Monday 16 June 2008

सेरिब्रल पाल्सी (प्रमस्तिष्कीय लकवा)

http://www.youtube.com/watch?v=P8xOA8AXOVw



आज जिस विषय पर बात होगी वह है सेरीब्रल पाल्सी। यह विषय मेरे दिल के बेहद करीब है। और मैं मानती हूँ कि भले ही हमारा कोई अपना इस से ग्रसित हो कि नहीं हमें इसके बारे में जानना चाहिये। भगवान ने हमें बहुत सारी सौगातों से नवाज़ा है...इस बात का अंदाज़ा सबसे अधिक मुझे ऐसे बच्चे के सामने होता है। ऐसे बच्चे के सामने इस बात का भी अंदाज़ा होता है कि इतनी परिमितता के बावजूद यह नन्हे फरिश्ते अपार स्नेह और कोशिश के काबिल होते हैं ।आज की यह पोस्ट इन बच्चों को समर्पित....जिनके लिये मेडिकल साइंस बहुत कम कर सका है लेकिन जिन्होने जीवन के अमूल्य स्पंदन से मुझे अवगत कराया है।

क्या कभी अपनी माँ से अपने पहले कदम या पहले शब्द के बारे में पूछा है....शायद माँ ने बताया हो....

सेरीब्रल पाल्सी से ग्रसित बच्चे की माँ वह लम्हा कभी भूल नहीं सकती..ना जाने कितने इंतज़ार और तप के बाद नसीब होता है एक ऐसा खूबसूरत सा लम्हा...जिसे हम हमारे जीवन का साधारण और स्वाभाविक पड़ाव मानते हैं।
इन बच्चों में से कुछ व्हील चेयर का इस्तेमाल करते हैं,कुछ बैसाखी का, कोई ठीक से बात नहीं कर सकता तो कई खुद को किसी भी तरह व्यक्त करने में असमर्थ होते हैं।
हज़ारों की सँख्या में शिशु और बच्चे इससे हर साल ग्रसित हो जाते हैं। यह संक्रामक नहीं होता। पर यह लकवा है जो दिमाग और शरीर को मार जाता है।
ऐसे बच्चे का इसकी माँस पेशियों पर इच्छित नियंत्रण नहीं होता। मस्तिष्क ही हमें कौन सा काम, किस समय, किस तरह करना है बताता है। चूँकी सेरिब्रल पाल्सी (प्रमस्तिष्कीय लकवा) मस्तिष्क पर असर करता है , जिस हिस्से पर असर होता है उससे उसका प्रभाव निर्धारित होता है। अत: ऐसा बच्चा खाने पीने,खेलने कूदने, चलने -उठने मे असमर्थ हो सकता है।

सेरिब्रल पाल्सी (प्रमस्तिष्कीय लकवा) के प्रकार





http://www.youtube.com/watch?v=xXXH2a-thB4&feature=related




तीन प्रकार


स्पास्टिक


इससे ग्रसित बच्चा अपनी माँस पेशियों को ढ़ीला छोड़ने में असमर्थ होता है। माँस पेशियाँ सिंकुड़े हुए अवस्था में लगातार रहती हैं।

अथीटोइड

इससे ग्रसित बच्चा अपनी माँस पेशियों पर सही नियंत्रण नहीं रख पाता। लिहाजा ग्रसित माँस पेशियाँ अचानक से फड़फड़ा सकती हैं,उनमें कोई हरकत हो सकती है।

अटैक्सिक

इससे ग्रसित बच्चा संतुलन और सही तालमेल नहीं बना पाता।

मस्तिष्क का कितना और कौन सा हिस्सा ग्रसित हुआ है निर्धारित करता है कि बच्चे को तकलीफ कितनी होगी। अगर दोनो हाथ और पैर पर प्रभाव पड़े तो व्हील चेयर की आवश्यकता पड़ सकती है,अगर दिमाग का जो हिस्सा वार्तालाप का नियंत्रण करता है ग्रसित हो तो बच्चे के बात करने की क्षमता पर असर पड़ता है।

सेरिब्रल पाल्सी (प्रमस्तिष्कीय लकवा) के कारण


सही सही कारण ज्ञात नहीं है। कई बार जन्म के समय शिशु के मस्तिष्क पर आघात कारण बनता है। कई बार समय से पहले शिशु के प्रसव होने की वजह से अपूर्ण विकास कारण बनता है। जन्म पश्चात शिशु को हुई कोई तकलीफ की वजह से ऐसा हो सकता है। पर फिर भी अक्सर जन्म पूर्व मस्तिष्क को पहुँची हानि ही इसका कारण बनती है। इसकी कोई खास वजह अभी तक ढूँढ़ी नहीं जा सकी है।


