Wednesday 30 April 2008

स्तनपान




शिशु के जन्म होते ही पहले स्पर्श का भी समय हो जाता है। स्पर्श की तपिश और अनुरक्ति का अहसास इतने बचपन में भी होता है। माँ की गर्मी के पास और साथ रह कर शिशु एक जुड़ाव महसूस करता है, स्वयं को सुरक्षित महसूस करता है। शिशु को साफ और मुलायम कपड़ो में सही तरीके से लपेट कर जितनी जल्दी हो सके माँ को सौंप देना चाहिये। प्रसव के आधे घंटे के अंदर स्तनपान करवाना चाहिये। यह अवधि सीज़ेरियन प्रसव से हुए बच्चों के लिये एक घंटा मानी जा सकती है।

स्तनपान की बात आते ही हमारे प्रोफेसर की एक बात याद आती है। Cow's milk is for the calf....your child needs yours!! गाय का दूध बछड़े के लिये...तुम्हारे बच्चे को तुम्हारे दूध की जरूरत है।

माँ के दूध पर आधारित सभी कहावतों और डायलॉग्स के पीछे एक ठोस आधार है। हर माँ का दूध उसके शिशु के लिये एकदम उपयुक्त होता है। मतलब कि अगर शिशु 28 हफ्ते में ही जन्म ले तो उसके पाचन शक्ति और जरूरत के हिसाब का सही मात्रा में प्रोटीन्स, विटामिन्स और चर्बी दूध में होती है। जैसे उस शिशु के लिये उसके जरूरत के अनुसार खास ऑर्डर पर तैयार किया गया हो।

माँ का दूध मतलब माँ के आँचल में रह कर मिलने वाली खोराक- साफ, बिना झंझट, हमेशा फ्रेश, स्टेरिलाइसेशन की आवश्यकता से दूर, हमेशा माँ के पास, माँ के साथ...सही मात्रा में प्रोटीन, विटामिन्स,ग्लूकोस, फैट। साथ में रोग प्रतिकारक शक्ति। माँ से लगातार गहराता जुड़ाव। काउ मिल्क अलर्जी से दूर।

फायदें इतने हैं कि यह समझना कठिन है कि यहाँ भी फैशन ने बाजी मार ली है। फैशन, ट्रैन्ड, फिगर और कठिनाई जैसे बहानों का इस्तेमाल कर शिशु को इससे वँचित रखना दुखद है।

खैर।
नवजात शिशु को देखना हमेशा एक सुंदर अनुभव रहा है। माँ के पास गर्म , मुलायम कपड़ों में लिपटा शिशु जल्द ही बगल में मुड़कर माँ को तलाशना शुरु करता है। होठों पर जीभ फेरकर दूध की माँग रखता है। यही सही समय है स्तनपान शुरु करने का।

शिशु के लिये स्तनपान सीखी हुई एक बात है। किन्तु पहली बार बनी माँ के लिये यह एकदम नया अनुभव है। माँ को सहजता से इसकी शुरुआत करनी चाहिये। माँ की विकलता शिशु तुरंत भाँप लेता है...इसीलिये परेशान माँ का शिशु भी अक्सर चिढ़चिढ़ा हो जाता है।

पहली बार स्तन से लगाना अपने आप में एक प्रक्रिया है। इसे लैच्चिंग ऑन कहते हैं। अगर सही तरीके से स्तनपान की शुरुआत की जाये तो माँ और शिशु के बीच के रिश्ते को अच्छी और तनाव रहित शुरुआत मिल सकती है।
1.शिशु का मुँह पूरी तरह खुलवायें। हल्के से शिशु के होंठ स्तन पर लगाने से वह पूरा मुँह खोल देगा...ऐसे जैसे उबासी में खोलते हैं।
2. फिर जिस हाथ में शिशु को सँभाला है उसे पास लाकर शिशु को स्तन के पास लाना है। ध्यान रहना चाहिये कि शिशु को माँ की तरफ लाया जाये ना कि माँ को शिशु की तरफ।
ध्यान रहे कि शिशु के मसूड़े स्तन के आसपास के एरियोला (स्तन के पास गहरे रंग की त्वचा)को पूरी तरह से मुँह के अंदर लें। शिशु के होंठ बाहर की तरफ मुड़े हुए हों।
3. इतना करने पर शिशु स्तन चूस कर दूध पीने की कोशिश करेगा।

(स्तनपान का सही तरीका जानने के लिये नीचे दिये लिंक पर जायें)

http://www.youtube.com/watch?v=Zln0LTkejIs

अगर शिशु स्तन से सही तरीके से जुड़ा हो और सही तरह से चूस रहा हो तो इस प्रक्रिया में स्तन में दर्द नहीं उठना चाहिये। अगर दर्द उठे तो स्तनपान रोक कर फिर कोशिश करनी चाहिये। शिशु के स्तन पकड़ने पर वैक्यूम बनता है और सक्शन एफैक्ट से दूध खिंचता है। जब भी शिशु को स्तन से हटाना हो तो स्तन और मसूड़े के बीच उँगली ड़ाल कर पहले वैक्यूम खत्म करें। कभी भी गलत तरीके से स्तनपान जारी ना रखे। इससे स्तन पर चीरे पड़ने का डर रहता है और शिशु को भी पर्याप्त मात्रा में दूध नहीं मिलता।

