Thursday 13 March 2008

उत्पत्ति

नौ महीने का सफर समाप्त होते होते शिशु स्वतंत्र रूप से साँस लेने में सक्षम होता है। उसकी शारीरिक संरचना बाहर की दुनिया में आकर जीवित रहने के लिये पूर्ण। किन्तु कोख के अंदर से बाहर की यात्रा किसी भी दृष्टिकोण से एक दिलचस्प घटनाचक्र है। हिन्दी पिक्चरों में दिखाई जाने वाली इमोशनल प्रसव पीड़ा के बिहाइन्ड द सीन्स इतना कुछ हो रहा होता है कि हर बात अगर रेकार्ड की जाये तो एक पूरा उपन्यास लिखा जा सकता है।

हर मनुष्य की इससे अहम और मुश्किल यात्रा शायद ही कोई और हो। एक बेहद संकरा रास्ता, जीवन की खोराक पहुँचाने वाली धमनियों से अलगाव, स्वतंत्र साँस की शुरुआत और बेहद तेजी से होता आंतरिक बदलाव।


स्पर्श की तपिश की पहली चाह और माँ का वात्सल्यपूर्ण साथ।
माँ जो खुद शारीरिक और मानसिक बदलाव से गुजर रही है। शिशु को जन्म देने की पीड़ा और अपने जीवन से एक अलग अस्तित्व में देखने की अनुभूति....
एक ऐसा समय जब माँ और शिशु दोनों को शिशु के पिता के साथ और आश्वासन की जरूरत होती है। पिता के लिये भी भावनात्मक जुड़ाव बनाने का महत्वपूर्ण समय।
जन्म से पहले फेफड़े पानी से भरे होते हैं। औक्सीजन की आवश्यकता माँ नाल से पूरी करती है। अशुद्ध खून की सफाई भी आंवल(placenta) मे ही होती है। जब शिशु संकरे से योनिमार्ग से गुजरता है तो फेफड़ों से पानी निचुड़ जाता है। बाहर पहुँचे शिशु की नाल काट दी जाती है। एक ऐसा क्षण जो माँ से अलगाव और पहली साँस के बीच गुजरता है। लगातार घटता औक्सीजन, तापमान और रोशनी में परिवर्तन, स्पर्श और फेफडों में बढ़ने वाला नेगैटिव प्रेशर, इनका संयुक्त प्रभाव शिशु को साँस लेने की पहल करने को उकसाता है।
फेफड़ों का साँस लेना सीखना एक अत्यंत जटिल प्रकरण है।
नये अंकुरित पौधे को नई ज़मीन में रोपने जैसा। इस दौरान जड़े उखड़ जाती हैं और ज़मीन बदल जाती है।

इससे पहले कि हम शिशु में होते बदलाव जानें हमें एक सामान्य हृदय के कार्यप्रणाली से परीचित होना होगा। हृदय नाशपति के आकार का एक मांसपेशीय अव्यय है | दो फेफड़ों के बीच स्थित , शरीर के विभिन्न भागों में रक्त पहुँचाने के लिये जिम्मेदार होता है | यह चार प्रकोष्ठों मे बटाँ होता है। दाँये भाग में अशुद्ध (डिऔक्सीजनेटड) रक्त होता है और बाँये भाग में शुद्ध(औक्सीजनेटड)। दाँये और बाँये भाग ऐट्रियम और वेन्ट्रीकल में बँटे होते हैं। रक्त का प्रवाह एट्रियम से वैन्ट्रीकल( एक ही दिशा) में संभव है। दाँये भाग में ऐट्रियम और वेन्ट्रीकल के बीच ट्राइकस्पिड वाल्व होता है। और बाँये भाग में ऐट्रियम और वेन्ट्रीकल के बीच बाइकस्पिड वाल्व होता है। दाँये भाग में वैन्ट्रीकल से अशुद्ध रक्त फेफड़ों तक पलमनरी आर्टरी से पहुँचता है। वहाँ से शुद्ध होकर पलमोनरी वेइन्स से बाँये ऐट्रियम में लौटता है। ऐट्रियम से वेन्ट्रीकल फिर एओर्टा से शरीर के सभी हिस्सों तक । वहाँ औक्सीजन पहुँचा कर सुपीरियर और इनफीरियर वीना कैवा से दाँये ऐट्रियम में अशुद्ध रक्त पहुँचता है।

हाँ थोड़ा पेचिदा है।

लेकिन सोचने की बात है कि कुछ ही क्षणों में बिल्कुल काम नहीं करते हुए फेफड़े अचानक काम करना कैसे शुरु करते हैं।

जन्म पू्र्व शिशु में जो बातें अलग होती हैं-
नाल और आंवल के बीच की धमनियाँ अशुद्ध रक्त पहुँचा कर शुद्ध रक्त वापस ले जाती हैं।

• डक्टस आर्टिरियोसस- पलमनरी आर्टरी और एओर्टा के बीच
• फोरामेन ओवेल-दोनो वेन्ट्रीकल के बीच एक छेद।
• डक्टस विनोसस- जिगर(लिवर) और इनफीरियर वीना कैवा के बीच
• अंबीलीकल वेइन- नाल से शिशु के लिवर तक
• अंबिलिकल आर्टरी- शिशु से आंवल तक
इतनी धमनियों को जन्मउपरांत बंद हो जाना पड़ता है। और सामान्य हृदय की कार्यप्रणाली तक पहुँचना पड़ता है।
जानती हूँ कि समझने में बहुत आसान नहीं है। लेकिन इतने जटिल बदलाव करने के लिये निमिष मात्र का समय होता है। कहीं कोई छोटी सी चूक और वह हृदय के संरचना में त्रुटि के रूप में उभर आती है।


इतने बदलाव के बाद होता है बच्चे का पहला रूदन.....पहली साँस.....
पता नहीं क्यूँ फिर सभी हिन्दी पिक्चरों के सीन्स याद आ गये। जी हाँ...पहला रूदन वाकई खुशी की बात है....कुदरत के एक चमत्कार के संपूर्ण होने के उद्घोष जैसा....

कभी लगता है कुदरत ने हम में से हर एक के ऊपर कितनी मेहनत की है । कई बार जितना मोल आंक कर हमें कुदरत ने जीवन दिया है...हम उससे बहुत नीचे के स्तर पर जीवन निर्वाह करते हैं।



और माँ .... बीज, मिट्टी और हवा....तो जीवन है...