<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-6012202322442671087</id><updated>2012-01-16T13:34:41.568-08:00</updated><title type='text'>स्पंदन</title><subtitle type='html'>डॉक्टर की डेस्क से</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Beji</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16964389992273176028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://thumb18.webshots.net/t/16/16/4/0/43/2989400430101162518uaiKLi_th.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>27</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6012202322442671087.post-7603156756620307609</id><published>2009-08-27T03:32:00.000-07:00</published><updated>2009-08-27T04:02:02.565-07:00</updated><title type='text'>स्वाइन फ्लू</title><content type='html'>करीबन दो महीने से स्वाइन फ्लू पर लिखने की चेष्ठा कर रही हूँ। लिख नहीं रही। कहीं दूर से बैठे किसी ग्राफ का विश्लेषण करने जैसे लग रहा था। बच्चे रोज़ अस्पताल आ रहे थे। सर्दी खाँसी आम सी बात थी। पर स्वाइन फ्लू कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। आने वाली आफत और सामने वाली आफत में भारी फर्क है। एक को हम बिल्कुल नहीं जानते और दूसरे से जूझने के सिवा चारा नहीं होता। जिस बात से हम अनिभिज्ञ हैं हम उससे अपने सारे जाने अनजाने डर जोड़ देते हैं। स्वाइन फ्लू से जब नज़र मिलाई तो महसूस हुआ इसका चेहरा इतना विकृत भी नहीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SpDkyb00atI/AAAAAAAAD5U/ko_uGTf-H5Q/s1600-h/flu+virus.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 284px; height: 320px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SpDkyb00atI/AAAAAAAAD5U/ko_uGTf-H5Q/s320/flu+virus.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5373045910566890194" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सर्दी, खाँसी और फ्लू&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SpZeSd8nMbI/AAAAAAAAD58/pPWMy5gURcI/s1600-h/how-to-catch-the-flu.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 329px; height: 400px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SpZeSd8nMbI/AAAAAAAAD58/pPWMy5gURcI/s400/how-to-catch-the-flu.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5374586876682777010" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साधारण सर्दी खाँसी और फ्लू में बहुत सारी बातें एक सी हैं। किसी भी वायरस के संक्रमण पर शरीर उसे बाहर फेंकने की कोशिश करता है। खाँसना, छींकना, जाड़ा, उल्टियाँ यह सब इसमें मदद करती हैं। साधारण सर्दी जुकाम के लक्षण नाक के आसपास होते हैं। इनके लिए जिम्मेदार होते हैं नोस वायरसस। रेस्पिरेटरी सिनसायटियल वायरस खास तौर पर जिम्मेदार माना गया है। कभी कबार इनफ्लूएंज़ा वायरस भी सर्दी खाँसी के जिम्मेदार हो सकते हैं। कॉमन कोल्ड के मुख्य लक्षण नाक बंद होना, छींके आना और नाक का बहना है। बड़े लोगों और बड़े बच्चों में बुखार अक्सर नहीं आता। छोटे बच्चों में 100 से 102 फैरनहीट जितना बुखार आता है। गले में खराश अक्सर पाई जाती है पर गला खराब नहीं होता और उसमे लाली नही दिखती। साल भर में बच्चों में तीन से आठ बार तक सर्दी खाँसी हो सकती है। ठंडी और बरसात के मौसम में इसकी संभावना अधिक हो जाती है। बहती हुई नाक में यह वायरस बड़ी संख्या मे होता है। खाँसने, छींकने, नाक साफ करने पर, किसी संक्रमित जगह छूने के बाद चेहरा छूने पर यह वायरस फैलता है। सर्दी के वायरस के संपर्क में आने के एक से पाँच दिन के भीतर लक्षण शुरु हो जाते हैं। एक से तीन दिन में नाक से बहता पानी, हरे या पीले रंग का हो जाता है। बच्चों के कान के पर्दे लाल हो जाते हैं। करीबन सात दिन में सर्दी का असर खत्म हो जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साधारण सर्दी के सभी लक्षण गले से ऊपर के हिस्से में होते हैं। फ्लू  का असर पूरे शरीर पर होता है। फ्लू इन्फ्लूएंज़ा वायरस से होता है। अधिकतर सभी को साल में एक से तीन बार तक हो सकता है। साथ में तेज बुखार होता है - बच्चों में भी और बड़ों में भी। इसके लक्षणों से तकलीफ तो होती है किंतु यह कोई भयानक रोग नहीं है। फ्लू में अचानक से तेज़ बुखार आ जाता है (102-106), चेहरा लाल , गाल सुर्ख हो जाते हैं,शरीर में दर्द उठता है ,थकान होती है और ऊर्जा की कमी महसूस होती है। कभी कबार चक्कर  भी आते हैं और उल्टियाँ भी हो सकती हैं। बुखार एक दो दिन तक रहता है और कभी कबार पाँच दिन तक भी। दूसरे दिन से शरीर की तकलीफ कम होने लगती है और श्वास से संबंधित तकलीफ बढ़ जाती है। यह  वायरस जहाँ केन्द्रित होते है उसके अनुसार् सर्दी, खाँसी, गले मे दर्द ,कान मे इंफेक्श्न, ब्रोंकिओलिटिस या नयूमोनिया के लक्षण दर्दी मे पाये जाते है। फ्लू का सबसे आम लक्षण है सूखी खांसी आना। अधिकतर लोगो मे सरदर्द और गले का लाल होना भी शामिल है। नाक का बहना और छींके आना भी आम है। यह सभी लक्षण चार से सात दिन के भीतर बेह्तर हो जाते है। कभी कभी इस दौरान बुखार फिर चड़ने लगता है। हफ्तों तक फ्लू से उत्पन्न कमज़ोरी रह सकती है। दर्दी सर्दी, खांसी से इस वायरस के सपर्क मे आते है। एक से सात दिन मे लक्षण दिखने शुरु होते है। हवा मे फैलने की वजह से फ्लू की संक्रमण शक्ति बेहद अधिक होती है। देखते ही देखते बडी संख्या मे  बहुत लोग एक साथ बीमार हो जाते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;फ्लू वैक्सीन&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SpZdSOCi_II/AAAAAAAAD50/lyxE9YsFZyc/s1600-h/flow_chart.gif"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 257px; height: 400px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SpZdSOCi_II/AAAAAAAAD50/lyxE9YsFZyc/s400/flow_chart.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5374585772901072002" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;फ्लू से जूझने के लिये फ्लू वैक्सीन उप्लब्ध है। यह वैक्सीन किसी भी साल मे हुए फ्लू वायरस के स्ट्रैन पर आधारित है। जब फ्लू के नये स्ट्रैन होते है तो यह वैक्सीन कारगर नही रहती।  जाहिर है कुछ सालो मे यह वैक्सीन बाकी सालों के मुकाबले अधिक कारगर रहती है।&lt;br /&gt;फ्लू के स्ट्रैन में परिवर्तन होने पर यह घातक रूप धारण कर सकती है। इस शतक के शुरु मे इससे काफी जानलेवा महामारी फैली थी। ऐसी ही महामारी बीच बीच मे फैलती रहती है। साधारण तौर पर भी अकेले अमेरिका मे ही करीबन तीस से चालीस हज़ार लोग इससे ग्रस्त होकर जान से हाथ धो बैठते है। जिन लोगो मे पहले  से कोई कमज़ोरी होती है वो गभीर रूप से बीमार हो सकते है। अगर काफी कम या ज़्यादा उम्र , कैंसर या डायबिटिस जैसे रोग, श्वास संबंधित रोग वगैरह हों तो इसका संक्रमण अधिक जोर पकड़ता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;फ्लू और फ्लू महामारी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब से मेक्सिको में स्वाइन फ्लू वायरस की खबर मिली इसमें महामारी फैलाने की क्षमता का अंदेशा होने लगा। दक्षिणी और उत्तरी गोलार्ध में फ्लू का मौसम अलग अलग समय है। फ्लू वायरस लगातार बदलते हैं। और इसीलिए दोनो गोलार्ध में एक से वायरस नहीं पाये जाते। महामारी फैलाने वाले फ्लू वायरस का आचरण साधारण फ्लू वायरस की तरह नहीं होता। यह उससे अधिक घातक होते हैं। अधिक आसानी से संक्रमित करते हैं। सही परिस्थिति में चिड़िया, सूअर वदैरह के फ्लू वायरस के जीन ह्यूमन फ्लू वायरस का अंश बन जाते हैं। चूँकि हमारी रोगप्रतिकारक शक्ति को  इसका कोई परिचय नहीं होता, उसका प्रतिकार सक्षम नहीं होता। ऐसे में फ्लू वायरस शरीर पर आसानी से कब्जा जमा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;फ्लू वायरस के कितने प्रकार&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीन प्रकार। ए, बी, सी। ए से अधिकतर फ्लू के केसस होते हैं। सी के लक्षण बेहद कम होते हैं और यह पाया भी सबसे कम जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ए- इसमें 16 H और 9 N  प्रकार शामिल हैं।  H का मतलब हीमअग्लूटिनिन, N का मतलब न्यूरामिनिडेस। यह वायरस पर पाये जाने वाले डाँचे हैं जिनसे इनकी पहचान सँभव है। बर्ड फ्लू का वायरस है H5N1 । मनुष्यों में फिलहाल जो तीन वायरस फ्लू फैला रहे  हैं वे हैं ए वायरस( two A viruses) – (A) H1N1 और (A)H3N2 – तथा एक बी (B ) वायरस. इंसानों में जो H1N1 वायरस पाया जाता है वो सवाइन फ्लू के H1N1 वायरस से अलग है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;महामारी का मतलब जानलेवा नहीं&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह समझना बेहद जरूरी है कि महामारी का मतलब जानलेवा बीमारी नहीं है। WHO ने जब स्वाइन फ्लू को महामारी कहा उनका तात्पर्य  इस वायरस के फैलने की तेज़ी और क्षमता से था। दोनो गोलार्ध में एक साथ पाया जाना, मौसम और तापमान से संबन्ध ना होना - यह बातें इसे महामारी बनाती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ्लू सर्दी के मौसम में अधिक क्यों&lt;br /&gt; -अधिक समय घर के अंदर, धूप से दूर&lt;br /&gt; -विटामिन डी की कमी&lt;br /&gt; -हवा में सीलन की कमी जिससे श्वास के अवयव शुष्क जाते हैं और रोगाणु आसानी से पकड़ पा लेते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;क्या हाल की फ्लू वैक्सीन आपकी रक्षा करने में सक्षम है&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मनुष्यों और स्वाइन फ्लू में पाया गया H1N1 स्ट्रैन एक दूसरे से काफी अलग है इसलिए यह कहना मुष्किल है कि हाल की वैक्सीन कितनी सुरक्षा दे सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर भी 65 से ऊपर के सभी, आरोग्य कार्यकर्ता, हृदय संबंधित रोगों,डायबीटिस, अस्थमा से पीड़ित लोगों का, गर्भवति स्त्री वगैरह का इस वैक्सीन का लेना जायज़ है। CDC (Centre of Disease Control) के हाल के निर्देश के हिसाब से सभी को खास तौर से बच्चों को  यह वैक्सीन लेनी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;फ्लू से स्वस्थ नौजवानों की मृत्यु क्यों&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;सही कारण मालूम नहीं है। किंतु अंदेशा लगाया जाता है कि इसका कारण सायटोकीन स्टार्म (cytokine storm) है। फ्लू के वायरस के दावा बोलते ही रोग प्रतिकारक शक्ति पूरी सेना उसके खिलाफ छोड़ देती है। इससे बुखार, शरीर में दर्द और अवयवों का विफल होना शुरु हो जाता है। वायरस की साफ पहचान ना होने की वजह से उसका बाल भी बाँका नहीं होता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर भी यह कहना गलत होगा कि फ्लू से अधिक नौजवानों की मौत होती है। मृत में 90 फीसदी लोग 65 की उम्र के ऊपर  पाये जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;क्या वजह है कि फ्लू वायरस की इतनी दहशत है&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वायरस जीव और निर्जीव के बीच की एक अवस्था है। कालांतर से यह बदलते जा रहे हैं। खुद के जैसों के उत्पादन में यह लगातार भूल करते हैं। जो भूल जिंदा रहने में सक्षम होती है आगे बड़ जाती है। यह हवा में धूल की तरह फैल कर शरीर तक पहुँचते हैं और वहाँ पहुँच कर सँख्या में बढ़ते हैं और दावा बोल देते हैं। यह इतनी जल्दि और लगातार बदलते हैं कि शरीर के लिए इनकी पूरी पहचान सँभव नहीं हो पाती।  शरीर हर बार इसका नया रूप देखता है। जब तक वह खुद को इससे लड़ने को तैयार करता है यह फिर बदल जाता है।&lt;br /&gt;H प्रोटीन इसे गले, श्वास नलियों की कोशिकाओं में चिपकने में मदद करता है और N प्रोटीन इन कोशिकाओ में पनप कर इन्हे तोड़ कर बाहर निकल बाकी कोशिकाओं पर हमला करने में सँभव। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टैमीफ्लू जैसी दवा इन HN प्रोटीन्स पर हमला करते हैं । किंतु अगर इनका डाँचा और बदल जाये तो जरूरी नहीं कि यह सक्षम रह सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;ये कहाँ आ गये हम साथ साथ चलते&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SpDkkbMyhhI/AAAAAAAAD5M/tiCuGZQYCUI/s1600-h/swine-flu.gif"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 254px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SpDkkbMyhhI/AAAAAAAAD5M/tiCuGZQYCUI/s320/swine-flu.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5373045669880825362" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वाइन फ्लू एक महामारी है&lt;br /&gt;स्वाइन फ्लू साधारण तौर पर जानलेवा नहीं है&lt;br /&gt;स्वाइन फ्लू जानलेवा बन सकती है&lt;br /&gt;फ्लू के बाकी वायरस की तरह ही यह भी हवा में और हवा से फैलती है&lt;br /&gt;खाँसने, छींकने और बहती नाक हाथ से पोँछने से वायरस को फैलने में आसानी होती है&lt;br /&gt;कड़ी धूप में यह नहीं पनप सकती&lt;br /&gt;साबुन और पानी के सामन नहीं टिक सकती&lt;br /&gt;बंद कमरे , भीड़ , सफाई की कमी में यह जोर पकड़ती है&lt;br /&gt;स्वस्थ शरीर में अक्सर नहीं टिक पाती है&lt;br /&gt;यह बदल रही है....बुरे के लिए भी हो तसकता है और अच्छे के लिए भी&lt;br /&gt;वैक्सीन की खोज समझो पूरी हुई&lt;br /&gt;वैक्सीन के आते ही वायरस बदलेगा नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;हम क्या करें...क्या कर सकते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SpDkVc251YI/AAAAAAAAD5E/IwQaLe2FApg/s1600-h/3Cs+to+prevent+flu.jpg.png"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 306px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SpDkVc251YI/AAAAAAAAD5E/IwQaLe2FApg/s320/3Cs+to+prevent+flu.jpg.png" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5373045412627862914" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1. साफ सफाई रखें और नियमित हाथ धोये।&lt;br /&gt;2.चेहरे पर बेवजह बार बार हाथ ना ले जाये&lt;br /&gt;3. सर्दी खाँसी होने पर टिश्यू इस्तेमाल करें, नहीं तो बाँह ;और टिश्यू को लोगों के संपर्क में ना आने दें&lt;br /&gt;4.सात से आठ घँटों की नींद, अच्छा भोजन जिसमें विटामिन सी और डी पर्याप्त मात्रा में हो&lt;br /&gt;5.घर में धूप आने दें, ठंड से बचें और भीड़ में ना जायें&lt;br /&gt;6.मास्क एक बैरियर का काम कर सकता है और भीड़ में आपके श्वास अवयवों तक वायरस को पहुँचने से रोक सकता है।&lt;br /&gt;अगर घर में कोई स्वाइन फ्लू से ग्रसित है तो उसे एक कमरे तक सीमित रखें और कम से कम लोगों के संपर्क में उसे आने दें। &lt;br /&gt;7. पर्याप्त मात्रा में पानी पियें।&lt;br /&gt;8.हल्की सर्दी खाँसी का घर रह कर ही उपचार करें।&lt;br /&gt;9. फ्लू के लक्षण दिखने पर अस्पताल से संपर्क करें और सिर्फ दर्दी को अस्पताल ले जायें।&lt;br /&gt;10. स्वाइन फ्लू जानलेवा नहीं है और इसीलिए साधारण इलाज से भी बेहतर हो सकती है।&lt;br /&gt;11. श्वास संबंधित लक्षणों के दिखने पर ( तेज साँस चलना, साँस लेने में तकलीफ होना), लगातार बहुत तेज बुखार होने पर, बेहोशी की अवस्था होने पर, या और कोई भी चिंताजनक गँभीर लक्षण दिखने पर देरी ना करें और डॉक्टर से मिलें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SpDlCBwEsLI/AAAAAAAAD5c/2Hxwslxz-o4/s1600-h/handwashing22.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 250px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SpDlCBwEsLI/AAAAAAAAD5c/2Hxwslxz-o4/s320/handwashing22.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5373046178445570226" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;स्वाइन फ्लू और मेरा अनुभव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वाइन फ्लू के केस अब नई बात नहीं रह गई है। करीबन पाँच कनफर्म्ड केस देखे हैं, सभी पाँच साल से छोटे, तीन बच्चे दो साल से छोटे। दो को टैमीफ्लू  नहीं दिया गया था  और बाकी  को दिया गया था। सभी स्वस्थ हैं।  मैं भी....अब तक। :-))&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर बीमारी हमारी अवस्था का बखान करती है। बीमारी से पता चलता है समाज की अवस्था का। प्लेग से दौड़ते चूहे याद आते हैं और एड्स से नैतिकता पर सवाल उठता है। कोलेरा से पीने के पानी की और ध्यान जाता है और मलेरिया से जमे हुए पानी पर। डायबिटिस और ब्लडप्रऐशर से जंक फुड्स की बाढ़ याद आती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वाइन फ्लू गरीबों और अमीरों दोनो पर हावी है-&lt;br /&gt;गरीब कमज़ोर है, साफ नहीं है, भीड़ में रहता है, अच्छे खाने से वँचित है&lt;br /&gt;अमीर ए सी गाड़ियों और घरों में रहता है,धूप से दूर रहता है हाथ धोने से ज्यादा टिश्यू पोंछने में विश्वास रखता है, देश विदेश जा सकता है और इन वायरस के संपर्क में आता है....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इलाज और रस्सी तक हम पहुँच ही गये हैं......हवादार कमरे, हाय से नमस्ते, साफ सुथरे  हो जायें तो जीवित वायरस को निर्जीव करना इतना मुश्किल भी नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और जानकारी पाने के लिए  http://www.cdc.gov/h1n1flu/&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6012202322442671087-7603156756620307609?l=drbejisdesk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/feeds/7603156756620307609/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6012202322442671087&amp;postID=7603156756620307609&amp;isPopup=true' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/7603156756620307609'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/7603156756620307609'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='स्वाइन फ्लू'/><author><name>Beji</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16964389992273176028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://thumb18.webshots.net/t/16/16/4/0/43/2989400430101162518uaiKLi_th.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SpDkyb00atI/AAAAAAAAD5U/ko_uGTf-H5Q/s72-c/flu+virus.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6012202322442671087.post-2680554026526142018</id><published>2009-04-27T04:47:00.000-07:00</published><updated>2009-04-27T04:49:01.224-07:00</updated><title type='text'>बच्चे के व्यक्तित्व के विकास में माता पिता का योगदान</title><content type='html'>किसी भी बच्चे का लालन पालन बेहद जिम्मेदारी का काम है। माता पिता की भूमिका इसलिए भी बहुत अहम है क्योंकि ना केवल हम बीज देते हैं बल्कि ज़मीन, हवा और ऱौशनी भी हमारी जिम्मेदारी है। एक शिशु ने किस माता पिता से जन्म लिया और किस घर और वातावरण में पला बड़ा ,दोनो बातें उसके व्यक्तित्व पर छाप छोड़ते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सायकोलोजी में एक बेहद दिलचस्प विषय है- ट्राँसैक्शनल अनालिसिस (TRANSACTIONAL aNALYSIS) । इसके अनुसार किसी भी व्यक्ति का व्यक्तित्व तीन खंड़ों ( इगो स्टेट्स) में बाँटा जा सकता है। एडल्ट(वयस्क),चाईल्ड(शिशु) और पेरन्ट(जनक)। 