Monday 31 March 2008

शिशु पर माता पिता के ब्लड ग्रूप का महत्व

"खून के रिश्ते" बोलते समय एक जबरदस्त सा जज़्बा मन में आता है।यूँ ही नहीं शायद। खून खून में थोड़ा थोड़ा फर्क है....और माँ के दूध की ही तरह माँ बाप के खून का भी महत्व है।

माता पिता का ब्लड ग्रूप शिशु का ब्लड ग्रूप तय करता है। और बात सिर्फ तय करने तक सीमित होती तो इसे नज़रंदाज़ भी कर सकते थे। किन्तु माँ अगर आर एच नेगाटिव(Rh-) हो तो शिशु पर इसके परिणाम विविध और घातक भी हो सकते हैं। इसीलिये हर दंपत्ति को अपना ब्लड ग्रूप ज्ञात होना चाहिये।

चार ब्लड ग्रूप होते हैं। ए (A),बी (B),O(ओ) और AB(एबी) । रक्त की लाल कोशिकाओं की सतह पर कुछ प्रोटीन, ग्रूप निर्धारित करते हैं। जिनमें 'ए' ऐन्टीजन होता है उसका ग्रूप 'ए और जिसमें 'बी' ऐन्टीजन होता है उसका ग्रूप 'बी'। जिसमें दोनो होते हैं 'एबी',जिसमें दोनो नहीं होते उनका ग्रूप 'ओ' होता है।

पूरी मानव जाति इन चार ब्लड टाइप्स में बँटी है। जैसा की सर आरनल्ड कहते हैं
There is no caste in blood.
- Sir Edwin Arnold



इसके अलावा एक 'आर एच'(Rh) नाम का और प्रोटीन होता है । यह भी रक्त की लाल कोशिकाओं के सतह पर ही होता हैं। जिनमें यह होता है वह आर एच पौसीटिव और जिनमें नहीं होता वह आर एच नैगाटिव होते है।

इनके होने या ना होने से रक्त की कोशिकाओं या रक्त के गुण पर खास असर नहीं होता। पर यह भी इंसान की पहचान का एक हिस्सा हैं। जरूरत पर सही मैच का ही खून चढ़ाया जा सकता है। अगर अलग ब्लड ग्रूप का खून चढ़ाया जाये तो परिणाम चिंताजनक हो सकते हैं। करीबन 85 प्रतिशत लोग आर एच पौसीटिव होते हैं। बाकी के आर एच नैगाटिव।

एक दंपत्ति के लिये सचेत होने की शुरुआत पत्नि के 'आर एच नैगाटिव' होने पर होनी चाहिये। पति अगर 'आर अच पौसीटिव' है तो गर्भ के समय उपयुक्त उपाय करना जरूरी है। आर एच नैगाटिव माँ के गर्भ में पल रहे शिशु को 'आर एच फैक्टर ' पिता से विरासत में मिल सकता है। ऐसे दंपत्ति के आर एच पौसिटिव शिशु होने की सँभावना करीबन 50 प्रतिशत होती है।

पहले गर्भ में (जब शिशु आर एच पौसीटिव हो ),तब भी तकलीफ की गुँजाईश कम ही होती है। माँ के खून से शिशु के खून का संपर्क प्रसव के दौरान ही होता है। इस संपर्क से तात्कालिक कोई हानि नहीं होती। किन्तु शिशु के आर एच पौसीटिव खून के संपर्क में आते ही....माँ की इम्युनिटी कुदरती तौर पर इनसे लड़ने के लिये ऐन्टीबौडी की सेना तैयार करने लगती है। इन ऐन्टीबौड़ी से माँ को कोई हानि नहीं होती। किन्तु अगले गर्भ के समय भी अगर शिशु आर एच पौसीटिव हो तो यह बनी बनाई सेना शिशु पर हमला बोल देती है। यह ऐन्टीबौड़ी इतने सक्षम होते हैं कि शिशु की रक्त कोशिकाओं को तोड़ तितर बितर कर दें। इनके टूटने से बिलीरूबिन की मात्रा शिशु के रक्त में बढ़ने लगती है। नवजात शिशु को गँभीर पीलिया हो सकता है, शिशु के और कभी कभार माँ के जान को भी खतरा हो सकता है।





आर एच नैगाटिव स्त्री ब्लड ट्रान्सफ्यूशन, गर्भपात, और एक्टोपिक प्रेगनैन्सी से भी ऐसी स्थिति तक पहुँच सकती है।

इसका हल क्या है

• जागरुकता- हम सभी को अपना ब्लड ग्रूप मालूम होना चाहिये। अपने जीवन साथी की इस पहचान से अनभिज्ञ नहीं होना चाहिये।
• अगर स्त्री आर एच नैगाटिव है और पुरुष आर एच पौसीटिव तो डॉक्टर से सही समय पर सलाह और इन्जेक्शन लेने की तैयारी और तत्परता होनी चाहिये।।


