Tuesday 26 August 2008

ऑटिस्म

जिस विषय पर आज चर्चा करना चाहती हूँ....उसके लिए थोड़ा समय निकाल कर चिंतन करना जरूरी है। हर बीस मिनट में एक बच्चा ऑटिस्म लेबल्ड। इसके विषय में हमारी जानकारी सीमित।
अगर हम अमेरिका और आसपास की जगह के सर्वे पर एक नज़र ड़ालें तो महसूस होता है की यह एक ऐसी अवस्था है जो दिन ब दिन बढ़ती जा रही है। एक ऐसी चुनौती है जिसके बारे में जानना हमारे लिए आवश्यक है।






http://www.fightingautism.org/idea/autism.php


ऑटिस्म यानि आत्मानुचिंतन या स्वलीनता ।
एक नज़र में ऑटिस्म से ग्रसित बच्चे बाकी बच्चों से अलग नहीं दिखते। इसी वजह से इन बच्चों को अक्सर ज्यादा शैतान और जाहिल समझा जा सकता है।

http://www.youtube.com/watch?v=IWyrit6i9aI&feature=related






ऑटिस्म आखिर है क्या ?! यह एक ऐसी अवस्था है जो मस्तिष्क के सामर्थ्य को कम करती है। इससे ग्रसित व्यक्ति की अपने आसपास की बात की समझ और उस पर प्रतिक्रिया अनुपयुक्त होती है। इस कारण उनका स्वभाव बाकियों से भिन्न होता है।
उन्हे जरूरत और चाह के हिसाब से उपयुक्त शब्द नहीं मिलते। कई बार सही शब्द की तलाश में एक ही शब्द या वाक्य दोहराते जाते हैं। लोगों की बात ना समझ पाना एक बड़ी उलझन होती है। हर शब्द साफ सुनने के बावजूद वे उसका सही अर्थ समझने में असमर्थ होते हैं। ऐसे बच्चे के मन के भाव तेजी से बदलते हैं। जो बच्चा हाल में प्रसन्न दिखता है अगले ही क्षण दुखी, खीजा हुआ, गुस्सैल हो सकता है। कोशिश करने पर भी अपनी बात व्यक्त ना कर पाने की बेबसी इसकी वजह हो सकती है। कई बार वजह समझ पाना मुश्किल होता है। सच तो यह है की वजह बहुत कुछ और कुछ भी हो सकता है। इन वजहों की लिस्ट बनाना नामुमकिन ना सही बहुत ही मुश्किल साबित होता है। यह अपने आप में इन बच्चों और इनका ध्यान रखने वाले और परवरिश करने वालों के लिए चुनौती साबित होता है। उलझनें, भ्रांतियाँ,निराशा और कुण्ठा बढ़ती जाती है। बहुत बच्चे एक ही पद्धति से कार्य करते हैं। इसमें ज़रा भी फेर करने पर स्वभाव बदल जाता है। कई गुस्सैल, परेशान, निराश हो जाते हैं नहीं तो डर जाते हैं। हर चीज़ अगर एक निर्धारित क्रम में चलता रहे तो वे संतुष्ट रहते हैं और अगर परिस्थिति का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सके तो स्वयं को असुरक्षित पाते हैं। एक अवस्था से दूसरे तक जाने में भी उनका संतुलन खोता है।
हकीकत इन्हे भ्रमित करती है। एक बात और चीज़ को दूसरे से जोड़ कर देखना इनके लिए बहुत मुश्किल होता है।

ऑटिस्म को स्पेक्ट्रम डिसॉर्डर कहते हैं। हर बच्चे को यह अलग मात्रा में ग्रसित करती है । कुछ को कम, कुछ को ज्यादा। हर बच्चा अलग।

आम तौर पर तीन बातों में कमी पाई जाती है
संवाद
कल्पना
अंतःक्रिया


जितनी आसानी से एक आम बच्चे के लिए दुनिया का होना है....उतना ही मुश्किल है ऐसे बच्चे का दुनिया की साधारण बातों को समझना।



