Thursday 29 May 2008

शिशु की त्वचा- भाग 2

पिछली कड़ी के आगे

डायपेर रैश



डायपेर रैश - नाम से ही जाहिर है कि डायपेर पहनने की वजह से और उस जगह पर होता है जहाँ डायपेर त्वचा के संपर्क में आता है। यह लाल और दुखदायी होता है। मलमूत्र से भीगा हुआ डायपेर जब काफी समय तक त्वचा के संपर्क में रहता है तो त्वचा पर इस तरह असर होने लगता है। ऐसे में शिशु को सूखा रखना (खास तौर से कूल्हा और प्राइवेट (गुप्त) भाग)बेहद जरूरी है। कई बार बैक्टीरिया और यीस्ट के चेप से भी हो सकता है। दो तीन दिन में अगर ठीक ना हो तो डॉक्टर को दिखाना चाहिये। साधारण तौर पर पावडर लगा कर, सही समय पर डायपेर बदल कर, कुछ समय शिशु को खुला रख हवा लगने देना चाहिये। जिस क्रीम में ज़िक ऑक्साइड हो वह फायदा करती है।


एटोपिक डर्मटाइटिस



यह एक तरह की स्किन अलर्जी है। अक्सर ऐसे शिशु के परिवार में किसी ना किसी को अलर्जी की शिकायत होती है। कुछ भाग पर त्वजा बेहद नाजुक, सूखी होती है और यहाँ खुजली उठती है। यह गालपर, कुहनियों और घुटनों के पीछे और कई बार शरीर में पूरी जगह हो सकती है। खाने में , पहनने में, लगाने में.....किसी में भी कोई ऐसी चीज़ हो सकती है जिससे शिशु में तकलीफ शुरु हो। ठंड के मौसम में तकलीफ के बढ़ने की आशंका रहती है। जिस शिशु में यह तकलीफ है उसके और उसके माता पिता के लिये इससे जूझना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। सही समय पर सही निदान, सही और पर्याप्त उपचार और बचाव महत्वपूर्ण है। इस पोस्ट में इस विषय में और कहना मुश्किल होगा किंतु सही निदान और पर्याप्त उपचार-ना कम ना ज्यादा- आवश्यक बातें है।


नवजात शिशु में पीलिया


माँ और शिशु के ब्लड़ ग्रूप के अलग होने की वजह से जो पीलिया होता है उसके बारे में पहले ही लिख चुकी हूँ।

पीलिया सामान्य तौर पर दूसरे तीसरे दिन दिख सकता है और एक हफ्ते तक रह सकता है। शिशु की आँखों में पीलापन गँभीर पीलिया ना होने पर भी दिख सकता है। इसमें चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है। अगर शिशु सचेत है, बराबर दूध पी रहा है, पेशाब समय से कर रहा है तो चिंता की आवश्यकता नहीं है।

पीलिया होने पर धूप में शिशु को रखने की जो सलाह चली आ रही है वह गलत है। जिस वेवलैंग्थ की लाइट इस पीलिये पर असर कर सकती है वह साधारण धूप में नहीं मिल सकती। बल्कि धूप में शरीर के पानी के सूखने की वजह से पीलिया और बिगड़ सकता है।


जन्मचिह्न

नवजात शिशु में विविध प्रकार के जन्मचिह्न देखे जा सकते है। इनमें से कुछ ,थोड़े बरसों बाद गायब हो जाते हैं और कुछ जीवन भर रहते है।

कफै उ लैट



चाय कॉफी के गिरने के बाद जैसा निशान होता है। एक दो से अधिक या बड़े निशान को डॉक्टर को दिखाना जरूरी है। कभी कभार यह किसी और कमी की तरफ इशारा कर सकता है।

पोर्ट वाइन स्टेन



यह बड़े, बिना उभरे गहरे लाल या जामुनी धब्बे होते है। बहुत सारी शिराओं के त्वचा के नीचे इकट्ठा होने से यह बनते है। यह लुप्त नहीं होते।


स्ट्राबेरी हिमैन्जियोमा





स्ट्राबेरी की तरह दिखने वाले यह चिन्ह बहुत छोटे से बहुत बड़े तक हो सकते है। लाल रंग के उभरे हुए निशान होते है। असामान्य रक्तप्रवाह की वजह से यह बनते है। इसकी वजह से त्वचा फूलने लगती है और लाल दिखती है। यह जन्म के बाद बड़ने लगते है और अक्सर दस बरस तक गायब भी हो जाते है। अगर यह निशान चेहरे पर है, आँखों के पास है , नज़र पर असर करें है तो इसे उपचार की आवश्यकता है। अगर निशान लगातार बड़ रहा हो तो डॉक्टर को दिखाना आवश्यक है।