आर एच इम्यूनोग्लोबिन इन्जेक्शन्स

गर्भ ठहरने के 28 हफ्ते में पहला इन्जेक्शन फिर प्रसव के 72 घंटे के भीतर दूसरा।

यह इन्जेक्शन माँ के शरीर में ऐन्टीबौडीज़ बनने से रोकते हैं। जाहिर है इसे पहले गर्भ मे ही लेना चाहिये। और चूंकि गर्भ में शिशु के ग्रूप पता लगाने की कौम्प्लीकेटड प्रोसीजर से बचना चाहिये ,यह इन्जेक्शन हर आर एच नैगाटिव स्त्री (जिसका पति आर एच पौसिटिव हो), को लेना चाहिये

अगर कुछ कारणों की वजह से यह इनजेक्शन नहीं लिये गये तो डॉक्टर से तुरंत संपर्क करें। ऐसे गर्भ को विशेष ध्यान की जरूरत है। अगर शिशु खतरे में हो तो एक्सचेंज ट्रांसफ्यूशन कर के इस शिशु के खून को आर एच नैगाटिव खून से बदला जा सकता हैं। ऐसा कई बार करने की जरूरत पड़ सकती हैं।

अगर ऐसा कुछ भी नहीं किया जा सका तो शिशु के दिमाग और किडनी पर असर पड़ सकता है। हार्ट फेल ( हृदय के पम्प करने की शक्ति विफल) हो सकता है। रक्त की कमी हो सकती है। गँभीर पीलिया हो सकता है। इन सबसे शिशु की जान जा सकती है।

समस्या गँभीर हो सकती है। पर हल कितना आसान है। ब्लड़ ग्रूप का पता होना। समय पर इंजेक्शन लेना।

किंतु दुख की बात है की भारत में अभी भी अक्सर गर्भवति स्त्री को उसके ब्लड ग्रूप के बारे में नही पता होता। इतनी सुलभता से जो बचाया जा सकता है ....उसे उतनी ही लापरवाही से हम खो आते हैं। जब तक बात पता चलती है तब तक देर हो चुकी होती है।

नवजात शिशु को कितने ही कारणों से खोया जा सकता है।

.....सुना हैं बचाने वाला मारने वाले से ज्यादा बलवान होता है...

पता नहीं......हम कब छोटी छोटी पहल कर बचाने वालों में अपना नाम दर्ज़ करायेंगे?!

Tuesday 25 March 2008

गर्भ के दौरान मनोवैज्ञानिक परिवर्तन

पोपुलर सिनेमा में गर्भ धारण होने की खबर हिरोईन की बेहोशी के साथ होती है। फिर नब्ज़ पकड़ कर प्रेग्नेन्सी टेस्ट। इसके बाद खुथी की लहर। मिठाई। फिर बहु का चमकता लजीला चेहरा। और उसके बाद लोरी गा कर सुलाती माँ।

किन्तु यह परिवर्तन इतना सहज नहीं है ।

शिशु मनचाहा बदलाव है तो माँ का मन खुश....और नहीं तो तनावग्रस्त रहता है। गर्भ धारण करते ही स्त्री अत्यंत संवेदनशील हो जाती है। हर भाव की अत्युक्ति करना स्वभाव में शामिल हो जाता है। छोटी से छोटी बात रुला देती है, हँसा सकती है, डरा देती है।

गर्भ के समय को तीन महीने के अवधि अनुसार देखा जाये तो तीन भाग में बाँटा जा सकता है।

पहले त्रिमाही भाग में स्त्री अपने में बदलाव महसूस करती है। यह बदलाव बाकियों को नज़र ना भी आये वह लगातार इसका अनुभव करती है। ऐसे में अक्सर पत्नि अपने गर्भ के बारे में भूलती नहीं....और पति को कभी कभार ही याद आता है। कुछ स्त्रियाँ इस समय भावनात्मक स्तर पर बेहद परेशान हो जाती हैं। उल्टियों का होना और शरीर में जल्द होते बदलाव तनाव को और बढ़ा सकता है। कई बार शरीर की तकलीफ तनाव की वजह से भी बढ़ सकती है।

ऐसे में पति का रवैया, सखी सहेलियों का साथ और कामकाज़, गृह गृहस्थि में तनाव का असर स्त्री के स्वभाव पर असर करता है। रियायत और विश्राम काफी हद तक मदद कर सकते हैं।

दूसरे भाग में स्त्री अपने इस नई पहचान की तरफ थोड़ी सहज हो चुकी होती है। बीसवें हफ्ते से शिशु के उदर में हिलने को महसूस कर सकती है। उसे शिशु का अपने से अलग एक अस्तित्व के होने पर विश्वास होने लगता है। इस समय स्त्री का वज़न तेजी से बढ़ता है। उसे अपने सौंदर्य पर और आकर्षण पर संदेह होने लगता है। वह अपने पति को लगातार आँकती है कि उसकी नज़र में वह अब भी खूबसूरत है कि नहीं। अपने जीवन साथी पर उसकी निर्भरता बढ़ जाती है। वह हिम्मत चाहती है कि उसका जीवनसाथी जरूरत में उसके साथ होगा। उसमें रुचि लेगा। उसकी तकलीफ समझेगा। ऐसे में दंपति को एक दूसरे के साथ समय बिताना चाहिये। आगे आने वाले जीवन के बारे में बात करनी चाहिये। दूसरे त्रिमाही भाग में स्त्री में संभोग की इच्छा भी होती है और इससे नुकसान की सबसे कम सँभावना होती है।

