Thursday 27 August 2009

स्वाइन फ्लू

करीबन दो महीने से स्वाइन फ्लू पर लिखने की चेष्ठा कर रही हूँ। लिख नहीं रही। कहीं दूर से बैठे किसी ग्राफ का विश्लेषण करने जैसे लग रहा था। बच्चे रोज़ अस्पताल आ रहे थे। सर्दी खाँसी आम सी बात थी। पर स्वाइन फ्लू कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। आने वाली आफत और सामने वाली आफत में भारी फर्क है। एक को हम बिल्कुल नहीं जानते और दूसरे से जूझने के सिवा चारा नहीं होता। जिस बात से हम अनिभिज्ञ हैं हम उससे अपने सारे जाने अनजाने डर जोड़ देते हैं। स्वाइन फ्लू से जब नज़र मिलाई तो महसूस हुआ इसका चेहरा इतना विकृत भी नहीं।




सर्दी, खाँसी और फ्लू




साधारण सर्दी खाँसी और फ्लू में बहुत सारी बातें एक सी हैं। किसी भी वायरस के संक्रमण पर शरीर उसे बाहर फेंकने की कोशिश करता है। खाँसना, छींकना, जाड़ा, उल्टियाँ यह सब इसमें मदद करती हैं। साधारण सर्दी जुकाम के लक्षण नाक के आसपास होते हैं। इनके लिए जिम्मेदार होते हैं नोस वायरसस। रेस्पिरेटरी सिनसायटियल वायरस खास तौर पर जिम्मेदार माना गया है। कभी कबार इनफ्लूएंज़ा वायरस भी सर्दी खाँसी के जिम्मेदार हो सकते हैं। कॉमन कोल्ड के मुख्य लक्षण नाक बंद होना, छींके आना और नाक का बहना है। बड़े लोगों और बड़े बच्चों में बुखार अक्सर नहीं आता। छोटे बच्चों में 100 से 102 फैरनहीट जितना बुखार आता है। गले में खराश अक्सर पाई जाती है पर गला खराब नहीं होता और उसमे लाली नही दिखती। साल भर में बच्चों में तीन से आठ बार तक सर्दी खाँसी हो सकती है। ठंडी और बरसात के मौसम में इसकी संभावना अधिक हो जाती है। बहती हुई नाक में यह वायरस बड़ी संख्या मे होता है। खाँसने, छींकने, नाक साफ करने पर, किसी संक्रमित जगह छूने के बाद चेहरा छूने पर यह वायरस फैलता है। सर्दी के वायरस के संपर्क में आने के एक से पाँच दिन के भीतर लक्षण शुरु हो जाते हैं। एक से तीन दिन में नाक से बहता पानी, हरे या पीले रंग का हो जाता है। बच्चों के कान के पर्दे लाल हो जाते हैं। करीबन सात दिन में सर्दी का असर खत्म हो जाता है।

साधारण सर्दी के सभी लक्षण गले से ऊपर के हिस्से में होते हैं। फ्लू का असर पूरे शरीर पर होता है। फ्लू इन्फ्लूएंज़ा वायरस से होता है। अधिकतर सभी को साल में एक से तीन बार तक हो सकता है। साथ में तेज बुखार होता है - बच्चों में भी और बड़ों में भी। इसके लक्षणों से तकलीफ तो होती है किंतु यह कोई भयानक रोग नहीं है। फ्लू में अचानक से तेज़ बुखार आ जाता है (102-106), चेहरा लाल , गाल सुर्ख हो जाते हैं,शरीर में दर्द उठता है ,थकान होती है और ऊर्जा की कमी महसूस होती है। कभी कबार चक्कर भी आते हैं और उल्टियाँ भी हो सकती हैं। बुखार एक दो दिन तक रहता है और कभी कबार पाँच दिन तक भी। दूसरे दिन से शरीर की तकलीफ कम होने लगती है और श्वास से संबंधित तकलीफ बढ़ जाती है। यह वायरस जहाँ केन्द्रित होते है उसके अनुसार् सर्दी, खाँसी, गले मे दर्द ,कान मे इंफेक्श्न, ब्रोंकिओलिटिस या नयूमोनिया के लक्षण दर्दी मे पाये जाते है। फ्लू का सबसे आम लक्षण है सूखी खांसी आना। अधिकतर लोगो मे सरदर्द और गले का लाल होना भी शामिल है। नाक का बहना और छींके आना भी आम है। यह सभी लक्षण चार से सात दिन के भीतर बेह्तर हो जाते है। कभी कभी इस दौरान बुखार फिर चड़ने लगता है। हफ्तों तक फ्लू से उत्पन्न कमज़ोरी रह सकती है। दर्दी सर्दी, खांसी से इस वायरस के सपर्क मे आते है। एक से सात दिन मे लक्षण दिखने शुरु होते है। हवा मे फैलने की वजह से फ्लू की संक्रमण शक्ति बेहद अधिक होती है। देखते ही देखते बडी संख्या मे बहुत लोग एक साथ बीमार हो जाते है।

फ्लू वैक्सीन



फ्लू से जूझने के लिये फ्लू वैक्सीन उप्लब्ध है। यह वैक्सीन किसी भी साल मे हुए फ्लू वायरस के स्ट्रैन पर आधारित है। जब फ्लू के नये स्ट्रैन होते है तो यह वैक्सीन कारगर नही रहती। जाहिर है कुछ सालो मे यह वैक्सीन बाकी सालों के मुकाबले अधिक कारगर रहती है।
फ्लू के स्ट्रैन में परिवर्तन होने पर यह घातक रूप धारण कर सकती है। इस शतक के शुरु मे इससे काफी जानलेवा महामारी फैली थी। ऐसी ही महामारी बीच बीच मे फैलती रहती है। साधारण तौर पर भी अकेले अमेरिका मे ही करीबन तीस से चालीस हज़ार लोग इससे ग्रस्त होकर जान से हाथ धो बैठते है। जिन लोगो मे पहले से कोई कमज़ोरी होती है वो गभीर रूप से बीमार हो सकते है। अगर काफी कम या ज़्यादा उम्र , कैंसर या डायबिटिस जैसे रोग, श्वास संबंधित रोग वगैरह हों तो इसका संक्रमण अधिक जोर पकड़ता है।


फ्लू और फ्लू महामारी

जब से मेक्सिको में स्वाइन फ्लू वायरस की खबर मिली इसमें महामारी फैलाने की क्षमता का अंदेशा होने लगा। दक्षिणी और उत्तरी गोलार्ध में फ्लू का मौसम अलग अलग समय है। फ्लू वायरस लगातार बदलते हैं। और इसीलिए दोनो गोलार्ध में एक से वायरस नहीं पाये जाते। महामारी फैलाने वाले फ्लू वायरस का आचरण साधारण फ्लू वायरस की तरह नहीं होता। यह उससे अधिक घातक होते हैं। अधिक आसानी से संक्रमित करते हैं। सही परिस्थिति में चिड़िया, सूअर वदैरह के फ्लू वायरस के जीन ह्यूमन फ्लू वायरस का अंश बन जाते हैं। चूँकि हमारी रोगप्रतिकारक शक्ति को इसका कोई परिचय नहीं होता, उसका प्रतिकार सक्षम नहीं होता। ऐसे में फ्लू वायरस शरीर पर आसानी से कब्जा जमा सकता है।

