydRo



इलाज

- ऐंठन के समय बच्चे को चोट ना लगने दें। उनके मुँह में कुछ ना ड़ालें। बच्चे को रिकवरी पोसाशन में ड़ाल दें।



- बुखार को बहुत बढ़ने ना दें। पैरासिटामोल का इस्तेमाल करें।

- कमरा ठंडा करें, बच्चे के कपड़े ड़ीले करें।

- पानी में भिगो कर शरीर को स्पोंज करें। स्पोंज करते समय बच्चे की छाती, पीठ ,कक्ष और जाँघ में भी पोछे।

अगर ऐसा पहली बार देखने में आया है तो बच्चे का इलाज और ठीक से वजह जानने के लिए बाकी जाँच जरूरी है। हो सकता है बच्चे को डायज़ापॉम नाम की दवा देनी पड़े। निदान हो जाने पर यह दवा आप संडास की जगह से भी दे सकते हैं। अपने डॉक्टर से इस विषय में सही सलाह ली जानी चाहिए।


अगर तकलीफ एक साल की उम्र से पहले देखने में आई है , या परिवार में किसी और को भी है तो तकलीफ के बारबार होने की सँभावना ज्यादा है।

अधिकतर बच्चे पाँच साल बाद इस तकलीफ से उभर जाते हैं। किंतु करीबन 1 प्रतिशत बच्चों में आगे जाकर अपस्मार देखा जाता है।

बुखार में हुई ऐसी सामान्य बात को देख अपने या किसी दूसरे बच्चे पर अपस्मार का लेबल ना लगायें। चौकसी और सचेत होना आवश्यक है लेकिन फेब्राइल कनवल्शन्स चिंता का कारण ना बनायें।


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Wednesday 15 October 2008

जुकाम की दवा और नुकसान

बीमार बच्चा देखकर हर माँ का दिल भर आता है। पापा का बस चले तो अपनी लाड़ली के लिए जान भी हाज़िर कर दे। पर कुछ दुख तो सह कर ही पार लगते हैं। सर्दी के लिए दवाओं से चाहे जितनी नाकाबंदी कर दें यह सता कर ही दम लेती है। कुछ ना कुछ कर के बीमार बच्चे की तकलीफ कम करने की कोशिश में अक्सर कई गैरजरूरी दवाईयाँ इस्तेमाल की जाती है।
बात अगर यहीं तक सीमित होती तो भी चलता लेकिन इनमें से कई दवाईयाँ काफी हद तक नुकसान पहुँचा सकती हैं, जान भी जोखिम में ड़ाल सकती है।


यह हैं ओवर द काउंटर मिलने वाली असँख्य दवाईयाँ जिनपर मुस्कुराते बच्चों की तस्वीर हमें बढ़ कर इन्हे खरीदने को उकसाती है।

सच तो यह है सर्दी जुकाम के लिए आज भी दादी माँ के नुस्खों से बेहतर उपाय नहीं। पैरासीटामोल, माँ की गोद, विक्स से मालिश, गुनगुने नमक के पानी से गरारे करना , अधरक की चाय, चिकन सूप....यही काफी है। छींकता खाँसता आपका दुलारा परेशान जरूर है....लेकिन आपके साथ और प्यार की मीठी यादें भी बना रहा है।


http://www.youtube.com/watch?v=fij-SnBOapQ



http://www.aap.org/advocacy/releases/jan08coughandcold.htm

यू एस फुड़ ऐन्ड ड्रग ऐडमिनिस्ट्रेशन ने खास इस बात पर ज़ोर दिया है कि दो साल से छोटे बच्चों को ओवर द काउंटर मिलने वाली यह दवाईयाँ हरगिज़ नहीं देनी चाहिए। इनसे जान तक को खतरा हो सकता है। छह साल से छोटे बच्चों में इनकी उपयोगिता साबित नहीं है। इन्हे लेने पर मृत्यु, फिट्स(कंपकंपी),हृदय की गति तेज़ होना या अचेत होना रेकार्ड किया गया है। आम तौर पर यूँ बहुत देखने में ना भी आये तो भी छह साल से छोटे बच्चों में इनसे वाँछित लाभ भी नहीं मिलता।

बच्चों और बड़ो मे फर्क है। एक ही दवा की प्रतिक्रिया दोनो में अलग तरीके से होती है। जिस दवा से बड़ों मे कोई हानि नहीं होती बच्चों में वे गँभीर नुकसान पहुँचा सकते हैं।

एफ ड़ी ए ने दवाईयों के लेबल मे इन बातों को साफ करने की राय रखी है।

घरेलू नुस्खों के अलावा सलाइन नेसल ड्रॉप्स से फायदा भी होता है और नुकसान भी नहीं है।



अधिक जानकारी के लिए इस साइट पर जायें( www.aap.org/publiced/BR_Infections.htm
http://www.aap.org/new/kidcolds.htm)

पिछले अक्टूबर में जो दवाइयाँ लौटा दी गई थी
(Cough and cold medicines withdrawn in October 2007):

Dimetapp(R) Decongestant Plus Cough Infant Drops,
Dimetapp(R) Decongestant Infant Drops,
Little Colds(R) Decongestant Plus Cough,
Little Colds(R) Multi-Symptom Cold Formula,
PEDIACARE(R) Infant Drops Decongestant (containing pseudoephedrine),
PEDIACARE(R) Infant Drops Decongestant & Cough (containing pseudoephedrine),
PEDIACARE(R) Infant Dropper Decongestant (containing phenylephrine),
PEDIACARE(R) Infant Dropper Long-Acting Cough,
PEDIACARE(R) Infant Dropper Decongestant & Cough (containing phenylephrine),
Robitussin(R) Infant Cough DM Drops,
Triaminic(R) Infant & Toddler Thin Strips(R) Decongestant,
Triaminic(R) Infant & Toddler Thin Strips(R) Decongestant Plus Cough,
TYLENOL(R) Concentrated Infants' Drops Plus Cold,
TYLENOL(R) Concentrated Infants' Drops Plus Cold & Cough



FDA की सलाह

-लेबल हमेशा देखें। उसमें ऐक्टिव इनग्रीडियन्ट (“active ingredients”)देखें । कई बार कई सारी अलग अलग असर की दवाओं का काकटेल होती हैं ऐसी दवाईयाँ (an antihistamine, a decongestant, a cough suppressant, an expectorant, or a pain reliever/fever reducer)। आप अगर एक से अधिक ऐसी दवा दें तो शायद सेफ लिमिट से ज्यादा देकर बच्चे को नुकसान पहुँचा सकते हैं।


-दवा का लेबल खास चेक करें। उसके निर्देश का पालन करें। इसमें दी गई चम्मच या मेशरिंग कप से ही दवा दें। अंदाज़े से दवा कभी नहीं दे।


- बच्चों से दवा हमेशा दूर रखें। हो सके तो चाइल्ड सेफ ढक्कन वाली दवा ही खरीदें।

- कभी भी इन दवा का इस्तेमाल बच्चों को सुलाने के लिए ना करें।

- सर्दी जुकाम आम सी बिमारी है। अगर शंका हो कि तकलीफ कुछ और भी हो सकती है तो डॉक्टर तक पहुँचने में देर ना करें ।


http://www.youtube.com/watch?v=zE6rYqaWjkU

Sunday 5 October 2008

बच्चे के दूध में मेलामिन!!

कुछ समय से मेलामिन लगातार ध्यान खींच रहा है। मेलामिन जिससे खूबसूरत क्रौकरी तैयार होती है....बहुत ही अलग और गलत जगह में काफी मात्रा में पाया गया।

जगह थी पेट्स फूड...। अमेरिका में जब पालतू जानवर अचानक से किडनी फेल्यर से मरने लगे तो लगा कोई गंभीर महामारी फैल रही है। थोड़ा विश्लेषण करने पर इस तकलीफ की वजह मिली - चीन से एक्सपोर्ट हुए पेट्स फूड में मेलामिन की मिलावट। कई जानवर इंसानी लालच और पैसा कमाने के शार्टकट्स में शहीद हो गये।

http://www.youtube.com/watch?v=s8U9we0HEQg



अगर बात जानवरों के खाने तक सीमित होती तो फिर भी नुकसान की आशंका कम होती। पर चीन में हज़ारों की संख्या में बच्चे बीमार होने लगे। करीबन पचास हज़ार से अघिक बच्चे गुर्दे की निष्क्रियता की वजह से मर गये। सैंकड़ों अभी भी बीमार है।

सानलू नाम की कंपनी के मिल्क पावडर में मेलामिन पाया गया। यीली, जो की ओलंपिक गेम्स में बतौर स्पौंसर रही....उस के मिल्क पावडर में भी मेलामिन की मात्रा अधिक पाई गई। Nestle जैसे ब्रैन्ड्स भी यकीन से मेलामिन के होने को झुठला नहीं सकते।

जो कंपनियाँ अपनी प्रतिष्ठा को लेकर चिंतित थी...उन्होने बाज़ार से अपना पावडर उठवा लिया। छोटी कंपनियों के लिए यह बहुत ही बड़ा घाटा सिद्ध होता...तो वे अब भी बाज़ार में हैं।




http://www.youtube.com/watch?v=prLr1PNCeSg




बच्चों के दूध में आखिर कौन और क्यों मेलामिन मिला रहा है??

कौन का जवाब भी बहुत साफ नहीं है- शायद इन कंपनियों में दूध की आपूर्ति करने वाला नहीं तो स्वयं निर्माता।

क्यों-
ताकि प्रोटीन की मात्रा अधिक दिख सके। प्रबंध कर्ताओं का ध्यान या संशय अब तक इस ओर नहीं था। इसीलिए क्वालिटी जाँच में मेलामिन आँकने का प्रावधान भी नहीं था।


आखिर मेलामिन क्या है और किस तरह पहुँचाता है नुकसान??


मेलामिन एक ऑर्गैनिक कंपाउन्ड है C3H6N6(1,3,5-triazine-2,4,6-triamine )। इसमें व्याप्त नाइट्रोजन की मात्रा की वजह से ही यह गलत प्रोटीन की रीड़िंग देता है। जो लोग मेलामिन जैसी चीज़ नवजात शिशु के दूध में मिलाने में हिचकिचाते नहीं....जाहिर है वे मेलामिन की शुद्धता पर भी घ्यान नहीं दे सकते। सायन्यूरिक एसिड़ जैसे ऐसिड के होने पर मेलामिन के नुकसान करने की क्षमता कई गुना बढ़ जाती है।

यह गुर्दे पर सीधा असर करती है। बहुत समय तक इस्तेमाल करने पर किड़नी स्टोन्स, मूत्राशय के कैन्सर , किड़नी फेल्यर और मौत तक हो सकती है।


बच्चों मे इस रोग के होने के लक्षण

किड़नी के फेल होने और किड़नी स्टोन्स के होने जैसे ही लक्षण देखने में आये हैं
- बच्चे का बेहिसाब रोना, खास कर पेशाब करते समय। उल्टी के जैसा लगना
- पेशाब में खून ( जाहिर या माइक्रोस्कोपिक)
- पेशाब का कम होना या बिल्कुल बंद हो जाना
- ब्लड प्रेशर का बढ़ना
- पीठ पर किढनी की जगह पर थपथपाने पर दर्द का उठना
- बुखार




अगर बच्चों में ऐसे लक्षण दिखें तो शक करने के लिए जानना जरूरी है कि पावड़र मिल्क का इस्तेमाल किया गया या नहीं।
करीबन तीन महीने के लगातार इस्तेमाल के बाद ही अक्सर लक्षण दिखते हैं।

मेलामिन का दूध के पावडर में होने की जाँच आम लैबोरेटरी में नहीं की जा सकती। हालांकि,स्पेक्ट्रोमेट्री से बहुत आसानी से पता लगाया जा सकता है।

जो भी हो शक के घेरे में आई ऐसी बात सूचित करना जरूरी है।

समय बदल रहा है। कई लोग शॉर्टकट्स अपना कर हम आप की जान जोखिम में ड़ाल धनवान होने का प्रयत्न कर रहे हैं। वे हमारे भविष्य को बीमार कर रहे हैं।

कई बार तो लगता है काफी हद तक हम भी जिम्मेदार हैं। स्तनपान की जगह मिल्क पावड़र का चुनाव भी एक किस्म का शॉर्टकट ही है। छह महीने बाद भी सहूलियत के लिए जो माँये दूध के पावडर को ही मुख्य आहार रहने देती हैं...वह भी ऐसी स्थिति की जिम्मेदार हैं। हम सब जो हमारे सिस्टम को मिल्क पावड़र टेस्ट करने के लिए बाध्य नहीं कर सकते जिम्मेदार हैं।

....याद रहे बात बच्चों के दूध से सामने आई है। इस बात की गुंजाईश बहुक अधिक है कि आप खा रहे चॉकलेट, पी रहे चाय और मिठाइयों में मेलामिन है। इनमें इस्तेमाल हो रहे मिल्क पावड़र में मेलामिन की मात्रा की जाँच नहीं की गई है।

चीन के पेट फूड़ एक्सपोर्ट करने की वजह से स्पॉटलाइट उन पर है......जहाँ स्पॉटलाइट नहीं है...उस अँधेरे में पता नहीं हमारे और हमारे बच्चों के खाने में कौन सा जहर मिलाया जा रहा है।

क्या हम सचेत हैं??




The videos have been used strictly for educational purposes.

Thursday 11 September 2008

ऑटिस्म- पिछली चर्चा के आगे

मुझे यकीन नहीं था ऑटिस्म मे सब इतनी दिलचस्पी लेंगे । पोस्ट लिखने में देरी हुई इसके लिये क्षमा चाहती हूँ।

पिछली पोस्ट में कई सवाल उठे,ऐसे सवाल जिन्हे संक्षिप्त में जवाब नहीं देना चाहती थी।

ऑटिस्म की वजह क्या है?

