Monday 31 March 2008

शिशु पर माता पिता के ब्लड ग्रूप का महत्व

"खून के रिश्ते" बोलते समय एक जबरदस्त सा जज़्बा मन में आता है।यूँ ही नहीं शायद। खून खून में थोड़ा थोड़ा फर्क है....और माँ के दूध की ही तरह माँ बाप के खून का भी महत्व है।

माता पिता का ब्लड ग्रूप शिशु का ब्लड ग्रूप तय करता है। और बात सिर्फ तय करने तक सीमित होती तो इसे नज़रंदाज़ भी कर सकते थे। किन्तु माँ अगर आर एच नेगाटिव(Rh-) हो तो शिशु पर इसके परिणाम विविध और घातक भी हो सकते हैं। इसीलिये हर दंपत्ति को अपना ब्लड ग्रूप ज्ञात होना चाहिये।

चार ब्लड ग्रूप होते हैं। ए (A),बी (B),O(ओ) और AB(एबी) । रक्त की लाल कोशिकाओं की सतह पर कुछ प्रोटीन, ग्रूप निर्धारित करते हैं। जिनमें 'ए' ऐन्टीजन होता है उसका ग्रूप 'ए और जिसमें 'बी' ऐन्टीजन होता है उसका ग्रूप 'बी'। जिसमें दोनो होते हैं 'एबी',जिसमें दोनो नहीं होते उनका ग्रूप 'ओ' होता है।

पूरी मानव जाति इन चार ब्लड टाइप्स में बँटी है। जैसा की सर आरनल्ड कहते हैं
There is no caste in blood.
- Sir Edwin Arnold



इसके अलावा एक 'आर एच'(Rh) नाम का और प्रोटीन होता है । यह भी रक्त की लाल कोशिकाओं के सतह पर ही होता हैं। जिनमें यह होता है वह आर एच पौसीटिव और जिनमें नहीं होता वह आर एच नैगाटिव होते है।

इनके होने या ना होने से रक्त की कोशिकाओं या रक्त के गुण पर खास असर नहीं होता। पर यह भी इंसान की पहचान का एक हिस्सा हैं। जरूरत पर सही मैच का ही खून चढ़ाया जा सकता है। अगर अलग ब्लड ग्रूप का खून चढ़ाया जाये तो परिणाम चिंताजनक हो सकते हैं। करीबन 85 प्रतिशत लोग आर एच पौसीटिव होते हैं। बाकी के आर एच नैगाटिव।

एक दंपत्ति के लिये सचेत होने की शुरुआत पत्नि के 'आर एच नैगाटिव' होने पर होनी चाहिये। पति अगर 'आर अच पौसीटिव' है तो गर्भ के समय उपयुक्त उपाय करना जरूरी है। आर एच नैगाटिव माँ के गर्भ में पल रहे शिशु को 'आर एच फैक्टर ' पिता से विरासत में मिल सकता है। ऐसे दंपत्ति के आर एच पौसिटिव शिशु होने की सँभावना करीबन 50 प्रतिशत होती है।

पहले गर्भ में (जब शिशु आर एच पौसीटिव हो ),तब भी तकलीफ की गुँजाईश कम ही होती है। माँ के खून से शिशु के खून का संपर्क प्रसव के दौरान ही होता है। इस संपर्क से तात्कालिक कोई हानि नहीं होती। किन्तु शिशु के आर एच पौसीटिव खून के संपर्क में आते ही....माँ की इम्युनिटी कुदरती तौर पर इनसे लड़ने के लिये ऐन्टीबौडी की सेना तैयार करने लगती है। इन ऐन्टीबौड़ी से माँ को कोई हानि नहीं होती। किन्तु अगले गर्भ के समय भी अगर शिशु आर एच पौसीटिव हो तो यह बनी बनाई सेना शिशु पर हमला बोल देती है। यह ऐन्टीबौड़ी इतने सक्षम होते हैं कि शिशु की रक्त कोशिकाओं को तोड़ तितर बितर कर दें। इनके टूटने से बिलीरूबिन की मात्रा शिशु के रक्त में बढ़ने लगती है। नवजात शिशु को गँभीर पीलिया हो सकता है, शिशु के और कभी कभार माँ के जान को भी खतरा हो सकता है।





आर एच नैगाटिव स्त्री ब्लड ट्रान्सफ्यूशन, गर्भपात, और एक्टोपिक प्रेगनैन्सी से भी ऐसी स्थिति तक पहुँच सकती है।

इसका हल क्या है

• जागरुकता- हम सभी को अपना ब्लड ग्रूप मालूम होना चाहिये। अपने जीवन साथी की इस पहचान से अनभिज्ञ नहीं होना चाहिये।
• अगर स्त्री आर एच नैगाटिव है और पुरुष आर एच पौसीटिव तो डॉक्टर से सही समय पर सलाह और इन्जेक्शन लेने की तैयारी और तत्परता होनी चाहिये।।


आर एच इम्यूनोग्लोबिन इन्जेक्शन्स

गर्भ ठहरने के 28 हफ्ते में पहला इन्जेक्शन फिर प्रसव के 72 घंटे के भीतर दूसरा।

यह इन्जेक्शन माँ के शरीर में ऐन्टीबौडीज़ बनने से रोकते हैं। जाहिर है इसे पहले गर्भ मे ही लेना चाहिये। और चूंकि गर्भ में शिशु के ग्रूप पता लगाने की कौम्प्लीकेटड प्रोसीजर से बचना चाहिये ,यह इन्जेक्शन हर आर एच नैगाटिव स्त्री (जिसका पति आर एच पौसिटिव हो), को लेना चाहिये

अगर कुछ कारणों की वजह से यह इनजेक्शन नहीं लिये गये तो डॉक्टर से तुरंत संपर्क करें। ऐसे गर्भ को विशेष ध्यान की जरूरत है। अगर शिशु खतरे में हो तो एक्सचेंज ट्रांसफ्यूशन कर के इस शिशु के खून को आर एच नैगाटिव खून से बदला जा सकता हैं। ऐसा कई बार करने की जरूरत पड़ सकती हैं।

अगर ऐसा कुछ भी नहीं किया जा सका तो शिशु के दिमाग और किडनी पर असर पड़ सकता है। हार्ट फेल ( हृदय के पम्प करने की शक्ति विफल) हो सकता है। रक्त की कमी हो सकती है। गँभीर पीलिया हो सकता है। इन सबसे शिशु की जान जा सकती है।

समस्या गँभीर हो सकती है। पर हल कितना आसान है। ब्लड़ ग्रूप का पता होना। समय पर इंजेक्शन लेना।

किंतु दुख की बात है की भारत में अभी भी अक्सर गर्भवति स्त्री को उसके ब्लड ग्रूप के बारे में नही पता होता। इतनी सुलभता से जो बचाया जा सकता है ....उसे उतनी ही लापरवाही से हम खो आते हैं। जब तक बात पता चलती है तब तक देर हो चुकी होती है।

नवजात शिशु को कितने ही कारणों से खोया जा सकता है।

.....सुना हैं बचाने वाला मारने वाले से ज्यादा बलवान होता है...

पता नहीं......हम कब छोटी छोटी पहल कर बचाने वालों में अपना नाम दर्ज़ करायेंगे?!