Tuesday 11 March 2008

नौ महीने गर्भ में

एक शिशु को संसार में लाना और फिर उसकी परवरिश का दायित्व सँभालना जिम्मेदारी का काम है। एक दम्पति के जीवन में यह एक ऐसा बदलाव है जिसके कई पहलू हैं।

अगर नवागंतुक का आगमन सोचा समझा ना गया हो,शुभ नहीं समझा जा रहा हो, किसी गल्ती का परिणाम हो तो इस पूरे प्रक्रिया में और भी कई पक्ष उभर आते हैं। आर्थिक परेशानियाँ, इसके पहले के गर्भ के समय आया कोई संकट, माँ की गर्भवति होने के समय की उम्र और उसके स्वयं के बचपन में सहे संघर्ष एवं द्वन्द्व...ऐसी कई बातें हैं जो कोख में पल रहे बच्चे और उस बच्चे को जनने वाली माँ पर असर कर सकती है।

एक औरत जब गर्भवति हो जाती है तो शारीरिक और मानसिक रूप से कई परिवर्तन के दौर से गुजरती है। एक नये जीवन को खोराक और पलने की जगह देना, उसे स्वतंत्र साँस तक लेकर पहुँचना और फिर उसके आत्मनिर्भर होने तक अपने खून से सींचना।

मानसिक रूप से भी तीन सीढ़ियाँ पार करती है।
• पहली बार यह जानकर कि वह माँ बनने वाली है,एक सुखद अनुभूति का अहसास होता है। किन्तु साथ ही अपने सामर्थ्य पर शक भी। अपने माता पिता के साथ अगर कोई भावनात्मक द्वन्द्व हो तो इस दौरान बाहर आ जाता है।
• करीबन बीस हफ्ते के आसपास, औरत की उपरोक्त भावनायें चरम सीमा पर पहुँच जाती हैं। उसे चिन्ता सताने लगती है कि कहीं उसका बच्चा शारीरिक और मानसिक रूप से विकलांग ना हो। उसे अहसास होने लगता है कि यह बच्चा उसके शरीर में है जरूर पर इसका अस्तित्व अलग है।
• गर्भ के अंत तक पहुँचते पहुँचते माँ अपने बच्चे को एक व्यक्तित्व से जोड़ देती है।

दो सूईयों को लेकर स्वेटर बुनती माँ वाली इमेज कितनी भी रूमानी क्यूँ ना हो...यह एक सच है कि इस दौरान वह विविध मानसिक और शारीरिक उतार चढ़ाव से गुजरती है। इस समय उसे समझना और स्वीकार करना उसके मानसिक संतुलन के लिये आवश्यक है।

यह कुदरत का एक करिश्मा ही है कि एक कोशिका से एक पूरा इंसान तैयार हो जाता है।
नियंत्रण एक डी एन ए कोड़ मे लिखा हुआ, जिसमें माता और पिता की बराबर की भागेदारी रहती है। इस कोड़ के अनुसार एक कोशिका ,रूप मे ढ़लने लगती है।

किसी कुशल निर्देशक के हाथ में एक सिम्फनी.....साधन माँ उपलब्ध कराती है...और जगह उसकी कोख।








विकास का क्रम
1. उर्वरण और कोख में स्थिर होना- भ्रूण जीवन की शुरुआत (पहला और दूसरा हफ्ता)
2. दो में संस्तरित होना
3. तीसरे स्तर का जुड़ाव- अव्ययों के निर्माण की शुरुआत (तीसरा, चैथा हफ्ता)
4. हृदय, आँख और एक नन्हा आकार- हाथ और पाँव के अंकुर (पाँचवा हफ्ता)
5. नन्हा सा मुँह
6. नाक और होंठ
7. पलक
8. ओवरीज़ और टेस्टिस
9. स्त्री या पुरुष विशेषता सूचक (नौवाँ हफ्ता)
10. खुली आँखें
11. हिलता , घूमता शिशु ( बीसवें हफ्ते से अढतीसवाँ हफ्ता)


मृत्यु दर और अस्वस्थता सबसे अधिक जन्म से पूर्व होती है। करीबन तीस प्रतिशत गर्भ स्वत: निष्फल हो जाते हैं। इनमें अक्सर कोई बुनियादी खोट होता है। दो प्रतिशत नवजात शिशु में कोई गँभीर शारीरिक विकलांगता होती है जिसे शल्य चिकित्सा की आवश्यकता पड़े। रोगाणू, रसायन,तापमान की विविधता और एक्स रेस का असर भी सबसे अधिक इसी दौरान होता है। माता या पिता के सिगरेट फूँकने का असर भी बच्चे में कम विकास का कारण बन सकता है।

माँ एक कोशिका को एक शिशु बनाने की प्रक्रिया में पूरी खोराक पहुँचाती है। सभी अव्ययों को विकसित करने के लिये विटामिन्स, मिनरल्स ,ऊर्जा ,कैल्सियम, लौह तत्व वगौरह की जरूरत पड़ती है। जो माँ को अपने खोराक से मिलता है, विकसित होते शिशु तक पहुँच जाता है। जो खोराक में नहीं होता पर उसके शरीर में हो....वो शरीर से सोंक लिया जाता है। अगर शरीर भी उस जरूरी खोराक से वँचित हो तो शिशु में असर दिखता है।

गर्भ ....शायद एकमात्र ऐसा समय जब एक ही शरीर में दो दिल साथ में धड़कते हैं....

कुदरत कितने निपुणता से हर अंग को रूप में ढ़ाल देती है।

....इतनी खूबसूरती,श्रम और परम के आशा के चिन्ह को.....कितनी आसानी से कुछ लोग भ्रूण हत्या के हेडलाइन्स के नीचे समाप्त कर देते हैं.....
जैसा कि मार्टिन कहते हैं
God's interest in the human race is nowhere better evidenced than in obstetrics.
Martin H. Fischer

भगवान का मनुष्य जाति से लगाव औबस्ट्रैटिक्स (गर्भ संबंधित विज्ञान) से ज्यादा और कहीं नज़र नहीं आता।

फिर रवीन्द्र नाथ टैगोर ने कहा ही है
Every child comes with the message that God is not yet discouraged of man.



काश हम थोड़ी कोशिश कर परम का हौसला बनाये रखें......।