Saturday 10 May 2008

नवजात शिशु के सामान्य रिफ्लेक्सस एवं इनका महत्व

कुछ रिफ्लेक्सस नवजात शिशु में जन्म से ही पाये जाते है। यह प्रारम्भिक रिफ्लेक्सस शिशु जब उदर में होता है तब विकसित होते है। जन्म के समय इनका पूर्ण विकास होना आवश्यक है। जन्म के तीन माह पश्चात से बारह माह तक दिमाग का उच्चतर केन्द्र इन पर नकारात्मक दबाव ड़ालता है और इन पर वाँछित नियंत्रण विकसित करता है। जन्म के वक्त इनका होना शिशु के जीवित रहने के लिये जरूरी है।

इन रिफ्लेक्सस की अपनी समय सारिणी है। माता पिता को इसका थोड़ा बहुत ज्ञान होना आवश्यक है। इस समय सारिणी से अलग जब भी कोई महत्वपूर्ण फेर शिशु में दिखे तो चेतना आवश्यक है। सही समय पर छोटी बातों पर ध्यान आ जाये तो बड़ी मुसीबते बड़ी उलझने बनें इससे पहले उनका कोई उपाय किया जा सकता है।

इन रिफ्लेक्सस में उल्लेखनीय है चूसना, निगलना, आँखें मीचना, मलमूत्र क्रिया, हिचकी आना...वगैरह। जैसा की पहले भी बताया इनका होना शिशु के जीवित रहने के लिये अत्यावश्यक है।

शिशु का उदर में विकास संपू्र्ण होने के लिये उसे उदर में 37 हफ्ते से 40 हफ्ते तक बिताने जरूरी है। ऐसे शिशु के प्रसव को फुल टर्म डेलिवरी कहते हैं।

जन्म होते ही शिशु को पाँच बड़े बदलाव से सामना करना पड़ता है-
• शिशु जो उदर के अंदर जलचर होता है वह पहली बार स्वतंत्र साँस लेता है।
• पहली बार खुराक मुँह से लेकर पचाना सीखता है
• मलमूत्र क्रिया पहली बार संपन्न करता है
• अपने शरीर का तापमान बनाये रखता है
• रक्त से निरंतर खुराक मिलने की जगह भोजन अंतराल पर मिलने की आदत ड़ालता है


शिशु के लिये यह बदलाव छोटे नहीं है। इस बदलाव से सहजता से गुजरने के लिये रिफ्लेक्सेस जरूरी है।

दिमाग, रीढ़ और नसों की व्यवस्था सही तरह से विकसित होने का एक महत्वपूर्ण लक्षण है सामान्य रिफ्लेक्सेस का होना।

ऱिफ्लेक्स को टेस्ट करने की क्रिया को स्टिमुलेस और उस स्टिमुलेस की प्रतिक्रिया को रेस्पौन्स कहते हैं।

रूटिंग रिफ्लेक्स
इस रिफ्लेक्स को पर्दर्शित करने के लिये शिशु के गाल पर या मुँह के कोने पर हल्का सा सहलाने पर शिशु तुरंत मुँह फेर कर सहलाये गई जगह की तरफ मुँफ फेर कर और खोलकर स्टिमुलेस की तलाश करने लगता है। अक्सर यह माँ के स्तन के छूने पर होता है। और स्तन से संपर्क में आते ही शिशु तुरंत मुँफ फेर कर,स्तन तलाश , मुँह खोल स्तन को मुँह में ले लेता है। यह रिफ्लेक्स पैदाइशी रहता है और तीन चार माह जन्म पश्चात गायब हो जाता है।




सक्खिंग रिफ्लेक्स (चूसना)

इस रिफ्लेक्स को पर्दर्शित करने के लिये उँगली से शिशु के तालू में सहलायें तो शिशु तुरंत उँगली चूसने लगता है। यह क्रिया तुक में और बलपूर्वक तरीके से की जाती है। चूसने के बाद निगलने की कर्िया शामिल है।रूटिंग रिफ्लेक्स की ही तरह यह भी पैदाइशी रहता है और तीन चार माह जन्म पश्चात गायब हो जाता है। जाहिर है कि इससे शिशु माँ का दूध चूस पाने में सक्षम होता है।



मोरोस रिफ्लेक्स

शिशु जब अपने पीठ के बल लेटा हुआ हो तब कोई अचानक से की गई ऊँची आवाज़ या गरदन पर दिया सहारा आकस्मिक तरीके से छोड़ने की प्रतिक्रिया में शिशु सहसा ही अपना सर हिला देता है।शिशु अपने दोनो हाथ और पैर पहले फैला देता है और फिर मोड़ लेता है। अंत में शिशु चिल्ला कर रो पड़ता है।शरीर के दोनो भागों में अगर यह प्रतिक्रिया एक समान ना हो तो घ्यान देना और चिकित्सक के ध्यान में लाना जरूरी है।

