Thursday 27 August 2009

स्वाइन फ्लू

करीबन दो महीने से स्वाइन फ्लू पर लिखने की चेष्ठा कर रही हूँ। लिख नहीं रही। कहीं दूर से बैठे किसी ग्राफ का विश्लेषण करने जैसे लग रहा था। बच्चे रोज़ अस्पताल आ रहे थे। सर्दी खाँसी आम सी बात थी। पर स्वाइन फ्लू कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। आने वाली आफत और सामने वाली आफत में भारी फर्क है। एक को हम बिल्कुल नहीं जानते और दूसरे से जूझने के सिवा चारा नहीं होता। जिस बात से हम अनिभिज्ञ हैं हम उससे अपने सारे जाने अनजाने डर जोड़ देते हैं। स्वाइन फ्लू से जब नज़र मिलाई तो महसूस हुआ इसका चेहरा इतना विकृत भी नहीं।




सर्दी, खाँसी और फ्लू




साधारण सर्दी खाँसी और फ्लू में बहुत सारी बातें एक सी हैं। किसी भी वायरस के संक्रमण पर शरीर उसे बाहर फेंकने की कोशिश करता है। खाँसना, छींकना, जाड़ा, उल्टियाँ यह सब इसमें मदद करती हैं। साधारण सर्दी जुकाम के लक्षण नाक के आसपास होते हैं। इनके लिए जिम्मेदार होते हैं नोस वायरसस। रेस्पिरेटरी सिनसायटियल वायरस खास तौर पर जिम्मेदार माना गया है। कभी कबार इनफ्लूएंज़ा वायरस भी सर्दी खाँसी के जिम्मेदार हो सकते हैं। कॉमन कोल्ड के मुख्य लक्षण नाक बंद होना, छींके आना और नाक का बहना है। बड़े लोगों और बड़े बच्चों में बुखार अक्सर नहीं आता। छोटे बच्चों में 100 से 102 फैरनहीट जितना बुखार आता है। गले में खराश अक्सर पाई जाती है पर गला खराब नहीं होता और उसमे लाली नही दिखती। साल भर में बच्चों में तीन से आठ बार तक सर्दी खाँसी हो सकती है। ठंडी और बरसात के मौसम में इसकी संभावना अधिक हो जाती है। बहती हुई नाक में यह वायरस बड़ी संख्या मे होता है। खाँसने, छींकने, नाक साफ करने पर, किसी संक्रमित जगह छूने के बाद चेहरा छूने पर यह वायरस फैलता है। सर्दी के वायरस के संपर्क में आने के एक से पाँच दिन के भीतर लक्षण शुरु हो जाते हैं। एक से तीन दिन में नाक से बहता पानी, हरे या पीले रंग का हो जाता है। बच्चों के कान के पर्दे लाल हो जाते हैं। करीबन सात दिन में सर्दी का असर खत्म हो जाता है।

साधारण सर्दी के सभी लक्षण गले से ऊपर के हिस्से में होते हैं। फ्लू का असर पूरे शरीर पर होता है। फ्लू इन्फ्लूएंज़ा वायरस से होता है। अधिकतर सभी को साल में एक से तीन बार तक हो सकता है। साथ में तेज बुखार होता है - बच्चों में भी और बड़ों में भी। इसके लक्षणों से तकलीफ तो होती है किंतु यह कोई भयानक रोग नहीं है। फ्लू में अचानक से तेज़ बुखार आ जाता है (102-106), चेहरा लाल , गाल सुर्ख हो जाते हैं,शरीर में दर्द उठता है ,थकान होती है और ऊर्जा की कमी महसूस होती है। कभी कबार चक्कर भी आते हैं और उल्टियाँ भी हो सकती हैं। बुखार एक दो दिन तक रहता है और कभी कबार पाँच दिन तक भी। दूसरे दिन से शरीर की तकलीफ कम होने लगती है और श्वास से संबंधित तकलीफ बढ़ जाती है। यह वायरस जहाँ केन्द्रित होते है उसके अनुसार् सर्दी, खाँसी, गले मे दर्द ,कान मे इंफेक्श्न, ब्रोंकिओलिटिस या नयूमोनिया के लक्षण दर्दी मे पाये जाते है। फ्लू का सबसे आम लक्षण है सूखी खांसी आना। अधिकतर लोगो मे सरदर्द और गले का लाल होना भी शामिल है। नाक का बहना और छींके आना भी आम है। यह सभी लक्षण चार से सात दिन के भीतर बेह्तर हो जाते है। कभी कभी इस दौरान बुखार फिर चड़ने लगता है। हफ्तों तक फ्लू से उत्पन्न कमज़ोरी रह सकती है। दर्दी सर्दी, खांसी से इस वायरस के सपर्क मे आते है। एक से सात दिन मे लक्षण दिखने शुरु होते है। हवा मे फैलने की वजह से फ्लू की संक्रमण शक्ति बेहद अधिक होती है। देखते ही देखते बडी संख्या मे बहुत लोग एक साथ बीमार हो जाते है।