सच कहा जाये तो ठीक जानकारी नहीं है। अनुमान है की जेनिटिक्स का रोल है। कुछ परिवार के बच्चों में इससे ग्रसित होने की संभावना अधिक होती है। फिर भी एक सटीक वजह बता पाना संभव नहीं हुआ है। कुछ अनस्टेबल जीन्स से इसके होने की आशंका बढ़ जाती है। कुछ लोगों का मानना है की गर्भ के दौरान हुए वायरल इनफेक्शन्स, मेटाबोलिक डिसौर्डर्स या कुछ कैमिकल्स के संपर्क में आना इस रोग का कारण बन सकता है।
फ्रैजाइल एक्स सिन्ड्रोम (Fragile X syndrome),ट्यूबरस स्क्लीरोसिस(tuberous sclerosis), कनजनाइटल रुबैल्ला सिन्ड्रोम( congenital rubella syndrome),ऐस्पर्जर्स सिन्ड्रोम (Asperger's syndrome)और फिनाइलकीटोनयूरिया untreated phenylketonuria ऐसी कुछ अवस्था हैं जिनमें ऑटिस्म की संभावना बढ़ जाती है।

परिवेश भी इसके लिए जिम्मेदार हो सकता है। कई भारी धातुओं को,जैसे की मरकुरी का एक मात्रा से अधिक संपर्क में आने को कुछ लोग दोषी मानते हैं। उनका कहना है की ऐसे बच्चों में इसको शरीर से दूर करने की पद्धति में खोट होता है और इनके रहने से जो रोग दबा हुआ होता है, वह जाहिर हो जाता है।


क्या टीकों का इनसे कोई संबंघ है?

इसका भी साफ साफ जवाब नहीं है। लेकिन कुछ टीकों को दोषी माना गया था। कुछ समय पहले यह वात काफी चर्चा में थी। खास तौर पर एम एम आर (MMR) इसकी वजह इन टीकों में प्रस्तुत मरकुरी को माना गया था। ठीक ठीक ऐसी बात का सबूत नहीं है।

जो भी है शोध जारी है।

http://www.youtube.com/watch?v=zN20SkRgGz0


एक खास चौकसी की आवश्यकता फ्लू वैक्सीन्स को लेकर है। इसमें मरकुरी की मात्रा 25 माइक्रो ग्राम है। यह मात्रा बाकी सभी टीकों को मिलाकर भी देखा जाये तो ज्यादा है (0.4 माइक्रो ग्राम)

जब तक इस बात की पुष्टी नहीं हो जाती कुछ भी पक्के तौर पर कहना गलत होगा। किंतु जिन बच्चों को ऑटिस्म है उनके भाई बहन मे, या जिन में जेनिटिकली ऐसे रोग की सँभावना है वहाँ सावधानी बरतना ही बेहतर होगा।

क्या ऑटिस्म वास्तव में इतनी शीघ्रता से बढ़ रहा है? अगर हाँ तो क्यों?

अगर अंकों पर जाये तो हाँ ही जवाब होगा। किंतु एक खास बात जिसे नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता वो यह है की ऑटिस्म की परिभाषा, उसके प्रति सतर्कता, उसपर लगे अंकुश,उसकी विविघता की स्वीकृति, समाज और पाठशाला में खास ध्यान -इन बातों में तेजी से बदलाव आया है। हो सकता है की अंकों पर इन बातो का असर पड़ा हो। फिर भी यह भी सच है की इतने बच्चों को ऐसी तकलीफ है और उन्हे और उनके परिवार को हमारे स्वीकृति और दिलासे की जरूरत।

ऑटिस्म से ग्रसित होने की उम्र कब है? क्या किसी व्यस्क को किसी ट्रौमा के बाद ऑटिस्म हो सकता है?




जिन बच्चो को ऑटिस्म होती है उनमें ऐसी प्रवृति रहती है। कई बार कुछ वक्त गुजरने के बाद ही इसके लक्षण समझ आते हैं। कुछ में टीकों के बाद प्रवृति में खास गिरावट देखी गई है। कुछ के कारण उनमें मौजूद जेनेटिक रोग हैं।

कुल मिलाकर बात यह है की जो रोग उपस्थित है ,इसका निदान कब हो पाता है।

किसी ट्रौमा के बाद ऐसे लक्षण दिख सकते हैं। मनुष्य के दिमाग के कनेक्शन्स इतने जटिल है की कहीं कोई केबल के टूट जाने पर ऐसे लक्षण जाहिर हो सकते हैं। किंतु इन्हे ऑटिस्म नहीं कह सकते।

हाँ जिन्हे ऑटिस्म है...वह व्यस्क हो जाये तब भी ऑटिस्टिक ही रहते हैं। कोई और मानसिक दबाव इनपर ज्यादा बुरा असर दिखाता है।

हम सब कई बार अपने स्वस्थ, सामान्य बच्चों से परेशान हो जाते हैं। उनकी नादानियों कभी परेशान करती है, उनकी जरूरतें कभीकबार हमारे समय पर एक डिमांड सा महसूस होती हैं....। थकान, तनाव और रोज़मर्रा की जिन्दगी के अपने अलग किस्से हैं...ऐसे में ऐसे बच्चों की परवरिश करना आसान नहीं है।

आज की यह पोस्ट ऐसे बच्चों और उनसे जुड़े हर माता पिता और केयरगीवर को समर्पित।


http://www.youtube.com/watch?v=03bcE9xYKos&feature=related







Refeences
www.autism-society.org
www.autismkey.net
http://www.time.com/time/magazine/article/0,9171,1576829,00.html


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Tuesday 26 August 2008

ऑटिस्म

जिस विषय पर आज चर्चा करना चाहती हूँ....उसके लिए थोड़ा समय निकाल कर चिंतन करना जरूरी है। हर बीस मिनट में एक बच्चा ऑटिस्म लेबल्ड। इसके विषय में हमारी जानकारी सीमित।
अगर हम अमेरिका और आसपास की जगह के सर्वे पर एक नज़र ड़ालें तो महसूस होता है की यह एक ऐसी अवस्था है जो दिन ब दिन बढ़ती जा रही है। एक ऐसी चुनौती है जिसके बारे में जानना हमारे लिए आवश्यक है।






http://www.fightingautism.org/idea/autism.php


ऑटिस्म यानि आत्मानुचिंतन या स्वलीनता ।
एक नज़र में ऑटिस्म से ग्रसित बच्चे बाकी बच्चों से अलग नहीं दिखते। इसी वजह से इन बच्चों को अक्सर ज्यादा शैतान और जाहिल समझा जा सकता है।

http://www.youtube.com/watch?v=IWyrit6i9aI&feature=related






ऑटिस्म आखिर है क्या ?! यह एक ऐसी अवस्था है जो मस्तिष्क के सामर्थ्य को कम करती है। इससे ग्रसित व्यक्ति की अपने आसपास की बात की समझ और उस पर प्रतिक्रिया अनुपयुक्त होती है। इस कारण उनका स्वभाव बाकियों से भिन्न होता है।
उन्हे जरूरत और चाह के हिसाब से उपयुक्त शब्द नहीं मिलते। कई बार सही शब्द की तलाश में एक ही शब्द या वाक्य दोहराते जाते हैं। लोगों की बात ना समझ पाना एक बड़ी उलझन होती है। हर शब्द साफ सुनने के बावजूद वे उसका सही अर्थ समझने में असमर्थ होते हैं। ऐसे बच्चे के मन के भाव तेजी से बदलते हैं। जो बच्चा हाल में प्रसन्न दिखता है अगले ही क्षण दुखी, खीजा हुआ, गुस्सैल हो सकता है। कोशिश करने पर भी अपनी बात व्यक्त ना कर पाने की बेबसी इसकी वजह हो सकती है। कई बार वजह समझ पाना मुश्किल होता है। सच तो यह है की वजह बहुत कुछ और कुछ भी हो सकता है। इन वजहों की लिस्ट बनाना नामुमकिन ना सही बहुत ही मुश्किल साबित होता है। यह अपने आप में इन बच्चों और इनका ध्यान रखने वाले और परवरिश करने वालों के लिए चुनौती साबित होता है। उलझनें, भ्रांतियाँ,निराशा और कुण्ठा बढ़ती जाती है। बहुत बच्चे एक ही पद्धति से कार्य करते हैं। इसमें ज़रा भी फेर करने पर स्वभाव बदल जाता है। कई गुस्सैल, परेशान, निराश हो जाते हैं नहीं तो डर जाते हैं। हर चीज़ अगर एक निर्धारित क्रम में चलता रहे तो वे संतुष्ट रहते हैं और अगर परिस्थिति का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सके तो स्वयं को असुरक्षित पाते हैं। एक अवस्था से दूसरे तक जाने में भी उनका संतुलन खोता है।
हकीकत इन्हे भ्रमित करती है। एक बात और चीज़ को दूसरे से जोड़ कर देखना इनके लिए बहुत मुश्किल होता है।

ऑटिस्म को स्पेक्ट्रम डिसॉर्डर कहते हैं। हर बच्चे को यह अलग मात्रा में ग्रसित करती है । कुछ को कम, कुछ को ज्यादा। हर बच्चा अलग।

आम तौर पर तीन बातों में कमी पाई जाती है
संवाद
कल्पना
अंतःक्रिया


जितनी आसानी से एक आम बच्चे के लिए दुनिया का होना है....उतना ही मुश्किल है ऐसे बच्चे का दुनिया की साधारण बातों को समझना।



कुछ आम तौर पर दिखने वाले लक्षण

बोलचाल का कम होना
भाषा से अलग आवाज़ निकालना
देर से बोलना सीखना
एक ही शब्द,वाक्य बार बार बोलना
मैं और तुम जैसे सर्वनाम के प्रयोग में गलती करना
मेलमिलाप कम करना और नापसंद करना
आँख ना मिलाना
पूछी बात पर प्रतिक्रिया ना देना
चिढ़चिढ़ा पहना
हाथों से विशेष लगाव
हाथ हिलाते रहना,कूदना,गोल घूमना, बैलेंस बनाने की कोशिश करना,ऐड़ी पर चलना
कुछ आवाज़ों को सख्त नापसंद करना
कुछ कपड़ों, खाने की चीज़ों को नापसंद करना
पैटर्न्स में बात दुहराना
अनिच्छुक रहना
खुद को नुकसान पहुँचाना

इनमें से कई बातें हो सकती है और कई नहीं भी। हर बात की तीव्रता भी अलग हो सकती है। हर बच्चा अलग होता है...और उसका सामर्थ्य भी।



हमारे पास एक ही विकल्प है....सही दृष्टिकोण चुनने का....

http://www.youtube.com/watch?v=_IhG9CgQ49g







कुछ गलत धारणायें
1. ऑटिस्म से ग्रसित बच्चे कभी आँख नहीं मिलाते।
ऐसा नहीं है। और काफी बच्चे निरंतर प्रयास करने के बाद सीखते भी हैं।

2.ऐसा बच्चा जीनियस होता है।
हर आई क्यू का बच्चा ऑटिस्टिक हो सकता है।

3.ऐसा बच्चा प्यार नहीं दिखाता, समझता।
प्यार की अभिव्यक्ति इन बच्चों के लिए मुश्किल जरूर है...असँभव नहीं। लगातार कोशिश के बाद बच्चे प्यार जताना और दिखाना सीख जाते हैं।

4.बच्चे में सुधार का मतलब बच्चे को तकलीफ नहीं है।
सुधार का मतलब प्रयास, स्नेह और साँत्वना है।

5.मुस्कुराते बच्चे का मतलब वह ऑटिस्टिक नहीं है।
गलत। हर लक्षण की तीव्रता अलग हो सकती है।

6.समय के साथ ऑटिस्म पीछे छूट जाता है।
नहीं।इसे उपचार और लगातार प्रयास की जरूरत है। जिसके बाद ऐसे बच्चे अर्थपूर्ण जीवन पा सकते हैं।

7.खराब परवरिश इसके लिए जिम्मेदार है।
गलत

http://www.youtube.com/watch?v=eoUx4D4rdro&feature=related



दो तरह के टेस्ट हैं जिनसे ऑटिस्म के होने की आशंका जताई जा सकती है।

CHAT(Checklist for Autism in Toddlers test)
http://www.paains.org.uk/Autism/chat.htm

ATEC Test(Autism Treatment Evaluation Checklist )
http://www.autism.com/ari/atec/

कोई भी शंका के होने पर बाल रोग विशेषज्ञ नहीं तो चाइल्ड सायकोलोजिस्ट से मिलें। किसी निश्चय पर स्वयं पहुँचने के अपने खतरे हैं। इस अवस्था के होने पर सही निदान और उपचार और लगातार प्रयास जरूरी है। सही दृष्टिकोण हो तो ऐसे बच्चे अर्थपूर्ण अस्तित्व पा सकते हैं। ऐसे बच्चे निर्धारित लक्ष्य पा सकते हैं। जीवन में कुछ बन सकते हैं।

ऑटिस्म अभिव्यक्ति के गूंगेपन जैसी अवस्था है । व्यक्तित्व पर एक ऐसा ताला जिसकी चाभी गुम हो। एक व्यक्ति स्वयं अपने शरीर मे कैद। ऐसी बेबसी की कल्पना भी हमारे लिए मुश्किल है। इस रोग से जूझते बच्चे और उनका परिवार हमसे सिर्फ स्वीकृति चाहते हैं। यह अलग हैं..बुरे नहीं।

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Wednesday 13 August 2008

जुड़वा बच्चे


जुड़वा बच्चों ने हमेशा आकर्षित किया है। बचपन में हमेशा सोचती थी कितना अच्छा होता मेरी भी कोई जुड़वा बहन होती। एक शरीर में तीन दिल....कुदरत का करिश्मा ही है।

जब सगर्भा स्त्री को बताया जाता है तो अक्सर वह खुश से ज्यादा आशंकित हो जाती है। आने वाली कई परेशानियों को सोच कई सवाल उसके मन में उठते हैं। जहाँ तक मैं समझती हूँ कुछ बातों का ध्यान रखा जाये तो यह दुगुने खुशी का अवसर बन सकता है।

साधारण गर्भ में जहाँ 9-10 कंसल्टेशन काफी होते हैं वहीं जुडुवा बच्चों के साथ इससे ज्यादा की जरूरत है। दो अल्ट्रासाउंड भी काफी नहीं है।

कोई भी निश्चित की गई डॉक्टर से मुलाकात नहीं चूकनी चाहिए। रक्तचाप, खून में शक्कर, अनीमिया वगैरह के लिए नियमित जाँच जरूरी है।