'चाईल्ड' हमारे व्यक्तित्व का शिशु है। नैसर्गिक, निर्दोष, मासूम। यह भावनाओं और अवस्था को ज्यों का त्यों महसूस करता है और उसी के अनुसार प्रतिक्रिया करता है। अनुभव से दूर , और दूरदर्शिता की चिंता बिना का व्यवहार कभी बहुत ही प्यारा और कभी बेहद लापरवाह लगता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ लोग कभी बड़े नहीं होते। मस्त रहते हैं और किसी बात की जिम्मेदारी नहीं लेते। ऐसे लोगों के व्यक्तित्व का एक बड़ा हिस्सा चाईल्ड इगो स्टेट है । जहाँ इनका बिंदास होना सुहाता है,वहीं इनकी लापरवाही खलती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ इस चाईल्ड को बहुत कम अहमियत देते हैं। वक्त से पहले संजीदा,गँभीर, बेहद जिम्मेदार हो जाते हैं। वे जीवन के बदलते रंगों में आत्मा नहीं डुबो पाते और मासूमियत और नये तरीके की सोच और खोज से दूर रहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एडल्ट यानी वयस्क इगो स्टेट हमारे व्यक्तित्व का वह इगो स्टेट है जो समय के साथ बड़ा होता है। अनुभव को अपने व्यक्तित्व में समेट सोच समझ कर व्यवहार करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पेरंट इगो स्टेट हमारे व्यक्तित्व का वो तिहाई हिस्सा है जो हमारे अंदर का जनक है। यह हिस्सा अक्सर बिना किसी फेर बदलाव के हम अपने माता पिता और उन लोगों से जिनका प्रभुत्व हम पर है उनसे ग्रहण करते हैं। और इसीलिए हम अपने माता पिता की तरह चलते हैं, हँसते हैं, खाँसते हैं, त्योहार में कोई खास मिठाई बनाते हैं..किसी खास अंदाज़ में तौलिया रखते हैं, खाने की मेज़ पर बैठते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माता पिता का एक तिहाई हिस्सा हम में यू ही शामिल हो जाता है। सोचने की बात है कि हम जो और जैसे हैं वह हमारे बच्चे का एक तिहाई व्यक्तित्व तय करता है। इसीलिए अपने व्यवहार से सही उदाहरण देना आवश्यक है। हमारे या उसके चाहे अनचाहे उसका व्यक्तित्व इसे आत्मसात कर लेता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे बच्चों में हम जैसे व्यक्तित्व की कामना करते हैं, जरूरी है कि स्वयं हमारे अंदर वैसा व्यक्तित्व हो। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन्ही इगो स्टेट्स के संदर्भ में समझा जा सकता है कि माता पिता की भूमिका एक शिशु को एक योग्य वयस्क बनाना है। और जहाँ हमारा व्यक्तित्व इस पर असर करता है वहीं हम किस वातावरण में इन्हे पालते हैं भी बेहद महत्वपूर्ण है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बच्चों में माता पिता का अंश जरूर है किंतु वह हमारा हिस्सा या फैलाव नहीं हैं। उनकी अपनी एक अनुपम उपस्थिति है जो महज हमारे सपनों का विस्तार नहीं है। उनका अपना एक प्रवाह ,एक गति है.....हमारी जिम्मेदारी उसे सही दिशा और मजबूत किनारे देना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माता पिता जो कहते हैं वह किसी रेकॉर्डड टेप की तरह हमारे जहन में चलता रहता है। क्या करना चाहिए और क्या नहीं की एक लंबी लिस्ट हम सभी के पास रहती है। बचपन से कही सुनी कितनी बातें हमारे मस्तिष्क में चलती रहती हैं। घर के बाहर चप्पल उतारो,सच बोलो, खाना खाते वक्त बात मत करो, ऊपर बैठ कर पाँव मत हिलाओ, टी वी पास से नहीं देखो वगैरह। कई विचार भी हमें विरासत में मिलते हैं। लड़कियाँ ठहाके मार कर नहीं हँसती, लड़के खाना नहीं परोसेंगे, नैप्पी बदलने का काम माँ का है, माँ बाप से सवाल करना बदतमीज़ी है, औरतों के लिए सीट खाली करनी चाहिए, औरतें चुगली करती हैं,परीक्षा के पहले दही खाकर जाना चाहिए। धर्म, लिंग ,देश,रंग के कितने ही पूर्वाग्रह के लिए यह टेप जिम्मेदार हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करेन होर्नी (Karen Horney)नाम की सायकोअनालिस्ट ने टायरेनी ऑफ शुड्स (Tyranny of Shoulds) का विचार रखा था। इसमें इसी टेप का जिक्र है जो हमारे व्यक्तित्व पर राज़ करता है। जाहिर है यह टेप कई गलत कामों को करने से रोकता है। वँही कई बार इस टेप के चलते हम समर्थ, उनमुक्त राय कायम करने में सक्षम नहीं रहते। अगर माँ और पिता की तरफ से मिला टेप अलग अलग बात कहता हो तो बच्चा उलझ भी सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माता पिता होने के नाते हमारा कर्तव्य बनता है कि सही टेप अपने बच्चे तक पहुँचायें। और  उसे खुद सोचने और समझने और अपने निर्णय सही लेने में सक्षम बनाये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टायरेनी ऑफ शुड्स की तरह उसके विचार और व्यक्तित्व को परीमित ना करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमें हमारे बच्चे किस वक्त कहाँ और किस हाल में है जानना जरूरी है। आज़ादी की कोई भी गुहार की वजह से हमें इस बात पर लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए। बच्चा किस के साथ है, टी वी में क्या देख रहा है, कौन सी पुस्तक पढ़ रहा है, किस तरह का संगीत सुन रहा है ...सब जानकारी रखना ना केवल महत्वपूर्ण है बल्कि समय रहते सचेत होने के लिए आवश्यक भी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अच्छे से अच्छा माता पिता भी कुछ भूल करता है। उसमें से एक है कि हम रोज़ किस तरह का संगीत अपने नन्हे मुन्ने के सुपुर्द करते हैं।&lt;br /&gt;एक समय में काफी चला हुआ गाना ज़रा सुनें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;http://www.youtube.com/watch?v=fxx8LA-O1HQ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="344"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/fxx8LA-O1HQ&amp;hl=en&amp;fs=1"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowscriptaccess" value="always"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/fxx8LA-O1HQ&amp;hl=en&amp;fs=1" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" width="425" height="344"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब यह सुनिये&lt;br /&gt;http://www.youtube.com/watch?v=dJOTlpt2_5Y&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="344"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/dJOTlpt2_5Y&amp;hl=en&amp;fs=1"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowscriptaccess" value="always"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/dJOTlpt2_5Y&amp;hl=en&amp;fs=1" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" width="425" height="344"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संगीत में बहुत ताकत होती है। ऐडरेन फ्लेटची. एक स्कौटिश...कहते हैं...तुम इस देश के नियम लिखो...मैं इस देश का संगीत लिखूँगा....और तुम देखोगे कि इस देश पर मैं राज़ करूँगा।&lt;br /&gt;लय और ताल पर सुर में कहे गये शब्दों में बहुत ताकत होती है। रूह में यह शब्द बस जाते हैं। अगर इनमें गलत संदेश है तो गलत संदेश आपका लाड़ला लगातार अपने सिस्टेम में ढ़ालता जाता है। वहीं सही संदेश लयबद्द करके सिखाया जाये तो भी बच्चे तक पहुँच जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज़रा देखें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;http://www.youtube.com/watch?v=amDp4ZQY6w0&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="344"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/amDp4ZQY6w0&amp;hl=en&amp;fs=1"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowscriptaccess" value="always"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/amDp4ZQY6w0&amp;hl=en&amp;fs=1" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" width="425" height="344"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विषय का विस्तार बहुत है। कहने समझने के लिए भी काफी सारे तथ्य। आज के समय इनको जानना बेहद आसान है। पर इन्हे जानकर सही का अनुसरण करना हमेशा की तरह कठिन। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिर्फ समझ लेने से बात नहीं बनती। इन्हे जीवन में उतारने के लिए समय की आवश्यकता है। किसी भी बच्चे तक प्यार शॉर्टकट में नहीं पहुँचाया जा सकता। प्यार की एक अहम माँग समय है..., समय जो साथ बिताया जाये। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन बच्चों ने माँ या बाप खोया है, वह बदनसीब हैं। अनुसरण करने के लिए उनके पास उनके अंदर का शून्य नहीं तो कोई कल्पना या भ्रम ही होता है। भ्रम जो सच का स्थान नहीं ले सकता। वो बच्चे जिनके माँ बाप तो हैं पर जिनके पास अपने बच्चे से मिलने के लिए दिन में ज़रा भी समय नहीं और भी बदनसीब हैं क्योंकि उनके पास कोई मीठा भ्रम भी नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतना यहाँ लिखने के पीछे सिर्फ एक ही आशय है कि हम जान सके हम हमारे बच्चे के विकास में कितने जिम्मेदार है।   माता पिता के मुकाबले अच्छे स्कूल, ट्यूशन, खिलौने, प्लेस्टेशन वगैरह इस योगदान का एक बहुत छोटा हिस्सा हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Children Learn What They Live&lt;br /&gt;By Dorothy Law Nolte, Ph.D.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;If children live with criticism, they learn to condemn.&lt;br /&gt;If children live with hostility, they learn to fight.&lt;br /&gt;If children live with fear, they learn to be apprehensive.&lt;br /&gt;If children live with pity, they learn to feel sorry for themselves.&lt;br /&gt;If children live with ridicule, they learn to feel shy.&lt;br /&gt;If children live with jealousy, they learn to feel envy.&lt;br /&gt;If children live with shame, they learn to feel guilty.&lt;br /&gt;If children live with encouragement, they learn confidence.&lt;br /&gt;If children live with tolerance, they learn patience.&lt;br /&gt;If children live with praise, they learn appreciation.&lt;br /&gt;If children live with acceptance, they learn to love.&lt;br /&gt;If children live with approval, they learn to like themselves.&lt;br /&gt;If children live with recognition, they learn it is good to have a goal.&lt;br /&gt;If children live with sharing, they learn generosity.&lt;br /&gt;If children live with honesty, they learn truthfulness.&lt;br /&gt;If children live with fairness, they learn justice.&lt;br /&gt;If children live with kindness and consideration, they learn respect.&lt;br /&gt;If children live with security, they learn to have faith in themselves and in those about them.&lt;br /&gt;If children live with friendliness, they learn the world is a nice place in which to live&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम अपने बच्चों को बहुत कुछ बनाना चाहते हैं.....काश हम उसे कुछ भी बनाने की जगह....उसे अपने रंग और महक में खुशी खुशी फलने फूलने दें। उसे एक व्यक्ति बनने दें।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;http://www.youtube.com/watch?v=9Ms_fYsUrnY&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="344"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/9Ms_fYsUrnY&amp;hl=en&amp;fs=1"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowscriptaccess" value="always"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/9Ms_fYsUrnY&amp;hl=en&amp;fs=1" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" width="425" height="344"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6012202322442671087-2680554026526142018?l=drbejisdesk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/feeds/2680554026526142018/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6012202322442671087&amp;postID=2680554026526142018&amp;isPopup=true' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/2680554026526142018'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/2680554026526142018'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='बच्चे के व्यक्तित्व के विकास में माता पिता का योगदान'/><author><name>Beji</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16964389992273176028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://thumb18.webshots.net/t/16/16/4/0/43/2989400430101162518uaiKLi_th.jpg'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6012202322442671087.post-6860554589156206207</id><published>2009-04-18T05:40:00.000-07:00</published><updated>2009-04-18T08:35:47.115-07:00</updated><title type='text'>एपन्डिसाइटिस (appendicitis)</title><content type='html'>आज एपन्डिसाइटिस पर चर्चा करेंगे। बच्चों में पेट के ऑपरेशन का एक मुख्य कारण। अक्सर मातापिता लक्षणों को पूरी गँभीरता से नहीं लेते और देर होने की वजह से एपन्डिक्स का रप्चर (फूट कर फट जाना)हो जाता है। बच्चों में बाकी कारणों से भी निदान इतना आसान नहीं होता और कई बार डॉक्टर की लापरवाही से भी देर हो जाती है। आईये हम इस विषय को लेकर सजग हों।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SehQln1RbgI/AAAAAAAAD0Q/rQ6BX8MpKzo/s1600-h/appendix.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 244px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SehQln1RbgI/AAAAAAAAD0Q/rQ6BX8MpKzo/s320/appendix.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5325595166643416578" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;एपन्डिसाइटिस क्या है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एपन्डिसाइटिस एपन्डिक्स का संक्रमण है जिसकी वजह से उसमें सूजन और दर्द उठता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;एपन्डिक्स क्या है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एपन्डिक्स उँगली के समान एक छोटी थैली है जो बड़ी आँत से जुड़ी होती है और पेट के दाँये निछले हिस्से में पाई जाती है। एपन्डिक्स के  सही कार्य का अब तक भी ठीक पता नहीं है। इसे मानव विकास में अवशेष ही माना गया है। शरीर का एक ऐसा हिस्सा जो अपनी क्षमता और कार्य खो चुका है। &lt;br /&gt;इसकी थैली के अंदर जो बलगम (श्लेम )उत्पन्न होता है वह बड़ी आँत में पहुँच कर शरीर से निवृत होता है।&lt;br /&gt;एपन्डिक्स को शरीर से निकालने पर आँत की कार्यक्षमता मे कोई कमी नहीं आती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;http://www.youtube.com/watch?v=9fN6sm5hu48&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="344"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/9fN6sm5hu48&amp;hl=en&amp;fs=1"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowscriptaccess" value="always"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/9fN6sm5hu48&amp;hl=en&amp;fs=1" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" width="425" height="344"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;एपन्डिसाइटिस की वजह क्या है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ वजहों से एपन्डिक्स की थैली के मुँह का रास्ता बंद हो जाता है। बलगम अंदर इकट्ठा होने लगता है। उसके अंदर स्वाभाविक तौर पर उपस्थित बैक्टीरिया सँख्या में बढ़ने लगते हैं। एपन्डिक्स में संक्रमण होता है। सूजन और दर्द उठता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस रुकावट का कारण मल, लिम्फ टिश्यू, इन्फ्लमेटरी बावल डिसीस, आँत में कहीं और संक्रमण, नहीं तो शरीर में कहीं और संक्रमण हो सकता है।&lt;br /&gt;संक्रमित एपन्डिक्स फूट सकता है। ऐसी स्थिति में पूरे पेट में संक्रमण फैल जाता है। पेरिटोनाइटिस नाम की गँभीर स्थिति उत्पन्न हो सकती है और यह जानलेवा हो सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;एपन्डिसाइटिस किसे हो सकता है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह किसी को भी हो सकता है। 10 से तीस बरस में इसकी सँभावना अधिक देखी गई है। एपन्डिसाइटिस पेट के ऑपरेशन की सबसे अहम वजहों में से एक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;इसके लक्षण क्या हैं&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एपन्डिसाइटिस का मुख्य लक्षण है पेट में दर्द उठना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह दर्द इतना तीव्र होता है कि अक्सर नींद से बच्चा उठ कर बैठ जाता है। पहले नाभि के आसपास दर्द उठता है और फिर धीरे धीरे दाँई तरफ केंध्रित होता जाता है। कुछ ही घंटों में इसकी तीव्रता काफी बड़ जाती है। यह चलने फिरने में, गहरी साँस लेते वक्त और खाँसने या छींकने पर असहनीय हो जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाकी लक्षण जो पाये जाते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भूख कम लगना &lt;br /&gt;उल्टी और उबका&lt;br /&gt;दस्त&lt;br /&gt;कब्ज &lt;br /&gt;हवा छोड़ सकने मे अक्षमता&lt;br /&gt;बुखार&lt;br /&gt;पेट में सूजन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सभी लक्षण बाकी स्थितियों में भी उभर सकते हैं। किंतु इनके पाये जाने पर डॉक्टरी सलाह लेना अत्यावश्यक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;http://www.youtube.com/watch?v=_RhH2Y3fjYI&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="344"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/_RhH2Y3fjYI&amp;hl=en&amp;fs=1"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowscriptaccess" value="always"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/_RhH2Y3fjYI&amp;hl=en&amp;fs=1" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" width="425" height="344"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;एपन्डिसाइटिस का निदान कैसे किया जाता है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डॉक्टर दर्दी की पड़ताल और कुछ खून की जाँच और दूसरे टेस्ट्स करने पर इस नतीजे तक पहुँच सकता है। अगर दर्दी की जाँच से ठीक ठीक निदान का अंदाज़ा लगता है तो कई बार डॉक्टर बिना आगे के टेस्ट्स किये ही ऑपरेशन के लिए दर्दी को तैयार करता है। एपन्डिक्स का उसके फूटने के पहले निकालना बहुत जरूरी है। सोनोग्राफी और सी टी स्कैन करने पर सही निर्णय पर पहुँच सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SehRcm4dddI/AAAAAAAAD0g/0hEcesVk5tY/s1600-h/appendicitis.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 197px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SehRcm4dddI/AAAAAAAAD0g/0hEcesVk5tY/s320/appendicitis.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5325596111281157586" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दर्दी से पूछा जाता है कि दर्द कब और कहाँ से शुरु हुआ और किस तरफ बढ़ा और इसकी तीव्रता सबसे अधिक कहाँ है। इससे पहले कभी ऐसी तकलीफ हुई हो तो यह बताना भी आवश्यक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डॉक्टर जाँच करते वक्त खास चिन्हों को तलाशते हैं। एपन्डिक्स होने पर पेट में गॉर्डिंग  पाई जाती है- दर्दी अपने पेट की माँसपेशियों को छूते ही कड़क कर देता है। रिबाउन्ड टेन्डरनेस, रोवसिंग साईन, सोआस साईन और औबचुरेटर साईन- यह कुछ ऐसे चिन्ह है जिसके लिए तपास की जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खून में व्हाईट ब्लड सेल्स(सफेद कोशिकाएँ) की गिनती 15000 से अधिक हो सकती है। पानी और नमक की मात्रा में फेरबदल हो सकता है। पेशाब में संक्रमण भी पाया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SehSLRvkUeI/AAAAAAAAD0o/g1x2b7cavk0/s1600-h/alogrithm+appendicitis.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 246px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SehSLRvkUeI/AAAAAAAAD0o/g1x2b7cavk0/s320/alogrithm+appendicitis.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5325596913060565474" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एपन्डिसाइटिस से निज़ाद पाने के लिए अक्सर शल्य चिकित्सा की जाती है। जल्द से जल्द ऑपरेशन करने पर एपन्डिक्स के फूटने और पेट में संक्रमण फैलने की सँभावना बहुत कम रहती है। इसे लैपरोटोमी नहीं तो लैपरोस्कोपी से किया जा सकता है। लैपरोटोमी में पेट में एक चीरा लगा कर एपन्डिक्स काट कर अलग किया जाता है। लैपरोस्कोपी में एक छेद के अंदर से ही ऑपरेशन किया जाता है। लैपरोस्कोपी से की गई शल्य चिकित्सा के बाद फिर से तंदुरुस्त होने में कम समय लगता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SehRUBCC1iI/AAAAAAAAD0Y/Pr5DKIsmu1E/s1600-h/appendicectomy.gif"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 300px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SehRUBCC1iI/AAAAAAAAD0Y/Pr5DKIsmu1E/s320/appendicectomy.