कैवर्नस हिमैन्जियोमा

काफी कुछ स्ट्राबेरी हिमैन्जियोमा की ही तरह होते है। इसमें त्वचा के नीचे की कई परतें भी अन्तर्ग्रस्त होती है। यह पहले बरस में बड़ कर पाँच से बारह बरस तक में लुप्त हो जाती है। कभी चाहो तो शल्यक्रिया से निकाली भी जा सकती है।


कब डॉक्टर को मिलें

-शिशु के व्यवहार में अंतर महसूस करें
-अगर किसी चेपी रोग के लक्षण महसूस हो
-निशान में दर्द इठे, सूजन आ जाये या गरम महसूस हो
-मध्य से लाल रेखायें जाती हुई दिखने लगे
-परू भर जाये
-गले, बगल या पेट और जाँघ के बीच के भाग में गिलटी उभर आये
-बुखार हो
-डायपेर रैश के दो तीन दिन तक ठीक ना होने पर
-कोई और नया चिन्ह उभरने पर

शिशु की त्वचा बेहद नाजुक होती है। कई परेशानियाँ महज उपयुक्त बचाव से सुलझ सकती है। बाकी जिन्हे इलाज की जरूरत है वह जादू टोना से नहीं सुलझ सकती। त्वचा का सही इलाज करवा पाना भी एक मुश्किल काम है। क्योंकि अक्सर यह धैर्य माँगती है....जो हममें नहीं होता....

कई बार ऐसे शिशु के माता पिता में हीन भावना पनप जाती है जो बिल्कुल जायज़ नहीं है। जरूरत है ऐसी स्थिति में विवेक और संवेदना की....

और अपनी सुंदरता की परिभाषा पर पुनर्विचार करने की.....





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Tuesday 27 May 2008

ज़रा मुस्कुरा दो

ब्लॉग जगत में हर विवाद के बीच में कुछ कहने का मन हुआ है....आज सिर्फ अनुरोध है...ज़रा मुस्कुरा दो...एक मौका जिंदगी को दो...एक मासूमियत को... थोड़ी हँसी बहने दो....




(http://www.youtube.com/watch?v=mnbY2jALfqI)

कहीं सुना था....
If you HAVE to make a choice between being kind and being right....choose kindness

अगर कभी चुनाव के लिये दो ही विकल्प हो- सही साबित होना या उदार होना...उदारता चुनो

स्नेह से रहना और संयत होकर अपनी बात कहना इनके लिये तो मुश्किल नहीं लगता....

Monday 26 May 2008

शिशु की त्वचा- भाग 1



टीवी और विज्ञापन में शिशु की त्वचा देखकर मन होता है काश ऐसी त्वचा हम सब को मिली होती। हर दूसरा तीसरा कॉस्मेटिक प्रोडेक्ट वादा करता है की आपकी त्वचा को फिर से शैशव की ताज़गी देगी। लेकिन जानकर अचरज होगा की शिशु की त्वचा में सामान्य तौर पर ही भिन्नता नज़र आती है। कई बार पर्याप्त ज्ञान ना होने की वजह से इन्हे रोग समझ इनका उपाय ढूँढा जाता है। कई बार इन उपायों से नुकसान ज्यादा और फायदा कम होता है।
आज ज़रा देखें सुंदरता स्किन डीप होती है या इसके और मायने हैं....

क्रैडल कैप



शिशु के सर पर जमी पपड़ी को क्रैडल कैप कहते हैं। यह शिशु के सर की त्वचा के छिल कर निकलने का लक्षण है। कई वजह समझाई जाती है लेकिन यह शिशु को नुकसान नहीं पहुँचाती। अक्सर थोड़ा तेल मालिश और स्नान से धीमे धीमे त्वचा ठीक हो जाती है। अगर पपड़ी बहुत ज्यादा है या निकल नहीं रही हो तो डॉक्टर की सलाह लेकर खास शौम्पू और औइन्टमेन्ट इस्तेमाल करना पड़ सकता है। कई बार यह महीनों तक रह सकती है। सही उपाय से हफ्ते में ठीक भी हो सकती है।


एरीदिमा टॉक्सीकम



जन्म लेने के दूसरे दिन से शरीर के ऊपर लाल धब्बे नज़र आ सकते हैं। यह शरीर में कहीं भी हो सकते है सिवाय हथेली और पाँव के तलुओं के। कई बार इन के बीच की जगह में पीली छोटी फुँसियों सी निकली होती हैं। यह नवजात शिशु में अक्सर देखा जा सकता है । पहले एक दो हफ्ते बाद यह आप ही चले जाते हैं। सामान्य है इसीलिये जाहिर है इनके लिये कुछ भी करने की जरूरत नहीं है।