जहाँ जुड़वा बच्चों का गर्भ एक सामान्य बात है वहीं इसमें अधिक सावधानी की जरूरत से इंकार नहीं किया जा सकता।
डॉक्टर और सगर्भा की कोशिश होनी चाहिए की गर्भ निर्धारित समय तक टिक सके। अधिकतर 37वे हफ्ते तक ही शिशु गर्भाशय मे रह पाता है। कोशिश होनी चाहिए की किसी भी कारण से शिशु का जन्म समय से पहले ना हो। कई सगर्भा सत्रियाँ पूरे 40 हफ्ते पूरा करती है और सामान्य प्रसव से ही इन शिशुओं का जन्म भी होता है। 40 वे हफ्ते के बाद भी अगर सामान्य तरीके से प्रसव ना हो तो कुछ डॉक्टर सिज़ेरियन करना पसंद करते हैं।



दो तरह के जुड़वा बच्चे होते हैं। आइडेन्टिकल और नान आइडेन्टिकल( फ्रैटर्नल) । आईडेन्टिकल जुड़वा बच्चे लिंग, रूप रंग, स्वभाव मे एक से होते हैं। आइडेन्टिकल जुड़वा बच्चों के बीच एक ही आँवल (प्लासेंटा)होता हैं।



आइडेन्टिकल बच्चों में ट्विन ट्राँसफ्यूशन सिंड्रोम का खतरा अधिक होता है। इसमें एक बच्चे का विकास दूसरे के व्यय से जुड़ जाता है।

अल्ट्रासाउंड की सँख्या सामान्य गर्भ से अधिक होनी चाहिए। खास तौर पर 28 से 40 हफ्ते के बीच चौकसी रखना जरूरी है। शिशु का गर्भाशय में स्थान, आँवल का स्थान, दोनो शिशु का विकास वगैरह ऐसी बातें हैं जिस पर नज़र रखी जानी चाहिए।
अगर सगर्भा स्त्री को डायबेटिस या अपस्मार की बिमारी हो तो खास सावधानी बरतनी जरूरी है।

इस बात पर जोर देना जरूरी है कि ऐसे में खोराक, पर्याप्त आराम और सही व्यायाम (जैसे की योगा) पर ध्यान अत्यंत आवश्यक है। गर्भ के साथ जुड़ी बाकी परेशानियाँ भी अधिक महसूस हो सकती है। परिवार का सहयोग ऐसे में अहम भूमिका अदा करता है।

http://www.youtube.com/watch?v=tLPZa4Ydayw&feature=related





समस्यायें

कुछ समस्यायें खास इस अवस्था से जुड़ी है। समस्या के बारे में पता होगा तो ही समाधान के प्रति सजग हो सकेंगे।

वैनिशिंग ट्विन सिंड्रोम
कभी कभार जुड़वा में से एक बच्चा गायब हो जाता है। वजह आँवल, कोई आंतरिक त्रुटि या विकास में कोई अन्य त्रुटि हो सकती है। जो भी हो इससे माँ को बहुत तकलीफ नहीं होती। अल्ट्रासाउंड कर के पता लग सकता है। और यह शुरुआती महीनों में ही अक्सर होता है।


मिसकैरेज
इसकी सँभावना सामान्य गर्भ से लगभग दुगुनी होती है। पर सँभावना फिर भी सँभावना ही है। सही देखभाल से इसका होना काफी हद तक कम किया जा सकता है। और कभी अगर एक शिशु गिर भी जाये कोई जरूरी नहीं दूसरे के साथ भी ऐसा हो। अक्सर दूसरा शिशु स्वस्थ पैदा होता है।

प्रीएकलम्पसिया (सगर्भा अवस्था से बढ़ा रक्तचाप) और डायबेटिस की सँभावना और कठोरता दोनो इस अवस्था मे अधिक होती है। किंतु नियमित डॉक्टर से मिलना और समय पर इलाज इनको नियंत्रण में रख सकता है।


प्लासेंटल एबरप्शन
आँवल पर दरार पडकर टूटना एक गँभीर बात हो सकती है। सही खोराक की कमी और घुम्रपान इसकी कारण बन सकते हैं। इसकी वजह से समय से पहले प्रसव होने की सँभावना भी रहती है।

फीटल ग्रोत रेस्ट्रिक्शन

शिशु का विकास अपेक्षा से कम होने की सँभावना।


ट्विन ट्राँसफ्यूशन सिंड्रोम

इसके लिए सजग रहना आवश्यक है। नियमित जाँच से इसका पता लगाया जा सकता है। निदान होने पर तुरंत सलाह और उपचार जरूरी है।


एकार्डियाक ट्विन
इसकी सँभावना 1:35000 है। निदान अल्ट्रासाइंड से हो सकता है।

इन सभी से अधिक सँभावना समय से पहले प्रसव की है। अस्पताल जाने की तैयारी हमेशा रहनी चाहिए। प्रसव के समय होने वाले बदलाव का सही ज्ञान होना चाहिए। ऐसे किसी भी लक्षण के होने पर तुरंत अस्पताल जाना चाहिए।

जुड़वा बच्चों के बारे में बताते हुए महसूस हो रहा है जैसे मैं ऐसी सगर्भा माँ को सचेत और सजग करने से ज्यादा आतंकित कर रही हूँ। पर मेरी मंशा जहाँ आपकी बेफिक्री हटाने की है आपको फिक्रमंद करने की नहीं है। बिंदास रहने वाला रवैया
नहीं चल सकता और अगर आप सजग हैं और जिम्मेदार भी तो कुदरत का यह करिश्मा आपकी गोदी में पलेगा...स्वस्थ और तंदुरुस्त

http://www.youtube.com/watch?v=3meRrmsZKnM




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Monday 16 June 2008

सेरिब्रल पाल्सी (प्रमस्तिष्कीय लकवा)

http://www.youtube.com/watch?v=P8xOA8AXOVw



आज जिस विषय पर बात होगी वह है सेरीब्रल पाल्सी। यह विषय मेरे दिल के बेहद करीब है। और मैं मानती हूँ कि भले ही हमारा कोई अपना इस से ग्रसित हो कि नहीं हमें इसके बारे में जानना चाहिये। भगवान ने हमें बहुत सारी सौगातों से नवाज़ा है...इस बात का अंदाज़ा सबसे अधिक मुझे ऐसे बच्चे के सामने होता है। ऐसे बच्चे के सामने इस बात का भी अंदाज़ा होता है कि इतनी परिमितता के बावजूद यह नन्हे फरिश्ते अपार स्नेह और कोशिश के काबिल होते हैं ।आज की यह पोस्ट इन बच्चों को समर्पित....जिनके लिये मेडिकल साइंस बहुत कम कर सका है लेकिन जिन्होने जीवन के अमूल्य स्पंदन से मुझे अवगत कराया है।

क्या कभी अपनी माँ से अपने पहले कदम या पहले शब्द के बारे में पूछा है....शायद माँ ने बताया हो....

सेरीब्रल पाल्सी से ग्रसित बच्चे की माँ वह लम्हा कभी भूल नहीं सकती..ना जाने कितने इंतज़ार और तप के बाद नसीब होता है एक ऐसा खूबसूरत सा लम्हा...जिसे हम हमारे जीवन का साधारण और स्वाभाविक पड़ाव मानते हैं।
इन बच्चों में से कुछ व्हील चेयर का इस्तेमाल करते हैं,कुछ बैसाखी का, कोई ठीक से बात नहीं कर सकता तो कई खुद को किसी भी तरह व्यक्त करने में असमर्थ होते हैं।
हज़ारों की सँख्या में शिशु और बच्चे इससे हर साल ग्रसित हो जाते हैं। यह संक्रामक नहीं होता। पर यह लकवा है जो दिमाग और शरीर को मार जाता है।
ऐसे बच्चे का इसकी माँस पेशियों पर इच्छित नियंत्रण नहीं होता। मस्तिष्क ही हमें कौन सा काम, किस समय, किस तरह करना है बताता है। चूँकी सेरिब्रल पाल्सी (प्रमस्तिष्कीय लकवा) मस्तिष्क पर असर करता है , जिस हिस्से पर असर होता है उससे उसका प्रभाव निर्धारित होता है। अत: ऐसा बच्चा खाने पीने,खेलने कूदने, चलने -उठने मे असमर्थ हो सकता है।

सेरिब्रल पाल्सी (प्रमस्तिष्कीय लकवा) के प्रकार





http://www.youtube.com/watch?v=xXXH2a-thB4&feature=related




तीन प्रकार


स्पास्टिक


इससे ग्रसित बच्चा अपनी माँस पेशियों को ढ़ीला छोड़ने में असमर्थ होता है। माँस पेशियाँ सिंकुड़े हुए अवस्था में लगातार रहती हैं।

अथीटोइड

इससे ग्रसित बच्चा अपनी माँस पेशियों पर सही नियंत्रण नहीं रख पाता। लिहाजा ग्रसित माँस पेशियाँ अचानक से फड़फड़ा सकती हैं,उनमें कोई हरकत हो सकती है।

अटैक्सिक

इससे ग्रसित बच्चा संतुलन और सही तालमेल नहीं बना पाता।

मस्तिष्क का कितना और कौन सा हिस्सा ग्रसित हुआ है निर्धारित करता है कि बच्चे को तकलीफ कितनी होगी। अगर दोनो हाथ और पैर पर प्रभाव पड़े तो व्हील चेयर की आवश्यकता पड़ सकती है,अगर दिमाग का जो हिस्सा वार्तालाप का नियंत्रण करता है ग्रसित हो तो बच्चे के बात करने की क्षमता पर असर पड़ता है।

सेरिब्रल पाल्सी (प्रमस्तिष्कीय लकवा) के कारण


सही सही कारण ज्ञात नहीं है। कई बार जन्म के समय शिशु के मस्तिष्क पर आघात कारण बनता है। कई बार समय से पहले शिशु के प्रसव होने की वजह से अपूर्ण विकास कारण बनता है। जन्म पश्चात शिशु को हुई कोई तकलीफ की वजह से ऐसा हो सकता है। पर फिर भी अक्सर जन्म पूर्व मस्तिष्क को पहुँची हानि ही इसका कारण बनती है। इसकी कोई खास वजह अभी तक ढूँढ़ी नहीं जा सकी है।


डॉक्टर की भूमिका


डॉक्टर इसका निदान करने में सहायक होता है। इस बात का पता लगाता है कि शिशु किसी और रोग की वजह से ऐसा नहीं है। रोग के तीव्रता और असर का सही अंदाज़ा लगाता है। और बच्चे और माता पिता को इससे जूझने में मदद करता है। छोटी छोटी बातें, कुछ दवाइयाँ, कसरत, सही सहायक उपकरण, सीखने और सिखाने में मदद करता है। माँस पेशियों की विभिन्न तकलीफ को समझ उपयुक्त उपाय किया जाता है।

शिशु के करीबन अठारह महीने होने तक इस रोग की पुष्टी की जा सकती है। विकास की सीढीयों में कुछ असामान्य या देरी होना इसका परिचायक होते हैं।

सेरिब्रल पाल्सी (प्रमस्तिष्कीय लकवा)के साथ जीना

इस रोग से ग्रसित होना या ऐसे बच्चे की देखरेक करना काफी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।बच्चे के मस्तिष्क का दोष समय के साथ बिगड़ता नहीं है बल्कि ज्यों का त्यों रहता है। किंतु लगातार माँसपेशियों में तनाव या दूसरी तकलीफ की वजह से स्थिति बिगड़ सकती है। इसीलिये ऐसे बच्चे को उपचार की जरूरत होती है। यह उपचार शारीरिक, मानसिक, वाक शक्ति पर केंद्रित हो सकती है। कई बार शल्य क्रिया की भी जरूरत पड़ सकती है।

सेरिब्रल पाल्सी के होने का मतलब बच्चे के सार्थक जीवनयापन करने में असमर्थ होना नहीं है। यह बच्चा सोच सकता है, महसूस कर सकता है, समझ सकता है, दोस्त बना सकता है, खेलना चाहता है, हँस सकता है.....। हाँ उसकी अपनी सीमायें हैं....और बाकी बच्चों से फरक भी।

यह बच्चे और इनके माता पिता हमसे स्वीकृति चाहते हैं, थोड़ी संवेदनशीलता ...थोड़ी सी मदद और इनके बारे में थोड़ी सी समझ। वे अपनी खुद की जगह पूर्ण अधिकार से लेना चाहते हैं। जितनी कोशिश से वे अपनी बात कहते हैं...वे चाहते हैं कि हम थोड़े धीरज से उन्हे सुन लें। उन्हे अवसर दें और स्नेह भी।

पता नहीं क्यों पर हमेशा उनसे जो स्नेह मिला है हमेशा दिल भर गया है। आठ साल के पुलकित के असंतुलित हाथ से बने फूल और उनसे लिखे डगमगाये अक्षरों में मेरा नाम....उसकी वॉकर पर टिकी काया और चश्मे के पीछे से मुस्कुराता चेहरा...
ऐसे में जीवन से कई शिकायतें यूँ ही पिघल गई है ...और रूह आनन्दित हुई है।

http://www.youtube.com/watch?v=FDB8dCag3yk&feature=related




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Thursday 29 May 2008

शिशु की त्वचा- भाग 2

पिछली कड़ी के आगे

डायपेर रैश



डायपेर रैश - नाम से ही जाहिर है कि डायपेर पहनने की वजह से और उस जगह पर होता है जहाँ डायपेर त्वचा के संपर्क में आता है। यह लाल और दुखदायी होता है। मलमूत्र से भीगा हुआ डायपेर जब काफी समय तक त्वचा के संपर्क में रहता है तो त्वचा पर इस तरह असर होने लगता है। ऐसे में शिशु को सूखा रखना (खास तौर से कूल्हा और प्राइवेट (गुप्त) भाग)बेहद जरूरी है। कई बार बैक्टीरिया और यीस्ट के चेप से भी हो सकता है। दो तीन दिन में अगर ठीक ना हो तो डॉक्टर को दिखाना चाहिये। साधारण तौर पर पावडर लगा कर, सही समय पर डायपेर बदल कर, कुछ समय शिशु को खुला रख हवा लगने देना चाहिये। जिस क्रीम में ज़िक ऑक्साइड हो वह फायदा करती है।