अगर यह रिफ्लेक्स शिशु में नहीं हो तो शिशु की जाँच आवश्यक है क्योंकि इसका इशारा नसों या दिमाग में कमजोरी की तरफ हो सकता है।



ऐसा ही एक और रिफ्लेक्स है टोनिक नेक रिफ्लेक्स

Tonic Neck Reflex


यह लगभग छह सात महीने तक गायब हो जाता है। इसके गायब होने पर ही शिशु घुटनों पर चलना सीखता है।

ग्रास्पिंग रिफ्लेक्स
शिशु की हथेली में उँगली ड़ालो तो शिशु तुरंत उँगली पर पकड़ मजबूत कर देता है। करीबन छह महीने तक यह रिफ्लेक्स रहता है जिसके बाद शिशु अपनी इच्छा से पकड़ना और छोड़ना सीखता है।



बैबिन्सकी रिफ्लेक्स

शिशु के पाँव के तलुओं पर हल्का सा खंरोच दो तो पाँव की उँगलियाँ फैला कर ऊपर की तरफ मुड़ जाते है। यह रिफ्लेक्स छह से नौ महीने पर गायब होता है जिसके बाद शिशु चलना सीखता है।

वाल्किंग रिफ्लेक्स

शिशु का पैर नीचे रखो तो शिशु चलने की तरह कदम बड़ाने लगता है।




नवजात शिशु में इन रिफ्लेक्स का होना तस्सली देता है कि शिशु के नसों और दिमाग की व्यवस्था सही एवं संपूर्ण है। इन रिफ्लेक्स का ठीक समय पर गायब होना और शिशु का अलग अलग कार्य इच्छानुसार कर सकना विकास की अगली सीढ़ी है। ऐसा नहीं कर पाना और इन रिफ्लेक्स का समय से अधिक रहना भी चेतने का विषय है।

हर माता पिता का इस विषय में प्राथमिक ज्ञान आवश्यक है। इससे वे ठीक समय पर ,"चलता है बच्चा है बड़ा हो जायेगा " वाली मानसिक स्थिति से सही समय पर निकल; जो भी सही और जरूरी उपाय है लेने में सक्षम होंगे।




Note: The You Tube videos are used solely for educational purpose.

10 comments:

vijay gaur said...

acha laga ye jaan kar ki aap apne profession mai bhi itni siddat se kaam karti hain.

Neeraj Rohilla said...

डाक्टर साहिबा जी,
जानकारी से भरपूर पोस्ट, इसे लिखने के लिए बहुत धन्यवाद |

Dr.Parveen Chopra said...

डाक्टर साहिबा, यह बढि़या पोस्ट पढ़ी और यही सोचा कि इन रिफ्लैक्सिज़ के बारे में आम जनता में बहुत ज्यादा जागरूकता की ज़रूरत है।
और सब से बढिया तो यह लगा,डाक्टर साहिबा, कि जैसे जैसे पोस्ट को पढ़ता गया...विभिन्न 2 रिफलेक्सिज़ के बारे में .....तो अपने बच्चों के साथ की गईं ये सारी मस्तियां आंखों के सामने घूमने लगीं और एक बार फिर से आप की पोस्ट की बदौलत उन्हें जी लेने का अच्छा खासा मौका मि्ल गया।

Udan Tashtari said...

उम्दा जानकारी, आभार.

Raviratlami said...

अति सुंदर, बढ़िया जानकारी. कोई अठारह वर्ष पहले अन्वेष (मेरा पुत्र) के जन्म के समय मैं इस तरह की जानकारियों के तलाश में खूब भटका था, कुछ किताबें भी खरीदी थीं, परंतु इतनी विस्तृत , विजुअल जानकारी कहीं नहीं मिली थी.

सुशील कुमार said...

आपकी ये जानकारीयाँ और कही नही मिलती है इसके लिए फिर से धन्यवाद।

Dr Prabhat Tandon said...

बहुत ही बढिया तरीके से दी गई जानकारी !

महामंत्री (तस्लीम ) said...

डा० साहिबा आपने बहुत अच्छी जानकारी दी है। शुक्रिया।

arbuda said...

मैं अपने दोनों बच्चों के साथ इस तरह की हरकतों को बड़ा ही enjoy करती थी, वीडियो देख कर फिर से वही याद आ गया और समझ भी।
बहुत interesting लगा पढ़ना.

Ila's world, in and out said...

काश आप की ये पोस्ट १५ साल पहले पढी होती जब मेरी बिटिया हुई थी. बहरहाल सारी यादें सिनेमा की रील की तरह सामने घूम गईं और दिल पुपुल के साथ बिताये लम्हों में डूब गया.