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5325595963681855010" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभीकबार पेट खोलने पर सामान्य एपन्डिक्स दिखाई पड़ता है। ऐसे में भी कई डॉक्टर भविष्य में तकलीफ ना हो इसलिए एपन्डिक्स निकाल देते हैं। कभी पेट के खोलने पर कोई और तकलीफ सामने आती है जिसेकि शल्य चिकित्सा के दौरान ठीक किया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एपन्डिक्स के फूटने या रप्चर होने पर एपन्डिक्स के आसपास पस जमा हो सकता है। यह पेट में गोले की तरह महसूस हो सकता है। इस पस को ऑपरेशन से पहले निकालना जरूरी है। इसके लिए पेट में एक नली रखनी पड़ सकती है। यह नली दो हफ्ते तक रखनी पड़ सकती है जिस दौरान दर्दी को ऐन्टिबायोटिक्स दिए जाते हैं। छह से आठ हफ्ते बाद जब संक्रमण काबू में आ जाता है तब ऑपरेशन करके एपन्डिक्स निकाला जाता है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिना शल्यचिकित्सा के ऐन्टीबायोटिक्स देकर शायद ही ठीक हो सकता है। किंतु अगर शल्य चिकित्सा में देर लगे तो ऐन्टीबायोटिक्स देना जरूरी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शल्यचिकित्सा के चार से छह हफ्तों में दर्दी पूरी तरह ठीक हो जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;याद रखें&lt;br /&gt;एपन्डिसाईटिस एक आपातकालीन स्थिति है जिसपर जल्द से जल्द ध्यान देना आवश्यक है।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ALL PICTURES AND VIDEOS HAVE BEEN USED PURELY FOR EDUCATIONAL PURPOSES. IF ANY COPY RIGHT VIOLATION IS DONE KINDLY INFORM THE PICTURE OR VIDEO WILL BE TAKEN OFF IMMEDIATELY.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6012202322442671087-6860554589156206207?l=drbejisdesk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/feeds/6860554589156206207/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6012202322442671087&amp;postID=6860554589156206207&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/6860554589156206207'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/6860554589156206207'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/2009/04/appendicitis.html' title='एपन्डिसाइटिस (appendicitis)'/><author><name>Beji</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16964389992273176028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://thumb18.webshots.net/t/16/16/4/0/43/2989400430101162518uaiKLi_th.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SehQln1RbgI/AAAAAAAAD0Q/rQ6BX8MpKzo/s72-c/appendix.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6012202322442671087.post-5464468423975205507</id><published>2009-02-10T22:51:00.000-08:00</published><updated>2009-02-10T22:56:39.713-08:00</updated><title type='text'>रोटावायरस वैक्सीन</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SZJxPoNk3JI/AAAAAAAADvE/VQQRWTTQlJU/s1600-h/rota.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 210px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SZJxPoNk3JI/AAAAAAAADvE/VQQRWTTQlJU/s320/rota.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5301424224674831506" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोटावायरस पर पोस्ट लिखने के बाद महसूस किया कि रोटावायरस वैक्सीन के विषय में दी गई जानकारी बेहद संक्षिप्त है। और इसे लेकर कई सवाल अनुत्तरित रह गये। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो प्रश्नोत्तर ही सही&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;1.पहली बार रोटावायरस वैक्सीन कब लोगों तक पहुँचा?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;1998 में पहली बार वैयत्त कंपनी ने रोटाशील्ड़ के नाम से रोटावायरस का वैक्सीन उपलब्ध कराया। इसे बाज़ार में पहुँचाने से पहले किए गये शोध में कुछ हानिकारक नहीं पाया गया था। 1999 में इनेटससेप्शन (intussusception) ( आँत का एक तरह का जानलेवा अवरोध) की गुँजाइश बढ़ने की शंका के तहत इसे बाज़ार से हटा लिया गया। तब इसके फायदे को लेकर बहस गर्म हो गई।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SZJyj6dMhGI/AAAAAAAADvc/A1Vl4TtdnDg/s1600-h/int.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 194px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SZJyj6dMhGI/AAAAAAAADvc/A1Vl4TtdnDg/s320/int.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5301425672681194594" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फरवरी 2006 में FDA (Food and Drug Administration ) ने एक नये वैक्सीन RotaTeq (Merck) की अनुमति दी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SZJxZZeCv0I/AAAAAAAADvM/vczYAL4e5Kw/s1600-h/rotateq.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 121px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SZJxZZeCv0I/AAAAAAAADvM/vczYAL4e5Kw/s320/rotateq.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5301424392516058946" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;2.यह किस प्रकार की रस्सी (vaccine) है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;यह गाय और इंसान को ग्रसित करने वाले जीवित रोटावायरस से बना है। यह पाँच तरह के स्ट्रेन्स (serotypes G1, G2, G3, G4 and P1 )से सुरक्षा देता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;3.इसे किस तरह दिया जाता है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;यह तरल है और मुँह से दिया जाता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;4.यह टीके किसे और कब लगने चाहिए?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;Advisory Committee on Immunization Practices (ACIP) इसे एक साल के भीतर के बच्चों के देने की सिफारिश देती है।&lt;br /&gt;इसके तीन डोस हैं जो की दूसरे, चौथे और छठे महीने में दिये जाते हैं। पहला डोस छह से बारह हफ्ते के बीच और आखिरी 32 हफ्ते से पहले दिया जाना चाहिए। &lt;br /&gt;इसे बाकी टीकों के साथ दिया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;5.क्या ऐसे बच्चे को टीका लगाने की जरूरत है जो रोटावायरस से ग्रसित हो चुका है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;बच्चे को एक ही रोटावायरस के स्ट्रेन का संक्रमण हुआ होता है जबकि यह पाँच से सुरक्षा देता है। 32 हफ्ते से पहले इन्हे भी तीन टीके लगने चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;6.यह टीका कितना सुरक्षित है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;70000 बच्चों में रोग-विषयक जाँच में इसे सुरक्षित पाया गया है। किंतु इससे पहले के टीके के साथ कुछ शंकायें जुड़ी थी इसलिए इसकी जाँच और परीक्षण जारी है। इसे 32 हफ्ते के ऊपर के बच्चों में अभी देने की अनुमति नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;7.यह टीका रोग प्रतिरोध में कितना सक्षम है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;यह 74% रोटावायरस के मामले, 98% गँभीर संक्रमण, 96% अस्पताल के दाखिलों में कमी लाने में सक्षम है। दूसरे वायरस से होने वाले दस्त और उल्टी पर इसका कोई असर नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;8.किस तरह के दूसरे लक्षणों की  इस वैक्सीन बतौर संभावना है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;कुछ बच्चों में (1%-3% ज्यादा संभावना) इसके देने पर सात दिन के भीतर दस्त और उल्टी देखा गया है।&lt;br /&gt;और कोई गँभीर लक्षण नहीं देखा गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;9.यह टीका किसे नहीं दिया जाना चाहिए?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;- जिसे यह देने पर कोई रिएक्शन हुआ हो&lt;br /&gt;- जिसे इसके किसी घटक  से कोई जानलेवा अलर्जी हो&lt;br /&gt;- जिन बच्चों को intussusception हुआ हो&lt;br /&gt;-जो बच्चे बीमार हैं उन्हे कुछ रुककर वैक्सीन दिया जाना चाहिए।&lt;br /&gt;-जिन बच्चों को HIV/AIDS  हो, या जो स्टीरौयड्स पर हैं,जिनकी रोग प्रतिकारक क्षमता धटी हुई हो।&lt;br /&gt;-जिन्हे हाल ही में खून या खून संबंधित कोई दवा दी गई हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;10.क्या वैक्सीन से बीमारी हो सकती है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;नहीं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;11.क्या रोटावायरस के लिए कोई और टीका भी है ?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;हाँ रोटारिक्स (Rotarix)नाम का glaxo smithcline द्वारा निर्मित टीका भी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SZJx3Fh6ByI/AAAAAAAADvU/j3ejOPvyktw/s1600-h/rotarix.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SZJx3Fh6ByI/AAAAAAAADvU/j3ejOPvyktw/s320/rotarix.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5301424902559631138" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;12.इसे कैसे और कब दिया जाता है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;इसके दो डोस है जिसे दूसरे और चौथे महीनों में दिया जा सकता है। पहला डोस छह हफ्ते के बाद और दूसरा कम से कम चार हफ्ते के अंतराल पर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसे भी मुँह से ही दिया जाता है और बाकी लक्षण रोटाटेक जैसे ही हैं।&lt;br /&gt;कभी कभार चिड़चिड़ापन,भूख कम लगना,नाक का बहना और बुखार भी देखा गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नोट&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;रोटावायरस का टीका लगना इसके नहीं होने की गारंटी नहीं देता। इसके इस्तेमाल से दुनियाभर में प्रतिवर्ष इससे ग्रसित होने वाले बच्चे और मृत्युदर को काफी हद तक घटाया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;32 हफ्ते से ऊपर के बच्चों में पर्याप्त जाँच की कमी होने की वजह से इसे अभी तक इनमें इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SZJ0KbQ4tbI/AAAAAAAADvs/iT3Oo43GE0U/s1600-h/vaccine.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 244px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SZJ0KbQ4tbI/AAAAAAAADvs/iT3Oo43GE0U/s320/vaccine.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5301427433834591666" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई भी टीका लगवाना या ना लगवाना माँ बाप तय कर सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SZJzG-ybHjI/AAAAAAAADvk/9OQLkrZ_Cgs/s1600-h/VAERS.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 64px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SZJzG-ybHjI/AAAAAAAADvk/9OQLkrZ_Cgs/s320/VAERS.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5301426275139395122" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर आप के बच्चे को वैक्सीन के बाद पेट में मरोड़, उल्टी,दस्त, दस्त में खून या पेट की किसी और प्रकार की तकलीफ उठे तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। इसे  VAERS (The Vaccine Adverse Event Reporting System)(http://vaers.hhs.gov/)को भी सूचित करें। यह Intussusception के लक्षण हो सकते हैं। Intussusception का 24 घंटो के भीतर इलाज करने पर बच्चा पूरी तरह स्वस्थ हो सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(राधिका बुधकर जी के संशय पर ही यह पोस्ट लिखने की इच्छा हुई। उनका शुक्रिया।)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ALL PICTURES ARE USED ONLY FOR EDUCATIONAL PURPOSES. IF ANY COPYRIGHT VIOLATION IS DONE PLEASE INFORM,THE PICTURE WILL BE TAKEN OFF IMMEDIATELY.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6012202322442671087-5464468423975205507?l=drbejisdesk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/feeds/5464468423975205507/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6012202322442671087&amp;postID=5464468423975205507&amp;isPopup=true' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/5464468423975205507'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/5464468423975205507'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/2009/02/blog-post.html' title='रोटावायरस वैक्सीन'/><author><name>Beji</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16964389992273176028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://thumb18.webshots.net/t/16/16/4/0/43/2989400430101162518uaiKLi_th.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SZJxPoNk3JI/AAAAAAAADvE/VQQRWTTQlJU/s72-c/rota.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6012202322442671087.post-991640937085328132</id><published>2009-01-29T10:22:00.000-08:00</published><updated>2009-01-29T10:26:30.158-08:00</updated><title type='text'>नर्स मेय्ड्स एल्बो (Nursemaid's Elbow,Pulled Elbow)</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SWD7QQkOEaI/AAAAAAAADmg/M9kBeC72z_U/s1600-h/elbow.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 218px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SWD7QQkOEaI/AAAAAAAADmg/M9kBeC72z_U/s320/elbow.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5287502219276325282" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज का विषय है नर्स मेय्ड्स एल्बो। पुल्ड एल्बो के नाम से भी यह जाना जाता है। सीधा अनुवाद होगा खिंची हुई कुहनी । बच्चों में इसके होने की सँभावना बहुत अधिक है । इस विषय में बात करने की इच्छा के पीछे का कारण भी यही है। जाने अनजाने हमारी गल्ती से बहुत आसानी से बच्चा इस स्थिति का शिकार हो जाता है। इलाज आसान है। और बचाव मुमकिन।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नर्स मेय्ड्स एल्बो कुहनी के नीचे की हड्डी का कुहनी के जोड़ से आंशिक हटाव है। रेडियस और अल्ना में से रेडियस नाम की हड्डी जोड़ से कुछ कारणवश खिसक जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SWD5Ft0Y07I/AAAAAAAADmI/ChSqa6zgxkU/s1600-h/nursemaid%27s+elbow.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 256px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SWD5Ft0Y07I/AAAAAAAADmI/ChSqa6zgxkU/s320/nursemaid%27s+elbow.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5287499839126950834" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कारण &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; यह सामान्यत: पाँच बरस के नीचे के बच्चों में पाया जाता है। जब बच्चे को हाथ या कलाई पकड़ कर ज़ोर से खींचा जाता है या एक हाथ से उठाया जाता है तो इसके होने की सँभावना बहुत बढ़ जाती है( जैसे की सीड़ीयों पर, सड़क पार करते हुए)। बच्चे को हाथों से पकड़ कर गोल घुमाने पर भी ऐसा होना सँभव है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके होते ही बच्चा तुरंत दर्द से रोने लगता है और प्रभावित हाथ इस्तेमाल करने से इंकार कर देता है। बच्चा अपनी बाँह अपनी तरफ थोड़ा मोड़ कर, कुहनी पेट से चिपका कर रखता है। वह अपने कँधे का इस्तेमाल करता है पर कुहनी का नहीं। कुछ बच्चों में दर्द कम होता है और वे रोना तो बंद कर देते हैं पर कुहनी फिर भी इस्तेमाल नहीं करते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बार ऐसा होने पर ऐसा फिर से होने की, कई बार महीने के अंदर ही सँभावना बहुत बढ़ जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अक्सर पाँच बरस के बाद यह देखने में नहीं आता।  तब तक कुहनी का जोड़ और आसपास की माँसपेशियाँ मजबूत हो जाती हैं। फिर भी किसी चोट या फ्रैक्चर के बाद ऐसा होना सँभव है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SWD5m1AWbgI/AAAAAAAADmQ/YOA_4B-4lUA/s1600-h/pulled+elbow.bmp"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 241px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SWD5m1AWbgI/AAAAAAAADmQ/YOA_4B-4lUA/s320/pulled+elbow.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5287500407991856642" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लक्षण&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तकलीफ होते ही तुरंत रोना&lt;br /&gt;कुहनी में दर्द&lt;br /&gt;प्रभावित बाँह का उपयोग ना करना&lt;br /&gt;कुहनी को हल्का सा मोड़कर रखना&lt;br /&gt;निचले बाँह को और कुहनी को पेट पर सटाकर रखना&lt;br /&gt;कँधे का हिला सकना और कुहनी का ना हिलाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अगर आप को शंका है की आपके बच्चे को नर्स मेय्ड्स एल्बो है तो&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- कुहनी पर खपच्ची बांधने से पहले बच्चे को ना हिलायें&lt;br /&gt;- बाँह और कुहनी को खुद सीधा करने की कोशिश ना करें&lt;br /&gt;- बर्फ के पैक कुहनी पर लगायें&lt;br /&gt;-कुहनी जिस अवस्था में है वैसे ही खपच्ची बांधे&lt;br /&gt;- कुहनी को ऊपर और नीचे से हिलने ना दे। हो सके तो कलाई और कँधा भी ना हिलायें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- डॉक्टर के पास तुरंत ले जायें।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नर्स मेय्ड्स एल्बो के होने का संकेत और जाँच&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डॉक्टर जाँच के समय पायेगा कि बच्चा कुहनी घुमा नहीं सकता। कुहनी को पूरी तरह मोड़ा भी नहीं जा सकता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;उपचार &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; डॉक्टर हल्के से कुहनी मोड़ते हुए अग्र बाहु (forearm) को इस तरह घुमायेंगे कि हथेली ऊपर की तरफ देखने लगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;खुद ऐसी कोशिश करना जोखिम भरा हो सकता है। बच्चे को इससे नुकसान पहुँच सकता है।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई बार बारंबार ऐसी अवस्था होने पर आपको यह विधि डॉक्टर  ठीक तरह से  सिखा सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SWD6SJRYfYI/AAAAAAAADmY/xJL_7gS7roM/s1600-h/maneuver.bmp"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 298px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SWD6SJRYfYI/AAAAAAAADmY/xJL_7gS7roM/s320/maneuver.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5287501152166378882" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नर्स मेय्ड्स एल्बो का इलाज ना करने पर स्थायी क्षति पहुँच सकती है। इलाज करने पर कुहनी पूरी तरह से ठीक भी हो जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;समस्या &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ बच्चों में कुहनी के चलन में कमी आ सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बचाव&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बचाव बहुत आसान है। ध्यान रखा जाये कि कुहनी खिंचने ना पायें। बच्चे को एक हाथ से खींचिये और उठाइये नहीं। हाथ से पकड़ कर घुमाइये नहीं। सड़क पार करते समय हाथ ज़ोर से ना खींचे।