एटोपिक डर्मटाइटिस



यह एक तरह की स्किन अलर्जी है। अक्सर ऐसे शिशु के परिवार में किसी ना किसी को अलर्जी की शिकायत होती है। कुछ भाग पर त्वजा बेहद नाजुक, सूखी होती है और यहाँ खुजली उठती है। यह गालपर, कुहनियों और घुटनों के पीछे और कई बार शरीर में पूरी जगह हो सकती है। खाने में , पहनने में, लगाने में.....किसी में भी कोई ऐसी चीज़ हो सकती है जिससे शिशु में तकलीफ शुरु हो। ठंड के मौसम में तकलीफ के बढ़ने की आशंका रहती है। जिस शिशु में यह तकलीफ है उसके और उसके माता पिता के लिये इससे जूझना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। सही समय पर सही निदान, सही और पर्याप्त उपचार और बचाव महत्वपूर्ण है। इस पोस्ट में इस विषय में और कहना मुश्किल होगा किंतु सही निदान और पर्याप्त उपचार-ना कम ना ज्यादा- आवश्यक बातें है।


नवजात शिशु में पीलिया


माँ और शिशु के ब्लड़ ग्रूप के अलग होने की वजह से जो पीलिया होता है उसके बारे में पहले ही लिख चुकी हूँ।

पीलिया सामान्य तौर पर दूसरे तीसरे दिन दिख सकता है और एक हफ्ते तक रह सकता है। शिशु की आँखों में पीलापन गँभीर पीलिया ना होने पर भी दिख सकता है। इसमें चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है। अगर शिशु सचेत है, बराबर दूध पी रहा है, पेशाब समय से कर रहा है तो चिंता की आवश्यकता नहीं है।

पीलिया होने पर धूप में शिशु को रखने की जो सलाह चली आ रही है वह गलत है। जिस वेवलैंग्थ की लाइट इस पीलिये पर असर कर सकती है वह साधारण धूप में नहीं मिल सकती। बल्कि धूप में शरीर के पानी के सूखने की वजह से पीलिया और बिगड़ सकता है।


जन्मचिह्न

नवजात शिशु में विविध प्रकार के जन्मचिह्न देखे जा सकते है। इनमें से कुछ ,थोड़े बरसों बाद गायब हो जाते हैं और कुछ जीवन भर रहते है।

कफै उ लैट



चाय कॉफी के गिरने के बाद जैसा निशान होता है। एक दो से अधिक या बड़े निशान को डॉक्टर को दिखाना जरूरी है। कभी कभार यह किसी और कमी की तरफ इशारा कर सकता है।

पोर्ट वाइन स्टेन



यह बड़े, बिना उभरे गहरे लाल या जामुनी धब्बे होते है। बहुत सारी शिराओं के त्वचा के नीचे इकट्ठा होने से यह बनते है। यह लुप्त नहीं होते।


स्ट्राबेरी हिमैन्जियोमा





स्ट्राबेरी की तरह दिखने वाले यह चिन्ह बहुत छोटे से बहुत बड़े तक हो सकते है। लाल रंग के उभरे हुए निशान होते है। असामान्य रक्तप्रवाह की वजह से यह बनते है। इसकी वजह से त्वचा फूलने लगती है और लाल दिखती है। यह जन्म के बाद बड़ने लगते है और अक्सर दस बरस तक गायब भी हो जाते है। अगर यह निशान चेहरे पर है, आँखों के पास है , नज़र पर असर करें है तो इसे उपचार की आवश्यकता है। अगर निशान लगातार बड़ रहा हो तो डॉक्टर को दिखाना आवश्यक है।

कैवर्नस हिमैन्जियोमा

काफी कुछ स्ट्राबेरी हिमैन्जियोमा की ही तरह होते है। इसमें त्वचा के नीचे की कई परतें भी अन्तर्ग्रस्त होती है। यह पहले बरस में बड़ कर पाँच से बारह बरस तक में लुप्त हो जाती है। कभी चाहो तो शल्यक्रिया से निकाली भी जा सकती है।


कब डॉक्टर को मिलें

-शिशु के व्यवहार में अंतर महसूस करें
-अगर किसी चेपी रोग के लक्षण महसूस हो
-निशान में दर्द इठे, सूजन आ जाये या गरम महसूस हो
-मध्य से लाल रेखायें जाती हुई दिखने लगे
-परू भर जाये
-गले, बगल या पेट और जाँघ के बीच के भाग में गिलटी उभर आये
-बुखार हो
-डायपेर रैश के दो तीन दिन तक ठीक ना होने पर
-कोई और नया चिन्ह उभरने पर

शिशु की त्वचा बेहद नाजुक होती है। कई परेशानियाँ महज उपयुक्त बचाव से सुलझ सकती है। बाकी जिन्हे इलाज की जरूरत है वह जादू टोना से नहीं सुलझ सकती। त्वचा का सही इलाज करवा पाना भी एक मुश्किल काम है। क्योंकि अक्सर यह धैर्य माँगती है....जो हममें नहीं होता....

कई बार ऐसे शिशु के माता पिता में हीन भावना पनप जाती है जो बिल्कुल जायज़ नहीं है। जरूरत है ऐसी स्थिति में विवेक और संवेदना की....

और अपनी सुंदरता की परिभाषा पर पुनर्विचार करने की.....





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Tuesday 27 May 2008

ज़रा मुस्कुरा दो

ब्लॉग जगत में हर विवाद के बीच में कुछ कहने का मन हुआ है....आज सिर्फ अनुरोध है...ज़रा मुस्कुरा दो...एक मौका जिंदगी को दो...एक मासूमियत को... थोड़ी हँसी बहने दो....




(http://www.youtube.com/watch?v=mnbY2jALfqI)

कहीं सुना था....
If you HAVE to make a choice between being kind and being right....choose kindness

अगर कभी चुनाव के लिये दो ही विकल्प हो- सही साबित होना या उदार होना...उदारता चुनो

स्नेह से रहना और संयत होकर अपनी बात कहना इनके लिये तो मुश्किल नहीं लगता....

Monday 26 May 2008

शिशु की त्वचा- भाग 1



टीवी और विज्ञापन में शिशु की त्वचा देखकर मन होता है काश ऐसी त्वचा हम सब को मिली होती। हर दूसरा तीसरा कॉस्मेटिक प्रोडेक्ट वादा करता है की आपकी त्वचा को फिर से शैशव की ताज़गी देगी। लेकिन जानकर अचरज होगा की शिशु की त्वचा में सामान्य तौर पर ही भिन्नता नज़र आती है। कई बार पर्याप्त ज्ञान ना होने की वजह से इन्हे रोग समझ इनका उपाय ढूँढा जाता है। कई बार इन उपायों से नुकसान ज्यादा और फायदा कम होता है।
आज ज़रा देखें सुंदरता स्किन डीप होती है या इसके और मायने हैं....

क्रैडल कैप



शिशु के सर पर जमी पपड़ी को क्रैडल कैप कहते हैं। यह शिशु के सर की त्वचा के छिल कर निकलने का लक्षण है। कई वजह समझाई जाती है लेकिन यह शिशु को नुकसान नहीं पहुँचाती। अक्सर थोड़ा तेल मालिश और स्नान से धीमे धीमे त्वचा ठीक हो जाती है। अगर पपड़ी बहुत ज्यादा है या निकल नहीं रही हो तो डॉक्टर की सलाह लेकर खास शौम्पू और औइन्टमेन्ट इस्तेमाल करना पड़ सकता है। कई बार यह महीनों तक रह सकती है। सही उपाय से हफ्ते में ठीक भी हो सकती है।


एरीदिमा टॉक्सीकम



जन्म लेने के दूसरे दिन से शरीर के ऊपर लाल धब्बे नज़र आ सकते हैं। यह शरीर में कहीं भी हो सकते है सिवाय हथेली और पाँव के तलुओं के। कई बार इन के बीच की जगह में पीली छोटी फुँसियों सी निकली होती हैं। यह नवजात शिशु में अक्सर देखा जा सकता है । पहले एक दो हफ्ते बाद यह आप ही चले जाते हैं। सामान्य है इसीलिये जाहिर है इनके लिये कुछ भी करने की जरूरत नहीं है।


मीलिया



यह बहुत छोटे सफेद मोती के रंग के मुँहासों की तरह शिशु के माथे, गाल और नाक पर हो सकते है । इनके बनने का कारण सीबम (चिकनाई बनाने वाले) ग्लैंड्स का अधूरा विकास है। इस वजह से सीबम या चिकनाई छोटे छोटे मोतियों से जमा हो जाते है। कुछ हफ्तों मे यह आप ही चले जाते है। इनके साथ छेड़कान नाकरने में ही समझदारी है।

मंगोलियन स्पॉट्स


मंगोलियन स्पॉट्स नीले, थोड़े हरे या स्लेटी रंग के निशान है जो उभरे नहीं होते। यह शिशु के पीठ और कूल्हे पर नज़र आता है। कुछ कुछ घाव के बाद पड़े नीले निशान जैसा। यह अफरीकन और एशिया के शिशुओं में सामान्य तौर पर देखने को मिलता है। जैसे जैसे शिशु बड़ा होता है यह निशान हल्के पड़ जाते है लेकिन पूरी तरह से गायब नहीं होते।
हाँ ,रोग तो ये बिल्कुल नहीं है।


पुस्चूलर मेलोनोसिस



पुस्चूलर मेलोनोसिस छोटे छोटे फफोलों की तरह उभरते है। जल्द ही सूख कर गिर जाते है। पीछे थोड़े गहरे रंग के निशान छोड़ते है। अक्सर काले शिशु में ज्यादा देखने को मिलते है।

मीलियारिया



मीलियारिया उभरे हुए द्रव से भरे छोटे फोफले होते है। यह द्रव साफ अथवा दूध सा सफेद होता है। यह पसीने की ग्रंथि के बंद होने की वजह से बनते है। यह अपने आप ही ठीक हो जाते है।

जाहिर है की उपरोक्त किसी भी बात के लिये परेशान होने की जरूरत नहीं है। इनमें से कोई भी रोग का लक्षण नहीं है। किंतु सुंदरता और शिशु के त्वचा को लेकर जो सामान्य धारणा है उससे भिन्न है। पहली बार बने माँ बाप अक्सर यह देख कर तनाव में आ जाते है। और जो समस्या ही नही उसके लिये उपाय ढूँढ़ते है।

चाहे आपके शिशु की त्वचा आपके परिभाषा अनुरूप प्रवीण ना भी हो....शिशु सुंदर ही है....

Afterall beauty is DEFINITELY NOT skin deep !!!






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Saturday 10 May 2008

नवजात शिशु के सामान्य रिफ्लेक्सस एवं इनका महत्व

कुछ रिफ्लेक्सस नवजात शिशु में जन्म से ही पाये जाते है। यह प्रारम्भिक रिफ्लेक्सस शिशु जब उदर में होता है तब विकसित होते है। जन्म के समय इनका पूर्ण विकास होना आवश्यक है। जन्म के तीन माह पश्चात से बारह माह तक दिमाग का उच्चतर केन्द्र इन पर नकारात्मक दबाव ड़ालता है और इन पर वाँछित नियंत्रण विकसित करता है। जन्म के वक्त इनका होना शिशु के जीवित रहने के लिये जरूरी है।

इन रिफ्लेक्सस की अपनी समय सारिणी है। माता पिता को इसका थोड़ा बहुत ज्ञान होना आवश्यक है। इस समय सारिणी से अलग जब भी कोई महत्वपूर्ण फेर शिशु में दिखे तो चेतना आवश्यक है। सही समय पर छोटी बातों पर ध्यान आ जाये तो बड़ी मुसीबते बड़ी उलझने बनें इससे पहले उनका कोई उपाय किया जा सकता है।

इन रिफ्लेक्सस में उल्लेखनीय है चूसना, निगलना, आँखें मीचना, मलमूत्र क्रिया, हिचकी आना...वगैरह। जैसा की पहले भी बताया इनका होना शिशु के जीवित रहने के लिये अत्यावश्यक है।

शिशु का उदर में विकास संपू्र्ण होने के लिये उसे उदर में 37 हफ्ते से 40 हफ्ते तक बिताने जरूरी है। ऐसे शिशु के प्रसव को फुल टर्म डेलिवरी कहते हैं।

जन्म होते ही शिशु को पाँच बड़े बदलाव से सामना करना पड़ता है-
• शिशु जो उदर के अंदर जलचर होता है वह पहली बार स्वतंत्र साँस लेता है।
• पहली बार खुराक मुँह से लेकर पचाना सीखता है
• मलमूत्र क्रिया पहली बार संपन्न करता है
• अपने शरीर का तापमान बनाये रखता है
• रक्त से निरंतर खुराक मिलने की जगह भोजन अंतराल पर मिलने की आदत ड़ालता है


शिशु के लिये यह बदलाव छोटे नहीं है। इस बदलाव से सहजता से गुजरने के लिये रिफ्लेक्सेस जरूरी है।

दिमाग, रीढ़ और नसों की व्यवस्था सही तरह से विकसित होने का एक महत्वपूर्ण लक्षण है सामान्य रिफ्लेक्सेस का होना।

ऱिफ्लेक्स को टेस्ट करने की क्रिया को स्टिमुलेस और उस स्टिमुलेस की प्रतिक्रिया को रेस्पौन्स कहते हैं।

रूटिंग रिफ्लेक्स
इस रिफ्लेक्स को पर्दर्शित करने के लिये शिशु के गाल पर या मुँह के कोने पर हल्का सा सहलाने पर शिशु तुरंत मुँह फेर कर सहलाये गई जगह की तरफ मुँफ फेर कर और खोलकर स्टिमुलेस की तलाश करने लगता है। अक्सर यह माँ के स्तन के छूने पर होता है। और स्तन से संपर्क में आते ही शिशु तुरंत मुँफ फेर कर,स्तन तलाश , मुँह खोल स्तन को मुँह में ले लेता है। यह रिफ्लेक्स पैदाइशी रहता है और तीन चार माह जन्म पश्चात गायब हो जाता है।




सक्खिंग रिफ्लेक्स (चूसना)

इस रिफ्लेक्स को पर्दर्शित करने के लिये उँगली से शिशु के तालू में सहलायें तो शिशु तुरंत उँगली चूसने लगता है। यह क्रिया तुक में और बलपूर्वक तरीके से की जाती है। चूसने के बाद निगलने की कर्िया शामिल है।रूटिंग रिफ्लेक्स की ही तरह यह भी पैदाइशी रहता है और तीन चार माह जन्म पश्चात गायब हो जाता है। जाहिर है कि इससे शिशु माँ का दूध चूस पाने में सक्षम होता है।