तीसरे भाग तक स्त्री काफी हद तक संयत हो चुकी होती है। एक नये जीवन को सँभालने के लिये खुद को सक्षम पाती है। अगर गर्भ के समय उसे बाकी तकलीफ नहीं सहनी पड़ी हो तो वह बाकी लोगों का ध्यान और प्यार का आनंद लेती है। भरी बस में सीट दिया जाना....सभी के आदर से पेश आने से वह महत्वपूर्ण महसूस करती है।

इसी बात का कुछ कामकाज़ी स्त्रियों पर उल्टा असर भी होता है। उनके कार्यक्षमता को कम आँका जाता है। बीमार समझा जाता है। समय आने के पहले ही उनसे महत्व के काम ले लिये जाते हैं।

बाहरी व्यवस्थाओं का उसकी अवस्था पर सीधा असर पड़ता है। उसे किसी दूसरे स्त्री के सानिध्य की जरूरत महसूस होती है जो उसे इन परिवर्तनों की तरफ सहज कर सके।

जैसे जैसे समय करीब आता है उसके संशय बढ़ने लगते हैं।

स्त्री को गर्भवति होने पर साथ, प्यार, सानिध्य और सहानुभूति की जरूरत होती है। इस समय उसकी अतिसंवेदनशीलता को समझना और अनुरूप व्यवहार करना भी आवश्यक है।

दोनो स्त्री और पुरुष इस समय अपने बचपन के दिनों में लौटते हैं। उस समय की किसी बात पर हुई असंतुष्टता फिर उभरती है। अपनी नई पहचान कभी बहुत उल्लासित तो कभी दुखी करती है।

पुरुष अपनी पत्नि के बदले रूप से कम प्रभावित नहीं होता। उसका बदला स्वभाव उसके लिये कभी आश्चर्य तो कभी दुख और तनाव का कारण बनते हैं। स्त्री की अतिसंवेदनशीलता के सामने वह अपने आप को बेबस महसूस करता है। वह खुद अपनी योग्यता पर शक करता है। स्त्री के शारीरिक संरचना में आने वाले बदलाव भी उसको प्रभावित करते हैं।

इस दौरान एक दंपत्ति को लगातार एक दूसरे के साथ और विश्वास की जरूरत होती है।

गर्भवति होने पर अजीबोगरीब सपनों का आना भी सामान्य है। जागते हुए जिन बातों को लेकर संशय या डर होता है नींद में वही सपनों का रूप ले लेते हैं। अधिकतर सपनों में स्त्री को लगता है कि वो कहीं फँस गई है, उसका बच्चा खो गया है, जरूरत में बिल्कुल अकेली रह गई है, कोई उसके बच्चे को नुकसान पहुँचाना चाहता है...वगैरह।
यह सपने बिल्कुल सामान्य हैं। और इनका कोई गूढ़ अर्थ निकालकर उसका निदान करने की जरूरत नहीं है।

एक शिशु का मतलब क्या है.....
कुदरत का यह खूबसूरत करिश्मा जिसमें स्त्री पुरुष की साझेदारी है। ढ़ेर सारा अनुराग, अनुभूतियों का स्रोत....। इतनी मासूमियत की लगता है परम को छू लिया हो....।

एक शिशु का मतलब नींद में खलल, कई बार बीमार पड़ना, लगातार किसी का हम पर निर्भर रहना....सुसु, पौटी.....उल्टी, हिचकी, डकार, बेमतलब, बेहिसाब रोना, हँसना.....

इतने बदलाव के लिये सबसे जरूरी है कि स्त्री और पुरुष एक दूसरे का संबल बन सहजता से इस सौंदर्य को अपने जीवन में सहेजें......
कुछ किलकारियों से...कुछ लोरियों से...घर आँगन में तब हम मासूमियत भर सकते हैं...।



The most important thing a father can do for his children is to love their mother.
– Henry Ward Beecher

Monday 17 March 2008

फोलिक ऐसिड़ क्यूँ?!

सबसे पहले सबसे अहम बात
अगर शिशु का आग्रह हो तो गर्भ ठहरने के पहले से ही फोलिक ऐसिड. 400 mcg नियमित रोज़ ।

गर्भवति स्त्री को सब तरफ से सलाह और मशवरा मिलता है। ठंडा, गरम, सही, गलत.....बच्चे को सुंदर,सुशील और पता नहीं क्या क्या बना सकने के गूढ़ मंत्र सिखाये जाते हैं।

अगर मुझसे सिर्फ एक सलाह देने को कहा जाये तो मैं फोलिक ऐसिड़ के सेवन की सलाह दूँगी। वजह है।

• यह बच्चे के रीढ़ के विकास में आवश्यक है।
• अक्सर इसकी मात्रा आहार में कम होती है।
• कमी से रीढ और रीढ़ की हड्डी में गंभीर त्रुटि हो सकती है।
• यह किसी में भी हो सकती है।
• इस त्रुटि को 70 प्रतिशत तक मात्र फोलिक ऐसिड़ के सेवन से घटाया जा सकता है।