फ्लू वैक्सीन



फ्लू से जूझने के लिये फ्लू वैक्सीन उप्लब्ध है। यह वैक्सीन किसी भी साल मे हुए फ्लू वायरस के स्ट्रैन पर आधारित है। जब फ्लू के नये स्ट्रैन होते है तो यह वैक्सीन कारगर नही रहती। जाहिर है कुछ सालो मे यह वैक्सीन बाकी सालों के मुकाबले अधिक कारगर रहती है।
फ्लू के स्ट्रैन में परिवर्तन होने पर यह घातक रूप धारण कर सकती है। इस शतक के शुरु मे इससे काफी जानलेवा महामारी फैली थी। ऐसी ही महामारी बीच बीच मे फैलती रहती है। साधारण तौर पर भी अकेले अमेरिका मे ही करीबन तीस से चालीस हज़ार लोग इससे ग्रस्त होकर जान से हाथ धो बैठते है। जिन लोगो मे पहले से कोई कमज़ोरी होती है वो गभीर रूप से बीमार हो सकते है। अगर काफी कम या ज़्यादा उम्र , कैंसर या डायबिटिस जैसे रोग, श्वास संबंधित रोग वगैरह हों तो इसका संक्रमण अधिक जोर पकड़ता है।


फ्लू और फ्लू महामारी

जब से मेक्सिको में स्वाइन फ्लू वायरस की खबर मिली इसमें महामारी फैलाने की क्षमता का अंदेशा होने लगा। दक्षिणी और उत्तरी गोलार्ध में फ्लू का मौसम अलग अलग समय है। फ्लू वायरस लगातार बदलते हैं। और इसीलिए दोनो गोलार्ध में एक से वायरस नहीं पाये जाते। महामारी फैलाने वाले फ्लू वायरस का आचरण साधारण फ्लू वायरस की तरह नहीं होता। यह उससे अधिक घातक होते हैं। अधिक आसानी से संक्रमित करते हैं। सही परिस्थिति में चिड़िया, सूअर वदैरह के फ्लू वायरस के जीन ह्यूमन फ्लू वायरस का अंश बन जाते हैं। चूँकि हमारी रोगप्रतिकारक शक्ति को इसका कोई परिचय नहीं होता, उसका प्रतिकार सक्षम नहीं होता। ऐसे में फ्लू वायरस शरीर पर आसानी से कब्जा जमा सकता है।

फ्लू वायरस के कितने प्रकार

तीन प्रकार। ए, बी, सी। ए से अधिकतर फ्लू के केसस होते हैं। सी के लक्षण बेहद कम होते हैं और यह पाया भी सबसे कम जाता है।

ए- इसमें 16 H और 9 N प्रकार शामिल हैं। H का मतलब हीमअग्लूटिनिन, N का मतलब न्यूरामिनिडेस। यह वायरस पर पाये जाने वाले डाँचे हैं जिनसे इनकी पहचान सँभव है। बर्ड फ्लू का वायरस है H5N1 । मनुष्यों में फिलहाल जो तीन वायरस फ्लू फैला रहे हैं वे हैं ए वायरस( two A viruses) – (A) H1N1 और (A)H3N2 – तथा एक बी (B ) वायरस. इंसानों में जो H1N1 वायरस पाया जाता है वो सवाइन फ्लू के H1N1 वायरस से अलग है।