फ्लू वायरस के कितने प्रकार

तीन प्रकार। ए, बी, सी। ए से अधिकतर फ्लू के केसस होते हैं। सी के लक्षण बेहद कम होते हैं और यह पाया भी सबसे कम जाता है।

ए- इसमें 16 H और 9 N प्रकार शामिल हैं। H का मतलब हीमअग्लूटिनिन, N का मतलब न्यूरामिनिडेस। यह वायरस पर पाये जाने वाले डाँचे हैं जिनसे इनकी पहचान सँभव है। बर्ड फ्लू का वायरस है H5N1 । मनुष्यों में फिलहाल जो तीन वायरस फ्लू फैला रहे हैं वे हैं ए वायरस( two A viruses) – (A) H1N1 और (A)H3N2 – तथा एक बी (B ) वायरस. इंसानों में जो H1N1 वायरस पाया जाता है वो सवाइन फ्लू के H1N1 वायरस से अलग है।

महामारी का मतलब जानलेवा नहीं

यह समझना बेहद जरूरी है कि महामारी का मतलब जानलेवा बीमारी नहीं है। WHO ने जब स्वाइन फ्लू को महामारी कहा उनका तात्पर्य इस वायरस के फैलने की तेज़ी और क्षमता से था। दोनो गोलार्ध में एक साथ पाया जाना, मौसम और तापमान से संबन्ध ना होना - यह बातें इसे महामारी बनाती हैं।

फ्लू सर्दी के मौसम में अधिक क्यों
-अधिक समय घर के अंदर, धूप से दूर
-विटामिन डी की कमी
-हवा में सीलन की कमी जिससे श्वास के अवयव शुष्क जाते हैं और रोगाणु आसानी से पकड़ पा लेते हैं

क्या हाल की फ्लू वैक्सीन आपकी रक्षा करने में सक्षम है

मनुष्यों और स्वाइन फ्लू में पाया गया H1N1 स्ट्रैन एक दूसरे से काफी अलग है इसलिए यह कहना मुष्किल है कि हाल की वैक्सीन कितनी सुरक्षा दे सकता है।

फिर भी 65 से ऊपर के सभी, आरोग्य कार्यकर्ता, हृदय संबंधित रोगों,डायबीटिस, अस्थमा से पीड़ित लोगों का, गर्भवति स्त्री वगैरह का इस वैक्सीन का लेना जायज़ है। CDC (Centre of Disease Control) के हाल के निर्देश के हिसाब से सभी को खास तौर से बच्चों को यह वैक्सीन लेनी चाहिए।

फ्लू से स्वस्थ नौजवानों की मृत्यु क्यों

सही कारण मालूम नहीं है। किंतु अंदेशा लगाया जाता है कि इसका कारण सायटोकीन स्टार्म (cytokine storm) है। फ्लू के वायरस के दावा बोलते ही रोग प्रतिकारक शक्ति पूरी सेना उसके खिलाफ छोड़ देती है। इससे बुखार, शरीर में दर्द और अवयवों का विफल होना शुरु हो जाता है। वायरस की साफ पहचान ना होने की वजह से उसका बाल भी बाँका नहीं होता।

फिर भी यह कहना गलत होगा कि फ्लू से अधिक नौजवानों की मौत होती है। मृत में 90 फीसदी लोग 65 की उम्र के ऊपर पाये जाते हैं।

क्या वजह है कि फ्लू वायरस की इतनी दहशत है

वायरस जीव और निर्जीव के बीच की एक अवस्था है। कालांतर से यह बदलते जा रहे हैं। खुद के जैसों के उत्पादन में यह लगातार भूल करते हैं। जो भूल जिंदा रहने में सक्षम होती है आगे बड़ जाती है। यह हवा में धूल की तरह फैल कर शरीर तक पहुँचते हैं और वहाँ पहुँच कर सँख्या में बढ़ते हैं और दावा बोल देते हैं। यह इतनी जल्दि और लगातार बदलते हैं कि शरीर के लिए इनकी पूरी पहचान सँभव नहीं हो पाती। शरीर हर बार इसका नया रूप देखता है। जब तक वह खुद को इससे लड़ने को तैयार करता है यह फिर बदल जाता है।
H प्रोटीन इसे गले, श्वास नलियों की कोशिकाओं में चिपकने में मदद करता है और N प्रोटीन इन कोशिकाओ में पनप कर इन्हे तोड़ कर बाहर निकल बाकी कोशिकाओं पर हमला करने में सँभव।

टैमीफ्लू जैसी दवा इन HN प्रोटीन्स पर हमला करते हैं । किंतु अगर इनका डाँचा और बदल जाये तो जरूरी नहीं कि यह सक्षम रह सके।


ये कहाँ आ गये हम साथ साथ चलते




स्वाइन फ्लू एक महामारी है
स्वाइन फ्लू साधारण तौर पर जानलेवा नहीं है
स्वाइन फ्लू जानलेवा बन सकती है
फ्लू के बाकी वायरस की तरह ही यह भी हवा में और हवा से फैलती है
खाँसने, छींकने और बहती नाक हाथ से पोँछने से वायरस को फैलने में आसानी होती है
कड़ी धूप में यह नहीं पनप सकती
साबुन और पानी के सामन नहीं टिक सकती
बंद कमरे , भीड़ , सफाई की कमी में यह जोर पकड़ती है
स्वस्थ शरीर में अक्सर नहीं टिक पाती है
यह बदल रही है....बुरे के लिए भी हो तसकता है और अच्छे के लिए भी
वैक्सीन की खोज समझो पूरी हुई
वैक्सीन के आते ही वायरस बदलेगा नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं

हम क्या करें...क्या कर सकते हैं










1. साफ सफाई रखें और नियमित हाथ धोये।
2.चेहरे पर बेवजह बार बार हाथ ना ले जाये
3. सर्दी खाँसी होने पर टिश्यू इस्तेमाल करें, नहीं तो बाँह ;और टिश्यू को लोगों के संपर्क में ना आने दें
4.सात से आठ घँटों की नींद, अच्छा भोजन जिसमें विटामिन सी और डी पर्याप्त मात्रा में हो
5.घर में धूप आने दें, ठंड से बचें और भीड़ में ना जायें
6.मास्क एक बैरियर का काम कर सकता है और भीड़ में आपके श्वास अवयवों तक वायरस को पहुँचने से रोक सकता है।
अगर घर में कोई स्वाइन फ्लू से ग्रसित है तो उसे एक कमरे तक सीमित रखें और कम से कम लोगों के संपर्क में उसे आने दें।
7. पर्याप्त मात्रा में पानी पियें।
8.हल्की सर्दी खाँसी का घर रह कर ही उपचार करें।
9. फ्लू के लक्षण दिखने पर अस्पताल से संपर्क करें और सिर्फ दर्दी को अस्पताल ले जायें।
10. स्वाइन फ्लू जानलेवा नहीं है और इसीलिए साधारण इलाज से भी बेहतर हो सकती है।
11. श्वास संबंधित लक्षणों के दिखने पर ( तेज साँस चलना, साँस लेने में तकलीफ होना), लगातार बहुत तेज बुखार होने पर, बेहोशी की अवस्था होने पर, या और कोई भी चिंताजनक गँभीर लक्षण दिखने पर देरी ना करें और डॉक्टर से मिलें।




स्वाइन फ्लू और मेरा अनुभव

स्वाइन फ्लू के केस अब नई बात नहीं रह गई है। करीबन पाँच कनफर्म्ड केस देखे हैं, सभी पाँच साल से छोटे, तीन बच्चे दो साल से छोटे। दो को टैमीफ्लू नहीं दिया गया था और बाकी को दिया गया था। सभी स्वस्थ हैं। मैं भी....अब तक। :-))

हर बीमारी हमारी अवस्था का बखान करती है। बीमारी से पता चलता है समाज की अवस्था का। प्लेग से दौड़ते चूहे याद आते हैं और एड्स से नैतिकता पर सवाल उठता है। कोलेरा से पीने के पानी की और ध्यान जाता है और मलेरिया से जमे हुए पानी पर। डायबिटिस और ब्लडप्रऐशर से जंक फुड्स की बाढ़ याद आती है।

स्वाइन फ्लू गरीबों और अमीरों दोनो पर हावी है-
गरीब कमज़ोर है, साफ नहीं है, भीड़ में रहता है, अच्छे खाने से वँचित है
अमीर ए सी गाड़ियों और घरों में रहता है,धूप से दूर रहता है हाथ धोने से ज्यादा टिश्यू पोंछने में विश्वास रखता है, देश विदेश जा सकता है और इन वायरस के संपर्क में आता है....

इलाज और रस्सी तक हम पहुँच ही गये हैं......हवादार कमरे, हाय से नमस्ते, साफ सुथरे हो जायें तो जीवित वायरस को निर्जीव करना इतना मुश्किल भी नहीं।

और जानकारी पाने के लिए http://www.cdc.gov/h1n1flu/

Monday 27 April 2009

बच्चे के व्यक्तित्व के विकास में माता पिता का योगदान

किसी भी बच्चे का लालन पालन बेहद जिम्मेदारी का काम है। माता पिता की भूमिका इसलिए भी बहुत अहम है क्योंकि ना केवल हम बीज देते हैं बल्कि ज़मीन, हवा और ऱौशनी भी हमारी जिम्मेदारी है। एक शिशु ने किस माता पिता से जन्म लिया और किस घर और वातावरण में पला बड़ा ,दोनो बातें उसके व्यक्तित्व पर छाप छोड़ते हैं।

सायकोलोजी में एक बेहद दिलचस्प विषय है- ट्राँसैक्शनल अनालिसिस (TRANSACTIONAL aNALYSIS) । इसके अनुसार किसी भी व्यक्ति का व्यक्तित्व तीन खंड़ों ( इगो स्टेट्स) में बाँटा जा सकता है। एडल्ट(वयस्क),चाईल्ड(शिशु) और पेरन्ट(जनक)। 'चाईल्ड' हमारे व्यक्तित्व का शिशु है। नैसर्गिक, निर्दोष, मासूम। यह भावनाओं और अवस्था को ज्यों का त्यों महसूस करता है और उसी के अनुसार प्रतिक्रिया करता है। अनुभव से दूर , और दूरदर्शिता की चिंता बिना का व्यवहार कभी बहुत ही प्यारा और कभी बेहद लापरवाह लगता है।

कुछ लोग कभी बड़े नहीं होते। मस्त रहते हैं और किसी बात की जिम्मेदारी नहीं लेते। ऐसे लोगों के व्यक्तित्व का एक बड़ा हिस्सा चाईल्ड इगो स्टेट है । जहाँ इनका बिंदास होना सुहाता है,वहीं इनकी लापरवाही खलती है।

कुछ इस चाईल्ड को बहुत कम अहमियत देते हैं। वक्त से पहले संजीदा,गँभीर, बेहद जिम्मेदार हो जाते हैं। वे जीवन के बदलते रंगों में आत्मा नहीं डुबो पाते और मासूमियत और नये तरीके की सोच और खोज से दूर रहते हैं।

एडल्ट यानी वयस्क इगो स्टेट हमारे व्यक्तित्व का वह इगो स्टेट है जो समय के साथ बड़ा होता है। अनुभव को अपने व्यक्तित्व में समेट सोच समझ कर व्यवहार करता है।

पेरंट इगो स्टेट हमारे व्यक्तित्व का वो तिहाई हिस्सा है जो हमारे अंदर का जनक है। यह हिस्सा अक्सर बिना किसी फेर बदलाव के हम अपने माता पिता और उन लोगों से जिनका प्रभुत्व हम पर है उनसे ग्रहण करते हैं। और इसीलिए हम अपने माता पिता की तरह चलते हैं, हँसते हैं, खाँसते हैं, त्योहार में कोई खास मिठाई बनाते हैं..किसी खास अंदाज़ में तौलिया रखते हैं, खाने की मेज़ पर बैठते हैं।

माता पिता का एक तिहाई हिस्सा हम में यू ही शामिल हो जाता है। सोचने की बात है कि हम जो और जैसे हैं वह हमारे बच्चे का एक तिहाई व्यक्तित्व तय करता है। इसीलिए अपने व्यवहार से सही उदाहरण देना आवश्यक है। हमारे या उसके चाहे अनचाहे उसका व्यक्तित्व इसे आत्मसात कर लेता है।

हमारे बच्चों में हम जैसे व्यक्तित्व की कामना करते हैं, जरूरी है कि स्वयं हमारे अंदर वैसा व्यक्तित्व हो।

इन्ही इगो स्टेट्स के संदर्भ में समझा जा सकता है कि माता पिता की भूमिका एक शिशु को एक योग्य वयस्क बनाना है। और जहाँ हमारा व्यक्तित्व इस पर असर करता है वहीं हम किस वातावरण में इन्हे पालते हैं भी बेहद महत्वपूर्ण है।