अक्सर स्त्री को अपने गर्भ की स्थिति के अंदाजे से पहले ही रीढ़ का विकास काफी हद तक संपूर्ण हो चुका होता है। यही वजह है कि गर्भ धारण करने की इच्छा हो तब से ही इसका सेवन शुरु करना जरूरी है।


खुली त्रुटि में दिमाग और/या रीढ़ के साथ हड्डी पर भी असर पड़ता है। रीढ़ और दिमाग का भाग अपनी परत के साथ या बगैर पीठ से बाहर आ सकता है। इन त्रुटियों को न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट के अंतर्गत माना जाता है। सपाइना बाइफिड़ा, मेनिंगोसील, एनेनकेफाली, एनकेफालोसील वगैरह इसके अंतर्गत आते हैं। गले के ऊपर के भाग से कमर के नीचे तक कहीं भी त्रुटि संभव है। त्रुटि की जगह की नसें प्रभावित होती हैं। उन नसों से जो क्रिया जुड़ी होती है वह भी प्रभावित होती है। उदाहरण के तौर पर अगर कमर में त्रुटि हुई तो दस्त और मूत्र का नियंत्रण नहीं रहता। शरीर के निचले हिस्से को लकवा मार जाता है।
जेनेटिक खामी भी इस त्रुटि के रूप में सामने आ सकती है। (ट्राइसोमी 13 और 18) कई बार अगर माँ अपस्मार के लिये दवा ले रही हो या इनसुलिन डिपेंडेंट डाइबेटिस से पीड़ित हो तब भी इस त्रुटि की सँभावना बढ़ जाती है।
गर्भ धारण करने के 28 दिन के भीतर ही यह भ्रूण में स्थापित हो जाती है।

सामान्य जनसँख्या में इस त्रुटि की सँभावना 0.1% होती है यानि की 1000 में से एक में सँभावना होती है।

त्रुटि की जाँच 16-18 हफ्ते में सँभव है।
• माता का सीरम आल्फा फीटोप्रोटीन टेस्ट(16-18 हफ्ता)
• हाई रेसोल्यूशन अल्ट्रासाउन्ड (18 हफ्ता)
• ऐम्नियोसेंटेसिस (15 हफ्ते के बाद)
इन जाँच प्रक्रिया का अपना जोखिम है । इनके लिये मंजूरी देने से पहले इन्हे समझना जरूरी है।
अगर पहले गर्भ में यह कमी पाई गई हो तो दूसरे में इसकी सँभावना और भी बढ़ जाती है। फोलिक ऐसिड़ की मात्रा भी बढ़ाने की जरूरत होती है।

निष्कर्ष यह कि
• शादीशुदा स्त्री को फोलिक ऐसिड नियमित लेना चाहिये।
• गर्भ धारण करने पर भी इसका सेवन जारी रहना चाहिये।
• किसी भी फार्मसी से 400mcg फोलिक ऐसिड़ ओवर द काउंटर मिल सकता है। रोज़ एक नियमित।


शारीरिक संरचना मे कोई भी त्रुटि हो....किसी भी कमी को व्यक्ति या शिशु में त्रुटि नहीं माना जा सकता। सभी त्रुटियों और कमियों के बावजूद....अगर किसी जीव में जीवन है तो वह अलग हो सकता है किन्तु संपूर्ण है।

कुदरत का ऐसा कोई निर्णय अगर हमारे हाथ आ जाये तो उसे स्वीकार कर परवरिश करना माता पिता का कर्तव्य ही नहीं....माता और पिता के अर्थ को सार्थक करने के लिये जरूरी भी है।

Sunday 16 March 2008

सिज़ेरियन से प्रसव

कुदरती तरीके से हुए शिशु कुदरत की हिफाजत में संसार में आ जाते हैं। किन्तु कुछ कारणों की वजह से सीज़ेरियन का विकल्प रखना पड़ता है। सीज़ेरियन से हुए शिशु का सफर अलग होता है। नौ महीने माँ की कोख में पलने के बाद....जब एक शल्यक्रिया का निर्णय लिया जाता है तब कुदरत की बागड़ोर कुछ इंसानों के हाथ चली जाती है। कई बार जरूरी और कई बार बिना किसी खास अनुरूप तर्क के यह विकल्प चुना जाता है।

जब शिशु योनिमार्ग से नहीं गुजरता तो उसके फेफड़े का पानी ठीक से नहीं निचुड़ पाता। कुछ शिशु यह सामान्य तरीके से सहन कर लेते हैं। कुछ की साँस ज्यादा चलने लगती है। शिशु को इससे तकलीफ हो सकती है। इस स्थिति को ट्रान्सियन्ट टैकिप्निया ऑफ न्यूबॉर्न कहते हैं। योनिमार्ग से नहीं निकलने की वजह से सर पर कोन(कैपुट) भी नहीं बनता है।