महामारी का मतलब जानलेवा नहीं

यह समझना बेहद जरूरी है कि महामारी का मतलब जानलेवा बीमारी नहीं है। WHO ने जब स्वाइन फ्लू को महामारी कहा उनका तात्पर्य इस वायरस के फैलने की तेज़ी और क्षमता से था। दोनो गोलार्ध में एक साथ पाया जाना, मौसम और तापमान से संबन्ध ना होना - यह बातें इसे महामारी बनाती हैं।

फ्लू सर्दी के मौसम में अधिक क्यों
-अधिक समय घर के अंदर, धूप से दूर
-विटामिन डी की कमी
-हवा में सीलन की कमी जिससे श्वास के अवयव शुष्क जाते हैं और रोगाणु आसानी से पकड़ पा लेते हैं

क्या हाल की फ्लू वैक्सीन आपकी रक्षा करने में सक्षम है

मनुष्यों और स्वाइन फ्लू में पाया गया H1N1 स्ट्रैन एक दूसरे से काफी अलग है इसलिए यह कहना मुष्किल है कि हाल की वैक्सीन कितनी सुरक्षा दे सकता है।

फिर भी 65 से ऊपर के सभी, आरोग्य कार्यकर्ता, हृदय संबंधित रोगों,डायबीटिस, अस्थमा से पीड़ित लोगों का, गर्भवति स्त्री वगैरह का इस वैक्सीन का लेना जायज़ है। CDC (Centre of Disease Control) के हाल के निर्देश के हिसाब से सभी को खास तौर से बच्चों को यह वैक्सीन लेनी चाहिए।

फ्लू से स्वस्थ नौजवानों की मृत्यु क्यों

सही कारण मालूम नहीं है। किंतु अंदेशा लगाया जाता है कि इसका कारण सायटोकीन स्टार्म (cytokine storm) है। फ्लू के वायरस के दावा बोलते ही रोग प्रतिकारक शक्ति पूरी सेना उसके खिलाफ छोड़ देती है। इससे बुखार, शरीर में दर्द और अवयवों का विफल होना शुरु हो जाता है। वायरस की साफ पहचान ना होने की वजह से उसका बाल भी बाँका नहीं होता।

फिर भी यह कहना गलत होगा कि फ्लू से अधिक नौजवानों की मौत होती है। मृत में 90 फीसदी लोग 65 की उम्र के ऊपर पाये जाते हैं।

क्या वजह है कि फ्लू वायरस की इतनी दहशत है

वायरस जीव और निर्जीव के बीच की एक अवस्था है। कालांतर से यह बदलते जा रहे हैं। खुद के जैसों के उत्पादन में यह लगातार भूल करते हैं। जो भूल जिंदा रहने में सक्षम होती है आगे बड़ जाती है। यह हवा में धूल की तरह फैल कर शरीर तक पहुँचते हैं और वहाँ पहुँच कर सँख्या में बढ़ते हैं और दावा बोल देते हैं। यह इतनी जल्दि और लगातार बदलते हैं कि शरीर के लिए इनकी पूरी पहचान सँभव नहीं हो पाती। शरीर हर बार इसका नया रूप देखता है। जब तक वह खुद को इससे लड़ने को तैयार करता है यह फिर बदल जाता है।
H प्रोटीन इसे गले, श्वास नलियों की कोशिकाओं में चिपकने में मदद करता है और N प्रोटीन इन कोशिकाओ में पनप कर इन्हे तोड़ कर बाहर निकल बाकी कोशिकाओं पर हमला करने में सँभव।

टैमीफ्लू जैसी दवा इन HN प्रोटीन्स पर हमला करते हैं । किंतु अगर इनका डाँचा और बदल जाये तो जरूरी नहीं कि यह सक्षम रह सके।