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नर्स मेय्ड्स एल्बो डॉक्टर की ओ पी डी में लगभग रोज़ देखने में आती है। किंतु इनका फ्रैक्चर व कुहनी की बाकी तकलीफों से भेद करना जरूरी है। एक डॉक्टर या जानकार व्यक्ति ही यह अंतर समझ सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माता पिता होने के नाते बचाव की कोशिश करना जरूरी है और सही समय सही जगह से सही सलाह लेना आवश्यक।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ALL PICTURES ARE USED SOLELY FOR EDUCATIONAL PURPOSES . IF ANY COPYRIGHT VIOLATION IS DONE,PLEASE INFORM , PICTURE WILL BE REMOVED IMMEDIATELY.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6012202322442671087-991640937085328132?l=drbejisdesk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/feeds/991640937085328132/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6012202322442671087&amp;postID=991640937085328132&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/991640937085328132'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/991640937085328132'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/2009/01/nursemaids-elbowpulled-elbow.html' title='नर्स मेय्ड्स एल्बो (Nursemaid&apos;s Elbow,Pulled Elbow)'/><author><name>Beji</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16964389992273176028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://thumb18.webshots.net/t/16/16/4/0/43/2989400430101162518uaiKLi_th.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SWD7QQkOEaI/AAAAAAAADmg/M9kBeC72z_U/s72-c/elbow.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6012202322442671087.post-2363847737148099903</id><published>2009-01-15T12:07:00.000-08:00</published><updated>2009-01-15T12:08:02.135-08:00</updated><title type='text'>रोटावायरस से दस्त और उल्टी</title><content type='html'>&lt;em&gt;आप लभी को नववर्ष की शुभकामनायें। काफी दिनों बाद इस चिट्ठे पर लिख रही हूँ। हाल ही में आराम का काम छोड़ मुश्किल काम हाथ लिया है। समय की व्यस्तता और नई जगह पाँव जमाने में स्पंदन में लिखना छूट गया। कोशिश रहेगी की नियमित लिख सकूँ।&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SW-F5VMhk3I/AAAAAAAADoA/IgQlIJoBn0k/s1600-h/3D_Rotavirus_2Board.gif"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 120px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SW-F5VMhk3I/AAAAAAAADoA/IgQlIJoBn0k/s320/3D_Rotavirus_2Board.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5291595307172336498" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दस्त और उल्टी की कई वजह है। रोटावायरस नाम का वायरस इसलिए विख्यात है क्योंकि यह अकेला संसार भर में बच्चों में इनका सबसे बड़ा कारण है। पाँच साल की उम्र तक पहुँचते पहुँचते दुनिया के हर बच्चे को कम से कम एक बार इसका चेप लग चुका होता है। हाँ बार बार भी बच्चा संक्रमित हो सकता है किंतु हर बार का संक्रमण का असर, रोग प्रतिकारक शक्ति की वजह से पिछली बार से कम होता है।&lt;br /&gt;रोटावायरस डबल स्ट्रैन्डड(दुहरे रिबन जैसा) आर एन ए वायरस है। सात प्रकार के रोटावायरस- ए,बी,सी,डी ,ई,एफ और जी पाये जाते हैं। करीबन नब्बे प्रतिशत संक्रमण रोटावायरस ए से होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर हम दुनिया भर में इससे पीड़ित बच्चे और मृत्युदर पर नज़र दौड़ायें तो इस रोग को समझने और सही उपाय करने की आवश्यकता से इंकार नहीं कर सकते। हमारे देश में लाखों की सँख्या में बच्चे साल भर इससे ग्रसित होकर मरते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SW-J6mu5_iI/AAAAAAAADoQ/mSu6scdBv2o/s1600-h/deaths+RV.bmp"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SW-J6mu5_iI/AAAAAAAADoQ/mSu6scdBv2o/s400/deaths+RV.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5291599727106326050" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कैसे फैलता है यह रोग&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फीको-ओरल यानि की मल से मुख तक&lt;br /&gt;जाहिर सी बात है हाथ धोने में लापरवाही, गंदा ( प्रदूषित) पानी या खाना खाने से, किसी रोगी के मल से किसी तरह संपर्क में आने से यह रोग फैलता है। इस वायरस की संक्रमण शक्ति लाजवाब है,ज़रा सी लापरवाही से रोग फैल जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आक्रमण प्रणाली&lt;br /&gt;रोटावायरस सबसे पहले अंतड़ी के अस्तर पर लगी कोशिकाओं को संक्रामित करती हैं। वहाँ यह एन्डोटॉक्सिन बना कर दस्त की शुरुआत करती है। बच्चे को दस्त से पहले अक्सर उल्टी की शिकायत होती है। उल्टी और दस्त की बारंबारता इतनी अधिक होती है कि शरीर में पानी कम होने लगता है। पानी की कमी ही मृत्यु का मुख्य कारण बनती है। एंडोटॉक्सिन बना लेने पर बात खत्म नहीं होती। यह कोशिकाओं को इस तरह नुकसान पहुँचाती है कि सादा आहार भी पचा पाना मुश्किल हो जाता है। शरीर में यह बहुत तेज़ी से फैलती हैं और फिर दुगुने जोश से आक्रमण करती हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर बच्चे को इससे पहले कभी यह संक्रमण हो चुका हो तो उसकी रोग प्रतिकारक शक्ति तुरंत पहचान लेती है। बचाव की रणनीति की वजह से पहली बार के संक्रमण जितना असर फिर नहीं दिखता। यही वजह है कि बड़ों में इसका असर होने पर भी तकलीफ कम होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SW-K3IxSRoI/AAAAAAAADog/8csun1gJVJI/s1600-h/RV+repl.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 280px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SW-K3IxSRoI/AAAAAAAADog/8csun1gJVJI/s400/RV+repl.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5291600767035262594" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लक्षण&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जुकाम जैसे लक्षण&lt;br /&gt;हल्का बुखार&lt;br /&gt;उल्टियाँ&lt;br /&gt;दस्त&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोटावायरस की सबसे खास बात दस्त का बारंबार होना है...इतनी बार की पानी शरीर में कम हो जाता है। संक्रमित होने के दो दिन बाद लक्षण दिखने लगते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोशिकाओं को नुकसान पहुँचने की वजह से दूध पचाने वाले एन्ज़ाइम पर खास असर पड़ता है। ऐसे में दूध देने पर दस्त की तकलीफ बहुत बढ़ जाती है।&lt;br /&gt;यह तकलीफ रोग के हटने के बाद भी एक दो हफ्ते तक देखी जा सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाँच&lt;br /&gt;दस्त में रोटावायरस ए की जाँच की जाती है। इसे अधिकतर स्थानें में एन्ज़ाइम इम्यूनऐसे नाम की तकनीक से करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इलाज&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसका कोई खास इलाज सँभव नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण है शरीर में पानी की कमी ना होने देना। वक्त पर अस्पताल पहुँचना, ओ आर एस का घोल, उल्टी की दवा....वगैरह। बच्चे के अंदर नमक की मात्रा में फेर बदल, पानी की कमी और रक्त में ग्लूकोस की मात्रा पर विशेष ध्यान देना पड़ता है। चूँकि लक्षण बहुत तेज़ी से बढ़ते हैं समय पर अस्पताल पहुँचाना बहुत जरूरी है। कभी कबार इससे दिमाग पर भी असर पड़ सकता है। किंतु अधिकतर सही समय पर ध्यान देने पर जान बिना किसी और समस्या के बचाई जा सकती है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोटावायरस कई देशों में डिसंबर से फरवरी के महीनों में होता है किंतु भारत में साल भर देखा जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;http://www.youtube.com/watch?v=aaxcmEvfnDY&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="344"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/aaxcmEvfnDY&amp;hl=en&amp;fs=1"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowscriptaccess" value="always"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/aaxcmEvfnDY&amp;hl=en&amp;fs=1" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" width="425" height="344"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोटावायरस  की रस्सी (Rotavirus vaccine)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सन 2006 में इस रोग से लड़ने के लिए दो टीके बाज़ार में आये।  ग्लैक्सोस्मितक्लाइन की रोटारिक्स और मर्क्ख की रोटाटेक़ (Rotarix by GlaxoSmithKline and RotaTeq by Merck) दोनो ही ओरल (मुँह से) लेने वाली हैं और इनमें रोगमुक्त जीवित वायरस हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह रोग सभी देशों में पाया जाता है। साधारण तापमान में यह वायरस बचा रहता है। सामान्य साफ सफाई भी इसका नुकसान नहीं पहुँचाती। बहुत कम मात्रा में भी यह बच्चे को गँभीर तरह से संक्रमित कर सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम क्या कर सकते हैं-&lt;br /&gt;1. साबुन से ठीक से हाथ धोना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह अकेली एक आदत इतनी आसानी से बचाव कर सकती है की आश्चर्य होता है। रोगी के घर पर होने पर खास ध्यान देना बेहद जरूरी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2.प्रदूषित पानी और खाने से दूर रहना&lt;br /&gt;3. रोटावायरस का ठीका लगवाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाहिर है इस ठीके की अहमियत पाँच साल के भीतर सबसे अधिक है। (रोटावायरस का ठीका लगाने पर रोग की संक्रमण शक्ति घटती है। या तो बच्चा इससे ग्रसित नहीं होता या फिर इसके लक्षण इतने तीव्र नहीं होते।)&lt;br /&gt;4. अगर इन सबके बावजूद भी अगर यह रोग हो जाये तो समय पर डॉक्टर की सलाह अत्यावश्यक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ALL PICTURES AND VIDEOS HAVE BEEN USED PURELY FOR EDUCATIONAL PURPOSES,IF THERE IS ANY COPYRIGHT VIOLATION PLEASE INFORM THEY WILL BE REMOVED IMMEDIATELY.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6012202322442671087-2363847737148099903?l=drbejisdesk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/feeds/2363847737148099903/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6012202322442671087&amp;postID=2363847737148099903&amp;isPopup=true' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/2363847737148099903'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/2363847737148099903'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/2009/01/blog-post.html' title='रोटावायरस से दस्त और उल्टी'/><author><name>Beji</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16964389992273176028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://thumb18.webshots.net/t/16/16/4/0/43/2989400430101162518uaiKLi_th.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SW-F5VMhk3I/AAAAAAAADoA/IgQlIJoBn0k/s72-c/3D_Rotavirus_2Board.gif' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6012202322442671087.post-8625305991954085246</id><published>2008-11-20T08:17:00.001-08:00</published><updated>2008-11-20T08:19:45.044-08:00</updated><title type='text'>फेब्राइल कनवल्शन्स ( बुखार से उत्पन्न मिरगी जैसी ऐंठन )</title><content type='html'>फेब्राइल कनवल्शन्स शरीर मे उठी एंठन है जो की ऐसे बच्चों में देखी जाती हैं जिनके शरीर का तापमान बुखार की वजह से 39डिग्री सेल्सियस या 102.2 डिग्री फैरनहीट से ज्यादा हो। अक्सर यह खाँसी सर्दी जुकाम के शुरुआत में होता है जब बच्चे के शरीर का तापमान तेजी से बढ़ रहा होता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वीडियो देखने के लिए क्लिक करें&lt;br /&gt;http://www.brightcove.tv/title.jsp?title=1078589570&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक नज़र में देखने पर स्थिति भयावह लग सकती है,किंतु विरले ही यह एक गँभीर समस्या बनती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाँच साल से छोटे बच्चों में इसके पाये जाने की सँभावना सबसे अधिक होती है। बच्चों का दिमाग पूरी तरह विकसित और परिपक्व नहीं होता। अधिक तापमान से इनके दिमाग में ऐसे विद्युत के सिग्नल उत्पन्न हो सकते हैं की बच्चे के शरीर में ऐंठन और मरोड़ उठे । करीब तीन प्रतिशत बच्चे इस से प्रभावित हो सकते हैं। छह महीने से तीन साल की इम्र में इनके होने की सँभावना सबसे अधिक होती है। हालांकि छह साल तक इन्हे देखा गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परिवार में अगर किसी को ऐसी तकलीफ रही हो तो इसके होने की सँभावना 20 प्रतिशत तक बढ़ सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लक्षण&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-ऐंठन और मरोड़ बहुत कम समय के लिए होती है। यह कुछ सेकंड से कुछ मिनट तक रह सकती है( पाँच मिनट से कम)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-बच्चा बेहोश हो सकता है, शरीर सख्त पड़ सकता है,साँस 30 सेकंड के लिए बंद हो सकती है, और बच्चा पेशाब और दस्त अनजाने ही कर सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-हाथ और पाँव में झटके आ सकते हैं। कई बार चेहरे पर भी खिंचाव दिख सकता है। बच्चे की आँखें ऊपर चढ़ सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-कुछ मिनट बाद बच्चे को होश आ जाता है। होश आने पर बच्चा सुस्त होता है, नहीं तो चिड़चिड़ा हो जाता है। उसे अपने आसपास की बातों का ठीक होश नहीं रहता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;http://www.youtube.com/watch?v=pS6uZYcydRo&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="344"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/pS6uZYcydRo&amp;hl=en&amp;fs=1"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowscriptaccess" value="always"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/pS6uZYcydRo&amp;hl=en&amp;fs=1" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" width="425" height="344"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;इलाज&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- ऐंठन के समय बच्चे को चोट ना लगने दें। उनके मुँह में कुछ ना ड़ालें। बच्चे को रिकवरी पोसाशन में ड़ाल दें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SSWLE5cCicI/AAAAAAAADHk/t2yWJ5009G8/s1600-h/recovery_position.gif"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 240px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SSWLE5cCicI/AAAAAAAADHk/t2yWJ5009G8/s320/recovery_position.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5270771855161199042" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- बुखार को बहुत बढ़ने ना दें। पैरासिटामोल का इस्तेमाल करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- कमरा ठंडा करें, बच्चे के कपड़े ड़ीले करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- पानी में भिगो कर शरीर को स्पोंज करें। स्पोंज करते समय बच्चे की छाती, पीठ ,कक्ष और जाँघ में भी पोछे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर ऐसा पहली बार देखने में आया है तो बच्चे का इलाज और ठीक से वजह जानने के लिए बाकी जाँच जरूरी है। हो सकता है बच्चे को डायज़ापॉम नाम की दवा देनी पड़े। निदान हो जाने पर यह दवा  आप संडास की जगह से भी दे सकते हैं। अपने डॉक्टर से इस विषय में सही सलाह ली जानी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर तकलीफ एक साल की उम्र से पहले देखने में आई है , या परिवार में किसी और को भी है तो तकलीफ के बारबार होने की सँभावना ज्यादा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अधिकतर बच्चे पाँच साल बाद इस तकलीफ से उभर जाते हैं। किंतु करीबन 1 प्रतिशत बच्चों में आगे जाकर अपस्मार देखा जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुखार में हुई ऐसी सामान्य बात को देख अपने या किसी दूसरे बच्चे पर अपस्मार का लेबल ना लगायें। चौकसी और सचेत होना आवश्यक है लेकिन फेब्राइल कनवल्शन्स चिंता का कारण ना बनायें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;All Pictures and videos are used solely for educational purposes. If any copyright violation is done please inform, the picture or video will be taken off immediately.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6012202322442671087-8625305991954085246?l=drbejisdesk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/feeds/8625305991954085246/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6012202322442671087&amp;postID=8625305991954085246&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/8625305991954085246'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/8625305991954085246'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/2008/11/blog-post.html' title='फेब्राइल कनवल्शन्स ( बुखार से उत्पन्न मिरगी जैसी ऐंठन )'/><author><name>Beji</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16964389992273176028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://thumb18.webshots.net/t/16/16/4/0/43/2989400430101162518uaiKLi_th.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SSWLE5cCicI/AAAAAAAADHk/t2yWJ5009G8/s72-c/recovery_position.gif' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6012202322442671087.post-8157506461267210989</id><published>2008-10-15T11:13:00.000-07:00</published><updated>2008-10-15T20:50:30.966-07:00</updated><title type='text'>जुकाम की दवा और नुकसान</title><content type='html'>बीमार बच्चा देखकर हर माँ का दिल भर आता है। पापा का बस चले तो अपनी लाड़ली के लिए जान भी हाज़िर कर दे। पर कुछ दुख तो सह कर ही पार लगते हैं। सर्दी के लिए दवाओं से चाहे जितनी नाकाबंदी कर दें यह सता कर ही दम लेती है। कुछ ना कुछ कर के बीमार बच्चे की तकलीफ कम करने की कोशिश में अक्सर कई गैरजरूरी दवाईयाँ इस्तेमाल की जाती है।&lt;br /&gt;बात अगर यहीं तक सीमित होती तो भी चलता लेकिन इनमें से कई दवाईयाँ काफी हद तक नुकसान पहुँचा सकती हैं, जान भी जोखिम में ड़ाल सकती है।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SPNbCgw8P3I/AAAAAAAADCc/dNJlmt1xRnY/s1600-h/cold.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SPNbCgw8P3I/AAAAAAAADCc/dNJlmt1xRnY/s320/cold.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5256645288784576370" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह हैं ओवर द काउंटर मिलने वाली असँख्य दवाईयाँ जिनपर मुस्कुराते बच्चों की तस्वीर हमें बढ़ कर इन्हे खरीदने को उकसाती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच तो यह है सर्दी जुकाम के लिए आज भी दादी माँ के नुस्खों से बेहतर उपाय नहीं। पैरासीटामोल, माँ की गोद, विक्स से मालिश, गुनगुने नमक के पानी  से गरारे करना , अधरक की चाय, चिकन सूप....यही काफी है। छींकता खाँसता आपका दुलारा परेशान जरूर है....