Wednesday 9 April 2008

विरासत में रोगाणु ?!

इस ब्लॉग के नियमित पाठकों से क्षमा। व्यस्तताओं के चलते थोड़ा विलम्ब हुआ।

शिशु माँ से खुराक, औक्सीजन जीन्स वगैरह पाता है। साथ ही अगर माँ किसी रोग से पीड़ित है तो कई बार रोग भी विरासत में पा लेता है। इसके बारे में जानना जरूरी है क्योंकि कोई माँ अपनी वजह से अपने शिशु में किसी प्रकार का रोग नहीं देखना चाहती।
सही जानकारी,जाँच और इलाज शिशु की रक्षा कर पाने में अधिकतर सक्षम होते हैं।

रोग किस प्रकार से माँ से शिशु तक पहुँच सकता है?

• नाल से। टौक्सोप्लास्मा, ट्रीपोनिमा पैलिडम(सिफिलिस के लिये जिम्मेदार),रुबेल्ला, सी एम वी(साय्टोमेगालेवायरस),लीस्टीरिया, फाल्सीपारम(मलेरिया)
• वर्द्धमान मातृक इनफेक्शन ( माँ से शिशु की ओर बढ़ता हुआ)-कोरियोएम्नियेनाइटिस
• प्रसव के दौरान- माँ के रक्त और योनि से संपर्क में आने पर। HIV (एड्स), HZV( चिकनपौक्स-माता), HBV (हैपाटाइटिस बी-जहरी कमळा) और क्लैमीडिया ट्रैकोमैटिस ( कनजंक्टिवाइटिस)
• प्रसव के बाद-स्तनपान से फैलने वाले


गर्भ से पहले और गर्भ के दौरान होने वाले परीक्षण से रोग के होने या हो सकने की सँभावना का पता लगाया जा सकता है। सही समय पर सही कदम लेने पर प्रतिकूल परिणाम से शिशु को बचाया जा सकता है।
TORCH के नाम से यह रोग जाने जाते रहे हैं। (टौक्सोप्लास्मा, रुबेल्ला, सी एम वी(साय्टोमेगालेवायरस), हर्पिस) ।
अक्सर गर्भ ठहरने के करीबन सोलहवें हफ्ते में इन रोगों के होने की जाँच की जाती है।


टौक्सोप्लास्मा

यह रोग अगर शिशु में हो तो शिशु के मानसिक विकास पर असर पड़ सकता है। शिशु अँधपन एवं अपस्मार का शिकार हो सकता है।
इससे बचाव के लिये इसके होने के तरीकों का जानना आवश्यक है। कच्चा गोश्त, मुर्गी, सीफुड़, बिना धोये फल और सब्जियाँ, बिल्ली या उसके मल से किसी प्रकार का संपर्क इस रोग को माँ तक पहुँचा सकता है। जाहिर है की कच्चा गोश्त ,मुर्गियों और बिल्लियों से दूर रहना चाहिये और फल और सब्जियाँ धोने के बाद ही हाथ लगानी चाहिये।


रुबेल्ला

रुबेल्ला से ग्रसित होने पर शिशु के पूरे विकास पर असर पड़ता है। मोतियाबिन्द, छोटी आँखें,हृदय की बनावट में बुनियादी खामी,(पैटेन्ट डक्टस आर्टिरियोसिस, पलमनरी आर्टरी स्टीनोसिस, बहरापन(सेन्सरी न्यूरल डैफनस), न्यूनमनस्क (मेन्टल रिटार्डेशन), थ्रौम्बोसायटोपीनिया , बच्चे का गिरना या मरा हुआ पैदा होना सँभव है।


एम एम आर इनजेक्शन एक आसान तरीका है बचने का। गर्भ ठहरने से पहले....हो सके तो यौवन में ही हर लड़की को रुबेल्ला का ठीका लगवा लेना चाहिये।


सी एम वी(साय्टोमेगालेवायरस)

इस रोग से ग्रसित नवजात का वजन कम हो सकता है, गुर्दे पर असर,कमळा, फेफड़ों में असर, अनीमिया और बहरापन हो सकता है।