बच्चों में माता पिता का अंश जरूर है किंतु वह हमारा हिस्सा या फैलाव नहीं हैं। उनकी अपनी एक अनुपम उपस्थिति है जो महज हमारे सपनों का विस्तार नहीं है। उनका अपना एक प्रवाह ,एक गति है.....हमारी जिम्मेदारी उसे सही दिशा और मजबूत किनारे देना है।

माता पिता जो कहते हैं वह किसी रेकॉर्डड टेप की तरह हमारे जहन में चलता रहता है। क्या करना चाहिए और क्या नहीं की एक लंबी लिस्ट हम सभी के पास रहती है। बचपन से कही सुनी कितनी बातें हमारे मस्तिष्क में चलती रहती हैं। घर के बाहर चप्पल उतारो,सच बोलो, खाना खाते वक्त बात मत करो, ऊपर बैठ कर पाँव मत हिलाओ, टी वी पास से नहीं देखो वगैरह। कई विचार भी हमें विरासत में मिलते हैं। लड़कियाँ ठहाके मार कर नहीं हँसती, लड़के खाना नहीं परोसेंगे, नैप्पी बदलने का काम माँ का है, माँ बाप से सवाल करना बदतमीज़ी है, औरतों के लिए सीट खाली करनी चाहिए, औरतें चुगली करती हैं,परीक्षा के पहले दही खाकर जाना चाहिए। धर्म, लिंग ,देश,रंग के कितने ही पूर्वाग्रह के लिए यह टेप जिम्मेदार हैं।

करेन होर्नी (Karen Horney)नाम की सायकोअनालिस्ट ने टायरेनी ऑफ शुड्स (Tyranny of Shoulds) का विचार रखा था। इसमें इसी टेप का जिक्र है जो हमारे व्यक्तित्व पर राज़ करता है। जाहिर है यह टेप कई गलत कामों को करने से रोकता है। वँही कई बार इस टेप के चलते हम समर्थ, उनमुक्त राय कायम करने में सक्षम नहीं रहते। अगर माँ और पिता की तरफ से मिला टेप अलग अलग बात कहता हो तो बच्चा उलझ भी सकता है।

माता पिता होने के नाते हमारा कर्तव्य बनता है कि सही टेप अपने बच्चे तक पहुँचायें। और उसे खुद सोचने और समझने और अपने निर्णय सही लेने में सक्षम बनाये।

टायरेनी ऑफ शुड्स की तरह उसके विचार और व्यक्तित्व को परीमित ना करें।

हमें हमारे बच्चे किस वक्त कहाँ और किस हाल में है जानना जरूरी है। आज़ादी की कोई भी गुहार की वजह से हमें इस बात पर लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए। बच्चा किस के साथ है, टी वी में क्या देख रहा है, कौन सी पुस्तक पढ़ रहा है, किस तरह का संगीत सुन रहा है ...सब जानकारी रखना ना केवल महत्वपूर्ण है बल्कि समय रहते सचेत होने के लिए आवश्यक भी।

अच्छे से अच्छा माता पिता भी कुछ भूल करता है। उसमें से एक है कि हम रोज़ किस तरह का संगीत अपने नन्हे मुन्ने के सुपुर्द करते हैं।
एक समय में काफी चला हुआ गाना ज़रा सुनें

http://www.youtube.com/watch?v=fxx8LA-O1HQ



अब यह सुनिये
http://www.youtube.com/watch?v=dJOTlpt2_5Y



संगीत में बहुत ताकत होती है। ऐडरेन फ्लेटची. एक स्कौटिश...कहते हैं...तुम इस देश के नियम लिखो...मैं इस देश का संगीत लिखूँगा....और तुम देखोगे कि इस देश पर मैं राज़ करूँगा।
लय और ताल पर सुर में कहे गये शब्दों में बहुत ताकत होती है। रूह में यह शब्द बस जाते हैं। अगर इनमें गलत संदेश है तो गलत संदेश आपका लाड़ला लगातार अपने सिस्टेम में ढ़ालता जाता है। वहीं सही संदेश लयबद्द करके सिखाया जाये तो भी बच्चे तक पहुँच जाता है।

ज़रा देखें

http://www.youtube.com/watch?v=amDp4ZQY6w0



विषय का विस्तार बहुत है। कहने समझने के लिए भी काफी सारे तथ्य। आज के समय इनको जानना बेहद आसान है। पर इन्हे जानकर सही का अनुसरण करना हमेशा की तरह कठिन।

सिर्फ समझ लेने से बात नहीं बनती। इन्हे जीवन में उतारने के लिए समय की आवश्यकता है। किसी भी बच्चे तक प्यार शॉर्टकट में नहीं पहुँचाया जा सकता। प्यार की एक अहम माँग समय है..., समय जो साथ बिताया जाये।

जिन बच्चों ने माँ या बाप खोया है, वह बदनसीब हैं। अनुसरण करने के लिए उनके पास उनके अंदर का शून्य नहीं तो कोई कल्पना या भ्रम ही होता है। भ्रम जो सच का स्थान नहीं ले सकता। वो बच्चे जिनके माँ बाप तो हैं पर जिनके पास अपने बच्चे से मिलने के लिए दिन में ज़रा भी समय नहीं और भी बदनसीब हैं क्योंकि उनके पास कोई मीठा भ्रम भी नहीं।

इतना यहाँ लिखने के पीछे सिर्फ एक ही आशय है कि हम जान सके हम हमारे बच्चे के विकास में कितने जिम्मेदार है। माता पिता के मुकाबले अच्छे स्कूल, ट्यूशन, खिलौने, प्लेस्टेशन वगैरह इस योगदान का एक बहुत छोटा हिस्सा हैं।


Children Learn What They Live
By Dorothy Law Nolte, Ph.D.


If children live with criticism, they learn to condemn.
If children live with hostility, they learn to fight.
If children live with fear, they learn to be apprehensive.
If children live with pity, they learn to feel sorry for themselves.
If children live with ridicule, they learn to feel shy.
If children live with jealousy, they learn to feel envy.
If children live with shame, they learn to feel guilty.
If children live with encouragement, they learn confidence.
If children live with tolerance, they learn patience.
If children live with praise, they learn appreciation.
If children live with acceptance, they learn to love.
If children live with approval, they learn to like themselves.
If children live with recognition, they learn it is good to have a goal.
If children live with sharing, they learn generosity.
If children live with honesty, they learn truthfulness.
If children live with fairness, they learn justice.
If children live with kindness and consideration, they learn respect.
If children live with security, they learn to have faith in themselves and in those about them.
If children live with friendliness, they learn the world is a nice place in which to live

हम अपने बच्चों को बहुत कुछ बनाना चाहते हैं.....काश हम उसे कुछ भी बनाने की जगह....उसे अपने रंग और महक में खुशी खुशी फलने फूलने दें। उसे एक व्यक्ति बनने दें।

http://www.youtube.com/watch?v=9Ms_fYsUrnY

Saturday 18 April 2009

एपन्डिसाइटिस (appendicitis)

आज एपन्डिसाइटिस पर चर्चा करेंगे। बच्चों में पेट के ऑपरेशन का एक मुख्य कारण। अक्सर मातापिता लक्षणों को पूरी गँभीरता से नहीं लेते और देर होने की वजह से एपन्डिक्स का रप्चर (फूट कर फट जाना)हो जाता है। बच्चों में बाकी कारणों से भी निदान इतना आसान नहीं होता और कई बार डॉक्टर की लापरवाही से भी देर हो जाती है। आईये हम इस विषय को लेकर सजग हों।



एपन्डिसाइटिस क्या है?