लेकिन आपके साथ और प्यार की मीठी यादें भी बना रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;http://www.youtube.com/watch?v=fij-SnBOapQ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="344"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/fij-SnBOapQ&amp;hl=en&amp;fs=1"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/fij-SnBOapQ&amp;hl=en&amp;fs=1" type="application/x-shockwave-flash" allowfullscreen="true" width="425" height="344"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;http://www.aap.org/advocacy/releases/jan08coughandcold.htm&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यू एस फुड़ ऐन्ड ड्रग ऐडमिनिस्ट्रेशन ने खास इस बात पर ज़ोर दिया है कि दो साल से छोटे बच्चों को ओवर द काउंटर मिलने वाली यह दवाईयाँ हरगिज़ नहीं देनी चाहिए। इनसे जान तक को खतरा हो सकता है। छह साल से छोटे बच्चों में इनकी उपयोगिता साबित नहीं है। इन्हे लेने पर मृत्यु, फिट्स(कंपकंपी),हृदय की गति तेज़ होना या अचेत होना रेकार्ड किया गया है। आम तौर पर यूँ बहुत देखने में ना भी आये तो भी छह साल से छोटे बच्चों में इनसे वाँछित लाभ भी नहीं मिलता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बच्चों और बड़ो मे फर्क है। एक ही दवा की प्रतिक्रिया दोनो में अलग तरीके से होती है। जिस दवा से बड़ों मे कोई हानि नहीं होती बच्चों में वे गँभीर नुकसान पहुँचा सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एफ ड़ी ए ने दवाईयों के लेबल मे इन बातों को साफ करने की राय रखी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घरेलू नुस्खों के अलावा सलाइन नेसल ड्रॉप्स से फायदा भी होता है और नुकसान भी नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अधिक जानकारी के लिए इस साइट पर जायें( www.aap.org/publiced/BR_Infections.htm &lt;br /&gt;http://www.aap.org/new/kidcolds.htm)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले अक्टूबर में जो दवाइयाँ लौटा दी गई थी&lt;br /&gt;(Cough and cold medicines withdrawn in October 2007): &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Dimetapp(R) Decongestant Plus Cough Infant Drops, &lt;br /&gt;Dimetapp(R) Decongestant Infant Drops, &lt;br /&gt;Little Colds(R) Decongestant Plus Cough, &lt;br /&gt;Little Colds(R) Multi-Symptom Cold Formula, &lt;br /&gt;PEDIACARE(R) Infant Drops Decongestant (containing pseudoephedrine), &lt;br /&gt;PEDIACARE(R) Infant Drops Decongestant &amp; Cough (containing pseudoephedrine), &lt;br /&gt;PEDIACARE(R) Infant Dropper Decongestant (containing phenylephrine), &lt;br /&gt;PEDIACARE(R) Infant Dropper Long-Acting Cough, &lt;br /&gt;PEDIACARE(R) Infant Dropper Decongestant &amp; Cough (containing phenylephrine), &lt;br /&gt;Robitussin(R) Infant Cough DM Drops, &lt;br /&gt;Triaminic(R) Infant &amp; Toddler Thin Strips(R) Decongestant, &lt;br /&gt;Triaminic(R) Infant &amp; Toddler Thin Strips(R) Decongestant Plus Cough, &lt;br /&gt;TYLENOL(R) Concentrated Infants' Drops Plus Cold, &lt;br /&gt;TYLENOL(R) Concentrated Infants' Drops Plus Cold &amp; Cough &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;FDA  की सलाह&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-लेबल हमेशा देखें। उसमें ऐक्टिव इनग्रीडियन्ट (“active ingredients”)देखें । कई बार कई सारी अलग अलग असर की दवाओं का काकटेल होती हैं ऐसी दवाईयाँ (an antihistamine, a decongestant, a cough suppressant, an expectorant, or a pain reliever/fever reducer)। आप अगर एक से अधिक ऐसी दवा दें तो शायद सेफ लिमिट से ज्यादा देकर बच्चे को नुकसान पहुँचा सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-दवा का लेबल खास चेक करें। उसके निर्देश का पालन करें। इसमें दी गई चम्मच या मेशरिंग कप से ही दवा दें। अंदाज़े से दवा कभी नहीं दे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- बच्चों से दवा हमेशा दूर रखें। हो सके तो चाइल्ड सेफ ढक्कन वाली दवा ही खरीदें। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- कभी भी इन दवा का इस्तेमाल बच्चों को सुलाने के लिए ना करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- सर्दी जुकाम आम सी बिमारी है। अगर शंका हो कि तकलीफ कुछ और भी हो सकती है तो डॉक्टर तक पहुँचने में देर ना करें । &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;http://www.youtube.com/watch?v=zE6rYqaWjkU&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="344"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/zE6rYqaWjkU&amp;hl=en&amp;fs=1"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/zE6rYqaWjkU&amp;hl=en&amp;fs=1" type="application/x-shockwave-flash" allowfullscreen="true" width="425" height="344"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6012202322442671087-8157506461267210989?l=drbejisdesk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/feeds/8157506461267210989/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6012202322442671087&amp;postID=8157506461267210989&amp;isPopup=true' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/8157506461267210989'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/8157506461267210989'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/2008/10/blog-post_15.html' title='जुकाम की दवा और नुकसान'/><author><name>Beji</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16964389992273176028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://thumb18.webshots.net/t/16/16/4/0/43/2989400430101162518uaiKLi_th.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SPNbCgw8P3I/AAAAAAAADCc/dNJlmt1xRnY/s72-c/cold.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6012202322442671087.post-337544182522885127</id><published>2008-10-05T02:17:00.000-07:00</published><updated>2008-10-05T02:29:25.519-07:00</updated><title type='text'>बच्चे के दूध में मेलामिन!!</title><content type='html'>कुछ  समय से मेलामिन लगातार ध्यान खींच रहा है। मेलामिन जिससे खूबसूरत क्रौकरी तैयार होती है....बहुत ही अलग और गलत जगह में काफी मात्रा में पाया गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जगह थी पेट्स फूड...। अमेरिका में जब पालतू जानवर अचानक से किडनी फेल्यर से मरने लगे तो लगा कोई गंभीर महामारी फैल रही है। थोड़ा विश्लेषण करने पर इस तकलीफ की वजह मिली - चीन से एक्सपोर्ट हुए पेट्स फूड में मेलामिन की मिलावट। कई जानवर इंसानी लालच और पैसा कमाने के शार्टकट्स में शहीद हो गये। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;http://www.youtube.com/watch?v=s8U9we0HEQg&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="344"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/s8U9we0HEQg&amp;hl=en&amp;fs=1"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/s8U9we0HEQg&amp;hl=en&amp;fs=1" type="application/x-shockwave-flash" allowfullscreen="true" width="425" height="344"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर बात जानवरों के खाने तक सीमित होती तो फिर भी नुकसान की आशंका कम होती। पर चीन में हज़ारों की संख्या में बच्चे बीमार होने लगे। करीबन पचास हज़ार से अघिक बच्चे गुर्दे की निष्क्रियता की वजह से मर गये। सैंकड़ों अभी भी बीमार है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सानलू नाम की कंपनी के मिल्क पावडर में मेलामिन पाया गया। यीली, जो की ओलंपिक गेम्स में बतौर स्पौंसर रही....उस के मिल्क पावडर में भी मेलामिन की मात्रा अधिक पाई गई। Nestle जैसे ब्रैन्ड्स भी यकीन से मेलामिन के होने को झुठला नहीं सकते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो कंपनियाँ अपनी प्रतिष्ठा को लेकर चिंतित थी...उन्होने बाज़ार से अपना पावडर उठवा लिया। छोटी कंपनियों के लिए यह बहुत ही बड़ा घाटा सिद्ध होता...तो वे अब भी बाज़ार में हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;http://www.youtube.com/watch?v=prLr1PNCeSg&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="344"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/prLr1PNCeSg&amp;hl=en&amp;fs=1"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/prLr1PNCeSg&amp;hl=en&amp;fs=1" type="application/x-shockwave-flash" allowfullscreen="true" width="425" height="344"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बच्चों के दूध में आखिर कौन और क्यों मेलामिन मिला रहा है??&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कौन का जवाब भी बहुत साफ नहीं है- शायद इन कंपनियों में दूध की आपूर्ति करने वाला नहीं तो स्वयं निर्माता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;क्यों&lt;/strong&gt;- &lt;br /&gt;ताकि प्रोटीन की मात्रा अधिक दिख सके। प्रबंध कर्ताओं का ध्यान या संशय अब तक इस ओर नहीं था। इसीलिए क्वालिटी जाँच में मेलामिन आँकने का प्रावधान भी नहीं था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आखिर मेलामिन क्या है और किस तरह पहुँचाता है नुकसान??&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेलामिन एक ऑर्गैनिक कंपाउन्ड है C3H6N6(1,3,5-triazine-2,4,6-triamine )। इसमें व्याप्त नाइट्रोजन की मात्रा की वजह से ही यह गलत प्रोटीन की रीड़िंग देता है। जो लोग मेलामिन जैसी चीज़ नवजात शिशु के दूध में मिलाने में हिचकिचाते नहीं....जाहिर है वे मेलामिन की शुद्धता पर भी घ्यान नहीं दे सकते। सायन्यूरिक एसिड़ जैसे ऐसिड के होने पर मेलामिन के नुकसान करने की क्षमता कई गुना बढ़ जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह गुर्दे पर सीधा असर करती है। बहुत समय तक इस्तेमाल करने पर किड़नी स्टोन्स, मूत्राशय के कैन्सर , किड़नी फेल्यर और मौत तक हो सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बच्चों मे इस रोग के होने के लक्षण&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किड़नी के फेल होने और किड़नी स्टोन्स के होने जैसे ही लक्षण देखने में आये हैं&lt;br /&gt;- बच्चे का बेहिसाब रोना, खास कर पेशाब करते समय। उल्टी के जैसा लगना&lt;br /&gt;- पेशाब में खून ( जाहिर या माइक्रोस्कोपिक)&lt;br /&gt;- पेशाब का कम होना या बिल्कुल बंद हो जाना&lt;br /&gt;- ब्लड प्रेशर का बढ़ना&lt;br /&gt;- पीठ पर किढनी की जगह पर थपथपाने पर दर्द का उठना&lt;br /&gt;- बुखार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर बच्चों में ऐसे लक्षण दिखें तो शक करने के लिए जानना जरूरी है कि पावड़र मिल्क का इस्तेमाल किया गया या नहीं।&lt;br /&gt;करीबन तीन महीने के लगातार इस्तेमाल के बाद ही अक्सर लक्षण दिखते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेलामिन का दूध के पावडर में होने की जाँच आम लैबोरेटरी में नहीं की जा सकती। हालांकि,स्पेक्ट्रोमेट्री से बहुत आसानी से पता लगाया जा सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो भी हो शक के घेरे में आई ऐसी बात सूचित करना जरूरी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समय बदल रहा है। कई लोग शॉर्टकट्स अपना कर हम आप की जान जोखिम में ड़ाल धनवान होने का प्रयत्न कर रहे हैं। वे हमारे भविष्य को बीमार कर रहे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई बार तो लगता है काफी हद तक हम भी जिम्मेदार हैं। स्तनपान की जगह मिल्क पावड़र का चुनाव भी एक किस्म का शॉर्टकट ही है। छह महीने बाद भी सहूलियत के लिए जो माँये दूध के पावडर को ही मुख्य आहार रहने देती हैं...वह भी ऐसी स्थिति की जिम्मेदार हैं। हम सब जो हमारे सिस्टम को मिल्क पावड़र टेस्ट करने के लिए बाध्य नहीं कर सकते जिम्मेदार हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;....याद रहे बात बच्चों के दूध से सामने आई है। इस बात की गुंजाईश बहुक अधिक है कि आप खा रहे चॉकलेट, पी रहे चाय और मिठाइयों में मेलामिन है। इनमें इस्तेमाल हो रहे मिल्क पावड़र में मेलामिन की मात्रा की जाँच नहीं की गई है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चीन के पेट फूड़ एक्सपोर्ट करने की वजह से स्पॉटलाइट उन पर है......जहाँ स्पॉटलाइट नहीं है...उस अँधेरे में पता नहीं हमारे और हमारे बच्चों के खाने में कौन सा जहर मिलाया जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या हम सचेत हैं??&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;The videos have been used strictly for educational purposes.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6012202322442671087-337544182522885127?l=drbejisdesk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/feeds/337544182522885127/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6012202322442671087&amp;postID=337544182522885127&amp;isPopup=true' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/337544182522885127'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/337544182522885127'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/2008/10/blog-post.html' title='बच्चे के दूध में मेलामिन!!'/><author><name>Beji</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16964389992273176028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://thumb18.webshots.net/t/16/16/4/0/43/2989400430101162518uaiKLi_th.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6012202322442671087.post-583961001185477469</id><published>2008-09-11T08:54:00.000-07:00</published><updated>2008-09-15T07:54:00.469-07:00</updated><title type='text'>ऑटिस्म- पिछली चर्चा के आगे</title><content type='html'>मुझे यकीन नहीं था ऑटिस्म मे सब इतनी दिलचस्पी लेंगे । पोस्ट लिखने में देरी हुई इसके लिये क्षमा चाहती हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछली पोस्ट में कई सवाल उठे,ऐसे सवाल जिन्हे संक्षिप्त में जवाब नहीं देना चाहती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ऑटिस्म की वजह क्या है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच कहा जाये तो ठीक जानकारी नहीं है। अनुमान है की जेनिटिक्स का रोल है। कुछ परिवार के बच्चों में इससे  ग्रसित होने की संभावना अधिक होती है। फिर भी एक सटीक वजह बता पाना संभव नहीं हुआ है। कुछ अनस्टेबल जीन्स से इसके होने की आशंका बढ़ जाती है। कुछ लोगों का मानना है की गर्भ के दौरान हुए वायरल इनफेक्शन्स, मेटाबोलिक डिसौर्डर्स या कुछ कैमिकल्स के संपर्क में आना  इस रोग का कारण बन सकता है।&lt;br /&gt;फ्रैजाइल एक्स सिन्ड्रोम (Fragile X syndrome),ट्यूबरस स्क्लीरोसिस(tuberous sclerosis), कनजनाइटल रुबैल्ला सिन्ड्रोम( congenital rubella syndrome),ऐस्पर्जर्स सिन्ड्रोम (Asperger's syndrome)और फिनाइलकीटोनयूरिया untreated phenylketonuria ऐसी कुछ अवस्था हैं जिनमें ऑटिस्म की संभावना बढ़ जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परिवेश भी इसके लिए जिम्मेदार हो सकता है। कई भारी धातुओं को,जैसे की मरकुरी का एक मात्रा से अधिक संपर्क में आने को कुछ लोग दोषी मानते हैं। उनका कहना है की ऐसे बच्चों में इसको शरीर से दूर करने की पद्धति में खोट होता है और इनके रहने से जो रोग दबा हुआ होता है, वह जाहिर हो जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;क्या टीकों का इनसे कोई संबंघ है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसका भी साफ साफ जवाब नहीं है। लेकिन कुछ टीकों को दोषी माना गया था। कुछ समय पहले यह वात काफी चर्चा में थी। खास तौर पर एम एम आर (MMR) इसकी वजह इन टीकों में प्रस्तुत मरकुरी को माना गया था। ठीक ठीक ऐसी बात का सबूत नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो भी है शोध जारी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;http://www.youtube.com/watch?v=zN20SkRgGz0&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="344"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/zN20SkRgGz0&amp;hl=en&amp;fs=1"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/zN20SkRgGz0&amp;hl=en&amp;fs=1" type="application/x-shockwave-flash" allowfullscreen="true" width="425" height="344"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक खास चौकसी की आवश्यकता फ्लू वैक्सीन्स को लेकर है। इसमें मरकुरी की मात्रा 25 माइक्रो ग्राम है। यह मात्रा बाकी सभी टीकों को मिलाकर भी देखा जाये तो ज्यादा है (0.4 माइक्रो ग्राम)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब तक इस बात की पुष्टी नहीं हो जाती कुछ भी पक्के तौर पर कहना गलत होगा। किंतु जिन बच्चों को ऑटिस्म है उनके भाई बहन मे, या जिन में जेनिटिकली ऐसे रोग की सँभावना है वहाँ सावधानी बरतना ही बेहतर होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;क्या ऑटिस्म वास्तव में इतनी शीघ्रता से बढ़ रहा है? अगर हाँ तो क्यों?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर अंकों पर जाये तो हाँ ही जवाब होगा। किंतु एक खास बात जिसे नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता वो यह है की ऑटिस्म की परिभाषा, उसके प्रति सतर्कता, उसपर लगे अंकुश,उसकी विविघता की स्वीकृति, समाज और पाठशाला में खास ध्यान -इन बातों में तेजी से बदलाव आया है। हो सकता है की अंकों पर इन बातो का असर पड़ा हो। फिर भी यह भी सच है की इतने बच्चों को ऐसी तकलीफ है और उन्हे और उनके परिवार को हमारे स्वीकृति और दिलासे की जरूरत।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ऑटिस्म से ग्रसित होने की उम्र कब है? क्या किसी व्यस्क को किसी ट्रौमा के बाद ऑटिस्म हो सकता है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SMk-nO4zolI/AAAAAAAAC9Y/1wIeP3Vm02w/s1600-h/autism1.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SMk-nO4zolI/AAAAAAAAC9Y/1wIeP3Vm02w/s320/autism1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5244792084781834834" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन बच्चो को ऑटिस्म होती है उनमें ऐसी प्रवृति रहती है। कई बार कुछ वक्त गुजरने के बाद ही इसके लक्षण समझ आते हैं। कुछ में टीकों के बाद प्रवृति में खास गिरावट देखी गई है।  कुछ के कारण उनमें मौजूद जेनेटिक रोग हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुल मिलाकर बात यह है की जो रोग उपस्थित है ,इसका निदान कब हो पाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी ट्रौमा के बाद ऐसे लक्षण दिख सकते हैं। मनुष्य के दिमाग के कनेक्शन्स इतने जटिल है की कहीं कोई केबल के टूट जाने पर ऐसे लक्षण जाहिर हो सकते हैं। किंतु इन्हे ऑटिस्म नहीं कह सकते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाँ जिन्हे ऑटिस्म है...वह व्यस्क हो जाये तब भी ऑटिस्टिक ही रहते हैं। कोई और मानसिक दबाव इनपर ज्यादा बुरा असर दिखाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम सब कई बार अपने स्वस्थ, सामान्य बच्चों से परेशान हो जाते हैं। उनकी नादानियों कभी परेशान करती है, उनकी जरूरतें कभीकबार हमारे समय पर एक डिमांड सा महसूस होती हैं....। थकान, तनाव और रोज़मर्रा की जिन्दगी के अपने अलग किस्से हैं...ऐसे में ऐसे बच्चों की परवरिश करना आसान नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज की यह पोस्ट ऐसे बच्चों और उनसे जुड़े हर माता पिता और केयरगीवर को समर्पित।