माँ और शिशु के रिश्ते का एक अहम पहलू है स्तनपान। माँ की खुशबू, सपर्श की तपिश, और माँ की गोद की सुरक्षा...इन सबके लिये पहला अनुभव है स्तनपान। स्वाभाविक क्रिया है और जितना सहजता और आनंद से निभाया जाये उतनी ही संतुष्टि दोनो को मिलती है।

छह महीने तक शिशु को मात्र स्तनपान देने से उसकी सभी खोराक की जरूरत पूरी हो जाती है। सिर्फ माँ का दूध उसके लिये पर्याप्त है। इसे एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीड़िंग कहते हैं। छह महीने से माँ के दूध के अलावा कुछ और भी शुरू किया जाना चाहिये। स्तनपान मात्र खोराक ही नहीं पूरा करता किंतु इससे शिशु का पहला स्नेह संबंध बनता है।

(http://www.youtube.com/watch?v=cVbZmCQT6Ec&feature=related)


कहते हैं भगवान ने माँ को इसलिये बनाया क्योंकि हर जगह हर समय हर शिशु के पास नहीं रह सकता....काश हर शिशु के पास उसका अपना भगवान ......उसकी माँ हो....जो उसे ममता से सँभाल,दूध से सींच,स्नेह से छू....उसको उसकी अपनी पहचान दे.....





( photo courtesy breastfeeding.com)

Wednesday 9 April 2008

विरासत में रोगाणु ?!

इस ब्लॉग के नियमित पाठकों से क्षमा। व्यस्तताओं के चलते थोड़ा विलम्ब हुआ।

शिशु माँ से खुराक, औक्सीजन जीन्स वगैरह पाता है। साथ ही अगर माँ किसी रोग से पीड़ित है तो कई बार रोग भी विरासत में पा लेता है। इसके बारे में जानना जरूरी है क्योंकि कोई माँ अपनी वजह से अपने शिशु में किसी प्रकार का रोग नहीं देखना चाहती।
सही जानकारी,जाँच और इलाज शिशु की रक्षा कर पाने में अधिकतर सक्षम होते हैं।

रोग किस प्रकार से माँ से शिशु तक पहुँच सकता है?

• नाल से। टौक्सोप्लास्मा, ट्रीपोनिमा पैलिडम(सिफिलिस के लिये जिम्मेदार),रुबेल्ला, सी एम वी(साय्टोमेगालेवायरस),लीस्टीरिया, फाल्सीपारम(मलेरिया)
• वर्द्धमान मातृक इनफेक्शन ( माँ से शिशु की ओर बढ़ता हुआ)-कोरियोएम्नियेनाइटिस
• प्रसव के दौरान- माँ के रक्त और योनि से संपर्क में आने पर। HIV (एड्स), HZV( चिकनपौक्स-माता), HBV (हैपाटाइटिस बी-जहरी कमळा) और क्लैमीडिया ट्रैकोमैटिस ( कनजंक्टिवाइटिस)
• प्रसव के बाद-स्तनपान से फैलने वाले


गर्भ से पहले और गर्भ के दौरान होने वाले परीक्षण से रोग के होने या हो सकने की सँभावना का पता लगाया जा सकता है। सही समय पर सही कदम लेने पर प्रतिकूल परिणाम से शिशु को बचाया जा सकता है।
TORCH के नाम से यह रोग जाने जाते रहे हैं। (टौक्सोप्लास्मा, रुबेल्ला, सी एम वी(साय्टोमेगालेवायरस), हर्पिस) ।
अक्सर गर्भ ठहरने के करीबन सोलहवें हफ्ते में इन रोगों के होने की जाँच की जाती है।


टौक्सोप्लास्मा

यह रोग अगर शिशु में हो तो शिशु के मानसिक विकास पर असर पड़ सकता है। शिशु अँधपन एवं अपस्मार का शिकार हो सकता है।
इससे बचाव के लिये इसके होने के तरीकों का जानना आवश्यक है। कच्चा गोश्त, मुर्गी, सीफुड़, बिना धोये फल और सब्जियाँ, बिल्ली या उसके मल से किसी प्रकार का संपर्क इस रोग को माँ तक पहुँचा सकता है। जाहिर है की कच्चा गोश्त ,मुर्गियों और बिल्लियों से दूर रहना चाहिये और फल और सब्जियाँ धोने के बाद ही हाथ लगानी चाहिये।