सीज़ेरियन एक अहम शल्यक्रिया है। अन्य किसी भी शल्यक्रिया की ही तरह इसमें उतना ही खतरा है। यह खतरा कोई सर्जीकल या अनेस्थेटिक कौम्प्लीकेशन, करने वाले डॉक्टर के हुनर की कमी, बच्चे में किसी त्रुटि या फिर स्त्री के शरीर के किसी प्रतिकूल अनुक्रिया की वजह से हो सकती है। किन्तु जब यह आवश्यक हो तब माँ और शिशु दोनों के लिये जीवनदायिनी भी है।


जब भी योनिमार्ग से प्रसव का विकल्प शिशु या माँ के जीवन को खतरा बन सकता हो तब इस विकल्प का चुनाव किया जाता है।

विशेष कारण
• बहुमूल्य गर्भ
• दीर्ध एवं विषम प्रसव
• विपत्ति में शिशु ( फीटल डिस्ट्रस)
• विपत्ति में माता ( मैटर्नल डिस्ट्रस)
• समस्या जैसे प्री एकलम्पसिया( अधिक रक्तचाप), हर्पिस
• आपत्ति जैसे कि नाल का उतरना(कौर्ड प्रोलैप्स), उदर पर चीर पड़ना
• एक से अधिक गर्भ
• अस्वाभाविक गर्भस्थिति
• विफल गर्भ प्रवेशन
• सहायक विफल प्रसव (फेल्ड इन्स्ट्रूमेन्टल डेलिवरी)
• बड़ा शिशु
• आंवल संबंधित त्रुटि
• नाल संबंधित त्रुटि
• संविदागत(कोन्ट्राक्टड) पेल्विस

जैसे जैसे चिकित्सा ज्ञान ने प्रगति करी है,वैसे वैसे सीज़ेरियन सुरक्षित होता गया है। किन्तु जिस गति से इस हुनर का विकास हुआ है उससे काफी अधिक गति से इसके संख्या में वृद्धि हुई है। करीबन दस से पचास प्रतिशत प्रसव अब सीजेरियन से होने लगे हैं।

सोच कर थोड़ी हैरानी होती है कि अचानक इतनी वृद्धि के पीछे क्या शिशु और माँ के स्वास्थ्य और जीवन का लाभ ही है।

कारण कई हैं-
• सुविधा का सुलभ होना
• कारणों का गलत आंकलन
• डॉक्टर्स का ज्यादा फीस लेना का तरीका
• दर्दी का योनिमार्ग से प्रसव करने से इंकार
• महुरत और फैशनेबल ट्रैन्ड

वजह जो भी हो यह एक अत्यंत चिंता का विषय है। कुदरत का हाथ बँटाना और उसके साथ खिलवाड़ करना दो अलग बातें हैं। सीजेरियन से जन्मे बच्चों में शर्तिया तकलीफ अधिक होने की सँभावना ज्यादा होती है। यह तकलीफ इनफेक्शन, खून का अधिक बहाव, अगले गर्भ में तकलीफ, उदर में चीर पड़ने की सँभावना....वगैरह कुछ भी हो सकती है। वैसे भी आज भी कुदरत इंसान से अधिक निपुण है।

फिर रिमोट कंट्रोल हमारे हाथ में नहीं है। जहाँ कुदरती तरीके से प्रसव हो वहाँ कुदरत ध्यान रखती है कि शिशु प्रसव के बाद रोये, माँ आंवल के बाहर आते ही शिशु को दूध देने में सक्षम हो, माँ का स्तन भी उपयुक्त समय पर भर जाता है।

जब यह कंट्रोल इंसान के हाथ आता है तो सब कुछ हमेशा निर्विघ्न नहीं हो पाता।

सिज़ेरियन के पश्चात माँ को एक शल्यक्रिया के बाद मिलने वाली चौकसी की जरूरत होती है। दो हफ्ते तक माँ स्वतंत्र रूप से शिशु को देखने में पूरी तरह समर्थ नहीं होती। उदर और पेट पर जो चीर पड़ता है , वह भी भरने में समय लेता है।

सिज़ेरियन के बाद एक माँ कुदरती प्रसव और सिजेरियन...दोनो की तकलीफ सहती है। जहाँ सामान्य प्रसव एक फिसियोलौजिकल प्रोसेस है....सिज़ेरियन एक कृत्रिम अवस्था है....जिसकी जटिलताओं का ज्ञान आवश्यक है।

अपने डॉक्टर का चुनाव हमेशा सोच समझ कर करना चाहिये। डॉक्टर का समय पर सही फैसला लेने के लिये सचेत रहना जरूरी है....किन्तु व्यर्थ में कुदरती क्रिया में हस्तक्षेप गलत है।

दर्दी और उसके साथ के लोग अक्सर भावनात्मक स्तर पर ऐसे समय में इतने कमज़ोर होते हैं कि कई बार एकदम सही फैसला नहीं कर पाते।

एक चिकित्सक लेकिन संयत होना चाहिये कि सोच समझ सके कि उसके निर्णय का असर दर्दी पर क्या होगा-

Surgeons must be very careful
When they take the knife!
Underneath their fine incisions
Stirs the Culprit - Life!
~Emily Dickinson