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;http://www.youtube.com/watch?v=03bcE9xYKos&amp;feature=related&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="344"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/03bcE9xYKos&amp;hl=en&amp;fs=1"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/03bcE9xYKos&amp;hl=en&amp;fs=1" type="application/x-shockwave-flash" allowfullscreen="true" width="425" height="344"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Refeences&lt;br /&gt;www.autism-society.org&lt;br /&gt;www.autismkey.net&lt;br /&gt;http://www.time.com/time/magazine/article/0,9171,1576829,00.html&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;All pictures and videos have been used only for educational purposes, in case any copyright violation is done, notify the picture or video will be removed immediately.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6012202322442671087-583961001185477469?l=drbejisdesk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/feeds/583961001185477469/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6012202322442671087&amp;postID=583961001185477469&amp;isPopup=true' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/583961001185477469'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/583961001185477469'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/2008/09/blog-post.html' title='ऑटिस्म- पिछली चर्चा के आगे'/><author><name>Beji</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16964389992273176028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://thumb18.webshots.net/t/16/16/4/0/43/2989400430101162518uaiKLi_th.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SMk-nO4zolI/AAAAAAAAC9Y/1wIeP3Vm02w/s72-c/autism1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6012202322442671087.post-4308550748644316162</id><published>2008-08-26T03:32:00.000-07:00</published><updated>2008-08-26T04:00:34.306-07:00</updated><title type='text'>ऑटिस्म</title><content type='html'>जिस विषय पर आज चर्चा करना चाहती हूँ....उसके लिए थोड़ा समय निकाल कर चिंतन करना जरूरी है। हर बीस मिनट में एक बच्चा ऑटिस्म लेबल्ड। इसके विषय में हमारी जानकारी सीमित।&lt;br /&gt;अगर हम अमेरिका और आसपास की जगह के सर्वे पर एक नज़र ड़ालें तो महसूस होता है की यह एक ऐसी अवस्था है जो दिन ब दिन बढ़ती जा रही है। एक ऐसी चुनौती है जिसके बारे में जानना हमारे लिए आवश्यक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SLPZhK1ljLI/AAAAAAAACzY/gumYv3YXOJQ/s1600-h/untitled.bmp"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SLPZhK1ljLI/AAAAAAAACzY/gumYv3YXOJQ/s400/untitled.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5238769955430042802" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;http://www.fightingautism.org/idea/autism.php&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऑटिस्म यानि आत्मानुचिंतन या स्वलीनता ।&lt;br /&gt;एक नज़र में ऑटिस्म से ग्रसित बच्चे बाकी बच्चों से अलग नहीं दिखते। इसी वजह से इन बच्चों को अक्सर ज्यादा शैतान और जाहिल समझा जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;http://www.youtube.com/watch?v=IWyrit6i9aI&amp;feature=related&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="344"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/IWyrit6i9aI&amp;hl=en&amp;fs=1"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/IWyrit6i9aI&amp;hl=en&amp;fs=1" type="application/x-shockwave-flash" allowfullscreen="true" width="425" height="344"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऑटिस्म आखिर है क्या ?! यह एक ऐसी अवस्था है जो मस्तिष्क के सामर्थ्य को कम करती है। इससे ग्रसित व्यक्ति की  अपने आसपास की बात की समझ और उस पर प्रतिक्रिया अनुपयुक्त होती है। इस कारण उनका स्वभाव बाकियों से भिन्न होता है।&lt;br /&gt;उन्हे जरूरत और चाह के हिसाब से उपयुक्त शब्द नहीं मिलते। कई बार सही शब्द की तलाश में एक ही शब्द या वाक्य दोहराते जाते हैं। लोगों की बात ना समझ पाना एक बड़ी उलझन होती है। हर शब्द साफ सुनने के बावजूद वे उसका सही अर्थ समझने में असमर्थ होते हैं। ऐसे बच्चे के मन के भाव तेजी से बदलते हैं। जो बच्चा हाल में प्रसन्न दिखता है अगले ही क्षण दुखी, खीजा हुआ, गुस्सैल हो सकता है। कोशिश करने पर भी अपनी बात व्यक्त ना कर पाने की बेबसी इसकी वजह हो सकती है। कई बार वजह समझ पाना मुश्किल होता है। सच तो यह है की वजह बहुत कुछ और कुछ भी हो सकता है। इन वजहों की लिस्ट बनाना नामुमकिन ना सही बहुत ही मुश्किल साबित होता है। यह अपने आप में इन बच्चों और इनका ध्यान रखने वाले और परवरिश करने वालों के लिए चुनौती साबित होता है। उलझनें, भ्रांतियाँ,निराशा और कुण्ठा बढ़ती जाती है। बहुत बच्चे एक ही पद्धति से कार्य करते हैं। इसमें ज़रा भी फेर करने पर स्वभाव बदल जाता है। कई गुस्सैल, परेशान, निराश हो जाते हैं नहीं तो डर जाते हैं। हर चीज़ अगर एक निर्धारित क्रम में चलता रहे तो वे संतुष्ट रहते हैं और अगर परिस्थिति का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सके तो स्वयं को असुरक्षित पाते हैं। एक  अवस्था से दूसरे तक जाने में भी उनका संतुलन खोता है।&lt;br /&gt;हकीकत इन्हे भ्रमित करती है। एक बात और चीज़ को दूसरे से जोड़ कर देखना इनके लिए बहुत मुश्किल होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऑटिस्म को स्पेक्ट्रम डिसॉर्डर कहते हैं। हर बच्चे को  यह अलग मात्रा में  ग्रसित करती है । कुछ को कम, कुछ को ज्यादा। हर बच्चा अलग।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आम तौर पर तीन बातों में कमी पाई जाती है&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;संवाद&lt;br /&gt;कल्पना&lt;br /&gt;अंतःक्रिया &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जितनी आसानी से एक आम बच्चे के लिए दुनिया का होना है....उतना ही मुश्किल है ऐसे बच्चे का दुनिया की साधारण बातों को समझना। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SLEP_vioLLI/AAAAAAAACyI/XMQHFzBa2VQ/s1600-h/autism_card.gif"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SLEP_vioLLI/AAAAAAAACyI/XMQHFzBa2VQ/s320/autism_card.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5237985429376478386" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ आम तौर पर दिखने वाले लक्षण&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बोलचाल का कम होना&lt;br /&gt;भाषा से अलग आवाज़ निकालना&lt;br /&gt;देर से बोलना सीखना&lt;br /&gt;एक ही शब्द,वाक्य बार बार बोलना&lt;br /&gt;मैं और तुम जैसे सर्वनाम के प्रयोग में गलती करना&lt;br /&gt;मेलमिलाप कम करना और नापसंद करना&lt;br /&gt;आँख ना मिलाना&lt;br /&gt;पूछी बात पर प्रतिक्रिया ना देना&lt;br /&gt;चिढ़चिढ़ा पहना&lt;br /&gt;हाथों से विशेष लगाव&lt;br /&gt;हाथ हिलाते रहना,कूदना,गोल घूमना, बैलेंस बनाने की कोशिश करना,ऐड़ी पर चलना&lt;br /&gt;कुछ आवाज़ों को सख्त नापसंद करना&lt;br /&gt;कुछ कपड़ों, खाने की चीज़ों को नापसंद करना&lt;br /&gt;पैटर्न्स में बात दुहराना&lt;br /&gt;अनिच्छुक रहना&lt;br /&gt;खुद को नुकसान पहुँचाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनमें से कई बातें हो सकती है और कई नहीं भी। हर बात की तीव्रता भी अलग हो सकती है। हर बच्चा अलग होता है...और उसका सामर्थ्य भी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे पास एक ही विकल्प है....सही दृष्टिकोण चुनने का....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;http://www.youtube.com/watch?v=_IhG9CgQ49g&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="344"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/_IhG9CgQ49g&amp;hl=en&amp;fs=1"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/_IhG9CgQ49g&amp;hl=en&amp;fs=1" type="application/x-shockwave-flash" allowfullscreen="true" width="425" height="344"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ गलत धारणायें&lt;br /&gt;1. ऑटिस्म से ग्रसित बच्चे कभी आँख नहीं मिलाते।&lt;br /&gt;ऐसा नहीं है। और काफी बच्चे निरंतर प्रयास करने के बाद सीखते भी हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2.ऐसा बच्चा जीनियस होता है।&lt;br /&gt;हर आई क्यू का बच्चा ऑटिस्टिक हो सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;3.ऐसा बच्चा प्यार नहीं दिखाता, समझता।&lt;br /&gt;प्यार की अभिव्यक्ति इन बच्चों के लिए मुश्किल जरूर है...असँभव नहीं। लगातार कोशिश के बाद बच्चे प्यार जताना और दिखाना सीख जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;4.बच्चे में सुधार का मतलब बच्चे को तकलीफ नहीं है।&lt;br /&gt;सुधार का मतलब प्रयास, स्नेह और साँत्वना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;5.मुस्कुराते बच्चे का मतलब वह ऑटिस्टिक नहीं है।&lt;br /&gt;गलत। हर लक्षण की तीव्रता अलग हो सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;6.समय के साथ ऑटिस्म पीछे छूट जाता है।&lt;br /&gt;नहीं।इसे उपचार और लगातार प्रयास की जरूरत है। जिसके बाद ऐसे बच्चे अर्थपूर्ण जीवन पा सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;7.खराब परवरिश इसके लिए जिम्मेदार है।&lt;br /&gt;गलत&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;http://www.youtube.com/watch?v=eoUx4D4rdro&amp;feature=related&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="344"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/eoUx4D4rdro&amp;hl=en&amp;fs=1"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/eoUx4D4rdro&amp;hl=en&amp;fs=1" type="application/x-shockwave-flash" allowfullscreen="true" width="425" height="344"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो तरह के टेस्ट हैं जिनसे ऑटिस्म के होने की आशंका जताई जा सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;CHAT(Checklist for Autism in Toddlers  test) &lt;br /&gt;http://www.paains.org.uk/Autism/chat.htm&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ATEC Test(Autism Treatment Evaluation Checklist )&lt;br /&gt;http://www.autism.com/ari/atec/&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई भी शंका के होने पर बाल रोग विशेषज्ञ नहीं तो चाइल्ड सायकोलोजिस्ट से मिलें। किसी निश्चय पर स्वयं पहुँचने के अपने खतरे हैं। इस अवस्था के होने पर सही निदान और उपचार और लगातार प्रयास जरूरी है। सही दृष्टिकोण हो तो ऐसे बच्चे अर्थपूर्ण अस्तित्व पा सकते हैं।  ऐसे बच्चे निर्धारित लक्ष्य पा सकते हैं। जीवन में कुछ बन सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऑटिस्म अभिव्यक्ति के गूंगेपन जैसी अवस्था है । व्यक्तित्व पर एक ऐसा ताला जिसकी चाभी गुम हो। एक व्यक्ति स्वयं अपने शरीर मे कैद। ऐसी बेबसी की कल्पना भी हमारे लिए मुश्किल है। इस रोग से जूझते बच्चे और उनका परिवार हमसे सिर्फ स्वीकृति चाहते हैं। यह अलग हैं..बुरे नहीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;All pictures and videos have been used solely for educational purposes . If there is any copyright violation please inform; the pictures or videos will be removed immediately.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6012202322442671087-4308550748644316162?l=drbejisdesk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/feeds/4308550748644316162/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6012202322442671087&amp;postID=4308550748644316162&amp;isPopup=true' title='17 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/4308550748644316162'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/4308550748644316162'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/2008/08/blog-post_26.html' title='ऑटिस्म'/><author><name>Beji</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16964389992273176028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://thumb18.webshots.net/t/16/16/4/0/43/2989400430101162518uaiKLi_th.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SLPZhK1ljLI/AAAAAAAACzY/gumYv3YXOJQ/s72-c/untitled.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>17</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6012202322442671087.post-6081490749798790473</id><published>2008-08-13T01:53:00.001-07:00</published><updated>2008-08-13T04:36:58.435-07:00</updated><title type='text'>जुड़वा बच्चे</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SKKghCLpfLI/AAAAAAAACs8/kKSNwpy6d1Q/s1600-h/twins.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SKKghCLpfLI/AAAAAAAACs8/kKSNwpy6d1Q/s200/twins.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5233922206339792050" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;जुड़वा बच्चों ने हमेशा आकर्षित किया है। बचपन में हमेशा सोचती थी कितना अच्छा होता मेरी भी कोई जुड़वा बहन होती। एक शरीर में तीन दिल....कुदरत का करिश्मा ही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब सगर्भा स्त्री को बताया जाता है तो अक्सर वह खुश से ज्यादा आशंकित हो जाती है। आने वाली कई परेशानियों को सोच कई सवाल उसके मन में उठते हैं। जहाँ तक मैं समझती हूँ कुछ बातों का ध्यान रखा जाये तो यह दुगुने खुशी का अवसर बन सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साधारण गर्भ में जहाँ 9-10 कंसल्टेशन काफी होते हैं वहीं  जुडुवा बच्चों के साथ  इससे ज्यादा की जरूरत है। दो अल्ट्रासाउंड भी काफी नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई भी निश्चित की गई डॉक्टर से मुलाकात नहीं चूकनी चाहिए। रक्तचाप, खून में शक्कर, अनीमिया वगैरह के लिए नियमित जाँच जरूरी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहाँ जुड़वा बच्चों का गर्भ एक सामान्य बात है वहीं इसमें अधिक सावधानी की जरूरत से इंकार नहीं किया जा सकता।&lt;br /&gt;डॉक्टर और सगर्भा की कोशिश होनी चाहिए की गर्भ निर्धारित समय तक टिक सके। अधिकतर  37वे हफ्ते तक ही शिशु गर्भाशय मे रह पाता है। कोशिश होनी चाहिए की किसी भी कारण से शिशु का जन्म समय से पहले ना हो। कई सगर्भा सत्रियाँ पूरे 40 हफ्ते  पूरा करती है और सामान्य प्रसव से ही इन शिशुओं का जन्म भी होता है। 40 वे हफ्ते के बाद भी अगर सामान्य तरीके से प्रसव ना हो तो कुछ डॉक्टर सिज़ेरियन करना पसंद करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो तरह के जुड़वा बच्चे होते हैं। आइडेन्टिकल और नान आइडेन्टिकल( फ्रैटर्नल) । आईडेन्टिकल जुड़वा बच्चे लिंग, रूप रंग, स्वभाव मे एक से होते हैं। आइडेन्टिकल जुड़वा बच्चों के बीच एक ही आँवल (प्लासेंटा)होता हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SJxCp9GP5JI/AAAAAAAACp0/g86rQGmg67U/s1600-h/Twins.png"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SJxCp9GP5JI/AAAAAAAACp0/g86rQGmg67U/s320/Twins.png" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5232130155640513682" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आइडेन्टिकल बच्चों में &lt;strong&gt;ट्विन ट्राँसफ्यूशन सिंड्रोम &lt;/strong&gt; का खतरा अधिक होता है। इसमें एक बच्चे का विकास दूसरे के व्यय से जुड़ जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अल्ट्रासाउंड की सँख्या सामान्य गर्भ से अधिक होनी चाहिए। खास तौर पर 28 से 40 हफ्ते के बीच चौकसी रखना जरूरी है। शिशु  का गर्भाशय में स्थान, आँवल का स्थान, दोनो शिशु का विकास वगैरह ऐसी बातें हैं जिस पर नज़र रखी जानी चाहिए।  &lt;br /&gt;अगर सगर्भा स्त्री  को डायबेटिस या अपस्मार की बिमारी हो तो खास सावधानी बरतनी जरूरी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बात पर जोर देना जरूरी है कि ऐसे में खोराक, पर्याप्त आराम और सही व्यायाम (जैसे की योगा) पर ध्यान अत्यंत आवश्यक है। गर्भ के साथ जुड़ी बाकी परेशानियाँ भी अधिक महसूस हो सकती है। परिवार का सहयोग ऐसे में अहम भूमिका अदा करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;http://www.youtube.com/watch?v=tLPZa4Ydayw&amp;feature=related&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="344"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/tLPZa4Ydayw&amp;hl=en&amp;fs=1"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/tLPZa4Ydayw&amp;hl=en&amp;fs=1" type="application/x-shockwave-flash" allowfullscreen="true" width="425" height="344"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समस्यायें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ समस्यायें खास इस अवस्था से जुड़ी है। समस्या के बारे में पता होगा तो ही समाधान के प्रति सजग हो सकेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;वैनिशिंग ट्विन सिंड्रोम&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;कभी कभार जुड़वा में से एक बच्चा गायब हो जाता है। वजह आँवल, कोई आंतरिक त्रुटि या विकास में कोई अन्य त्रुटि हो सकती है। जो भी हो इससे माँ को बहुत तकलीफ नहीं होती। अल्ट्रासाउंड कर के पता लग सकता है। और यह शुरुआती महीनों में ही अक्सर होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मिसकैरेज&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;इसकी सँभावना सामान्य गर्भ से लगभग दुगुनी होती है। पर सँभावना फिर भी सँभावना ही है। सही देखभाल से  इसका होना काफी हद तक कम किया जा सकता है। और कभी अगर एक शिशु गिर भी जाये कोई जरूरी नहीं दूसरे के साथ भी ऐसा हो। अक्सर दूसरा शिशु स्वस्थ पैदा होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रीएकलम्पसिया&lt;/strong&gt; (सगर्भा अवस्था से बढ़ा रक्तचाप) और &lt;strong&gt;डायबेटिस &lt;/strong&gt;की सँभावना और कठोरता दोनो इस अवस्था मे अधिक होती है। किंतु नियमित डॉक्टर से मिलना और समय पर इलाज इनको नियंत्रण में रख सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्लासेंटल एबरप्शन&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;आँवल पर दरार पडकर टूटना एक गँभीर बात हो सकती है। सही खोराक की कमी और घुम्रपान इसकी कारण बन सकते हैं। इसकी वजह से समय से पहले प्रसव होने की सँभावना भी रहती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;फीटल ग्रोत रेस्ट्रिक्शन&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिशु का विकास अपेक्षा से कम होने की सँभावना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ट्विन ट्राँसफ्यूशन सिंड्रोम &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके लिए सजग रहना आवश्यक है। नियमित जाँच से इसका पता लगाया जा सकता है। निदान होने पर तुरंत सलाह और उपचार जरूरी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;एकार्डियाक ट्विन&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;इसकी सँभावना 1:35000 है।  निदान अल्ट्रासाइंड से हो सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सभी से अधिक सँभावना समय से पहले प्रसव की है। अस्पताल जाने की तैयारी हमेशा रहनी चाहिए। प्रसव के समय होने वाले बदलाव का सही ज्ञान होना चाहिए। ऐसे किसी भी लक्षण के होने पर तुरंत अस्पताल जाना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जुड़वा बच्चों के बारे में बताते हुए महसूस हो रहा है जैसे मैं ऐसी सगर्भा माँ को सचेत और सजग करने से ज्यादा आतंकित कर रही हूँ।  