कुछ आम तौर पर दिखने वाले लक्षण

बोलचाल का कम होना
भाषा से अलग आवाज़ निकालना
देर से बोलना सीखना
एक ही शब्द,वाक्य बार बार बोलना
मैं और तुम जैसे सर्वनाम के प्रयोग में गलती करना
मेलमिलाप कम करना और नापसंद करना
आँख ना मिलाना
पूछी बात पर प्रतिक्रिया ना देना
चिढ़चिढ़ा पहना
हाथों से विशेष लगाव
हाथ हिलाते रहना,कूदना,गोल घूमना, बैलेंस बनाने की कोशिश करना,ऐड़ी पर चलना
कुछ आवाज़ों को सख्त नापसंद करना
कुछ कपड़ों, खाने की चीज़ों को नापसंद करना
पैटर्न्स में बात दुहराना
अनिच्छुक रहना
खुद को नुकसान पहुँचाना

इनमें से कई बातें हो सकती है और कई नहीं भी। हर बात की तीव्रता भी अलग हो सकती है। हर बच्चा अलग होता है...और उसका सामर्थ्य भी।



हमारे पास एक ही विकल्प है....सही दृष्टिकोण चुनने का....

http://www.youtube.com/watch?v=_IhG9CgQ49g







कुछ गलत धारणायें
1. ऑटिस्म से ग्रसित बच्चे कभी आँख नहीं मिलाते।
ऐसा नहीं है। और काफी बच्चे निरंतर प्रयास करने के बाद सीखते भी हैं।

2.ऐसा बच्चा जीनियस होता है।
हर आई क्यू का बच्चा ऑटिस्टिक हो सकता है।

3.ऐसा बच्चा प्यार नहीं दिखाता, समझता।
प्यार की अभिव्यक्ति इन बच्चों के लिए मुश्किल जरूर है...असँभव नहीं। लगातार कोशिश के बाद बच्चे प्यार जताना और दिखाना सीख जाते हैं।

4.बच्चे में सुधार का मतलब बच्चे को तकलीफ नहीं है।
सुधार का मतलब प्रयास, स्नेह और साँत्वना है।

5.मुस्कुराते बच्चे का मतलब वह ऑटिस्टिक नहीं है।
गलत। हर लक्षण की तीव्रता अलग हो सकती है।

6.समय के साथ ऑटिस्म पीछे छूट जाता है।
नहीं।इसे उपचार और लगातार प्रयास की जरूरत है। जिसके बाद ऐसे बच्चे अर्थपूर्ण जीवन पा सकते हैं।

7.खराब परवरिश इसके लिए जिम्मेदार है।
गलत

http://www.youtube.com/watch?v=eoUx4D4rdro&feature=related



दो तरह के टेस्ट हैं जिनसे ऑटिस्म के होने की आशंका जताई जा सकती है।

CHAT(Checklist for Autism in Toddlers test)
http://www.paains.org.uk/Autism/chat.htm

ATEC Test(Autism Treatment Evaluation Checklist )
http://www.autism.com/ari/atec/

कोई भी शंका के होने पर बाल रोग विशेषज्ञ नहीं तो चाइल्ड सायकोलोजिस्ट से मिलें। किसी निश्चय पर स्वयं पहुँचने के अपने खतरे हैं। इस अवस्था के होने पर सही निदान और उपचार और लगातार प्रयास जरूरी है। सही दृष्टिकोण हो तो ऐसे बच्चे अर्थपूर्ण अस्तित्व पा सकते हैं। ऐसे बच्चे निर्धारित लक्ष्य पा सकते हैं। जीवन में कुछ बन सकते हैं।

ऑटिस्म अभिव्यक्ति के गूंगेपन जैसी अवस्था है । व्यक्तित्व पर एक ऐसा ताला जिसकी चाभी गुम हो। एक व्यक्ति स्वयं अपने शरीर मे कैद। ऐसी बेबसी की कल्पना भी हमारे लिए मुश्किल है। इस रोग से जूझते बच्चे और उनका परिवार हमसे सिर्फ स्वीकृति चाहते हैं। यह अलग हैं..बुरे नहीं।

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