मोरोस रिफ्लेक्स

शिशु जब अपने पीठ के बल लेटा हुआ हो तब कोई अचानक से की गई ऊँची आवाज़ या गरदन पर दिया सहारा आकस्मिक तरीके से छोड़ने की प्रतिक्रिया में शिशु सहसा ही अपना सर हिला देता है।शिशु अपने दोनो हाथ और पैर पहले फैला देता है और फिर मोड़ लेता है। अंत में शिशु चिल्ला कर रो पड़ता है।शरीर के दोनो भागों में अगर यह प्रतिक्रिया एक समान ना हो तो घ्यान देना और चिकित्सक के ध्यान में लाना जरूरी है।

अगर यह रिफ्लेक्स शिशु में नहीं हो तो शिशु की जाँच आवश्यक है क्योंकि इसका इशारा नसों या दिमाग में कमजोरी की तरफ हो सकता है।



ऐसा ही एक और रिफ्लेक्स है टोनिक नेक रिफ्लेक्स

Tonic Neck Reflex


यह लगभग छह सात महीने तक गायब हो जाता है। इसके गायब होने पर ही शिशु घुटनों पर चलना सीखता है।

ग्रास्पिंग रिफ्लेक्स
शिशु की हथेली में उँगली ड़ालो तो शिशु तुरंत उँगली पर पकड़ मजबूत कर देता है। करीबन छह महीने तक यह रिफ्लेक्स रहता है जिसके बाद शिशु अपनी इच्छा से पकड़ना और छोड़ना सीखता है।



बैबिन्सकी रिफ्लेक्स

शिशु के पाँव के तलुओं पर हल्का सा खंरोच दो तो पाँव की उँगलियाँ फैला कर ऊपर की तरफ मुड़ जाते है। यह रिफ्लेक्स छह से नौ महीने पर गायब होता है जिसके बाद शिशु चलना सीखता है।

वाल्किंग रिफ्लेक्स

शिशु का पैर नीचे रखो तो शिशु चलने की तरह कदम बड़ाने लगता है।




नवजात शिशु में इन रिफ्लेक्स का होना तस्सली देता है कि शिशु के नसों और दिमाग की व्यवस्था सही एवं संपूर्ण है। इन रिफ्लेक्स का ठीक समय पर गायब होना और शिशु का अलग अलग कार्य इच्छानुसार कर सकना विकास की अगली सीढ़ी है। ऐसा नहीं कर पाना और इन रिफ्लेक्स का समय से अधिक रहना भी चेतने का विषय है।

हर माता पिता का इस विषय में प्राथमिक ज्ञान आवश्यक है। इससे वे ठीक समय पर ,"चलता है बच्चा है बड़ा हो जायेगा " वाली मानसिक स्थिति से सही समय पर निकल; जो भी सही और जरूरी उपाय है लेने में सक्षम होंगे।




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Wednesday 30 April 2008

स्तनपान




शिशु के जन्म होते ही पहले स्पर्श का भी समय हो जाता है। स्पर्श की तपिश और अनुरक्ति का अहसास इतने बचपन में भी होता है। माँ की गर्मी के पास और साथ रह कर शिशु एक जुड़ाव महसूस करता है, स्वयं को सुरक्षित महसूस करता है। शिशु को साफ और मुलायम कपड़ो में सही तरीके से लपेट कर जितनी जल्दी हो सके माँ को सौंप देना चाहिये। प्रसव के आधे घंटे के अंदर स्तनपान करवाना चाहिये। यह अवधि सीज़ेरियन प्रसव से हुए बच्चों के लिये एक घंटा मानी जा सकती है।

स्तनपान की बात आते ही हमारे प्रोफेसर की एक बात याद आती है। Cow's milk is for the calf....your child needs yours!! गाय का दूध बछड़े के लिये...तुम्हारे बच्चे को तुम्हारे दूध की जरूरत है।

माँ के दूध पर आधारित सभी कहावतों और डायलॉग्स के पीछे एक ठोस आधार है। हर माँ का दूध उसके शिशु के लिये एकदम उपयुक्त होता है। मतलब कि अगर शिशु 28 हफ्ते में ही जन्म ले तो उसके पाचन शक्ति और जरूरत के हिसाब का सही मात्रा में प्रोटीन्स, विटामिन्स और चर्बी दूध में होती है। जैसे उस शिशु के लिये उसके जरूरत के अनुसार खास ऑर्डर पर तैयार किया गया हो।

माँ का दूध मतलब माँ के आँचल में रह कर मिलने वाली खोराक- साफ, बिना झंझट, हमेशा फ्रेश, स्टेरिलाइसेशन की आवश्यकता से दूर, हमेशा माँ के पास, माँ के साथ...सही मात्रा में प्रोटीन, विटामिन्स,ग्लूकोस, फैट। साथ में रोग प्रतिकारक शक्ति। माँ से लगातार गहराता जुड़ाव। काउ मिल्क अलर्जी से दूर।

फायदें इतने हैं कि यह समझना कठिन है कि यहाँ भी फैशन ने बाजी मार ली है। फैशन, ट्रैन्ड, फिगर और कठिनाई जैसे बहानों का इस्तेमाल कर शिशु को इससे वँचित रखना दुखद है।

खैर।
नवजात शिशु को देखना हमेशा एक सुंदर अनुभव रहा है। माँ के पास गर्म , मुलायम कपड़ों में लिपटा शिशु जल्द ही बगल में मुड़कर माँ को तलाशना शुरु करता है। होठों पर जीभ फेरकर दूध की माँग रखता है। यही सही समय है स्तनपान शुरु करने का।

शिशु के लिये स्तनपान सीखी हुई एक बात है। किन्तु पहली बार बनी माँ के लिये यह एकदम नया अनुभव है। माँ को सहजता से इसकी शुरुआत करनी चाहिये। माँ की विकलता शिशु तुरंत भाँप लेता है...इसीलिये परेशान माँ का शिशु भी अक्सर चिढ़चिढ़ा हो जाता है।

पहली बार स्तन से लगाना अपने आप में एक प्रक्रिया है। इसे लैच्चिंग ऑन कहते हैं। अगर सही तरीके से स्तनपान की शुरुआत की जाये तो माँ और शिशु के बीच के रिश्ते को अच्छी और तनाव रहित शुरुआत मिल सकती है।
1.शिशु का मुँह पूरी तरह खुलवायें। हल्के से शिशु के होंठ स्तन पर लगाने से वह पूरा मुँह खोल देगा...ऐसे जैसे उबासी में खोलते हैं।
2. फिर जिस हाथ में शिशु को सँभाला है उसे पास लाकर शिशु को स्तन के पास लाना है। ध्यान रहना चाहिये कि शिशु को माँ की तरफ लाया जाये ना कि माँ को शिशु की तरफ।
ध्यान रहे कि शिशु के मसूड़े स्तन के आसपास के एरियोला (स्तन के पास गहरे रंग की त्वचा)को पूरी तरह से मुँह के अंदर लें। शिशु के होंठ बाहर की तरफ मुड़े हुए हों।
3. इतना करने पर शिशु स्तन चूस कर दूध पीने की कोशिश करेगा।

(स्तनपान का सही तरीका जानने के लिये नीचे दिये लिंक पर जायें)

http://www.youtube.com/watch?v=Zln0LTkejIs

अगर शिशु स्तन से सही तरीके से जुड़ा हो और सही तरह से चूस रहा हो तो इस प्रक्रिया में स्तन में दर्द नहीं उठना चाहिये। अगर दर्द उठे तो स्तनपान रोक कर फिर कोशिश करनी चाहिये। शिशु के स्तन पकड़ने पर वैक्यूम बनता है और सक्शन एफैक्ट से दूध खिंचता है। जब भी शिशु को स्तन से हटाना हो तो स्तन और मसूड़े के बीच उँगली ड़ाल कर पहले वैक्यूम खत्म करें। कभी भी गलत तरीके से स्तनपान जारी ना रखे। इससे स्तन पर चीरे पड़ने का डर रहता है और शिशु को भी पर्याप्त मात्रा में दूध नहीं मिलता।

माँ और शिशु के रिश्ते का एक अहम पहलू है स्तनपान। माँ की खुशबू, सपर्श की तपिश, और माँ की गोद की सुरक्षा...इन सबके लिये पहला अनुभव है स्तनपान। स्वाभाविक क्रिया है और जितना सहजता और आनंद से निभाया जाये उतनी ही संतुष्टि दोनो को मिलती है।

छह महीने तक शिशु को मात्र स्तनपान देने से उसकी सभी खोराक की जरूरत पूरी हो जाती है। सिर्फ माँ का दूध उसके लिये पर्याप्त है। इसे एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीड़िंग कहते हैं। छह महीने से माँ के दूध के अलावा कुछ और भी शुरू किया जाना चाहिये। स्तनपान मात्र खोराक ही नहीं पूरा करता किंतु इससे शिशु का पहला स्नेह संबंध बनता है।

(http://www.youtube.com/watch?v=cVbZmCQT6Ec&feature=related)


कहते हैं भगवान ने माँ को इसलिये बनाया क्योंकि हर जगह हर समय हर शिशु के पास नहीं रह सकता....काश हर शिशु के पास उसका अपना भगवान ......उसकी माँ हो....जो उसे ममता से सँभाल,दूध से सींच,स्नेह से छू....उसको उसकी अपनी पहचान दे.....





( photo courtesy breastfeeding.com)

Wednesday 9 April 2008

विरासत में रोगाणु ?!

इस ब्लॉग के नियमित पाठकों से क्षमा। व्यस्तताओं के चलते थोड़ा विलम्ब हुआ।

शिशु माँ से खुराक, औक्सीजन जीन्स वगैरह पाता है। साथ ही अगर माँ किसी रोग से पीड़ित है तो कई बार रोग भी विरासत में पा लेता है। इसके बारे में जानना जरूरी है क्योंकि कोई माँ अपनी वजह से अपने शिशु में किसी प्रकार का रोग नहीं देखना चाहती।
सही जानकारी,जाँच और इलाज शिशु की रक्षा कर पाने में अधिकतर सक्षम होते हैं।

रोग किस प्रकार से माँ से शिशु तक पहुँच सकता है?

• नाल से। टौक्सोप्लास्मा, ट्रीपोनिमा पैलिडम(सिफिलिस के लिये जिम्मेदार),रुबेल्ला, सी एम वी(साय्टोमेगालेवायरस),लीस्टीरिया, फाल्सीपारम(मलेरिया)
• वर्द्धमान मातृक इनफेक्शन ( माँ से शिशु की ओर बढ़ता हुआ)-कोरियोएम्नियेनाइटिस
• प्रसव के दौरान- माँ के रक्त और योनि से संपर्क में आने पर। HIV (एड्स), HZV( चिकनपौक्स-माता), HBV (हैपाटाइटिस बी-जहरी कमळा) और क्लैमीडिया ट्रैकोमैटिस ( कनजंक्टिवाइटिस)
• प्रसव के बाद-स्तनपान से फैलने वाले


गर्भ से पहले और गर्भ के दौरान होने वाले परीक्षण से रोग के होने या हो सकने की सँभावना का पता लगाया जा सकता है। सही समय पर सही कदम लेने पर प्रतिकूल परिणाम से शिशु को बचाया जा सकता है।
TORCH के नाम से यह रोग जाने जाते रहे हैं। (टौक्सोप्लास्मा, रुबेल्ला, सी एम वी(साय्टोमेगालेवायरस), हर्पिस) ।
अक्सर गर्भ ठहरने के करीबन सोलहवें हफ्ते में इन रोगों के होने की जाँच की जाती है।


टौक्सोप्लास्मा

यह रोग अगर शिशु में हो तो शिशु के मानसिक विकास पर असर पड़ सकता है। शिशु अँधपन एवं अपस्मार का शिकार हो सकता है।
इससे बचाव के लिये इसके होने के तरीकों का जानना आवश्यक है। कच्चा गोश्त, मुर्गी, सीफुड़, बिना धोये फल और सब्जियाँ, बिल्ली या उसके मल से किसी प्रकार का संपर्क इस रोग को माँ तक पहुँचा सकता है। जाहिर है की कच्चा गोश्त ,मुर्गियों और बिल्लियों से दूर रहना चाहिये और फल और सब्जियाँ धोने के बाद ही हाथ लगानी चाहिये।


रुबेल्ला

रुबेल्ला से ग्रसित होने पर शिशु के पूरे विकास पर असर पड़ता है। मोतियाबिन्द, छोटी आँखें,हृदय की बनावट में बुनियादी खामी,(पैटेन्ट डक्टस आर्टिरियोसिस, पलमनरी आर्टरी स्टीनोसिस, बहरापन(सेन्सरी न्यूरल डैफनस), न्यूनमनस्क (मेन्टल रिटार्डेशन), थ्रौम्बोसायटोपीनिया , बच्चे का गिरना या मरा हुआ पैदा होना सँभव है।


एम एम आर इनजेक्शन एक आसान तरीका है बचने का। गर्भ ठहरने से पहले....हो सके तो यौवन में ही हर लड़की को रुबेल्ला का ठीका लगवा लेना चाहिये।


सी एम वी(साय्टोमेगालेवायरस)

इस रोग से ग्रसित नवजात का वजन कम हो सकता है, गुर्दे पर असर,कमळा, फेफड़ों में असर, अनीमिया और बहरापन हो सकता है।

जिन में इस के रोगाणु होते हैं उनके शरीर के सभी द्रव्य से यह रोग फैल सकता है। संसर्ग, स्तनपान,ब्लड ट्रान्सफ्यूशन और औरगेन ट्रान्सप्लान्ट से भी यह फैल सकता है।

जाहिर है की किसी भी दूसरे व्यक्ति के शरीर के द्रव्य के संपर्क में आने से इसकी सँभावना बढ़ सकती है। हाथ धोना, संसर्ग के दौरान कौन्डोम का इस्तेमाल, ब्लड ट्रान्सफ्यूशन के समय डॉक्टर से तसल्ली करना अहम भूमिका निभा सकता है। नन्हे बच्चों को पढ़ाने या सँभालने वाली स्त्रियों को इस बात को लेकर खास सचेत होना चाहिये। उन्हे बच्चों के थूक,मूत्र इत्यादि द्रव्यों के संपर्क में नहीं आना चाहिये। और आये तो तुरंत साबुन और पानी का इस्तेमाल करना चाहिये।


हर्पिस





इस रोग से ग्रसित अधिकतर बच्चों में बहुत कम तकलीफ होती है। दो-तीन प्रतिशत बच्चों में वैरिसेल्ला सिन्ड्रोम हो सकता है। दागदार त्वचा, अंग का अधूरा विकास,अव्ययों, आँख और न्यूरोलौजिकल कार्य में क्षति हो सकती है।
माँ अगर चिकन पौक्स के संपर्क में प्रसव के पाँच दिन पूर्व से दो दिन पश्चात तक आये तो नियोनेटल झोस्टर की सँभावना बन जाती है। इसमें तीस प्रतिशत शिशु में जान खोने का जोखिम रहता है। इलाज( varicella-zoster immune globulin (VZIG) IM)तुरंत जरूरी है।



सभी गर्भवति स्त्रियों में HIV antibody(एड्स), Hepatitis B Surface antigen(जहरी कमळा),VDRL( सिफिलिस), मूत्र की जाँच वगैरह लाजिमी है। इन्हे करवाने के बाद डॉक्टर की सलाह आवश्यक है। स्वयं इन रिपोर्ट को पढ़ने की कोशिश कई बार गलत निष्कर्ष तक पहुँचा सकती है। परिणाम के अनुसार जरूरी दवा , नहीं तो पूर्वोपाय किये जा सकते हैं।

HIV antibody के पौसिटिव होने पर कभी छिपाया नहीं जाना चाहिये। सही समय और सही तरीके से दवा करने पर शिशु को रोगमुक्त रखा जा सकता है।








मलेरिया, मूत्र में दोष का इलाज सही समय पर करने से शिशु के स्वास्थ्य को हानि से बचाया जा सकता है। योनिमार्ग मे कोई दोष, नहीं तो प्रसव के दौरान फैलने वाले रोग से शिशु को सीज़ेरियन का विकल्प चुन बचाया जा सकता है।

रोगाणु बहुतेरे हैं...घात लगाये बैठे हुए....कई बार माँ के शरीर पर आक्रमण कर शिशु को स्वस्थ पैदा होने के विकल्प से वँचित कर देते हैं.