रुबेल्ला

रुबेल्ला से ग्रसित होने पर शिशु के पूरे विकास पर असर पड़ता है। मोतियाबिन्द, छोटी आँखें,हृदय की बनावट में बुनियादी खामी,(पैटेन्ट डक्टस आर्टिरियोसिस, पलमनरी आर्टरी स्टीनोसिस, बहरापन(सेन्सरी न्यूरल डैफनस), न्यूनमनस्क (मेन्टल रिटार्डेशन), थ्रौम्बोसायटोपीनिया , बच्चे का गिरना या मरा हुआ पैदा होना सँभव है।


एम एम आर इनजेक्शन एक आसान तरीका है बचने का। गर्भ ठहरने से पहले....हो सके तो यौवन में ही हर लड़की को रुबेल्ला का ठीका लगवा लेना चाहिये।


सी एम वी(साय्टोमेगालेवायरस)

इस रोग से ग्रसित नवजात का वजन कम हो सकता है, गुर्दे पर असर,कमळा, फेफड़ों में असर, अनीमिया और बहरापन हो सकता है।

जिन में इस के रोगाणु होते हैं उनके शरीर के सभी द्रव्य से यह रोग फैल सकता है। संसर्ग, स्तनपान,ब्लड ट्रान्सफ्यूशन और औरगेन ट्रान्सप्लान्ट से भी यह फैल सकता है।

जाहिर है की किसी भी दूसरे व्यक्ति के शरीर के द्रव्य के संपर्क में आने से इसकी सँभावना बढ़ सकती है। हाथ धोना, संसर्ग के दौरान कौन्डोम का इस्तेमाल, ब्लड ट्रान्सफ्यूशन के समय डॉक्टर से तसल्ली करना अहम भूमिका निभा सकता है। नन्हे बच्चों को पढ़ाने या सँभालने वाली स्त्रियों को इस बात को लेकर खास सचेत होना चाहिये। उन्हे बच्चों के थूक,मूत्र इत्यादि द्रव्यों के संपर्क में नहीं आना चाहिये। और आये तो तुरंत साबुन और पानी का इस्तेमाल करना चाहिये।


हर्पिस





इस रोग से ग्रसित अधिकतर बच्चों में बहुत कम तकलीफ होती है। दो-तीन प्रतिशत बच्चों में वैरिसेल्ला सिन्ड्रोम हो सकता है। दागदार त्वचा, अंग का अधूरा विकास,अव्ययों, आँख और न्यूरोलौजिकल कार्य में क्षति हो सकती है।
माँ अगर चिकन पौक्स के संपर्क में प्रसव के पाँच दिन पूर्व से दो दिन पश्चात तक आये तो नियोनेटल झोस्टर की सँभावना बन जाती है। इसमें तीस प्रतिशत शिशु में जान खोने का जोखिम रहता है। इलाज( varicella-zoster immune globulin (VZIG) IM)तुरंत जरूरी है।



सभी गर्भवति स्त्रियों में HIV antibody(एड्स), Hepatitis B Surface antigen(जहरी कमळा),VDRL( सिफिलिस), मूत्र की जाँच वगैरह लाजिमी है। इन्हे करवाने के बाद डॉक्टर की सलाह आवश्यक है। स्वयं इन रिपोर्ट को पढ़ने की कोशिश कई बार गलत निष्कर्ष तक पहुँचा सकती है। परिणाम के अनुसार जरूरी दवा , नहीं तो पूर्वोपाय किये जा सकते हैं।

HIV antibody के पौसिटिव होने पर कभी छिपाया नहीं जाना चाहिये। सही समय और सही तरीके से दवा करने पर शिशु को रोगमुक्त रखा जा सकता है।








मलेरिया, मूत्र में दोष का इलाज सही समय पर करने से शिशु के स्वास्थ्य को हानि से बचाया जा सकता है। योनिमार्ग मे कोई दोष, नहीं तो प्रसव के दौरान फैलने वाले रोग से शिशु को सीज़ेरियन का विकल्प चुन बचाया जा सकता है।

रोगाणु बहुतेरे हैं...घात लगाये बैठे हुए....कई बार माँ के शरीर पर आक्रमण कर शिशु को स्वस्थ पैदा होने के विकल्प से वँचित कर देते हैं.

पर माँ और पिता इतने भी बेबस नहीं है। जरूरत है अग्रसक्रिय होने की। हर होने वाले पिता में अपने जीवनसाथी और संतान की तरफ चौकसी की जिम्मेदारी लेने की।

और माँ तो फिर माँ है....सिर्फ ममता लोरी और रात रात तक जागरण करने तक सीमित नहीं होनी चाहिये....किन्तु जिम्मेदारी सहित स्वयं को रोगाणु से मुक्त रख अगली पीड़ी की सृष्टि में अपना दायित्व निभाने की तरफ सजग होना चाहिये।




जानती हूँ काफी रूखा सूखा सा विषय है। लेकिन बहुत जरूरी और बेहद ध्यान से समझने जैसा।
बहुत छोटी बातों से बहुत बड़ी समस्या को मूल से ही उखाड़ दिया जा सकता है....
हाँ आम जिन्दगी में भी नियम अलग तो नहीं हैं... :)))