डॉक्टर की भूमिका


डॉक्टर इसका निदान करने में सहायक होता है। इस बात का पता लगाता है कि शिशु किसी और रोग की वजह से ऐसा नहीं है। रोग के तीव्रता और असर का सही अंदाज़ा लगाता है। और बच्चे और माता पिता को इससे जूझने में मदद करता है। छोटी छोटी बातें, कुछ दवाइयाँ, कसरत, सही सहायक उपकरण, सीखने और सिखाने में मदद करता है। माँस पेशियों की विभिन्न तकलीफ को समझ उपयुक्त उपाय किया जाता है।

शिशु के करीबन अठारह महीने होने तक इस रोग की पुष्टी की जा सकती है। विकास की सीढीयों में कुछ असामान्य या देरी होना इसका परिचायक होते हैं।

सेरिब्रल पाल्सी (प्रमस्तिष्कीय लकवा)के साथ जीना

इस रोग से ग्रसित होना या ऐसे बच्चे की देखरेक करना काफी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।बच्चे के मस्तिष्क का दोष समय के साथ बिगड़ता नहीं है बल्कि ज्यों का त्यों रहता है। किंतु लगातार माँसपेशियों में तनाव या दूसरी तकलीफ की वजह से स्थिति बिगड़ सकती है। इसीलिये ऐसे बच्चे को उपचार की जरूरत होती है। यह उपचार शारीरिक, मानसिक, वाक शक्ति पर केंद्रित हो सकती है। कई बार शल्य क्रिया की भी जरूरत पड़ सकती है।

सेरिब्रल पाल्सी के होने का मतलब बच्चे के सार्थक जीवनयापन करने में असमर्थ होना नहीं है। यह बच्चा सोच सकता है, महसूस कर सकता है, समझ सकता है, दोस्त बना सकता है, खेलना चाहता है, हँस सकता है.....। हाँ उसकी अपनी सीमायें हैं....और बाकी बच्चों से फरक भी।

यह बच्चे और इनके माता पिता हमसे स्वीकृति चाहते हैं, थोड़ी संवेदनशीलता ...थोड़ी सी मदद और इनके बारे में थोड़ी सी समझ। वे अपनी खुद की जगह पूर्ण अधिकार से लेना चाहते हैं। जितनी कोशिश से वे अपनी बात कहते हैं...वे चाहते हैं कि हम थोड़े धीरज से उन्हे सुन लें। उन्हे अवसर दें और स्नेह भी।

पता नहीं क्यों पर हमेशा उनसे जो स्नेह मिला है हमेशा दिल भर गया है। आठ साल के पुलकित के असंतुलित हाथ से बने फूल और उनसे लिखे डगमगाये अक्षरों में मेरा नाम....उसकी वॉकर पर टिकी काया और चश्मे के पीछे से मुस्कुराता चेहरा...
ऐसे में जीवन से कई शिकायतें यूँ ही पिघल गई है ...और रूह आनन्दित हुई है।

http://www.youtube.com/watch?v=FDB8dCag3yk&feature=related




The videos here have been used solely for educational purposes.

7 comments:

अविनाश वाचस्पति said...

एकदम सही सोच
और
उचित कहा है आपने।
दिन भर भर आया है।

Priyankar said...

बेहद मानवीय दृष्टि से लिखा गया जानकारीपूर्ण वैज्ञानिक लेख .

vijay gaur said...

विषय की विशिष्ट्ता आपके इस ब्लाग को मह्त्वपूर्ण बना देती है. मेरी शुभकामनायें.

Parul said...

apaney aas pass 3 cases aisey dekh chuki huun mai..us samay kitna bebas lagta hai khud ko..shayd bata pana namumkin hai..aaj bhi aapka lekh jee kachot gaya meraa..doc bahut himmati hotey hain ..

arun prakash said...

मैंने पड़ोस मी एक बहुत खूबसूरत बच्चे को इससे ग्रसित देखा है तथा माँ बाप के जिजिविसा को भी नजदीक से देखा है आपकी प्रस्तुति ने इसे फ़िर यद् दिला दिया धन्यबाद इस रोचक जानकारी के लिए आशा है औरतों के कामन बीमारियों पर भी नजर रहेगी वाकई इसकी जरुरत है

शायदा said...

डॉ. बेजी, बधाई स्‍वीकार करें इस लेख को यहां प्रस्‍तुत करने के लिए। विषय पर आसान हिंदी में ऐसी जानकारी आसानी से नहीं मिलती। साथ ही वैल्‍यू एडीशन किया यूटयूब ने।
कुछ बरस पहले जब मैं मेडिकल बीट पर रिपोर्टिंग किया करती थी तो इस विषय को पहली बार जाना था। जयपुर के डॉ. पुरोहित चंडीगढ़ में एक वर्कशॉप लगा रहे थे अवेयरनेस के लिए। हम लोगों ने तब सीरीज में सेरेब्रल पाल्‍सी पर स्‍टोरीज की थीं अवेयरनेस के लिए। आज भी अपने साथियों से आपकी पोस्‍ट शेयर कर रही हूं इस मकसद से कि वे इसके बारे में जानें और बेहतर लिखें।

उन्मुक्त said...

ज्ञानवर्धन हुआ।