एपन्डिसाइटिस एपन्डिक्स का संक्रमण है जिसकी वजह से उसमें सूजन और दर्द उठता है।

एपन्डिक्स क्या है?


एपन्डिक्स उँगली के समान एक छोटी थैली है जो बड़ी आँत से जुड़ी होती है और पेट के दाँये निछले हिस्से में पाई जाती है। एपन्डिक्स के सही कार्य का अब तक भी ठीक पता नहीं है। इसे मानव विकास में अवशेष ही माना गया है। शरीर का एक ऐसा हिस्सा जो अपनी क्षमता और कार्य खो चुका है।
इसकी थैली के अंदर जो बलगम (श्लेम )उत्पन्न होता है वह बड़ी आँत में पहुँच कर शरीर से निवृत होता है।
एपन्डिक्स को शरीर से निकालने पर आँत की कार्यक्षमता मे कोई कमी नहीं आती।

http://www.youtube.com/watch?v=9fN6sm5hu48




एपन्डिसाइटिस की वजह क्या है?

कुछ वजहों से एपन्डिक्स की थैली के मुँह का रास्ता बंद हो जाता है। बलगम अंदर इकट्ठा होने लगता है। उसके अंदर स्वाभाविक तौर पर उपस्थित बैक्टीरिया सँख्या में बढ़ने लगते हैं। एपन्डिक्स में संक्रमण होता है। सूजन और दर्द उठता है।

इस रुकावट का कारण मल, लिम्फ टिश्यू, इन्फ्लमेटरी बावल डिसीस, आँत में कहीं और संक्रमण, नहीं तो शरीर में कहीं और संक्रमण हो सकता है।
संक्रमित एपन्डिक्स फूट सकता है। ऐसी स्थिति में पूरे पेट में संक्रमण फैल जाता है। पेरिटोनाइटिस नाम की गँभीर स्थिति उत्पन्न हो सकती है और यह जानलेवा हो सकती है।



एपन्डिसाइटिस किसे हो सकता है?

यह किसी को भी हो सकता है। 10 से तीस बरस में इसकी सँभावना अधिक देखी गई है। एपन्डिसाइटिस पेट के ऑपरेशन की सबसे अहम वजहों में से एक है।

इसके लक्षण क्या हैं


एपन्डिसाइटिस का मुख्य लक्षण है पेट में दर्द उठना

यह दर्द इतना तीव्र होता है कि अक्सर नींद से बच्चा उठ कर बैठ जाता है। पहले नाभि के आसपास दर्द उठता है और फिर धीरे धीरे दाँई तरफ केंध्रित होता जाता है। कुछ ही घंटों में इसकी तीव्रता काफी बड़ जाती है। यह चलने फिरने में, गहरी साँस लेते वक्त और खाँसने या छींकने पर असहनीय हो जाता है।

बाकी लक्षण जो पाये जाते हैं

भूख कम लगना
उल्टी और उबका
दस्त
कब्ज
हवा छोड़ सकने मे अक्षमता
बुखार
पेट में सूजन

यह सभी लक्षण बाकी स्थितियों में भी उभर सकते हैं। किंतु इनके पाये जाने पर डॉक्टरी सलाह लेना अत्यावश्यक है।

http://www.youtube.com/watch?v=_RhH2Y3fjYI






एपन्डिसाइटिस का निदान कैसे किया जाता है?

डॉक्टर दर्दी की पड़ताल और कुछ खून की जाँच और दूसरे टेस्ट्स करने पर इस नतीजे तक पहुँच सकता है। अगर दर्दी की जाँच से ठीक ठीक निदान का अंदाज़ा लगता है तो कई बार डॉक्टर बिना आगे के टेस्ट्स किये ही ऑपरेशन के लिए दर्दी को तैयार करता है। एपन्डिक्स का उसके फूटने के पहले निकालना बहुत जरूरी है। सोनोग्राफी और सी टी स्कैन करने पर सही निर्णय पर पहुँच सकते हैं।




दर्दी से पूछा जाता है कि दर्द कब और कहाँ से शुरु हुआ और किस तरफ बढ़ा और इसकी तीव्रता सबसे अधिक कहाँ है। इससे पहले कभी ऐसी तकलीफ हुई हो तो यह बताना भी आवश्यक है।

डॉक्टर जाँच करते वक्त खास चिन्हों को तलाशते हैं। एपन्डिक्स होने पर पेट में गॉर्डिंग पाई जाती है- दर्दी अपने पेट की माँसपेशियों को छूते ही कड़क कर देता है। रिबाउन्ड टेन्डरनेस, रोवसिंग साईन, सोआस साईन और औबचुरेटर साईन- यह कुछ ऐसे चिन्ह है जिसके लिए तपास की जाती है।

खून में व्हाईट ब्लड सेल्स(सफेद कोशिकाएँ) की गिनती 15000 से अधिक हो सकती है। पानी और नमक की मात्रा में फेरबदल हो सकता है। पेशाब में संक्रमण भी पाया जा सकता है।




एपन्डिसाइटिस से निज़ाद पाने के लिए अक्सर शल्य चिकित्सा की जाती है। जल्द से जल्द ऑपरेशन करने पर एपन्डिक्स के फूटने और पेट में संक्रमण फैलने की सँभावना बहुत कम रहती है। इसे लैपरोटोमी नहीं तो लैपरोस्कोपी से किया जा सकता है। लैपरोटोमी में पेट में एक चीरा लगा कर एपन्डिक्स काट कर अलग किया जाता है। लैपरोस्कोपी में एक छेद के अंदर से ही ऑपरेशन किया जाता है। लैपरोस्कोपी से की गई शल्य चिकित्सा के बाद फिर से तंदुरुस्त होने में कम समय लगता है।




कभीकबार पेट खोलने पर सामान्य एपन्डिक्स दिखाई पड़ता है। ऐसे में भी कई डॉक्टर भविष्य में तकलीफ ना हो इसलिए एपन्डिक्स निकाल देते हैं। कभी पेट के खोलने पर कोई और तकलीफ सामने आती है जिसेकि शल्य चिकित्सा के दौरान ठीक किया जा सकता है।