पर माँ और पिता इतने भी बेबस नहीं है। जरूरत है अग्रसक्रिय होने की। हर होने वाले पिता में अपने जीवनसाथी और संतान की तरफ चौकसी की जिम्मेदारी लेने की।

और माँ तो फिर माँ है....सिर्फ ममता लोरी और रात रात तक जागरण करने तक सीमित नहीं होनी चाहिये....किन्तु जिम्मेदारी सहित स्वयं को रोगाणु से मुक्त रख अगली पीड़ी की सृष्टि में अपना दायित्व निभाने की तरफ सजग होना चाहिये।




जानती हूँ काफी रूखा सूखा सा विषय है। लेकिन बहुत जरूरी और बेहद ध्यान से समझने जैसा।
बहुत छोटी बातों से बहुत बड़ी समस्या को मूल से ही उखाड़ दिया जा सकता है....
हाँ आम जिन्दगी में भी नियम अलग तो नहीं हैं... :)))

Monday 31 March 2008

शिशु पर माता पिता के ब्लड ग्रूप का महत्व

"खून के रिश्ते" बोलते समय एक जबरदस्त सा जज़्बा मन में आता है।यूँ ही नहीं शायद। खून खून में थोड़ा थोड़ा फर्क है....और माँ के दूध की ही तरह माँ बाप के खून का भी महत्व है।

माता पिता का ब्लड ग्रूप शिशु का ब्लड ग्रूप तय करता है। और बात सिर्फ तय करने तक सीमित होती तो इसे नज़रंदाज़ भी कर सकते थे। किन्तु माँ अगर आर एच नेगाटिव(Rh-) हो तो शिशु पर इसके परिणाम विविध और घातक भी हो सकते हैं। इसीलिये हर दंपत्ति को अपना ब्लड ग्रूप ज्ञात होना चाहिये।

चार ब्लड ग्रूप होते हैं। ए (A),बी (B),O(ओ) और AB(एबी) । रक्त की लाल कोशिकाओं की सतह पर कुछ प्रोटीन, ग्रूप निर्धारित करते हैं। जिनमें 'ए' ऐन्टीजन होता है उसका ग्रूप 'ए और जिसमें 'बी' ऐन्टीजन होता है उसका ग्रूप 'बी'। जिसमें दोनो होते हैं 'एबी',जिसमें दोनो नहीं होते उनका ग्रूप 'ओ' होता है।

पूरी मानव जाति इन चार ब्लड टाइप्स में बँटी है। जैसा की सर आरनल्ड कहते हैं
There is no caste in blood.
- Sir Edwin Arnold



इसके अलावा एक 'आर एच'(Rh) नाम का और प्रोटीन होता है । यह भी रक्त की लाल कोशिकाओं के सतह पर ही होता हैं। जिनमें यह होता है वह आर एच पौसीटिव और जिनमें नहीं होता वह आर एच नैगाटिव होते है।

इनके होने या ना होने से रक्त की कोशिकाओं या रक्त के गुण पर खास असर नहीं होता। पर यह भी इंसान की पहचान का एक हिस्सा हैं। जरूरत पर सही मैच का ही खून चढ़ाया जा सकता है। अगर अलग ब्लड ग्रूप का खून चढ़ाया जाये तो परिणाम चिंताजनक हो सकते हैं। करीबन 85 प्रतिशत लोग आर एच पौसीटिव होते हैं। बाकी के आर एच नैगाटिव।

एक दंपत्ति के लिये सचेत होने की शुरुआत पत्नि के 'आर एच नैगाटिव' होने पर होनी चाहिये। पति अगर 'आर अच पौसीटिव' है तो गर्भ के समय उपयुक्त उपाय करना जरूरी है। आर एच नैगाटिव माँ के गर्भ में पल रहे शिशु को 'आर एच फैक्टर ' पिता से विरासत में मिल सकता है। ऐसे दंपत्ति के आर एच पौसिटिव शिशु होने की सँभावना करीबन 50 प्रतिशत होती है।

पहले गर्भ में (जब शिशु आर एच पौसीटिव हो ),तब भी तकलीफ की गुँजाईश कम ही होती है। माँ के खून से शिशु के खून का संपर्क प्रसव के दौरान ही होता है। इस संपर्क से तात्कालिक कोई हानि नहीं होती। किन्तु शिशु के आर एच पौसीटिव खून के संपर्क में आते ही....माँ की इम्युनिटी कुदरती तौर पर इनसे लड़ने के लिये ऐन्टीबौडी की सेना तैयार करने लगती है। इन ऐन्टीबौड़ी से माँ को कोई हानि नहीं होती। किन्तु अगले गर्भ के समय भी अगर शिशु आर एच पौसीटिव हो तो यह बनी बनाई सेना शिशु पर हमला बोल देती है। यह ऐन्टीबौड़ी इतने सक्षम होते हैं कि शिशु की रक्त कोशिकाओं को तोड़ तितर बितर कर दें। इनके टूटने से बिलीरूबिन की मात्रा शिशु के रक्त में बढ़ने लगती है। नवजात शिशु को गँभीर पीलिया हो सकता है, शिशु के और कभी कभार माँ के जान को भी खतरा हो सकता है।





आर एच नैगाटिव स्त्री ब्लड ट्रान्सफ्यूशन, गर्भपात, और एक्टोपिक प्रेगनैन्सी से भी ऐसी स्थिति तक पहुँच सकती है।

इसका हल क्या है

• जागरुकता- हम सभी को अपना ब्लड ग्रूप मालूम होना चाहिये। अपने जीवन साथी की इस पहचान से अनभिज्ञ नहीं होना चाहिये।
• अगर स्त्री आर एच नैगाटिव है और पुरुष आर एच पौसीटिव तो डॉक्टर से सही समय पर सलाह और इन्जेक्शन लेने की तैयारी और तत्परता होनी चाहिये।।


आर एच इम्यूनोग्लोबिन इन्जेक्शन्स

गर्भ ठहरने के 28 हफ्ते में पहला इन्जेक्शन फिर प्रसव के 72 घंटे के भीतर दूसरा।

यह इन्जेक्शन माँ के शरीर में ऐन्टीबौडीज़ बनने से रोकते हैं। जाहिर है इसे पहले गर्भ मे ही लेना चाहिये। और चूंकि गर्भ में शिशु के ग्रूप पता लगाने की कौम्प्लीकेटड प्रोसीजर से बचना चाहिये ,यह इन्जेक्शन हर आर एच नैगाटिव स्त्री (जिसका पति आर एच पौसिटिव हो), को लेना चाहिये

अगर कुछ कारणों की वजह से यह इनजेक्शन नहीं लिये गये तो डॉक्टर से तुरंत संपर्क करें। ऐसे गर्भ को विशेष ध्यान की जरूरत है। अगर शिशु खतरे में हो तो एक्सचेंज ट्रांसफ्यूशन कर के इस शिशु के खून को आर एच नैगाटिव खून से बदला जा सकता हैं। ऐसा कई बार करने की जरूरत पड़ सकती हैं।

अगर ऐसा कुछ भी नहीं किया जा सका तो शिशु के दिमाग और किडनी पर असर पड़ सकता है। हार्ट फेल ( हृदय के पम्प करने की शक्ति विफल) हो सकता है। रक्त की कमी हो सकती है। गँभीर पीलिया हो सकता है। इन सबसे शिशु की जान जा सकती है।

समस्या गँभीर हो सकती है। पर हल कितना आसान है। ब्लड़ ग्रूप का पता होना। समय पर इंजेक्शन लेना।

किंतु दुख की बात है की भारत में अभी भी अक्सर गर्भवति स्त्री को उसके ब्लड ग्रूप के बारे में नही पता होता। इतनी सुलभता से जो बचाया जा सकता है ....उसे उतनी ही लापरवाही से हम खो आते हैं। जब तक बात पता चलती है तब तक देर हो चुकी होती है।

नवजात शिशु को कितने ही कारणों से खोया जा सकता है।

.....सुना हैं बचाने वाला मारने वाले से ज्यादा बलवान होता है...

पता नहीं......हम कब छोटी छोटी पहल कर बचाने वालों में अपना नाम दर्ज़ करायेंगे?!

Tuesday 25 March 2008

गर्भ के दौरान मनोवैज्ञानिक परिवर्तन

पोपुलर सिनेमा में गर्भ धारण होने की खबर हिरोईन की बेहोशी के साथ होती है। फिर नब्ज़ पकड़ कर प्रेग्नेन्सी टेस्ट। इसके बाद खुथी की लहर। मिठाई। फिर बहु का चमकता लजीला चेहरा। और उसके बाद लोरी गा कर सुलाती माँ।

किन्तु यह परिवर्तन इतना सहज नहीं है ।

शिशु मनचाहा बदलाव है तो माँ का मन खुश....और नहीं तो तनावग्रस्त रहता है। गर्भ धारण करते ही स्त्री अत्यंत संवेदनशील हो जाती है। हर भाव की अत्युक्ति करना स्वभाव में शामिल हो जाता है। छोटी से छोटी बात रुला देती है, हँसा सकती है, डरा देती है।

गर्भ के समय को तीन महीने के अवधि अनुसार देखा जाये तो तीन भाग में बाँटा जा सकता है।

पहले त्रिमाही भाग में स्त्री अपने में बदलाव महसूस करती है। यह बदलाव बाकियों को नज़र ना भी आये वह लगातार इसका अनुभव करती है। ऐसे में अक्सर पत्नि अपने गर्भ के बारे में भूलती नहीं....और पति को कभी कभार ही याद आता है। कुछ स्त्रियाँ इस समय भावनात्मक स्तर पर बेहद परेशान हो जाती हैं। उल्टियों का होना और शरीर में जल्द होते बदलाव तनाव को और बढ़ा सकता है। कई बार शरीर की तकलीफ तनाव की वजह से भी बढ़ सकती है।

ऐसे में पति का रवैया, सखी सहेलियों का साथ और कामकाज़, गृह गृहस्थि में तनाव का असर स्त्री के स्वभाव पर असर करता है। रियायत और विश्राम काफी हद तक मदद कर सकते हैं।

दूसरे भाग में स्त्री अपने इस नई पहचान की तरफ थोड़ी सहज हो चुकी होती है। बीसवें हफ्ते से शिशु के उदर में हिलने को महसूस कर सकती है। उसे शिशु का अपने से अलग एक अस्तित्व के होने पर विश्वास होने लगता है। इस समय स्त्री का वज़न तेजी से बढ़ता है। उसे अपने सौंदर्य पर और आकर्षण पर संदेह होने लगता है। वह अपने पति को लगातार आँकती है कि उसकी नज़र में वह अब भी खूबसूरत है कि नहीं। अपने जीवन साथी पर उसकी निर्भरता बढ़ जाती है। वह हिम्मत चाहती है कि उसका जीवनसाथी जरूरत में उसके साथ होगा। उसमें रुचि लेगा। उसकी तकलीफ समझेगा। ऐसे में दंपति को एक दूसरे के साथ समय बिताना चाहिये। आगे आने वाले जीवन के बारे में बात करनी चाहिये। दूसरे त्रिमाही भाग में स्त्री में संभोग की इच्छा भी होती है और इससे नुकसान की सबसे कम सँभावना होती है।

तीसरे भाग तक स्त्री काफी हद तक संयत हो चुकी होती है। एक नये जीवन को सँभालने के लिये खुद को सक्षम पाती है। अगर गर्भ के समय उसे बाकी तकलीफ नहीं सहनी पड़ी हो तो वह बाकी लोगों का ध्यान और प्यार का आनंद लेती है। भरी बस में सीट दिया जाना....सभी के आदर से पेश आने से वह महत्वपूर्ण महसूस करती है।

इसी बात का कुछ कामकाज़ी स्त्रियों पर उल्टा असर भी होता है। उनके कार्यक्षमता को कम आँका जाता है। बीमार समझा जाता है। समय आने के पहले ही उनसे महत्व के काम ले लिये जाते हैं।

बाहरी व्यवस्थाओं का उसकी अवस्था पर सीधा असर पड़ता है। उसे किसी दूसरे स्त्री के सानिध्य की जरूरत महसूस होती है जो उसे इन परिवर्तनों की तरफ सहज कर सके।

जैसे जैसे समय करीब आता है उसके संशय बढ़ने लगते हैं।

स्त्री को गर्भवति होने पर साथ, प्यार, सानिध्य और सहानुभूति की जरूरत होती है। इस समय उसकी अतिसंवेदनशीलता को समझना और अनुरूप व्यवहार करना भी आवश्यक है।

दोनो स्त्री और पुरुष इस समय अपने बचपन के दिनों में लौटते हैं। उस समय की किसी बात पर हुई असंतुष्टता फिर उभरती है। अपनी नई पहचान कभी बहुत उल्लासित तो कभी दुखी करती है।

पुरुष अपनी पत्नि के बदले रूप से कम प्रभावित नहीं होता। उसका बदला स्वभाव उसके लिये कभी आश्चर्य तो कभी दुख और तनाव का कारण बनते हैं। स्त्री की अतिसंवेदनशीलता के सामने वह अपने आप को बेबस महसूस करता है। वह खुद अपनी योग्यता पर शक करता है। स्त्री के शारीरिक संरचना में आने वाले बदलाव भी उसको प्रभावित करते हैं।

इस दौरान एक दंपत्ति को लगातार एक दूसरे के साथ और विश्वास की जरूरत होती है।

गर्भवति होने पर अजीबोगरीब सपनों का आना भी सामान्य है। जागते हुए जिन बातों को लेकर संशय या डर होता है नींद में वही सपनों का रूप ले लेते हैं। अधिकतर सपनों में स्त्री को लगता है कि वो कहीं फँस गई है, उसका बच्चा खो गया है, जरूरत में बिल्कुल अकेली रह गई है, कोई उसके बच्चे को नुकसान पहुँचाना चाहता है...वगैरह।
यह सपने बिल्कुल सामान्य हैं। और इनका कोई गूढ़ अर्थ निकालकर उसका निदान करने की जरूरत नहीं है।

एक शिशु का मतलब क्या है.....
कुदरत का यह खूबसूरत करिश्मा जिसमें स्त्री पुरुष की साझेदारी है। ढ़ेर सारा अनुराग, अनुभूतियों का स्रोत....। इतनी मासूमियत की लगता है परम को छू लिया हो....।

एक शिशु का मतलब नींद में खलल, कई बार बीमार पड़ना, लगातार किसी का हम पर निर्भर रहना....सुसु, पौटी.....उल्टी, हिचकी, डकार, बेमतलब, बेहिसाब रोना, हँसना.....