मीलिया



यह बहुत छोटे सफेद मोती के रंग के मुँहासों की तरह शिशु के माथे, गाल और नाक पर हो सकते है । इनके बनने का कारण सीबम (चिकनाई बनाने वाले) ग्लैंड्स का अधूरा विकास है। इस वजह से सीबम या चिकनाई छोटे छोटे मोतियों से जमा हो जाते है। कुछ हफ्तों मे यह आप ही चले जाते है। इनके साथ छेड़कान नाकरने में ही समझदारी है।

मंगोलियन स्पॉट्स


मंगोलियन स्पॉट्स नीले, थोड़े हरे या स्लेटी रंग के निशान है जो उभरे नहीं होते। यह शिशु के पीठ और कूल्हे पर नज़र आता है। कुछ कुछ घाव के बाद पड़े नीले निशान जैसा। यह अफरीकन और एशिया के शिशुओं में सामान्य तौर पर देखने को मिलता है। जैसे जैसे शिशु बड़ा होता है यह निशान हल्के पड़ जाते है लेकिन पूरी तरह से गायब नहीं होते।
हाँ ,रोग तो ये बिल्कुल नहीं है।


पुस्चूलर मेलोनोसिस



पुस्चूलर मेलोनोसिस छोटे छोटे फफोलों की तरह उभरते है। जल्द ही सूख कर गिर जाते है। पीछे थोड़े गहरे रंग के निशान छोड़ते है। अक्सर काले शिशु में ज्यादा देखने को मिलते है।

मीलियारिया



मीलियारिया उभरे हुए द्रव से भरे छोटे फोफले होते है। यह द्रव साफ अथवा दूध सा सफेद होता है। यह पसीने की ग्रंथि के बंद होने की वजह से बनते है। यह अपने आप ही ठीक हो जाते है।

जाहिर है की उपरोक्त किसी भी बात के लिये परेशान होने की जरूरत नहीं है। इनमें से कोई भी रोग का लक्षण नहीं है। किंतु सुंदरता और शिशु के त्वचा को लेकर जो सामान्य धारणा है उससे भिन्न है। पहली बार बने माँ बाप अक्सर यह देख कर तनाव में आ जाते है। और जो समस्या ही नही उसके लिये उपाय ढूँढ़ते है।

चाहे आपके शिशु की त्वचा आपके परिभाषा अनुरूप प्रवीण ना भी हो....शिशु सुंदर ही है....

Afterall beauty is DEFINITELY NOT skin deep !!!






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Saturday 10 May 2008

नवजात शिशु के सामान्य रिफ्लेक्सस एवं इनका महत्व

कुछ रिफ्लेक्सस नवजात शिशु में जन्म से ही पाये जाते है। यह प्रारम्भिक रिफ्लेक्सस शिशु जब उदर में होता है तब विकसित होते है। जन्म के समय इनका पूर्ण विकास होना आवश्यक है। जन्म के तीन माह पश्चात से बारह माह तक दिमाग का उच्चतर केन्द्र इन पर नकारात्मक दबाव ड़ालता है और इन पर वाँछित नियंत्रण विकसित करता है। जन्म के वक्त इनका होना शिशु के जीवित रहने के लिये जरूरी है।

इन रिफ्लेक्सस की अपनी समय सारिणी है। माता पिता को इसका थोड़ा बहुत ज्ञान होना आवश्यक है। इस समय सारिणी से अलग जब भी कोई महत्वपूर्ण फेर शिशु में दिखे तो चेतना आवश्यक है। सही समय पर छोटी बातों पर ध्यान आ जाये तो बड़ी मुसीबते बड़ी उलझने बनें इससे पहले उनका कोई उपाय किया जा सकता है।

इन रिफ्लेक्सस में उल्लेखनीय है चूसना, निगलना, आँखें मीचना, मलमूत्र क्रिया, हिचकी आना...वगैरह। जैसा की पहले भी बताया इनका होना शिशु के जीवित रहने के लिये अत्यावश्यक है।

शिशु का उदर में विकास संपू्र्ण होने के लिये उसे उदर में 37 हफ्ते से 40 हफ्ते तक बिताने जरूरी है। ऐसे शिशु के प्रसव को फुल टर्म डेलिवरी कहते हैं।

जन्म होते ही शिशु को पाँच बड़े बदलाव से सामना करना पड़ता है-
• शिशु जो उदर के अंदर जलचर होता है वह पहली बार स्वतंत्र साँस लेता है।
• पहली बार खुराक मुँह से लेकर पचाना सीखता है
• मलमूत्र क्रिया पहली बार संपन्न करता है
• अपने शरीर का तापमान बनाये रखता है
• रक्त से निरंतर खुराक मिलने की जगह भोजन अंतराल पर मिलने की आदत ड़ालता है