जिन में इस के रोगाणु होते हैं उनके शरीर के सभी द्रव्य से यह रोग फैल सकता है। संसर्ग, स्तनपान,ब्लड ट्रान्सफ्यूशन और औरगेन ट्रान्सप्लान्ट से भी यह फैल सकता है।

जाहिर है की किसी भी दूसरे व्यक्ति के शरीर के द्रव्य के संपर्क में आने से इसकी सँभावना बढ़ सकती है। हाथ धोना, संसर्ग के दौरान कौन्डोम का इस्तेमाल, ब्लड ट्रान्सफ्यूशन के समय डॉक्टर से तसल्ली करना अहम भूमिका निभा सकता है। नन्हे बच्चों को पढ़ाने या सँभालने वाली स्त्रियों को इस बात को लेकर खास सचेत होना चाहिये। उन्हे बच्चों के थूक,मूत्र इत्यादि द्रव्यों के संपर्क में नहीं आना चाहिये। और आये तो तुरंत साबुन और पानी का इस्तेमाल करना चाहिये।


हर्पिस





इस रोग से ग्रसित अधिकतर बच्चों में बहुत कम तकलीफ होती है। दो-तीन प्रतिशत बच्चों में वैरिसेल्ला सिन्ड्रोम हो सकता है। दागदार त्वचा, अंग का अधूरा विकास,अव्ययों, आँख और न्यूरोलौजिकल कार्य में क्षति हो सकती है।
माँ अगर चिकन पौक्स के संपर्क में प्रसव के पाँच दिन पूर्व से दो दिन पश्चात तक आये तो नियोनेटल झोस्टर की सँभावना बन जाती है। इसमें तीस प्रतिशत शिशु में जान खोने का जोखिम रहता है। इलाज( varicella-zoster immune globulin (VZIG) IM)तुरंत जरूरी है।



सभी गर्भवति स्त्रियों में HIV antibody(एड्स), Hepatitis B Surface antigen(जहरी कमळा),VDRL( सिफिलिस), मूत्र की जाँच वगैरह लाजिमी है। इन्हे करवाने के बाद डॉक्टर की सलाह आवश्यक है। स्वयं इन रिपोर्ट को पढ़ने की कोशिश कई बार गलत निष्कर्ष तक पहुँचा सकती है। परिणाम के अनुसार जरूरी दवा , नहीं तो पूर्वोपाय किये जा सकते हैं।

HIV antibody के पौसिटिव होने पर कभी छिपाया नहीं जाना चाहिये। सही समय और सही तरीके से दवा करने पर शिशु को रोगमुक्त रखा जा सकता है।








मलेरिया, मूत्र में दोष का इलाज सही समय पर करने से शिशु के स्वास्थ्य को हानि से बचाया जा सकता है। योनिमार्ग मे कोई दोष, नहीं तो प्रसव के दौरान फैलने वाले रोग से शिशु को सीज़ेरियन का विकल्प चुन बचाया जा सकता है।

रोगाणु बहुतेरे हैं...घात लगाये बैठे हुए....कई बार माँ के शरीर पर आक्रमण कर शिशु को स्वस्थ पैदा होने के विकल्प से वँचित कर देते हैं.

पर माँ और पिता इतने भी बेबस नहीं है। जरूरत है अग्रसक्रिय होने की। हर होने वाले पिता में अपने जीवनसाथी और संतान की तरफ चौकसी की जिम्मेदारी लेने की।

और माँ तो फिर माँ है....सिर्फ ममता लोरी और रात रात तक जागरण करने तक सीमित नहीं होनी चाहिये....किन्तु जिम्मेदारी सहित स्वयं को रोगाणु से मुक्त रख अगली पीड़ी की सृष्टि में अपना दायित्व निभाने की तरफ सजग होना चाहिये।




जानती हूँ काफी रूखा सूखा सा विषय है। लेकिन बहुत जरूरी और बेहद ध्यान से समझने जैसा।
बहुत छोटी बातों से बहुत बड़ी समस्या को मूल से ही उखाड़ दिया जा सकता है....
हाँ आम जिन्दगी में भी नियम अलग तो नहीं हैं... :)))