Thursday 13 March 2008

उत्पत्ति

नौ महीने का सफर समाप्त होते होते शिशु स्वतंत्र रूप से साँस लेने में सक्षम होता है। उसकी शारीरिक संरचना बाहर की दुनिया में आकर जीवित रहने के लिये पूर्ण। किन्तु कोख के अंदर से बाहर की यात्रा किसी भी दृष्टिकोण से एक दिलचस्प घटनाचक्र है। हिन्दी पिक्चरों में दिखाई जाने वाली इमोशनल प्रसव पीड़ा के बिहाइन्ड द सीन्स इतना कुछ हो रहा होता है कि हर बात अगर रेकार्ड की जाये तो एक पूरा उपन्यास लिखा जा सकता है।

हर मनुष्य की इससे अहम और मुश्किल यात्रा शायद ही कोई और हो। एक बेहद संकरा रास्ता, जीवन की खोराक पहुँचाने वाली धमनियों से अलगाव, स्वतंत्र साँस की शुरुआत और बेहद तेजी से होता आंतरिक बदलाव।


स्पर्श की तपिश की पहली चाह और माँ का वात्सल्यपूर्ण साथ।
माँ जो खुद शारीरिक और मानसिक बदलाव से गुजर रही है। शिशु को जन्म देने की पीड़ा और अपने जीवन से एक अलग अस्तित्व में देखने की अनुभूति....
एक ऐसा समय जब माँ और शिशु दोनों को शिशु के पिता के साथ और आश्वासन की जरूरत होती है। पिता के लिये भी भावनात्मक जुड़ाव बनाने का महत्वपूर्ण समय।
जन्म से पहले फेफड़े पानी से भरे होते हैं। औक्सीजन की आवश्यकता माँ नाल से पूरी करती है। अशुद्ध खून की सफाई भी आंवल(placenta) मे ही होती है। जब शिशु संकरे से योनिमार्ग से गुजरता है तो फेफड़ों से पानी निचुड़ जाता है। बाहर पहुँचे शिशु की नाल काट दी जाती है। एक ऐसा क्षण जो माँ से अलगाव और पहली साँस के बीच गुजरता है। लगातार घटता औक्सीजन, तापमान और रोशनी में परिवर्तन, स्पर्श और फेफडों में बढ़ने वाला नेगैटिव प्रेशर, इनका संयुक्त प्रभाव शिशु को साँस लेने की पहल करने को उकसाता है।
फेफड़ों का साँस लेना सीखना एक अत्यंत जटिल प्रकरण है।
नये अंकुरित पौधे को नई ज़मीन में रोपने जैसा। इस दौरान जड़े उखड़ जाती हैं और ज़मीन बदल जाती है।

इससे पहले कि हम शिशु में होते बदलाव जानें हमें एक सामान्य हृदय के कार्यप्रणाली से परीचित होना होगा। हृदय नाशपति के आकार का एक मांसपेशीय अव्यय है | दो फेफड़ों के बीच स्थित , शरीर के विभिन्न भागों में रक्त पहुँचाने के लिये जिम्मेदार होता है | यह चार प्रकोष्ठों मे बटाँ होता है। दाँये भाग में अशुद्ध (डिऔक्सीजनेटड) रक्त होता है और बाँये भाग में शुद्ध(औक्सीजनेटड)। दाँये और बाँये भाग ऐट्रियम और वेन्ट्रीकल में बँटे होते हैं। रक्त का प्रवाह एट्रियम से वैन्ट्रीकल( एक ही दिशा) में संभव है। दाँये भाग में ऐट्रियम और वेन्ट्रीकल के बीच ट्राइकस्पिड वाल्व होता है। और बाँये भाग में ऐट्रियम और वेन्ट्रीकल के बीच बाइकस्पिड वाल्व होता है। दाँये भाग में वैन्ट्रीकल से अशुद्ध रक्त फेफड़ों तक पलमनरी आर्टरी से पहुँचता है। वहाँ से शुद्ध होकर पलमोनरी वेइन्स से बाँये ऐट्रियम में लौटता है। ऐट्रियम से वेन्ट्रीकल फिर एओर्टा से शरीर के सभी हिस्सों तक । वहाँ औक्सीजन पहुँचा कर सुपीरियर और इनफीरियर वीना कैवा से दाँये ऐट्रियम में अशुद्ध रक्त पहुँचता है।

हाँ थोड़ा पेचिदा है।

लेकिन सोचने की बात है कि कुछ ही क्षणों में बिल्कुल काम नहीं करते हुए फेफड़े अचानक काम करना कैसे शुरु करते हैं।

जन्म पू्र्व शिशु में जो बातें अलग होती हैं-
नाल और आंवल के बीच की धमनियाँ अशुद्ध रक्त पहुँचा कर शुद्ध रक्त वापस ले जाती हैं।

• डक्टस आर्टिरियोसस- पलमनरी आर्टरी और एओर्टा के बीच
• फोरामेन ओवेल-दोनो वेन्ट्रीकल के बीच एक छेद।
• डक्टस विनोसस- जिगर(लिवर) और इनफीरियर वीना कैवा के बीच
• अंबीलीकल वेइन- नाल से शिशु के लिवर तक
• अंबिलिकल आर्टरी- शिशु से आंवल तक
इतनी धमनियों को जन्मउपरांत बंद हो जाना पड़ता है। और सामान्य हृदय की कार्यप्रणाली तक पहुँचना पड़ता है।
जानती हूँ कि समझने में बहुत आसान नहीं है। लेकिन इतने जटिल बदलाव करने के लिये निमिष मात्र का समय होता है। कहीं कोई छोटी सी चूक और वह हृदय के संरचना में त्रुटि के रूप में उभर आती है।