इतने बदलाव के लिये सबसे जरूरी है कि स्त्री और पुरुष एक दूसरे का संबल बन सहजता से इस सौंदर्य को अपने जीवन में सहेजें......
कुछ किलकारियों से...कुछ लोरियों से...घर आँगन में तब हम मासूमियत भर सकते हैं...।



The most important thing a father can do for his children is to love their mother.
– Henry Ward Beecher

Monday 17 March 2008

फोलिक ऐसिड़ क्यूँ?!

सबसे पहले सबसे अहम बात
अगर शिशु का आग्रह हो तो गर्भ ठहरने के पहले से ही फोलिक ऐसिड. 400 mcg नियमित रोज़ ।

गर्भवति स्त्री को सब तरफ से सलाह और मशवरा मिलता है। ठंडा, गरम, सही, गलत.....बच्चे को सुंदर,सुशील और पता नहीं क्या क्या बना सकने के गूढ़ मंत्र सिखाये जाते हैं।

अगर मुझसे सिर्फ एक सलाह देने को कहा जाये तो मैं फोलिक ऐसिड़ के सेवन की सलाह दूँगी। वजह है।

• यह बच्चे के रीढ़ के विकास में आवश्यक है।
• अक्सर इसकी मात्रा आहार में कम होती है।
• कमी से रीढ और रीढ़ की हड्डी में गंभीर त्रुटि हो सकती है।
• यह किसी में भी हो सकती है।
• इस त्रुटि को 70 प्रतिशत तक मात्र फोलिक ऐसिड़ के सेवन से घटाया जा सकता है।

अक्सर स्त्री को अपने गर्भ की स्थिति के अंदाजे से पहले ही रीढ़ का विकास काफी हद तक संपूर्ण हो चुका होता है। यही वजह है कि गर्भ धारण करने की इच्छा हो तब से ही इसका सेवन शुरु करना जरूरी है।


खुली त्रुटि में दिमाग और/या रीढ़ के साथ हड्डी पर भी असर पड़ता है। रीढ़ और दिमाग का भाग अपनी परत के साथ या बगैर पीठ से बाहर आ सकता है। इन त्रुटियों को न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट के अंतर्गत माना जाता है। सपाइना बाइफिड़ा, मेनिंगोसील, एनेनकेफाली, एनकेफालोसील वगैरह इसके अंतर्गत आते हैं। गले के ऊपर के भाग से कमर के नीचे तक कहीं भी त्रुटि संभव है। त्रुटि की जगह की नसें प्रभावित होती हैं। उन नसों से जो क्रिया जुड़ी होती है वह भी प्रभावित होती है। उदाहरण के तौर पर अगर कमर में त्रुटि हुई तो दस्त और मूत्र का नियंत्रण नहीं रहता। शरीर के निचले हिस्से को लकवा मार जाता है।
जेनेटिक खामी भी इस त्रुटि के रूप में सामने आ सकती है। (ट्राइसोमी 13 और 18) कई बार अगर माँ अपस्मार के लिये दवा ले रही हो या इनसुलिन डिपेंडेंट डाइबेटिस से पीड़ित हो तब भी इस त्रुटि की सँभावना बढ़ जाती है।
गर्भ धारण करने के 28 दिन के भीतर ही यह भ्रूण में स्थापित हो जाती है।

सामान्य जनसँख्या में इस त्रुटि की सँभावना 0.1% होती है यानि की 1000 में से एक में सँभावना होती है।

त्रुटि की जाँच 16-18 हफ्ते में सँभव है।
• माता का सीरम आल्फा फीटोप्रोटीन टेस्ट(16-18 हफ्ता)
• हाई रेसोल्यूशन अल्ट्रासाउन्ड (18 हफ्ता)
• ऐम्नियोसेंटेसिस (15 हफ्ते के बाद)
इन जाँच प्रक्रिया का अपना जोखिम है । इनके लिये मंजूरी देने से पहले इन्हे समझना जरूरी है।
अगर पहले गर्भ में यह कमी पाई गई हो तो दूसरे में इसकी सँभावना और भी बढ़ जाती है। फोलिक ऐसिड़ की मात्रा भी बढ़ाने की जरूरत होती है।

निष्कर्ष यह कि
• शादीशुदा स्त्री को फोलिक ऐसिड नियमित लेना चाहिये।
• गर्भ धारण करने पर भी इसका सेवन जारी रहना चाहिये।
• किसी भी फार्मसी से 400mcg फोलिक ऐसिड़ ओवर द काउंटर मिल सकता है। रोज़ एक नियमित।


शारीरिक संरचना मे कोई भी त्रुटि हो....किसी भी कमी को व्यक्ति या शिशु में त्रुटि नहीं माना जा सकता। सभी त्रुटियों और कमियों के बावजूद....अगर किसी जीव में जीवन है तो वह अलग हो सकता है किन्तु संपूर्ण है।

कुदरत का ऐसा कोई निर्णय अगर हमारे हाथ आ जाये तो उसे स्वीकार कर परवरिश करना माता पिता का कर्तव्य ही नहीं....माता और पिता के अर्थ को सार्थक करने के लिये जरूरी भी है।

Sunday 16 March 2008

सिज़ेरियन से प्रसव

कुदरती तरीके से हुए शिशु कुदरत की हिफाजत में संसार में आ जाते हैं। किन्तु कुछ कारणों की वजह से सीज़ेरियन का विकल्प रखना पड़ता है। सीज़ेरियन से हुए शिशु का सफर अलग होता है। नौ महीने माँ की कोख में पलने के बाद....जब एक शल्यक्रिया का निर्णय लिया जाता है तब कुदरत की बागड़ोर कुछ इंसानों के हाथ चली जाती है। कई बार जरूरी और कई बार बिना किसी खास अनुरूप तर्क के यह विकल्प चुना जाता है।

जब शिशु योनिमार्ग से नहीं गुजरता तो उसके फेफड़े का पानी ठीक से नहीं निचुड़ पाता। कुछ शिशु यह सामान्य तरीके से सहन कर लेते हैं। कुछ की साँस ज्यादा चलने लगती है। शिशु को इससे तकलीफ हो सकती है। इस स्थिति को ट्रान्सियन्ट टैकिप्निया ऑफ न्यूबॉर्न कहते हैं। योनिमार्ग से नहीं निकलने की वजह से सर पर कोन(कैपुट) भी नहीं बनता है।

सीज़ेरियन एक अहम शल्यक्रिया है। अन्य किसी भी शल्यक्रिया की ही तरह इसमें उतना ही खतरा है। यह खतरा कोई सर्जीकल या अनेस्थेटिक कौम्प्लीकेशन, करने वाले डॉक्टर के हुनर की कमी, बच्चे में किसी त्रुटि या फिर स्त्री के शरीर के किसी प्रतिकूल अनुक्रिया की वजह से हो सकती है। किन्तु जब यह आवश्यक हो तब माँ और शिशु दोनों के लिये जीवनदायिनी भी है।


जब भी योनिमार्ग से प्रसव का विकल्प शिशु या माँ के जीवन को खतरा बन सकता हो तब इस विकल्प का चुनाव किया जाता है।

विशेष कारण
• बहुमूल्य गर्भ
• दीर्ध एवं विषम प्रसव
• विपत्ति में शिशु ( फीटल डिस्ट्रस)
• विपत्ति में माता ( मैटर्नल डिस्ट्रस)
• समस्या जैसे प्री एकलम्पसिया( अधिक रक्तचाप), हर्पिस
• आपत्ति जैसे कि नाल का उतरना(कौर्ड प्रोलैप्स), उदर पर चीर पड़ना
• एक से अधिक गर्भ
• अस्वाभाविक गर्भस्थिति
• विफल गर्भ प्रवेशन
• सहायक विफल प्रसव (फेल्ड इन्स्ट्रूमेन्टल डेलिवरी)
• बड़ा शिशु
• आंवल संबंधित त्रुटि
• नाल संबंधित त्रुटि
• संविदागत(कोन्ट्राक्टड) पेल्विस

जैसे जैसे चिकित्सा ज्ञान ने प्रगति करी है,वैसे वैसे सीज़ेरियन सुरक्षित होता गया है। किन्तु जिस गति से इस हुनर का विकास हुआ है उससे काफी अधिक गति से इसके संख्या में वृद्धि हुई है। करीबन दस से पचास प्रतिशत प्रसव अब सीजेरियन से होने लगे हैं।

सोच कर थोड़ी हैरानी होती है कि अचानक इतनी वृद्धि के पीछे क्या शिशु और माँ के स्वास्थ्य और जीवन का लाभ ही है।

कारण कई हैं-
• सुविधा का सुलभ होना
• कारणों का गलत आंकलन
• डॉक्टर्स का ज्यादा फीस लेना का तरीका
• दर्दी का योनिमार्ग से प्रसव करने से इंकार
• महुरत और फैशनेबल ट्रैन्ड

वजह जो भी हो यह एक अत्यंत चिंता का विषय है। कुदरत का हाथ बँटाना और उसके साथ खिलवाड़ करना दो अलग बातें हैं। सीजेरियन से जन्मे बच्चों में शर्तिया तकलीफ अधिक होने की सँभावना ज्यादा होती है। यह तकलीफ इनफेक्शन, खून का अधिक बहाव, अगले गर्भ में तकलीफ, उदर में चीर पड़ने की सँभावना....वगैरह कुछ भी हो सकती है। वैसे भी आज भी कुदरत इंसान से अधिक निपुण है।

फिर रिमोट कंट्रोल हमारे हाथ में नहीं है। जहाँ कुदरती तरीके से प्रसव हो वहाँ कुदरत ध्यान रखती है कि शिशु प्रसव के बाद रोये, माँ आंवल के बाहर आते ही शिशु को दूध देने में सक्षम हो, माँ का स्तन भी उपयुक्त समय पर भर जाता है।

जब यह कंट्रोल इंसान के हाथ आता है तो सब कुछ हमेशा निर्विघ्न नहीं हो पाता।

सिज़ेरियन के पश्चात माँ को एक शल्यक्रिया के बाद मिलने वाली चौकसी की जरूरत होती है। दो हफ्ते तक माँ स्वतंत्र रूप से शिशु को देखने में पूरी तरह समर्थ नहीं होती। उदर और पेट पर जो चीर पड़ता है , वह भी भरने में समय लेता है।

सिज़ेरियन के बाद एक माँ कुदरती प्रसव और सिजेरियन...दोनो की तकलीफ सहती है। जहाँ सामान्य प्रसव एक फिसियोलौजिकल प्रोसेस है....सिज़ेरियन एक कृत्रिम अवस्था है....जिसकी जटिलताओं का ज्ञान आवश्यक है।

अपने डॉक्टर का चुनाव हमेशा सोच समझ कर करना चाहिये। डॉक्टर का समय पर सही फैसला लेने के लिये सचेत रहना जरूरी है....किन्तु व्यर्थ में कुदरती क्रिया में हस्तक्षेप गलत है।

दर्दी और उसके साथ के लोग अक्सर भावनात्मक स्तर पर ऐसे समय में इतने कमज़ोर होते हैं कि कई बार एकदम सही फैसला नहीं कर पाते।

एक चिकित्सक लेकिन संयत होना चाहिये कि सोच समझ सके कि उसके निर्णय का असर दर्दी पर क्या होगा-

Surgeons must be very careful
When they take the knife!
Underneath their fine incisions
Stirs the Culprit - Life!
~Emily Dickinson

Thursday 13 March 2008

उत्पत्ति

नौ महीने का सफर समाप्त होते होते शिशु स्वतंत्र रूप से साँस लेने में सक्षम होता है। उसकी शारीरिक संरचना बाहर की दुनिया में आकर जीवित रहने के लिये पूर्ण। किन्तु कोख के अंदर से बाहर की यात्रा किसी भी दृष्टिकोण से एक दिलचस्प घटनाचक्र है। हिन्दी पिक्चरों में दिखाई जाने वाली इमोशनल प्रसव पीड़ा के बिहाइन्ड द सीन्स इतना कुछ हो रहा होता है कि हर बात अगर रेकार्ड की जाये तो एक पूरा उपन्यास लिखा जा सकता है।