एपन्डिक्स के फूटने या रप्चर होने पर एपन्डिक्स के आसपास पस जमा हो सकता है। यह पेट में गोले की तरह महसूस हो सकता है। इस पस को ऑपरेशन से पहले निकालना जरूरी है। इसके लिए पेट में एक नली रखनी पड़ सकती है। यह नली दो हफ्ते तक रखनी पड़ सकती है जिस दौरान दर्दी को ऐन्टिबायोटिक्स दिए जाते हैं। छह से आठ हफ्ते बाद जब संक्रमण काबू में आ जाता है तब ऑपरेशन करके एपन्डिक्स निकाला जाता है।



बिना शल्यचिकित्सा के ऐन्टीबायोटिक्स देकर शायद ही ठीक हो सकता है। किंतु अगर शल्य चिकित्सा में देर लगे तो ऐन्टीबायोटिक्स देना जरूरी है।

शल्यचिकित्सा के चार से छह हफ्तों में दर्दी पूरी तरह ठीक हो जाता है।


याद रखें
एपन्डिसाईटिस एक आपातकालीन स्थिति है जिसपर जल्द से जल्द ध्यान देना आवश्यक है।



ALL PICTURES AND VIDEOS HAVE BEEN USED PURELY FOR EDUCATIONAL PURPOSES. IF ANY COPY RIGHT VIOLATION IS DONE KINDLY INFORM THE PICTURE OR VIDEO WILL BE TAKEN OFF IMMEDIATELY.

Tuesday 10 February 2009

रोटावायरस वैक्सीन



रोटावायरस पर पोस्ट लिखने के बाद महसूस किया कि रोटावायरस वैक्सीन के विषय में दी गई जानकारी बेहद संक्षिप्त है। और इसे लेकर कई सवाल अनुत्तरित रह गये।

तो प्रश्नोत्तर ही सही

1.पहली बार रोटावायरस वैक्सीन कब लोगों तक पहुँचा?
1998 में पहली बार वैयत्त कंपनी ने रोटाशील्ड़ के नाम से रोटावायरस का वैक्सीन उपलब्ध कराया। इसे बाज़ार में पहुँचाने से पहले किए गये शोध में कुछ हानिकारक नहीं पाया गया था। 1999 में इनेटससेप्शन (intussusception) ( आँत का एक तरह का जानलेवा अवरोध) की गुँजाइश बढ़ने की शंका के तहत इसे बाज़ार से हटा लिया गया। तब इसके फायदे को लेकर बहस गर्म हो गई।




फरवरी 2006 में FDA (Food and Drug Administration ) ने एक नये वैक्सीन RotaTeq (Merck) की अनुमति दी।




2.यह किस प्रकार की रस्सी (vaccine) है?
यह गाय और इंसान को ग्रसित करने वाले जीवित रोटावायरस से बना है। यह पाँच तरह के स्ट्रेन्स (serotypes G1, G2, G3, G4 and P1 )से सुरक्षा देता है।


3.इसे किस तरह दिया जाता है?
यह तरल है और मुँह से दिया जाता है


4.यह टीके किसे और कब लगने चाहिए?
Advisory Committee on Immunization Practices (ACIP) इसे एक साल के भीतर के बच्चों के देने की सिफारिश देती है।
इसके तीन डोस हैं जो की दूसरे, चौथे और छठे महीने में दिये जाते हैं। पहला डोस छह से बारह हफ्ते के बीच और आखिरी 32 हफ्ते से पहले दिया जाना चाहिए।
इसे बाकी टीकों के साथ दिया जा सकता है।

5.क्या ऐसे बच्चे को टीका लगाने की जरूरत है जो रोटावायरस से ग्रसित हो चुका है?
बच्चे को एक ही रोटावायरस के स्ट्रेन का संक्रमण हुआ होता है जबकि यह पाँच से सुरक्षा देता है। 32 हफ्ते से पहले इन्हे भी तीन टीके लगने चाहिए।


6.यह टीका कितना सुरक्षित है?
70000 बच्चों में रोग-विषयक जाँच में इसे सुरक्षित पाया गया है। किंतु इससे पहले के टीके के साथ कुछ शंकायें जुड़ी थी इसलिए इसकी जाँच और परीक्षण जारी है। इसे 32 हफ्ते के ऊपर के बच्चों में अभी देने की अनुमति नहीं है।

7.यह टीका रोग प्रतिरोध में कितना सक्षम है?
यह 74% रोटावायरस के मामले, 98% गँभीर संक्रमण, 96% अस्पताल के दाखिलों में कमी लाने में सक्षम है। दूसरे वायरस से होने वाले दस्त और उल्टी पर इसका कोई असर नहीं है।

8.किस तरह के दूसरे लक्षणों की इस वैक्सीन बतौर संभावना है?
कुछ बच्चों में (1%-3% ज्यादा संभावना) इसके देने पर सात दिन के भीतर दस्त और उल्टी देखा गया है।
और कोई गँभीर लक्षण नहीं देखा गया।

9.यह टीका किसे नहीं दिया जाना चाहिए?
- जिसे यह देने पर कोई रिएक्शन हुआ हो
- जिसे इसके किसी घटक से कोई जानलेवा अलर्जी हो
- जिन बच्चों को intussusception हुआ हो
-जो बच्चे बीमार हैं उन्हे कुछ रुककर वैक्सीन दिया जाना चाहिए।
-जिन बच्चों को HIV/AIDS हो, या जो स्टीरौयड्स पर हैं,जिनकी रोग प्रतिकारक क्षमता धटी हुई हो।
-जिन्हे हाल ही में खून या खून संबंधित कोई दवा दी गई हो।

10.क्या वैक्सीन से बीमारी हो सकती है?
नहीं

11.क्या रोटावायरस के लिए कोई और टीका भी है ?
हाँ रोटारिक्स (Rotarix)नाम का glaxo smithcline द्वारा निर्मित टीका भी है।







12.इसे कैसे और कब दिया जाता है?
इसके दो डोस है जिसे दूसरे और चौथे महीनों में दिया जा सकता है। पहला डोस छह हफ्ते के बाद और दूसरा कम से कम चार हफ्ते के अंतराल पर।

इसे भी मुँह से ही दिया जाता है और बाकी लक्षण रोटाटेक जैसे ही हैं।
कभी कभार चिड़चिड़ापन,भूख कम लगना,नाक का बहना और बुखार भी देखा गया है।


नोट


रोटावायरस का टीका लगना इसके नहीं होने की गारंटी नहीं देता। इसके इस्तेमाल से दुनियाभर में प्रतिवर्ष इससे ग्रसित होने वाले बच्चे और मृत्युदर को काफी हद तक घटाया जा सकता है।