इतने बदलाव के बाद होता है बच्चे का पहला रूदन.....पहली साँस.....
पता नहीं क्यूँ फिर सभी हिन्दी पिक्चरों के सीन्स याद आ गये। जी हाँ...पहला रूदन वाकई खुशी की बात है....कुदरत के एक चमत्कार के संपूर्ण होने के उद्घोष जैसा....

कभी लगता है कुदरत ने हम में से हर एक के ऊपर कितनी मेहनत की है । कई बार जितना मोल आंक कर हमें कुदरत ने जीवन दिया है...हम उससे बहुत नीचे के स्तर पर जीवन निर्वाह करते हैं।



और माँ .... बीज, मिट्टी और हवा....तो जीवन है...



Tuesday 11 March 2008

नौ महीने गर्भ में

एक शिशु को संसार में लाना और फिर उसकी परवरिश का दायित्व सँभालना जिम्मेदारी का काम है। एक दम्पति के जीवन में यह एक ऐसा बदलाव है जिसके कई पहलू हैं।

अगर नवागंतुक का आगमन सोचा समझा ना गया हो,शुभ नहीं समझा जा रहा हो, किसी गल्ती का परिणाम हो तो इस पूरे प्रक्रिया में और भी कई पक्ष उभर आते हैं। आर्थिक परेशानियाँ, इसके पहले के गर्भ के समय आया कोई संकट, माँ की गर्भवति होने के समय की उम्र और उसके स्वयं के बचपन में सहे संघर्ष एवं द्वन्द्व...ऐसी कई बातें हैं जो कोख में पल रहे बच्चे और उस बच्चे को जनने वाली माँ पर असर कर सकती है।

एक औरत जब गर्भवति हो जाती है तो शारीरिक और मानसिक रूप से कई परिवर्तन के दौर से गुजरती है। एक नये जीवन को खोराक और पलने की जगह देना, उसे स्वतंत्र साँस तक लेकर पहुँचना और फिर उसके आत्मनिर्भर होने तक अपने खून से सींचना।

मानसिक रूप से भी तीन सीढ़ियाँ पार करती है।
• पहली बार यह जानकर कि वह माँ बनने वाली है,एक सुखद अनुभूति का अहसास होता है। किन्तु साथ ही अपने सामर्थ्य पर शक भी। अपने माता पिता के साथ अगर कोई भावनात्मक द्वन्द्व हो तो इस दौरान बाहर आ जाता है।
• करीबन बीस हफ्ते के आसपास, औरत की उपरोक्त भावनायें चरम सीमा पर पहुँच जाती हैं। उसे चिन्ता सताने लगती है कि कहीं उसका बच्चा शारीरिक और मानसिक रूप से विकलांग ना हो। उसे अहसास होने लगता है कि यह बच्चा उसके शरीर में है जरूर पर इसका अस्तित्व अलग है।
• गर्भ के अंत तक पहुँचते पहुँचते माँ अपने बच्चे को एक व्यक्तित्व से जोड़ देती है।

दो सूईयों को लेकर स्वेटर बुनती माँ वाली इमेज कितनी भी रूमानी क्यूँ ना हो...यह एक सच है कि इस दौरान वह विविध मानसिक और शारीरिक उतार चढ़ाव से गुजरती है। इस समय उसे समझना और स्वीकार करना उसके मानसिक संतुलन के लिये आवश्यक है।

यह कुदरत का एक करिश्मा ही है कि एक कोशिका से एक पूरा इंसान तैयार हो जाता है।
नियंत्रण एक डी एन ए कोड़ मे लिखा हुआ, जिसमें माता और पिता की बराबर की भागेदारी रहती है। इस कोड़ के अनुसार एक कोशिका ,रूप मे ढ़लने लगती है।

किसी कुशल निर्देशक के हाथ में एक सिम्फनी.....साधन माँ उपलब्ध कराती है...और जगह उसकी कोख।








विकास का क्रम
1. उर्वरण और कोख में स्थिर होना- भ्रूण जीवन की शुरुआत (पहला और दूसरा हफ्ता)
2. दो में संस्तरित होना
3. तीसरे स्तर का जुड़ाव- अव्ययों के निर्माण की शुरुआत (तीसरा, चैथा हफ्ता)
4. हृदय, आँख और एक नन्हा आकार- हाथ और पाँव के अंकुर (पाँचवा हफ्ता)
5. नन्हा सा मुँह
6. नाक और होंठ
7. पलक
8. ओवरीज़ और टेस्टिस
9. स्त्री या पुरुष विशेषता सूचक (नौवाँ हफ्ता)
10. खुली आँखें
11. हिलता , घूमता शिशु ( बीसवें हफ्ते से अढतीसवाँ हफ्ता)