ये कहाँ आ गये हम साथ साथ चलते




स्वाइन फ्लू एक महामारी है
स्वाइन फ्लू साधारण तौर पर जानलेवा नहीं है
स्वाइन फ्लू जानलेवा बन सकती है
फ्लू के बाकी वायरस की तरह ही यह भी हवा में और हवा से फैलती है
खाँसने, छींकने और बहती नाक हाथ से पोँछने से वायरस को फैलने में आसानी होती है
कड़ी धूप में यह नहीं पनप सकती
साबुन और पानी के सामन नहीं टिक सकती
बंद कमरे , भीड़ , सफाई की कमी में यह जोर पकड़ती है
स्वस्थ शरीर में अक्सर नहीं टिक पाती है
यह बदल रही है....बुरे के लिए भी हो तसकता है और अच्छे के लिए भी
वैक्सीन की खोज समझो पूरी हुई
वैक्सीन के आते ही वायरस बदलेगा नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं

हम क्या करें...क्या कर सकते हैं










1. साफ सफाई रखें और नियमित हाथ धोये।
2.चेहरे पर बेवजह बार बार हाथ ना ले जाये
3. सर्दी खाँसी होने पर टिश्यू इस्तेमाल करें, नहीं तो बाँह ;और टिश्यू को लोगों के संपर्क में ना आने दें
4.सात से आठ घँटों की नींद, अच्छा भोजन जिसमें विटामिन सी और डी पर्याप्त मात्रा में हो
5.घर में धूप आने दें, ठंड से बचें और भीड़ में ना जायें
6.मास्क एक बैरियर का काम कर सकता है और भीड़ में आपके श्वास अवयवों तक वायरस को पहुँचने से रोक सकता है।
अगर घर में कोई स्वाइन फ्लू से ग्रसित है तो उसे एक कमरे तक सीमित रखें और कम से कम लोगों के संपर्क में उसे आने दें।
7. पर्याप्त मात्रा में पानी पियें।
8.हल्की सर्दी खाँसी का घर रह कर ही उपचार करें।
9. फ्लू के लक्षण दिखने पर अस्पताल से संपर्क करें और सिर्फ दर्दी को अस्पताल ले जायें।
10. स्वाइन फ्लू जानलेवा नहीं है और इसीलिए साधारण इलाज से भी बेहतर हो सकती है।
11. श्वास संबंधित लक्षणों के दिखने पर ( तेज साँस चलना, साँस लेने में तकलीफ होना), लगातार बहुत तेज बुखार होने पर, बेहोशी की अवस्था होने पर, या और कोई भी चिंताजनक गँभीर लक्षण दिखने पर देरी ना करें और डॉक्टर से मिलें।




स्वाइन फ्लू और मेरा अनुभव

स्वाइन फ्लू के केस अब नई बात नहीं रह गई है। करीबन पाँच कनफर्म्ड केस देखे हैं, सभी पाँच साल से छोटे, तीन बच्चे दो साल से छोटे। दो को टैमीफ्लू नहीं दिया गया था और बाकी को दिया गया था। सभी स्वस्थ हैं। मैं भी....अब तक। :-))

हर बीमारी हमारी अवस्था का बखान करती है। बीमारी से पता चलता है समाज की अवस्था का। प्लेग से दौड़ते चूहे याद आते हैं और एड्स से नैतिकता पर सवाल उठता है। कोलेरा से पीने के पानी की और ध्यान जाता है और मलेरिया से जमे हुए पानी पर। डायबिटिस और ब्लडप्रऐशर से जंक फुड्स की बाढ़ याद आती है।

स्वाइन फ्लू गरीबों और अमीरों दोनो पर हावी है-
गरीब कमज़ोर है, साफ नहीं है, भीड़ में रहता है, अच्छे खाने से वँचित है
अमीर ए सी गाड़ियों और घरों में रहता है,धूप से दूर रहता है हाथ धोने से ज्यादा टिश्यू पोंछने में विश्वास रखता है, देश विदेश जा सकता है और इन वायरस के संपर्क में आता है....

इलाज और रस्सी तक हम पहुँच ही गये हैं......हवादार कमरे, हाय से नमस्ते, साफ सुथरे हो जायें तो जीवित वायरस को निर्जीव करना इतना मुश्किल भी नहीं।

और जानकारी पाने के लिए http://www.cdc.gov/h1n1flu/