शिशु के लिये यह बदलाव छोटे नहीं है। इस बदलाव से सहजता से गुजरने के लिये रिफ्लेक्सेस जरूरी है।

दिमाग, रीढ़ और नसों की व्यवस्था सही तरह से विकसित होने का एक महत्वपूर्ण लक्षण है सामान्य रिफ्लेक्सेस का होना।

ऱिफ्लेक्स को टेस्ट करने की क्रिया को स्टिमुलेस और उस स्टिमुलेस की प्रतिक्रिया को रेस्पौन्स कहते हैं।

रूटिंग रिफ्लेक्स
इस रिफ्लेक्स को पर्दर्शित करने के लिये शिशु के गाल पर या मुँह के कोने पर हल्का सा सहलाने पर शिशु तुरंत मुँह फेर कर सहलाये गई जगह की तरफ मुँफ फेर कर और खोलकर स्टिमुलेस की तलाश करने लगता है। अक्सर यह माँ के स्तन के छूने पर होता है। और स्तन से संपर्क में आते ही शिशु तुरंत मुँफ फेर कर,स्तन तलाश , मुँह खोल स्तन को मुँह में ले लेता है। यह रिफ्लेक्स पैदाइशी रहता है और तीन चार माह जन्म पश्चात गायब हो जाता है।




सक्खिंग रिफ्लेक्स (चूसना)

इस रिफ्लेक्स को पर्दर्शित करने के लिये उँगली से शिशु के तालू में सहलायें तो शिशु तुरंत उँगली चूसने लगता है। यह क्रिया तुक में और बलपूर्वक तरीके से की जाती है। चूसने के बाद निगलने की कर्िया शामिल है।रूटिंग रिफ्लेक्स की ही तरह यह भी पैदाइशी रहता है और तीन चार माह जन्म पश्चात गायब हो जाता है। जाहिर है कि इससे शिशु माँ का दूध चूस पाने में सक्षम होता है।



मोरोस रिफ्लेक्स

शिशु जब अपने पीठ के बल लेटा हुआ हो तब कोई अचानक से की गई ऊँची आवाज़ या गरदन पर दिया सहारा आकस्मिक तरीके से छोड़ने की प्रतिक्रिया में शिशु सहसा ही अपना सर हिला देता है।शिशु अपने दोनो हाथ और पैर पहले फैला देता है और फिर मोड़ लेता है। अंत में शिशु चिल्ला कर रो पड़ता है।शरीर के दोनो भागों में अगर यह प्रतिक्रिया एक समान ना हो तो घ्यान देना और चिकित्सक के ध्यान में लाना जरूरी है।

अगर यह रिफ्लेक्स शिशु में नहीं हो तो शिशु की जाँच आवश्यक है क्योंकि इसका इशारा नसों या दिमाग में कमजोरी की तरफ हो सकता है।



ऐसा ही एक और रिफ्लेक्स है टोनिक नेक रिफ्लेक्स

Tonic Neck Reflex


यह लगभग छह सात महीने तक गायब हो जाता है। इसके गायब होने पर ही शिशु घुटनों पर चलना सीखता है।

ग्रास्पिंग रिफ्लेक्स
शिशु की हथेली में उँगली ड़ालो तो शिशु तुरंत उँगली पर पकड़ मजबूत कर देता है। करीबन छह महीने तक यह रिफ्लेक्स रहता है जिसके बाद शिशु अपनी इच्छा से पकड़ना और छोड़ना सीखता है।



बैबिन्सकी रिफ्लेक्स

शिशु के पाँव के तलुओं पर हल्का सा खंरोच दो तो पाँव की उँगलियाँ फैला कर ऊपर की तरफ मुड़ जाते है। यह रिफ्लेक्स छह से नौ महीने पर गायब होता है जिसके बाद शिशु चलना सीखता है।

वाल्किंग रिफ्लेक्स

शिशु का पैर नीचे रखो तो शिशु चलने की तरह कदम बड़ाने लगता है।




नवजात शिशु में इन रिफ्लेक्स का होना तस्सली देता है कि शिशु के नसों और दिमाग की व्यवस्था सही एवं संपूर्ण है। इन रिफ्लेक्स का ठीक समय पर गायब होना और शिशु का अलग अलग कार्य इच्छानुसार कर सकना विकास की अगली सीढ़ी है। ऐसा नहीं कर पाना और इन रिफ्लेक्स का समय से अधिक रहना भी चेतने का विषय है।

हर माता पिता का इस विषय में प्राथमिक ज्ञान आवश्यक है। इससे वे ठीक समय पर ,"चलता है बच्चा है बड़ा हो जायेगा " वाली मानसिक स्थिति से सही समय पर निकल; जो भी सही और जरूरी उपाय है लेने में सक्षम होंगे।




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