मृत्यु दर और अस्वस्थता सबसे अधिक जन्म से पूर्व होती है। करीबन तीस प्रतिशत गर्भ स्वत: निष्फल हो जाते हैं। इनमें अक्सर कोई बुनियादी खोट होता है। दो प्रतिशत नवजात शिशु में कोई गँभीर शारीरिक विकलांगता होती है जिसे शल्य चिकित्सा की आवश्यकता पड़े। रोगाणू, रसायन,तापमान की विविधता और एक्स रेस का असर भी सबसे अधिक इसी दौरान होता है। माता या पिता के सिगरेट फूँकने का असर भी बच्चे में कम विकास का कारण बन सकता है।

माँ एक कोशिका को एक शिशु बनाने की प्रक्रिया में पूरी खोराक पहुँचाती है। सभी अव्ययों को विकसित करने के लिये विटामिन्स, मिनरल्स ,ऊर्जा ,कैल्सियम, लौह तत्व वगौरह की जरूरत पड़ती है। जो माँ को अपने खोराक से मिलता है, विकसित होते शिशु तक पहुँच जाता है। जो खोराक में नहीं होता पर उसके शरीर में हो....वो शरीर से सोंक लिया जाता है। अगर शरीर भी उस जरूरी खोराक से वँचित हो तो शिशु में असर दिखता है।

गर्भ ....शायद एकमात्र ऐसा समय जब एक ही शरीर में दो दिल साथ में धड़कते हैं....

कुदरत कितने निपुणता से हर अंग को रूप में ढ़ाल देती है।

....इतनी खूबसूरती,श्रम और परम के आशा के चिन्ह को.....कितनी आसानी से कुछ लोग भ्रूण हत्या के हेडलाइन्स के नीचे समाप्त कर देते हैं.....
जैसा कि मार्टिन कहते हैं
God's interest in the human race is nowhere better evidenced than in obstetrics.
Martin H. Fischer

भगवान का मनुष्य जाति से लगाव औबस्ट्रैटिक्स (गर्भ संबंधित विज्ञान) से ज्यादा और कहीं नज़र नहीं आता।

फिर रवीन्द्र नाथ टैगोर ने कहा ही है
Every child comes with the message that God is not yet discouraged of man.



काश हम थोड़ी कोशिश कर परम का हौसला बनाये रखें......।

Sunday 9 March 2008

आरंभ

उदर में एक नन्हे से जीवन की पहल होते ही अनंत सँभावनाओं को मुट्टी में पकड़ एक स्वप्न रूप लेता है। नौ महीने परम के हाथ से माँ की कोख में अंग को पूर्ण करता हुआ लगातार एक स्वतंत्र अस्तित्व की ओर विकसित होता है।

जन्म पश्चात शिशु अपना जीवनकाल आरंभ करता है। जन्म,शैशव, बाल्यकाल, फिर तरुणाई। हर विकास के पड़ाव से गुजरता हुआ एक व्यक्ति बनता है।

यह सफर आसान नहीं है। कई बातों की सही समझ माँ बाप को नहीं होती। बहुत सी असामान्य बातें रीत रिवाज़ और रस्म की आड़ में छिपी रह जाती हैं। और बहुत सी सामान्य बातों को रोग का नाम दिया जाता है।

वैसे तो हर शिशु का व्यक्तित्व काफी कुछ तय होता है लेकिन परिवेश के असर से इंकार नहीं किया जा सकता। माता पिता उस कुम्हार की तरह हैं जो कच्ची मिट्टी को मनचाहा स्वरूप देने में सक्षम हैं।

इस जगह में मेरी कोशिश रहेगी कि मैं शैशव से तरुणाई तक के विभिन्न पहलुओं पर रोशनी ड़ाल सकूँ। विविध विषयों का विश्लेषण करना चाहती हूँ कि मार्गदर्शन कर सकूँ कि कहाँ हमें स्वीकार करने की जरूरत है और कहाँ हम सकारात्मक हस्तक्षेप कर सकते हैं ।
खलिल गिबरान कहते हैं कि माता पिता परम के हाथ में कमान की तरह होते हैं,जिसके सही झुकाव से बच्चे तीर की तरह सीधा सही रास्ते से गुजर लक्ष्य तक पहुँचते हैं।


Your children are not your children.
They are the sons and daughters of Life's longing for itself.
They come through you but not from you,
And though they are with you yet they belong not to you.

You may give them your love but not your thoughts,
For they have their own thoughts.
You may house their bodies but not their souls,
For their souls dwell in the house of tomorrow,
which you cannot visit, not even in your dreams.
You may strive to be like them,
but seek not to make them like you.
For life goes not backward nor tarries with yesterday.

You are the bows from which your children
as living arrows are sent forth.
The archer sees the mark upon the path of the infinite,
and He bends you with His might
that His arrows may go swift and far.
Let our bending in the archer's hand be for gladness;
For even as He loves the arrow that flies,
so He loves also the bow that is stable.

मेरे इस सफर में उम्मीद है आप मेरे साथ होंगे।

Monday 3 March 2008

वात्सल्य

नींव का पहला पत्थर.....