32 हफ्ते से ऊपर के बच्चों में पर्याप्त जाँच की कमी होने की वजह से इसे अभी तक इनमें इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं है।






कोई भी टीका लगवाना या ना लगवाना माँ बाप तय कर सकते हैं।






अगर आप के बच्चे को वैक्सीन के बाद पेट में मरोड़, उल्टी,दस्त, दस्त में खून या पेट की किसी और प्रकार की तकलीफ उठे तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। इसे VAERS (The Vaccine Adverse Event Reporting System)(http://vaers.hhs.gov/)को भी सूचित करें। यह Intussusception के लक्षण हो सकते हैं। Intussusception का 24 घंटो के भीतर इलाज करने पर बच्चा पूरी तरह स्वस्थ हो सकता है।





(राधिका बुधकर जी के संशय पर ही यह पोस्ट लिखने की इच्छा हुई। उनका शुक्रिया।)

ALL PICTURES ARE USED ONLY FOR EDUCATIONAL PURPOSES. IF ANY COPYRIGHT VIOLATION IS DONE PLEASE INFORM,THE PICTURE WILL BE TAKEN OFF IMMEDIATELY.

Thursday 29 January 2009

नर्स मेय्ड्स एल्बो (Nursemaid's Elbow,Pulled Elbow)






आज का विषय है नर्स मेय्ड्स एल्बो। पुल्ड एल्बो के नाम से भी यह जाना जाता है। सीधा अनुवाद होगा खिंची हुई कुहनी । बच्चों में इसके होने की सँभावना बहुत अधिक है । इस विषय में बात करने की इच्छा के पीछे का कारण भी यही है। जाने अनजाने हमारी गल्ती से बहुत आसानी से बच्चा इस स्थिति का शिकार हो जाता है। इलाज आसान है। और बचाव मुमकिन।

नर्स मेय्ड्स एल्बो कुहनी के नीचे की हड्डी का कुहनी के जोड़ से आंशिक हटाव है। रेडियस और अल्ना में से रेडियस नाम की हड्डी जोड़ से कुछ कारणवश खिसक जाती है।




कारण


यह सामान्यत: पाँच बरस के नीचे के बच्चों में पाया जाता है। जब बच्चे को हाथ या कलाई पकड़ कर ज़ोर से खींचा जाता है या एक हाथ से उठाया जाता है तो इसके होने की सँभावना बहुत बढ़ जाती है( जैसे की सीड़ीयों पर, सड़क पार करते हुए)। बच्चे को हाथों से पकड़ कर गोल घुमाने पर भी ऐसा होना सँभव है।

इसके होते ही बच्चा तुरंत दर्द से रोने लगता है और प्रभावित हाथ इस्तेमाल करने से इंकार कर देता है। बच्चा अपनी बाँह अपनी तरफ थोड़ा मोड़ कर, कुहनी पेट से चिपका कर रखता है। वह अपने कँधे का इस्तेमाल करता है पर कुहनी का नहीं। कुछ बच्चों में दर्द कम होता है और वे रोना तो बंद कर देते हैं पर कुहनी फिर भी इस्तेमाल नहीं करते।

एक बार ऐसा होने पर ऐसा फिर से होने की, कई बार महीने के अंदर ही सँभावना बहुत बढ़ जाती है।

अक्सर पाँच बरस के बाद यह देखने में नहीं आता। तब तक कुहनी का जोड़ और आसपास की माँसपेशियाँ मजबूत हो जाती हैं। फिर भी किसी चोट या फ्रैक्चर के बाद ऐसा होना सँभव है।




लक्षण

तकलीफ होते ही तुरंत रोना
कुहनी में दर्द
प्रभावित बाँह का उपयोग ना करना
कुहनी को हल्का सा मोड़कर रखना
निचले बाँह को और कुहनी को पेट पर सटाकर रखना
कँधे का हिला सकना और कुहनी का ना हिलाना


अगर आप को शंका है की आपके बच्चे को नर्स मेय्ड्स एल्बो है तो


- कुहनी पर खपच्ची बांधने से पहले बच्चे को ना हिलायें
- बाँह और कुहनी को खुद सीधा करने की कोशिश ना करें
- बर्फ के पैक कुहनी पर लगायें
-कुहनी जिस अवस्था में है वैसे ही खपच्ची बांधे
- कुहनी को ऊपर और नीचे से हिलने ना दे। हो सके तो कलाई और कँधा भी ना हिलायें।

- डॉक्टर के पास तुरंत ले जायें।


नर्स मेय्ड्स एल्बो के होने का संकेत और जाँच

डॉक्टर जाँच के समय पायेगा कि बच्चा कुहनी घुमा नहीं सकता। कुहनी को पूरी तरह मोड़ा भी नहीं जा सकता।

उपचार
डॉक्टर हल्के से कुहनी मोड़ते हुए अग्र बाहु (forearm) को इस तरह घुमायेंगे कि हथेली ऊपर की तरफ देखने लगे।

खुद ऐसी कोशिश करना जोखिम भरा हो सकता है। बच्चे को इससे नुकसान पहुँच सकता है।


कई बार बारंबार ऐसी अवस्था होने पर आपको यह विधि डॉक्टर ठीक तरह से सिखा सकता है।








नर्स मेय्ड्स एल्बो का इलाज ना करने पर स्थायी क्षति पहुँच सकती है। इलाज करने पर कुहनी पूरी तरह से ठीक भी हो जाती है।



समस्या

कुछ बच्चों में कुहनी के चलन में कमी आ सकती है।



बचाव

बचाव बहुत आसान है। ध्यान रखा जाये कि कुहनी खिंचने ना पायें। बच्चे को एक हाथ से खींचिये और उठाइये नहीं। हाथ से पकड़ कर घुमाइये नहीं। सड़क पार करते समय हाथ ज़ोर से ना खींचे।


नर्स मेय्ड्स एल्बो डॉक्टर की ओ पी डी में लगभग रोज़ देखने में आती है। किंतु इनका फ्रैक्चर व कुहनी की बाकी तकलीफों से भेद करना जरूरी है। एक डॉक्टर या जानकार व्यक्ति ही यह अंतर समझ सकता है।

माता पिता होने के नाते बचाव की कोशिश करना जरूरी है और सही समय सही जगह से सही सलाह लेना आवश्यक।


ALL PICTURES ARE USED SOLELY FOR EDUCATIONAL PURPOSES . IF ANY COPYRIGHT VIOLATION IS DONE,PLEASE INFORM , PICTURE WILL BE REMOVED IMMEDIATELY.

