Tuesday 25 March 2008

गर्भ के दौरान मनोवैज्ञानिक परिवर्तन

पोपुलर सिनेमा में गर्भ धारण होने की खबर हिरोईन की बेहोशी के साथ होती है। फिर नब्ज़ पकड़ कर प्रेग्नेन्सी टेस्ट। इसके बाद खुथी की लहर। मिठाई। फिर बहु का चमकता लजीला चेहरा। और उसके बाद लोरी गा कर सुलाती माँ।

किन्तु यह परिवर्तन इतना सहज नहीं है ।

शिशु मनचाहा बदलाव है तो माँ का मन खुश....और नहीं तो तनावग्रस्त रहता है। गर्भ धारण करते ही स्त्री अत्यंत संवेदनशील हो जाती है। हर भाव की अत्युक्ति करना स्वभाव में शामिल हो जाता है। छोटी से छोटी बात रुला देती है, हँसा सकती है, डरा देती है।

गर्भ के समय को तीन महीने के अवधि अनुसार देखा जाये तो तीन भाग में बाँटा जा सकता है।

पहले त्रिमाही भाग में स्त्री अपने में बदलाव महसूस करती है। यह बदलाव बाकियों को नज़र ना भी आये वह लगातार इसका अनुभव करती है। ऐसे में अक्सर पत्नि अपने गर्भ के बारे में भूलती नहीं....और पति को कभी कभार ही याद आता है। कुछ स्त्रियाँ इस समय भावनात्मक स्तर पर बेहद परेशान हो जाती हैं। उल्टियों का होना और शरीर में जल्द होते बदलाव तनाव को और बढ़ा सकता है। कई बार शरीर की तकलीफ तनाव की वजह से भी बढ़ सकती है।

ऐसे में पति का रवैया, सखी सहेलियों का साथ और कामकाज़, गृह गृहस्थि में तनाव का असर स्त्री के स्वभाव पर असर करता है। रियायत और विश्राम काफी हद तक मदद कर सकते हैं।

दूसरे भाग में स्त्री अपने इस नई पहचान की तरफ थोड़ी सहज हो चुकी होती है। बीसवें हफ्ते से शिशु के उदर में हिलने को महसूस कर सकती है। उसे शिशु का अपने से अलग एक अस्तित्व के होने पर विश्वास होने लगता है। इस समय स्त्री का वज़न तेजी से बढ़ता है। उसे अपने सौंदर्य पर और आकर्षण पर संदेह होने लगता है। वह अपने पति को लगातार आँकती है कि उसकी नज़र में वह अब भी खूबसूरत है कि नहीं। अपने जीवन साथी पर उसकी निर्भरता बढ़ जाती है। वह हिम्मत चाहती है कि उसका जीवनसाथी जरूरत में उसके साथ होगा। उसमें रुचि लेगा। उसकी तकलीफ समझेगा। ऐसे में दंपति को एक दूसरे के साथ समय बिताना चाहिये। आगे आने वाले जीवन के बारे में बात करनी चाहिये। दूसरे त्रिमाही भाग में स्त्री में संभोग की इच्छा भी होती है और इससे नुकसान की सबसे कम सँभावना होती है।

तीसरे भाग तक स्त्री काफी हद तक संयत हो चुकी होती है। एक नये जीवन को सँभालने के लिये खुद को सक्षम पाती है। अगर गर्भ के समय उसे बाकी तकलीफ नहीं सहनी पड़ी हो तो वह बाकी लोगों का ध्यान और प्यार का आनंद लेती है। भरी बस में सीट दिया जाना....सभी के आदर से पेश आने से वह महत्वपूर्ण महसूस करती है।

इसी बात का कुछ कामकाज़ी स्त्रियों पर उल्टा असर भी होता है। उनके कार्यक्षमता को कम आँका जाता है। बीमार समझा जाता है। समय आने के पहले ही उनसे महत्व के काम ले लिये जाते हैं।

बाहरी व्यवस्थाओं का उसकी अवस्था पर सीधा असर पड़ता है। उसे किसी दूसरे स्त्री के सानिध्य की जरूरत महसूस होती है जो उसे इन परिवर्तनों की तरफ सहज कर सके।

जैसे जैसे समय करीब आता है उसके संशय बढ़ने लगते हैं।

स्त्री को गर्भवति होने पर साथ, प्यार, सानिध्य और सहानुभूति की जरूरत होती है। इस समय उसकी अतिसंवेदनशीलता को समझना और अनुरूप व्यवहार करना भी आवश्यक है।

दोनो स्त्री और पुरुष इस समय अपने बचपन के दिनों में लौटते हैं। उस समय की किसी बात पर हुई असंतुष्टता फिर उभरती है। अपनी नई पहचान कभी बहुत उल्लासित तो कभी दुखी करती है।

पुरुष अपनी पत्नि के बदले रूप से कम प्रभावित नहीं होता। उसका बदला स्वभाव उसके लिये कभी आश्चर्य तो कभी दुख और तनाव का कारण बनते हैं। स्त्री की अतिसंवेदनशीलता के सामने वह अपने आप को बेबस महसूस करता है। वह खुद अपनी योग्यता पर शक करता है। स्त्री के शारीरिक संरचना में आने वाले बदलाव भी उसको प्रभावित करते हैं।

इस दौरान एक दंपत्ति को लगातार एक दूसरे के साथ और विश्वास की जरूरत होती है।

गर्भवति होने पर अजीबोगरीब सपनों का आना भी सामान्य है। जागते हुए जिन बातों को लेकर संशय या डर होता है नींद में वही सपनों का रूप ले लेते हैं। अधिकतर सपनों में स्त्री को लगता है कि वो कहीं फँस गई है, उसका बच्चा खो गया है, जरूरत में बिल्कुल अकेली रह गई है, कोई उसके बच्चे को नुकसान पहुँचाना चाहता है...वगैरह।
यह सपने बिल्कुल सामान्य हैं। और इनका कोई गूढ़ अर्थ निकालकर उसका निदान करने की जरूरत नहीं है।

एक शिशु का मतलब क्या है.....
कुदरत का यह खूबसूरत करिश्मा जिसमें स्त्री पुरुष की साझेदारी है। ढ़ेर सारा अनुराग, अनुभूतियों का स्रोत....। इतनी मासूमियत की लगता है परम को छू लिया हो....।

एक शिशु का मतलब नींद में खलल, कई बार बीमार पड़ना, लगातार किसी का हम पर निर्भर रहना....सुसु, पौटी.....उल्टी, हिचकी, डकार, बेमतलब, बेहिसाब रोना, हँसना.....

इतने बदलाव के लिये सबसे जरूरी है कि स्त्री और पुरुष एक दूसरे का संबल बन सहजता से इस सौंदर्य को अपने जीवन में सहेजें......
कुछ किलकारियों से...कुछ लोरियों से...घर आँगन में तब हम मासूमियत भर सकते हैं...।



The most important thing a father can do for his children is to love their mother.
– Henry Ward Beecher