हर मनुष्य की इससे अहम और मुश्किल यात्रा शायद ही कोई और हो। एक बेहद संकरा रास्ता, जीवन की खोराक पहुँचाने वाली धमनियों से अलगाव, स्वतंत्र साँस की शुरुआत और बेहद तेजी से होता आंतरिक बदलाव।


स्पर्श की तपिश की पहली चाह और माँ का वात्सल्यपूर्ण साथ।
माँ जो खुद शारीरिक और मानसिक बदलाव से गुजर रही है। शिशु को जन्म देने की पीड़ा और अपने जीवन से एक अलग अस्तित्व में देखने की अनुभूति....
एक ऐसा समय जब माँ और शिशु दोनों को शिशु के पिता के साथ और आश्वासन की जरूरत होती है। पिता के लिये भी भावनात्मक जुड़ाव बनाने का महत्वपूर्ण समय।
जन्म से पहले फेफड़े पानी से भरे होते हैं। औक्सीजन की आवश्यकता माँ नाल से पूरी करती है। अशुद्ध खून की सफाई भी आंवल(placenta) मे ही होती है। जब शिशु संकरे से योनिमार्ग से गुजरता है तो फेफड़ों से पानी निचुड़ जाता है। बाहर पहुँचे शिशु की नाल काट दी जाती है। एक ऐसा क्षण जो माँ से अलगाव और पहली साँस के बीच गुजरता है। लगातार घटता औक्सीजन, तापमान और रोशनी में परिवर्तन, स्पर्श और फेफडों में बढ़ने वाला नेगैटिव प्रेशर, इनका संयुक्त प्रभाव शिशु को साँस लेने की पहल करने को उकसाता है।
फेफड़ों का साँस लेना सीखना एक अत्यंत जटिल प्रकरण है।
नये अंकुरित पौधे को नई ज़मीन में रोपने जैसा। इस दौरान जड़े उखड़ जाती हैं और ज़मीन बदल जाती है।

इससे पहले कि हम शिशु में होते बदलाव जानें हमें एक सामान्य हृदय के कार्यप्रणाली से परीचित होना होगा। हृदय नाशपति के आकार का एक मांसपेशीय अव्यय है | दो फेफड़ों के बीच स्थित , शरीर के विभिन्न भागों में रक्त पहुँचाने के लिये जिम्मेदार होता है | यह चार प्रकोष्ठों मे बटाँ होता है। दाँये भाग में अशुद्ध (डिऔक्सीजनेटड) रक्त होता है और बाँये भाग में शुद्ध(औक्सीजनेटड)। दाँये और बाँये भाग ऐट्रियम और वेन्ट्रीकल में बँटे होते हैं। रक्त का प्रवाह एट्रियम से वैन्ट्रीकल( एक ही दिशा) में संभव है। दाँये भाग में ऐट्रियम और वेन्ट्रीकल के बीच ट्राइकस्पिड वाल्व होता है। और बाँये भाग में ऐट्रियम और वेन्ट्रीकल के बीच बाइकस्पिड वाल्व होता है। दाँये भाग में वैन्ट्रीकल से अशुद्ध रक्त फेफड़ों तक पलमनरी आर्टरी से पहुँचता है। वहाँ से शुद्ध होकर पलमोनरी वेइन्स से बाँये ऐट्रियम में लौटता है। ऐट्रियम से वेन्ट्रीकल फिर एओर्टा से शरीर के सभी हिस्सों तक । वहाँ औक्सीजन पहुँचा कर सुपीरियर और इनफीरियर वीना कैवा से दाँये ऐट्रियम में अशुद्ध रक्त पहुँचता है।

हाँ थोड़ा पेचिदा है।

लेकिन सोचने की बात है कि कुछ ही क्षणों में बिल्कुल काम नहीं करते हुए फेफड़े अचानक काम करना कैसे शुरु करते हैं।

जन्म पू्र्व शिशु में जो बातें अलग होती हैं-
नाल और आंवल के बीच की धमनियाँ अशुद्ध रक्त पहुँचा कर शुद्ध रक्त वापस ले जाती हैं।

• डक्टस आर्टिरियोसस- पलमनरी आर्टरी और एओर्टा के बीच
• फोरामेन ओवेल-दोनो वेन्ट्रीकल के बीच एक छेद।
• डक्टस विनोसस- जिगर(लिवर) और इनफीरियर वीना कैवा के बीच
• अंबीलीकल वेइन- नाल से शिशु के लिवर तक
• अंबिलिकल आर्टरी- शिशु से आंवल तक
इतनी धमनियों को जन्मउपरांत बंद हो जाना पड़ता है। और सामान्य हृदय की कार्यप्रणाली तक पहुँचना पड़ता है।
जानती हूँ कि समझने में बहुत आसान नहीं है। लेकिन इतने जटिल बदलाव करने के लिये निमिष मात्र का समय होता है। कहीं कोई छोटी सी चूक और वह हृदय के संरचना में त्रुटि के रूप में उभर आती है।


इतने बदलाव के बाद होता है बच्चे का पहला रूदन.....पहली साँस.....
पता नहीं क्यूँ फिर सभी हिन्दी पिक्चरों के सीन्स याद आ गये। जी हाँ...पहला रूदन वाकई खुशी की बात है....कुदरत के एक चमत्कार के संपूर्ण होने के उद्घोष जैसा....

कभी लगता है कुदरत ने हम में से हर एक के ऊपर कितनी मेहनत की है । कई बार जितना मोल आंक कर हमें कुदरत ने जीवन दिया है...हम उससे बहुत नीचे के स्तर पर जीवन निर्वाह करते हैं।



और माँ .... बीज, मिट्टी और हवा....तो जीवन है...



Tuesday 11 March 2008

नौ महीने गर्भ में

एक शिशु को संसार में लाना और फिर उसकी परवरिश का दायित्व सँभालना जिम्मेदारी का काम है। एक दम्पति के जीवन में यह एक ऐसा बदलाव है जिसके कई पहलू हैं।

अगर नवागंतुक का आगमन सोचा समझा ना गया हो,शुभ नहीं समझा जा रहा हो, किसी गल्ती का परिणाम हो तो इस पूरे प्रक्रिया में और भी कई पक्ष उभर आते हैं। आर्थिक परेशानियाँ, इसके पहले के गर्भ के समय आया कोई संकट, माँ की गर्भवति होने के समय की उम्र और उसके स्वयं के बचपन में सहे संघर्ष एवं द्वन्द्व...ऐसी कई बातें हैं जो कोख में पल रहे बच्चे और उस बच्चे को जनने वाली माँ पर असर कर सकती है।

एक औरत जब गर्भवति हो जाती है तो शारीरिक और मानसिक रूप से कई परिवर्तन के दौर से गुजरती है। एक नये जीवन को खोराक और पलने की जगह देना, उसे स्वतंत्र साँस तक लेकर पहुँचना और फिर उसके आत्मनिर्भर होने तक अपने खून से सींचना।

मानसिक रूप से भी तीन सीढ़ियाँ पार करती है।
• पहली बार यह जानकर कि वह माँ बनने वाली है,एक सुखद अनुभूति का अहसास होता है। किन्तु साथ ही अपने सामर्थ्य पर शक भी। अपने माता पिता के साथ अगर कोई भावनात्मक द्वन्द्व हो तो इस दौरान बाहर आ जाता है।
• करीबन बीस हफ्ते के आसपास, औरत की उपरोक्त भावनायें चरम सीमा पर पहुँच जाती हैं। उसे चिन्ता सताने लगती है कि कहीं उसका बच्चा शारीरिक और मानसिक रूप से विकलांग ना हो। उसे अहसास होने लगता है कि यह बच्चा उसके शरीर में है जरूर पर इसका अस्तित्व अलग है।
• गर्भ के अंत तक पहुँचते पहुँचते माँ अपने बच्चे को एक व्यक्तित्व से जोड़ देती है।

दो सूईयों को लेकर स्वेटर बुनती माँ वाली इमेज कितनी भी रूमानी क्यूँ ना हो...यह एक सच है कि इस दौरान वह विविध मानसिक और शारीरिक उतार चढ़ाव से गुजरती है। इस समय उसे समझना और स्वीकार करना उसके मानसिक संतुलन के लिये आवश्यक है।

यह कुदरत का एक करिश्मा ही है कि एक कोशिका से एक पूरा इंसान तैयार हो जाता है।
नियंत्रण एक डी एन ए कोड़ मे लिखा हुआ, जिसमें माता और पिता की बराबर की भागेदारी रहती है। इस कोड़ के अनुसार एक कोशिका ,रूप मे ढ़लने लगती है।

किसी कुशल निर्देशक के हाथ में एक सिम्फनी.....साधन माँ उपलब्ध कराती है...और जगह उसकी कोख।








विकास का क्रम
1. उर्वरण और कोख में स्थिर होना- भ्रूण जीवन की शुरुआत (पहला और दूसरा हफ्ता)
2. दो में संस्तरित होना
3. तीसरे स्तर का जुड़ाव- अव्ययों के निर्माण की शुरुआत (तीसरा, चैथा हफ्ता)
4. हृदय, आँख और एक नन्हा आकार- हाथ और पाँव के अंकुर (पाँचवा हफ्ता)
5. नन्हा सा मुँह
6. नाक और होंठ
7. पलक
8. ओवरीज़ और टेस्टिस
9. स्त्री या पुरुष विशेषता सूचक (नौवाँ हफ्ता)
10. खुली आँखें
11. हिलता , घूमता शिशु ( बीसवें हफ्ते से अढतीसवाँ हफ्ता)


मृत्यु दर और अस्वस्थता सबसे अधिक जन्म से पूर्व होती है। करीबन तीस प्रतिशत गर्भ स्वत: निष्फल हो जाते हैं। इनमें अक्सर कोई बुनियादी खोट होता है। दो प्रतिशत नवजात शिशु में कोई गँभीर शारीरिक विकलांगता होती है जिसे शल्य चिकित्सा की आवश्यकता पड़े। रोगाणू, रसायन,तापमान की विविधता और एक्स रेस का असर भी सबसे अधिक इसी दौरान होता है। माता या पिता के सिगरेट फूँकने का असर भी बच्चे में कम विकास का कारण बन सकता है।

माँ एक कोशिका को एक शिशु बनाने की प्रक्रिया में पूरी खोराक पहुँचाती है। सभी अव्ययों को विकसित करने के लिये विटामिन्स, मिनरल्स ,ऊर्जा ,कैल्सियम, लौह तत्व वगौरह की जरूरत पड़ती है। जो माँ को अपने खोराक से मिलता है, विकसित होते शिशु तक पहुँच जाता है। जो खोराक में नहीं होता पर उसके शरीर में हो....वो शरीर से सोंक लिया जाता है। अगर शरीर भी उस जरूरी खोराक से वँचित हो तो शिशु में असर दिखता है।

गर्भ ....शायद एकमात्र ऐसा समय जब एक ही शरीर में दो दिल साथ में धड़कते हैं....

कुदरत कितने निपुणता से हर अंग को रूप में ढ़ाल देती है।

....इतनी खूबसूरती,श्रम और परम के आशा के चिन्ह को.....कितनी आसानी से कुछ लोग भ्रूण हत्या के हेडलाइन्स के नीचे समाप्त कर देते हैं.....
जैसा कि मार्टिन कहते हैं
God's interest in the human race is nowhere better evidenced than in obstetrics.
Martin H. Fischer

भगवान का मनुष्य जाति से लगाव औबस्ट्रैटिक्स (गर्भ संबंधित विज्ञान) से ज्यादा और कहीं नज़र नहीं आता।

फिर रवीन्द्र नाथ टैगोर ने कहा ही है
Every child comes with the message that God is not yet discouraged of man.



काश हम थोड़ी कोशिश कर परम का हौसला बनाये रखें......।

Sunday 9 March 2008

आरंभ

उदर में एक नन्हे से जीवन की पहल होते ही अनंत सँभावनाओं को मुट्टी में पकड़ एक स्वप्न रूप लेता है। नौ महीने परम के हाथ से माँ की कोख में अंग को पूर्ण करता हुआ लगातार एक स्वतंत्र अस्तित्व की ओर विकसित होता है।

जन्म पश्चात शिशु अपना जीवनकाल आरंभ करता है। जन्म,शैशव, बाल्यकाल, फिर तरुणाई। हर विकास के पड़ाव से गुजरता हुआ एक व्यक्ति बनता है।

यह सफर आसान नहीं है। कई बातों की सही समझ माँ बाप को नहीं होती। बहुत सी असामान्य बातें रीत रिवाज़ और रस्म की आड़ में छिपी रह जाती हैं। और बहुत सी सामान्य बातों को रोग का नाम दिया जाता है।

वैसे तो हर शिशु का व्यक्तित्व काफी कुछ तय होता है लेकिन परिवेश के असर से इंकार नहीं किया जा सकता। माता पिता उस कुम्हार की तरह हैं जो कच्ची मिट्टी को मनचाहा स्वरूप देने में सक्षम हैं।

इस जगह में मेरी कोशिश रहेगी कि मैं शैशव से तरुणाई तक के विभिन्न पहलुओं पर रोशनी ड़ाल सकूँ। विविध विषयों का विश्लेषण करना चाहती हूँ कि मार्गदर्शन कर सकूँ कि कहाँ हमें स्वीकार करने की जरूरत है और कहाँ हम सकारात्मक हस्तक्षेप कर सकते हैं ।
खलिल गिबरान कहते हैं कि माता पिता परम के हाथ में कमान की तरह होते हैं,जिसके सही झुकाव से बच्चे तीर की तरह सीधा सही रास्ते से गुजर लक्ष्य तक पहुँचते हैं।


Your children are not your children.
They are the sons and daughters of Life's longing for itself.
They come through you but not from you,
And though they are with you yet they belong not to you.

You may give them your love but not your thoughts,
For they have their own thoughts.
You may house their bodies but not their souls,
For their souls dwell in the house of tomorrow,
which you cannot visit, not even in your dreams.
You may strive to be like them,
but seek not to make them like you.
For life goes not backward nor tarries with yesterday.

You are the bows from which your children
as living arrows are sent forth.
The archer sees the mark upon the path of the infinite,
and He bends you with His might
that His arrows may go swift and far.
Let our bending in the archer's hand be for gladness;
For even as He loves the arrow that flies,
so He loves also the bow that is stable.

मेरे इस सफर में उम्मीद है आप मेरे साथ होंगे।

Monday 3 March 2008

वात्सल्य

नींव का पहला पत्थर.....