पर मेरी मंशा जहाँ आपकी  बेफिक्री हटाने की है आपको फिक्रमंद करने की नहीं है। बिंदास रहने वाला रवैया &lt;br /&gt;नहीं चल सकता और अगर आप सजग हैं और जिम्मेदार भी तो कुदरत का यह करिश्मा आपकी गोदी में पलेगा...स्वस्थ और तंदुरुस्त&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;http://www.youtube.com/watch?v=3meRrmsZKnM&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="344"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/3meRrmsZKnM&amp;hl=en&amp;fs=1"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/3meRrmsZKnM&amp;hl=en&amp;fs=1" type="application/x-shockwave-flash" allowfullscreen="true" width="425" height="344"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;All pictures and videos are used only for educational purposes . If any copyright violation is done kindly inform ,the picture or video will be immediately removed.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6012202322442671087-6081490749798790473?l=drbejisdesk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/feeds/6081490749798790473/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6012202322442671087&amp;postID=6081490749798790473&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/6081490749798790473'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/6081490749798790473'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/2008/08/blog-post.html' title='जुड़वा बच्चे'/><author><name>Beji</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16964389992273176028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://thumb18.webshots.net/t/16/16/4/0/43/2989400430101162518uaiKLi_th.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SKKghCLpfLI/AAAAAAAACs8/kKSNwpy6d1Q/s72-c/twins.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6012202322442671087.post-8520274333328224858</id><published>2008-06-16T04:22:00.000-07:00</published><updated>2008-06-16T07:59:08.456-07:00</updated><title type='text'>सेरिब्रल पाल्सी (प्रमस्तिष्कीय लकवा)</title><content type='html'>http://www.youtube.com/watch?v=P8xOA8AXOVw&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="344"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/P8xOA8AXOVw&amp;hl=en"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="wmode" value="transparent"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/P8xOA8AXOVw&amp;hl=en" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent" width="425" height="344"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज जिस विषय पर बात होगी वह है सेरीब्रल पाल्सी। यह विषय मेरे दिल के बेहद करीब है। और मैं मानती हूँ कि भले ही हमारा कोई अपना इस से ग्रसित हो कि नहीं हमें इसके बारे में जानना चाहिये। भगवान ने हमें बहुत सारी सौगातों से नवाज़ा है...इस बात का अंदाज़ा सबसे अधिक मुझे ऐसे बच्चे के सामने होता है। ऐसे बच्चे के सामने इस बात का भी अंदाज़ा होता है कि इतनी परिमितता के बावजूद यह नन्हे फरिश्ते अपार स्नेह और कोशिश के काबिल होते हैं ।आज की यह पोस्ट इन बच्चों को समर्पित....जिनके लिये मेडिकल साइंस बहुत कम कर सका है लेकिन जिन्होने जीवन के अमूल्य स्पंदन से मुझे अवगत कराया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या कभी अपनी माँ से अपने पहले कदम या पहले शब्द के बारे में पूछा है....शायद माँ ने बताया हो....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सेरीब्रल पाल्सी से ग्रसित बच्चे की माँ वह लम्हा कभी भूल नहीं सकती..ना जाने कितने इंतज़ार और  तप के बाद नसीब होता है एक ऐसा खूबसूरत सा लम्हा...जिसे हम हमारे जीवन का साधारण और स्वाभाविक पड़ाव मानते हैं।&lt;br /&gt;इन बच्चों में से कुछ व्हील चेयर का इस्तेमाल करते हैं,कुछ बैसाखी का, कोई ठीक से बात नहीं कर सकता तो कई खुद को किसी भी तरह व्यक्त करने में असमर्थ होते हैं।&lt;br /&gt;हज़ारों की सँख्या में शिशु और बच्चे इससे हर साल ग्रसित हो जाते हैं। यह संक्रामक नहीं होता। पर यह लकवा है जो दिमाग और शरीर को मार जाता है।&lt;br /&gt;ऐसे बच्चे का इसकी माँस पेशियों पर इच्छित नियंत्रण नहीं होता। मस्तिष्क ही हमें कौन सा काम, किस समय, किस तरह करना है बताता है। चूँकी सेरिब्रल पाल्सी (प्रमस्तिष्कीय लकवा) मस्तिष्क पर असर करता है , जिस हिस्से पर असर होता है उससे उसका प्रभाव निर्धारित होता है। अत: ऐसा बच्चा खाने पीने,खेलने कूदने, चलने -उठने मे असमर्थ हो सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सेरिब्रल पाल्सी (प्रमस्तिष्कीय लकवा) के प्रकार&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SEbnvDBwRUI/AAAAAAAABXQ/JXhByKtjxpc/s1600-h/types_of_cp.gif"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SEbnvDBwRUI/AAAAAAAABXQ/JXhByKtjxpc/s320/types_of_cp.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5208104814553089346" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;http://www.youtube.com/watch?v=xXXH2a-thB4&amp;feature=related&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="344"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/xXXH2a-thB4&amp;hl=en"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="wmode" value="transparent"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/xXXH2a-thB4&amp;hl=en" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent" width="425" height="344"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;तीन प्रकार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्पास्टिक  &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे ग्रसित बच्चा अपनी माँस पेशियों को ढ़ीला छोड़ने में असमर्थ होता है। माँस पेशियाँ सिंकुड़े हुए अवस्था में लगातार रहती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अथीटोइड&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे ग्रसित बच्चा अपनी माँस पेशियों पर सही नियंत्रण नहीं रख पाता। लिहाजा ग्रसित माँस पेशियाँ अचानक से फड़फड़ा सकती हैं,उनमें कोई हरकत हो सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अटैक्सिक&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे ग्रसित बच्चा संतुलन और सही तालमेल नहीं बना पाता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मस्तिष्क का कितना और कौन सा हिस्सा ग्रसित हुआ है निर्धारित करता है कि बच्चे को तकलीफ कितनी होगी। अगर दोनो हाथ और पैर पर प्रभाव पड़े तो व्हील चेयर की आवश्यकता पड़ सकती है,अगर दिमाग का जो हिस्सा वार्तालाप का नियंत्रण करता है ग्रसित हो तो बच्चे के बात करने की क्षमता पर असर पड़ता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सेरिब्रल पाल्सी (प्रमस्तिष्कीय लकवा) के कारण&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सही सही कारण ज्ञात नहीं है। कई बार जन्म के समय शिशु के मस्तिष्क पर आघात कारण बनता है। कई बार  समय से पहले  शिशु के प्रसव होने की वजह से अपूर्ण विकास कारण बनता है। जन्म पश्चात शिशु को हुई कोई तकलीफ की वजह से ऐसा हो सकता है। पर फिर भी अक्सर जन्म पूर्व मस्तिष्क को पहुँची हानि ही इसका कारण बनती है। इसकी कोई खास वजह अभी तक ढूँढ़ी नहीं जा सकी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;डॉक्टर की भूमिका&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डॉक्टर इसका निदान करने में सहायक होता है। इस बात का पता लगाता है कि शिशु किसी और रोग की वजह से ऐसा नहीं है। रोग के तीव्रता और असर का सही अंदाज़ा लगाता है। और बच्चे और माता पिता को इससे जूझने में मदद करता है। छोटी छोटी बातें, कुछ दवाइयाँ, कसरत, सही सहायक उपकरण, सीखने और सिखाने में मदद करता है। माँस पेशियों की विभिन्न तकलीफ को समझ उपयुक्त उपाय किया जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिशु के करीबन &lt;strong&gt;अठारह महीने &lt;/strong&gt;होने तक इस रोग की पुष्टी की जा सकती है। विकास की सीढीयों में कुछ असामान्य या देरी होना इसका परिचायक होते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सेरिब्रल पाल्सी (प्रमस्तिष्कीय लकवा)के साथ जीना&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस रोग से ग्रसित होना या ऐसे बच्चे की देखरेक करना काफी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।बच्चे के मस्तिष्क का दोष समय के साथ बिगड़ता नहीं है बल्कि ज्यों का त्यों रहता है। किंतु लगातार माँसपेशियों में तनाव या दूसरी तकलीफ की वजह से स्थिति बिगड़ सकती है। इसीलिये ऐसे बच्चे को उपचार की जरूरत होती है। यह उपचार शारीरिक, मानसिक, वाक शक्ति पर केंद्रित हो सकती है। कई बार शल्य क्रिया की भी जरूरत पड़ सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सेरिब्रल पाल्सी के होने का मतलब बच्चे के सार्थक जीवनयापन करने में असमर्थ होना नहीं है। यह बच्चा सोच सकता है, महसूस कर सकता है, समझ सकता है, दोस्त बना सकता है, खेलना चाहता है, हँस सकता है.....। हाँ उसकी अपनी सीमायें हैं....और बाकी बच्चों से फरक भी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह बच्चे और इनके माता पिता हमसे स्वीकृति चाहते हैं, थोड़ी संवेदनशीलता ...थोड़ी सी मदद और इनके बारे में थोड़ी सी समझ। वे अपनी खुद की जगह पूर्ण अधिकार से लेना चाहते हैं। जितनी कोशिश से वे अपनी बात कहते हैं...वे चाहते हैं कि हम थोड़े धीरज से उन्हे सुन लें। उन्हे अवसर दें और स्नेह भी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पता नहीं क्यों पर हमेशा उनसे जो स्नेह मिला है हमेशा दिल भर गया है। आठ साल के पुलकित के असंतुलित हाथ से बने फूल और उनसे लिखे डगमगाये अक्षरों में मेरा नाम....उसकी वॉकर पर टिकी काया और चश्मे के पीछे से मुस्कुराता चेहरा...&lt;br /&gt;ऐसे में जीवन से कई शिकायतें यूँ ही पिघल गई है ...और रूह आनन्दित हुई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;http://www.youtube.com/watch?v=FDB8dCag3yk&amp;feature=related&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="344"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/FDB8dCag3yk&amp;hl=en"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="wmode" value="transparent"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/FDB8dCag3yk&amp;hl=en" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent" width="425" height="344"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;The videos here have been used solely for educational purposes.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6012202322442671087-8520274333328224858?l=drbejisdesk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/feeds/8520274333328224858/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6012202322442671087&amp;postID=8520274333328224858&amp;isPopup=true' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/8520274333328224858'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/8520274333328224858'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/2008/06/blog-post.html' title='सेरिब्रल पाल्सी (प्रमस्तिष्कीय लकवा)'/><author><name>Beji</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16964389992273176028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://thumb18.webshots.net/t/16/16/4/0/43/2989400430101162518uaiKLi_th.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SEbnvDBwRUI/AAAAAAAABXQ/JXhByKtjxpc/s72-c/types_of_cp.gif' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6012202322442671087.post-6370370170677616490</id><published>2008-05-29T04:21:00.000-07:00</published><updated>2008-05-29T04:46:38.404-07:00</updated><title type='text'>शिशु की त्वचा- भाग 2</title><content type='html'>पिछली कड़ी के आगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डायपेर रैश&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SDpo0SC3RaI/AAAAAAAABPQ/22Mu3tOhtcs/s1600-h/diaperrash.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SDpo0SC3RaI/AAAAAAAABPQ/22Mu3tOhtcs/s320/diaperrash.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5204587566786364834" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डायपेर रैश - नाम से ही जाहिर है कि डायपेर पहनने की वजह से और उस जगह पर होता है जहाँ डायपेर त्वचा के संपर्क में आता है। यह लाल और दुखदायी होता है। मलमूत्र से भीगा हुआ डायपेर जब काफी समय तक त्वचा के संपर्क में रहता है तो त्वचा पर इस तरह असर होने लगता है। ऐसे में शिशु को सूखा रखना (खास तौर से कूल्हा और प्राइवेट (गुप्त) भाग)बेहद जरूरी है। कई बार बैक्टीरिया और यीस्ट के चेप से भी हो सकता है। दो तीन दिन में अगर ठीक ना हो तो डॉक्टर को दिखाना चाहिये। साधारण तौर पर पावडर लगा कर, सही समय पर डायपेर बदल कर, कुछ समय शिशु को खुला रख हवा  लगने देना चाहिये। जिस क्रीम में ज़िक ऑक्साइड हो वह फायदा करती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एटोपिक डर्मटाइटिस&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SDUdnyC3RTI/AAAAAAAABOY/R5M0BNFTWJA/s1600-h/derm_22330014.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SDUdnyC3RTI/AAAAAAAABOY/R5M0BNFTWJA/s320/derm_22330014.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5203097513782363442" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह एक तरह की स्किन अलर्जी है। अक्सर ऐसे शिशु के परिवार में किसी ना किसी को अलर्जी की शिकायत होती है। कुछ भाग पर त्वजा बेहद नाजुक, सूखी होती है और यहाँ खुजली उठती है। यह गालपर, कुहनियों और घुटनों के पीछे और कई बार शरीर में पूरी जगह हो सकती है। खाने में , पहनने में, लगाने में.....किसी में भी कोई ऐसी चीज़ हो सकती है जिससे शिशु में तकलीफ शुरु हो। ठंड के मौसम में तकलीफ के बढ़ने की आशंका रहती है। जिस शिशु में यह तकलीफ है उसके और उसके माता पिता के लिये इससे जूझना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। सही समय पर सही निदान, सही और पर्याप्त उपचार और बचाव महत्वपूर्ण है। इस पोस्ट में इस विषय में और कहना मुश्किल होगा किंतु सही निदान और पर्याप्त उपचार-ना कम ना ज्यादा- आवश्यक बातें है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नवजात शिशु में पीलिया&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SDUYwCC3RQI/AAAAAAAABOA/_CMhf0dPkKI/s1600-h/newbornjaundice.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SDUYwCC3RQI/AAAAAAAABOA/_CMhf0dPkKI/s320/newbornjaundice.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5203092157958145282" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माँ और शिशु के ब्लड़ ग्रूप के अलग होने की वजह से जो पीलिया होता है उसके बारे में पहले ही लिख चुकी हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पीलिया सामान्य तौर पर दूसरे तीसरे दिन दिख सकता है और एक हफ्ते तक रह सकता है। शिशु की आँखों में पीलापन गँभीर पीलिया ना होने पर भी दिख सकता है। इसमें चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है। अगर शिशु सचेत है, बराबर दूध पी रहा है, पेशाब समय से कर रहा है तो चिंता की आवश्यकता नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पीलिया होने पर धूप में शिशु को रखने की जो सलाह चली आ रही है वह गलत है। जिस वेवलैंग्थ की लाइट इस पीलिये पर असर कर सकती है वह साधारण धूप में नहीं मिल सकती। बल्कि धूप में शरीर के पानी के सूखने की वजह से पीलिया और बिगड़ सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जन्मचिह्न &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नवजात शिशु में विविध प्रकार के जन्मचिह्न  देखे जा सकते है। इनमें से कुछ ,थोड़े बरसों बाद गायब हो जाते हैं और कुछ जीवन भर रहते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कफै उ लैट&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SDUjNyC3RXI/AAAAAAAABO4/VzbaUG4Kzwc/s1600-h/Cafe+au+lait.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SDUjNyC3RXI/AAAAAAAABO4/VzbaUG4Kzwc/s320/Cafe+au+lait.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5203103664175531378" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाय कॉफी के गिरने के बाद जैसा निशान होता है। एक दो से अधिक या बड़े निशान को डॉक्टर को दिखाना जरूरी है। कभी कभार यह किसी और कमी की तरफ इशारा कर सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पोर्ट वाइन स्टेन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SDUhfiC3RWI/AAAAAAAABOw/OVwz9ga0jlA/s1600-h/PortWineStain_small.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SDUhfiC3RWI/AAAAAAAABOw/OVwz9ga0jlA/s320/PortWineStain_small.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5203101770094953826" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह बड़े, बिना उभरे गहरे लाल या जामुनी धब्बे होते है। बहुत सारी शिराओं के त्वचा के नीचे इकट्ठा होने से  यह बनते है। यह लुप्त नहीं होते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्ट्राबेरी हिमैन्जियोमा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SDUYkSC3RPI/AAAAAAAABN4/AJKo6wCBzyY/s1600-h/strawberry+haemangioma.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SDUYkSC3RPI/AAAAAAAABN4/AJKo6wCBzyY/s320/strawberry+haemangioma.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5203091956094682354" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; स्ट्राबेरी की तरह दिखने वाले यह चिन्ह बहुत छोटे से बहुत बड़े तक हो सकते है। लाल रंग के उभरे हुए निशान होते है। असामान्य रक्तप्रवाह की वजह से यह बनते है। इसकी वजह से त्वचा फूलने लगती है और लाल दिखती है। यह जन्म के बाद बड़ने लगते है और अक्सर दस बरस तक गायब भी हो जाते है। अगर यह निशान चेहरे पर है, आँखों के पास है , नज़र पर असर करें है तो इसे उपचार की आवश्यकता है। अगर निशान लगातार बड़ रहा हो तो डॉक्टर को दिखाना आवश्यक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कैवर्नस हिमैन्जियोमा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काफी कुछ स्ट्राबेरी हिमैन्जियोमा की ही तरह होते है। इसमें त्वचा के नीचे की कई परतें भी अन्तर्ग्रस्त होती है। यह पहले बरस में बड़ कर पाँच से  बारह बरस तक में लुप्त हो जाती है। कभी चाहो तो शल्यक्रिया से निकाली भी जा सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; कब डॉक्टर को मिलें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-शिशु के व्यवहार में अंतर महसूस करें &lt;br /&gt;-अगर किसी चेपी रोग के लक्षण महसूस हो&lt;br /&gt;-निशान में दर्द इठे, सूजन आ जाये या गरम महसूस हो&lt;br /&gt;-मध्य से लाल रेखायें जाती हुई दिखने लगे&lt;br /&gt;-परू भर जाये&lt;br /&gt;-गले, बगल या पेट और जाँघ के बीच के भाग में गिलटी उभर आये&lt;br /&gt;-बुखार हो&lt;br /&gt;-डायपेर रैश के दो तीन दिन तक ठीक ना होने पर&lt;br /&gt;-कोई और नया चिन्ह उभरने पर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिशु की त्वचा बेहद नाजुक होती है। कई परेशानियाँ महज उपयुक्त बचाव से सुलझ सकती है। बाकी जिन्हे इलाज की जरूरत है वह जादू टोना से नहीं सुलझ सकती। त्वचा का सही इलाज करवा पाना भी एक मुश्किल काम है। क्योंकि अक्सर यह धैर्य माँगती है....