Thursday 15 January 2009

रोटावायरस से दस्त और उल्टी

आप लभी को नववर्ष की शुभकामनायें। काफी दिनों बाद इस चिट्ठे पर लिख रही हूँ। हाल ही में आराम का काम छोड़ मुश्किल काम हाथ लिया है। समय की व्यस्तता और नई जगह पाँव जमाने में स्पंदन में लिखना छूट गया। कोशिश रहेगी की नियमित लिख सकूँ।




दस्त और उल्टी की कई वजह है। रोटावायरस नाम का वायरस इसलिए विख्यात है क्योंकि यह अकेला संसार भर में बच्चों में इनका सबसे बड़ा कारण है। पाँच साल की उम्र तक पहुँचते पहुँचते दुनिया के हर बच्चे को कम से कम एक बार इसका चेप लग चुका होता है। हाँ बार बार भी बच्चा संक्रमित हो सकता है किंतु हर बार का संक्रमण का असर, रोग प्रतिकारक शक्ति की वजह से पिछली बार से कम होता है।
रोटावायरस डबल स्ट्रैन्डड(दुहरे रिबन जैसा) आर एन ए वायरस है। सात प्रकार के रोटावायरस- ए,बी,सी,डी ,ई,एफ और जी पाये जाते हैं। करीबन नब्बे प्रतिशत संक्रमण रोटावायरस ए से होता है।


अगर हम दुनिया भर में इससे पीड़ित बच्चे और मृत्युदर पर नज़र दौड़ायें तो इस रोग को समझने और सही उपाय करने की आवश्यकता से इंकार नहीं कर सकते। हमारे देश में लाखों की सँख्या में बच्चे साल भर इससे ग्रसित होकर मरते हैं।





कैसे फैलता है यह रोग

फीको-ओरल यानि की मल से मुख तक
जाहिर सी बात है हाथ धोने में लापरवाही, गंदा ( प्रदूषित) पानी या खाना खाने से, किसी रोगी के मल से किसी तरह संपर्क में आने से यह रोग फैलता है। इस वायरस की संक्रमण शक्ति लाजवाब है,ज़रा सी लापरवाही से रोग फैल जाता है।

आक्रमण प्रणाली
रोटावायरस सबसे पहले अंतड़ी के अस्तर पर लगी कोशिकाओं को संक्रामित करती हैं। वहाँ यह एन्डोटॉक्सिन बना कर दस्त की शुरुआत करती है। बच्चे को दस्त से पहले अक्सर उल्टी की शिकायत होती है। उल्टी और दस्त की बारंबारता इतनी अधिक होती है कि शरीर में पानी कम होने लगता है। पानी की कमी ही मृत्यु का मुख्य कारण बनती है। एंडोटॉक्सिन बना लेने पर बात खत्म नहीं होती। यह कोशिकाओं को इस तरह नुकसान पहुँचाती है कि सादा आहार भी पचा पाना मुश्किल हो जाता है। शरीर में यह बहुत तेज़ी से फैलती हैं और फिर दुगुने जोश से आक्रमण करती हैं।

अगर बच्चे को इससे पहले कभी यह संक्रमण हो चुका हो तो उसकी रोग प्रतिकारक शक्ति तुरंत पहचान लेती है। बचाव की रणनीति की वजह से पहली बार के संक्रमण जितना असर फिर नहीं दिखता। यही वजह है कि बड़ों में इसका असर होने पर भी तकलीफ कम होती है।




लक्षण

जुकाम जैसे लक्षण
हल्का बुखार
उल्टियाँ
दस्त

रोटावायरस की सबसे खास बात दस्त का बारंबार होना है...इतनी बार की पानी शरीर में कम हो जाता है। संक्रमित होने के दो दिन बाद लक्षण दिखने लगते हैं।

कोशिकाओं को नुकसान पहुँचने की वजह से दूध पचाने वाले एन्ज़ाइम पर खास असर पड़ता है। ऐसे में दूध देने पर दस्त की तकलीफ बहुत बढ़ जाती है।
यह तकलीफ रोग के हटने के बाद भी एक दो हफ्ते तक देखी जा सकती है।



जाँच
दस्त में रोटावायरस ए की जाँच की जाती है। इसे अधिकतर स्थानें में एन्ज़ाइम इम्यूनऐसे नाम की तकनीक से करते हैं।


इलाज

इसका कोई खास इलाज सँभव नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण है शरीर में पानी की कमी ना होने देना। वक्त पर अस्पताल पहुँचना, ओ आर एस का घोल, उल्टी की दवा....वगैरह। बच्चे के अंदर नमक की मात्रा में फेर बदल, पानी की कमी और रक्त में ग्लूकोस की मात्रा पर विशेष ध्यान देना पड़ता है। चूँकि लक्षण बहुत तेज़ी से बढ़ते हैं समय पर अस्पताल पहुँचाना बहुत जरूरी है। कभी कबार इससे दिमाग पर भी असर पड़ सकता है। किंतु अधिकतर सही समय पर ध्यान देने पर जान बिना किसी और समस्या के बचाई जा सकती है

रोटावायरस कई देशों में डिसंबर से फरवरी के महीनों में होता है किंतु भारत में साल भर देखा जाता है।

http://www.youtube.com/watch?v=aaxcmEvfnDY


रोटावायरस की रस्सी (Rotavirus vaccine)

सन 2006 में इस रोग से लड़ने के लिए दो टीके बाज़ार में आये। ग्लैक्सोस्मितक्लाइन की रोटारिक्स और मर्क्ख की रोटाटेक़ (Rotarix by GlaxoSmithKline and RotaTeq by Merck) दोनो ही ओरल (मुँह से) लेने वाली हैं और इनमें रोगमुक्त जीवित वायरस हैं।


यह रोग सभी देशों में पाया जाता है। साधारण तापमान में यह वायरस बचा रहता है। सामान्य साफ सफाई भी इसका नुकसान नहीं पहुँचाती। बहुत कम मात्रा में भी यह बच्चे को गँभीर तरह से संक्रमित कर सकता है।

हम क्या कर सकते हैं-
1. साबुन से ठीक से हाथ धोना

यह अकेली एक आदत इतनी आसानी से बचाव कर सकती है की आश्चर्य होता है। रोगी के घर पर होने पर खास ध्यान देना बेहद जरूरी है।

2.प्रदूषित पानी और खाने से दूर रहना
3. रोटावायरस का ठीका लगवाना

जाहिर है इस ठीके की अहमियत पाँच साल के भीतर सबसे अधिक है। (रोटावायरस का ठीका लगाने पर रोग की संक्रमण शक्ति घटती है। या तो बच्चा इससे ग्रसित नहीं होता या फिर इसके लक्षण इतने तीव्र नहीं होते।)
4. अगर इन सबके बावजूद भी अगर यह रोग हो जाये तो समय पर डॉक्टर की सलाह अत्यावश्यक है।

ALL PICTURES AND VIDEOS HAVE BEEN USED PURELY FOR EDUCATIONAL PURPOSES,IF THERE IS ANY COPYRIGHT VIOLATION PLEASE INFORM THEY WILL BE REMOVED IMMEDIATELY.