जो हममें नहीं होता....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई बार ऐसे शिशु के माता पिता में हीन भावना पनप जाती है जो बिल्कुल जायज़ नहीं है। जरूरत है ऐसी स्थिति में विवेक और संवेदना की....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और अपनी सुंदरता की परिभाषा पर पुनर्विचार करने की.....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;THE PICTURES ARE USED ONLY FOR EDUCATIONAL PURPOSES. IF THERE IS ANY COPYRIGHT VIOLATION OR OBJECTION PLEASE NOTIFY , THE PICTURES WILL BE TAKEN OFF IMMEDIATELY&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6012202322442671087-6370370170677616490?l=drbejisdesk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/feeds/6370370170677616490/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6012202322442671087&amp;postID=6370370170677616490&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/6370370170677616490'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/6370370170677616490'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/2008/05/2.html' title='शिशु की त्वचा- भाग 2'/><author><name>Beji</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16964389992273176028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://thumb18.webshots.net/t/16/16/4/0/43/2989400430101162518uaiKLi_th.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SDpo0SC3RaI/AAAAAAAABPQ/22Mu3tOhtcs/s72-c/diaperrash.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6012202322442671087.post-8989438909022660355</id><published>2008-05-27T22:37:00.000-07:00</published><updated>2008-05-28T09:51:51.319-07:00</updated><title type='text'>ज़रा मुस्कुरा दो</title><content type='html'>ब्लॉग जगत में हर विवाद के बीच में कुछ कहने का मन हुआ है....आज सिर्फ अनुरोध है...ज़रा मुस्कुरा दो...एक मौका जिंदगी को दो...एक मासूमियत को... थोड़ी हँसी बहने दो.... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="355"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/mnbY2jALfqI&amp;hl=en"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="wmode" value="transparent"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/mnbY2jALfqI&amp;hl=en" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent" width="425" height="355"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(http://www.youtube.com/watch?v=mnbY2jALfqI)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहीं सुना था....&lt;br /&gt;If you HAVE to make a choice between being kind and being right....choose kindness&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर कभी चुनाव के लिये दो ही विकल्प हो- सही साबित होना या उदार होना...उदारता चुनो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्नेह से रहना और संयत होकर अपनी बात कहना इनके लिये तो मुश्किल नहीं लगता....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6012202322442671087-8989438909022660355?l=drbejisdesk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/feeds/8989438909022660355/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6012202322442671087&amp;postID=8989438909022660355&amp;isPopup=true' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/8989438909022660355'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/8989438909022660355'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/2008/05/blog-post_27.html' title='ज़रा मुस्कुरा दो'/><author><name>Beji</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16964389992273176028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://thumb18.webshots.net/t/16/16/4/0/43/2989400430101162518uaiKLi_th.jpg'/></author><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6012202322442671087.post-2337794259409111123</id><published>2008-05-26T04:38:00.000-07:00</published><updated>2008-05-28T22:58:03.170-07:00</updated><title type='text'>शिशु की त्वचा- भाग 1</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SDUbYiC3RRI/AAAAAAAABOI/ac64bGHk-Ec/s1600-h/skin.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SDUbYiC3RRI/AAAAAAAABOI/ac64bGHk-Ec/s320/skin.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5203095052766102802" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टीवी और विज्ञापन में शिशु की त्वचा देखकर मन होता है काश ऐसी त्वचा हम सब को मिली होती। हर दूसरा तीसरा कॉस्मेटिक प्रोडेक्ट वादा करता है की आपकी त्वचा को फिर से शैशव की ताज़गी देगी। लेकिन जानकर अचरज होगा की शिशु की त्वचा में सामान्य तौर पर ही भिन्नता नज़र आती है। कई बार पर्याप्त ज्ञान ना होने की वजह से इन्हे रोग समझ इनका उपाय ढूँढा जाता है। कई बार इन उपायों से नुकसान ज्यादा और फायदा कम होता है।&lt;br /&gt;आज ज़रा देखें सुंदरता स्किन डीप  होती है या इसके और मायने हैं....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रैडल कैप&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SDUbySC3RSI/AAAAAAAABOQ/BNZkxuXfQlI/s1600-h/200px-Baby_With_Cradle_Cap.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SDUbySC3RSI/AAAAAAAABOQ/BNZkxuXfQlI/s320/200px-Baby_With_Cradle_Cap.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5203095495147734306" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिशु के सर पर जमी पपड़ी को क्रैडल कैप कहते हैं।  यह शिशु के सर की त्वचा के छिल कर निकलने का लक्षण है। कई वजह समझाई जाती है लेकिन यह शिशु को नुकसान नहीं पहुँचाती। अक्सर थोड़ा तेल मालिश और स्नान से धीमे धीमे त्वचा ठीक हो जाती है। अगर पपड़ी बहुत ज्यादा है या निकल नहीं रही हो तो डॉक्टर की सलाह लेकर खास शौम्पू और औइन्टमेन्ट इस्तेमाल करना पड़ सकता है। कई बार यह महीनों तक रह सकती है। सही उपाय से हफ्ते में ठीक भी हो सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एरीदिमा टॉक्सीकम&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SDqhxSC3RbI/AAAAAAAABPw/E_R69y1TqhI/s1600-h/erythema+toxicum+1.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SDqhxSC3RbI/AAAAAAAABPw/E_R69y1TqhI/s320/erythema+toxicum+1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5204650187409540530" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जन्म लेने के दूसरे दिन से शरीर के ऊपर लाल धब्बे नज़र आ सकते हैं। यह शरीर में कहीं भी हो सकते है सिवाय हथेली और पाँव के तलुओं के। कई बार इन के बीच की जगह में पीली छोटी फुँसियों सी निकली होती हैं। यह नवजात शिशु में अक्सर देखा जा सकता है । पहले एक दो हफ्ते बाद यह आप ही चले जाते हैं। सामान्य है इसीलिये जाहिर है इनके लिये कुछ भी करने की जरूरत नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मीलिया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SDUXLCC3ROI/AAAAAAAABNw/Fig2lAYNi6c/s1600-h/milia.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SDUXLCC3ROI/AAAAAAAABNw/Fig2lAYNi6c/s320/milia.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5203090422791357666" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह बहुत छोटे सफेद मोती के रंग के मुँहासों की तरह शिशु के माथे, गाल और नाक पर हो सकते है । इनके बनने का कारण सीबम (चिकनाई बनाने वाले) ग्लैंड्स का अधूरा विकास है। इस वजह से सीबम या चिकनाई छोटे छोटे मोतियों से जमा हो जाते है। कुछ हफ्तों मे यह आप ही चले जाते है। इनके साथ छेड़कान नाकरने में ही समझदारी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मंगोलियन स्पॉट्स&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SDpoQSC3RYI/AAAAAAAABPA/sZUBqsWb5E8/s1600-h/MongolianBack.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SDpoQSC3RYI/AAAAAAAABPA/sZUBqsWb5E8/s320/MongolianBack.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5204586948311074178" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मंगोलियन स्पॉट्स नीले, थोड़े हरे या स्लेटी रंग के निशान है जो उभरे नहीं होते। यह शिशु के पीठ और कूल्हे पर नज़र आता है। कुछ कुछ घाव के बाद पड़े नीले निशान जैसा। यह अफरीकन और एशिया के शिशुओं में सामान्य तौर पर देखने को मिलता है। जैसे जैसे शिशु बड़ा होता है यह निशान हल्के पड़ जाते है लेकिन पूरी तरह से गायब नहीं होते। &lt;br /&gt;हाँ ,रोग तो ये बिल्कुल नहीं है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुस्चूलर मेलोनोसिस&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SDUe7CC3RUI/AAAAAAAABOg/53V2udD2QYI/s1600-h/derm_fig1.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SDUe7CC3RUI/AAAAAAAABOg/53V2udD2QYI/s320/derm_fig1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5203098944006473026" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुस्चूलर मेलोनोसिस छोटे छोटे फफोलों की तरह उभरते है। जल्द ही सूख कर गिर जाते है। पीछे थोड़े गहरे रंग के निशान छोड़ते है। अक्सर काले शिशु में ज्यादा देखने को मिलते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मीलियारिया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SDUfWiC3RVI/AAAAAAAABOo/658YnZEc12Q/s1600-h/Prickly+heat.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SDUfWiC3RVI/AAAAAAAABOo/658YnZEc12Q/s320/Prickly+heat.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5203099416452875602" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मीलियारिया उभरे हुए द्रव से भरे छोटे फोफले होते है। यह द्रव साफ अथवा दूध सा सफेद होता है। यह पसीने की ग्रंथि के बंद होने की वजह से बनते है। यह अपने आप ही ठीक हो जाते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाहिर है की उपरोक्त किसी भी बात के लिये परेशान होने की जरूरत नहीं है। इनमें से कोई भी रोग का लक्षण नहीं है। किंतु सुंदरता और शिशु के त्वचा को लेकर जो सामान्य धारणा है उससे भिन्न है। पहली बार बने माँ बाप अक्सर यह देख कर तनाव में आ जाते है। और जो समस्या ही नही उसके लिये उपाय ढूँढ़ते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाहे आपके शिशु की त्वचा आपके परिभाषा अनुरूप प्रवीण ना भी हो....शिशु सुंदर ही है....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Afterall beauty is DEFINITELY  NOT skin deep !!!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;THE PICTURES ARE USED ONLY FOR EDUCATIONAL PURPOSES. IF THERE IS ANY COPYRIGHT VIOLATION OR OBJECTION PLEASE NOTIFY , THE PICTURES WILL BE TAKEN OFF IMMEDIATELY&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6012202322442671087-2337794259409111123?l=drbejisdesk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/feeds/2337794259409111123/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6012202322442671087&amp;postID=2337794259409111123&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/2337794259409111123'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/2337794259409111123'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/2008/05/1.html' title='शिशु की त्वचा- भाग 1'/><author><name>Beji</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16964389992273176028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://thumb18.webshots.net/t/16/16/4/0/43/2989400430101162518uaiKLi_th.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SDUbYiC3RRI/AAAAAAAABOI/ac64bGHk-Ec/s72-c/skin.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6012202322442671087.post-5970647883698650678</id><published>2008-05-10T10:29:00.001-07:00</published><updated>2008-05-10T21:38:28.148-07:00</updated><title type='text'>नवजात शिशु के सामान्य रिफ्लेक्सस एवं इनका महत्व</title><content type='html'>कुछ रिफ्लेक्सस नवजात शिशु में जन्म से ही पाये जाते है। यह प्रारम्भिक रिफ्लेक्सस शिशु जब उदर में होता है तब विकसित होते है। जन्म के समय इनका पूर्ण विकास होना आवश्यक है। जन्म के तीन माह पश्चात से बारह माह तक दिमाग का उच्चतर केन्द्र इन पर नकारात्मक दबाव ड़ालता है और इन पर वाँछित नियंत्रण विकसित करता है। जन्म के वक्त इनका होना शिशु के जीवित रहने के लिये जरूरी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन रिफ्लेक्सस की अपनी समय सारिणी है। माता पिता को इसका थोड़ा बहुत ज्ञान होना आवश्यक है। इस समय सारिणी से अलग जब भी कोई महत्वपूर्ण  फेर शिशु में दिखे तो चेतना आवश्यक है। सही समय पर छोटी बातों पर ध्यान आ जाये तो बड़ी मुसीबते बड़ी उलझने बनें इससे पहले उनका कोई उपाय किया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन रिफ्लेक्सस में उल्लेखनीय है चूसना, निगलना, आँखें मीचना, मलमूत्र क्रिया, हिचकी आना...वगैरह। जैसा की पहले भी बताया इनका होना शिशु के  जीवित रहने के लिये अत्यावश्यक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिशु का उदर में विकास संपू्र्ण होने के लिये उसे उदर में 37 हफ्ते से 40 हफ्ते तक बिताने जरूरी है। ऐसे शिशु के प्रसव को फुल टर्म डेलिवरी कहते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जन्म होते ही शिशु को पाँच बड़े बदलाव से सामना करना पड़ता है-&lt;br /&gt;• शिशु जो उदर के अंदर जलचर होता है वह पहली बार स्वतंत्र साँस लेता है।&lt;br /&gt;• पहली बार खुराक मुँह से लेकर पचाना सीखता है&lt;br /&gt;• मलमूत्र क्रिया पहली बार संपन्न करता है&lt;br /&gt;• अपने शरीर का तापमान बनाये रखता है&lt;br /&gt;• रक्त से निरंतर खुराक मिलने की जगह भोजन अंतराल पर मिलने की आदत ड़ालता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिशु के लिये यह बदलाव छोटे नहीं है। इस बदलाव से सहजता से गुजरने के लिये रिफ्लेक्सेस जरूरी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिमाग, रीढ़ और नसों की व्यवस्था सही तरह से विकसित होने का एक महत्वपूर्ण लक्षण है सामान्य रिफ्लेक्सेस का होना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऱिफ्लेक्स को टेस्ट करने की क्रिया को स्टिमुलेस और उस स्टिमुलेस की प्रतिक्रिया को रेस्पौन्स कहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रूटिंग रिफ्लेक्स &lt;br /&gt;इस रिफ्लेक्स को पर्दर्शित करने के लिये शिशु के गाल पर या मुँह के कोने पर हल्का सा सहलाने पर शिशु तुरंत मुँह फेर कर सहलाये गई जगह की तरफ मुँफ फेर कर और खोलकर स्टिमुलेस की तलाश करने लगता है। अक्सर यह माँ के स्तन के छूने पर होता है। और स्तन से संपर्क में आते ही शिशु तुरंत मुँफ फेर कर,स्तन तलाश , मुँह खोल स्तन को मुँह में ले लेता है। यह रिफ्लेक्स पैदाइशी रहता है और तीन चार माह जन्म पश्चात गायब हो जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="355"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/nS11Yw4ZEck&amp;hl=en"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="wmode" value="transparent"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/nS11Yw4ZEck&amp;hl=en" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent" width="425" height="355"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सक्खिंग रिफ्लेक्स (चूसना)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस रिफ्लेक्स को पर्दर्शित करने के लिये उँगली से शिशु के तालू में सहलायें तो शिशु तुरंत उँगली चूसने लगता है। यह क्रिया तुक में और बलपूर्वक तरीके से की जाती है। चूसने के बाद निगलने की कर्िया शामिल है।रूटिंग रिफ्लेक्स की ही तरह यह भी पैदाइशी रहता है और तीन चार माह जन्म पश्चात गायब हो जाता है। जाहिर है कि इससे शिशु माँ का दूध चूस पाने में सक्षम होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="355"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/KIgzqRaYJsg&amp;hl=en"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="wmode" value="transparent"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/KIgzqRaYJsg&amp;hl=en" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent" width="425" height="355"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मोरोस रिफ्लेक्स&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिशु जब अपने पीठ के बल लेटा हुआ हो तब कोई अचानक से की गई ऊँची आवाज़ या गरदन पर दिया सहारा आकस्मिक तरीके से छोड़ने की प्रतिक्रिया में शिशु सहसा ही अपना सर हिला देता है।शिशु अपने दोनो हाथ और पैर पहले फैला देता है और फिर मोड़ लेता है। अंत में शिशु चिल्ला कर रो पड़ता है।शरीर के दोनो भागों में अगर यह प्रतिक्रिया एक समान ना हो तो घ्यान देना और चिकित्सक के ध्यान में लाना जरूरी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर यह रिफ्लेक्स शिशु में नहीं हो तो शिशु की जाँच आवश्यक है क्योंकि इसका इशारा नसों या दिमाग में कमजोरी की तरफ हो सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="355"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/jsLqoT4fIH8&amp;hl=en"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="wmode" value="transparent"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/jsLqoT4fIH8&amp;hl=en" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent" width="425" height="355"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा ही एक और रिफ्लेक्स है टोनिक नेक रिफ्लेक्स&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Tonic Neck Reflex&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="355"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/SPR5aSQGlrQ&amp;hl=en"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="wmode" value="transparent"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/SPR5aSQGlrQ&amp;hl=en" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent" width="425" height="355"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;यह लगभग छह सात महीने तक गायब हो जाता है। इसके गायब होने पर ही शिशु घुटनों पर चलना सीखता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्रास्पिंग रिफ्लेक्स&lt;br /&gt;शिशु की हथेली में उँगली ड़ालो तो शिशु तुरंत उँगली पर पकड़ मजबूत कर देता है। करीबन छह महीने तक यह रिफ्लेक्स रहता है जिसके बाद शिशु अपनी इच्छा से पकड़ना और छोड़ना सीखता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="355"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/FV-qWSVNFt8&amp;hl=en"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="wmode" value="transparent"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/FV-qWSVNFt8&amp;hl=en" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent" width="425" height="355"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बैबिन्सकी रिफ्लेक्स&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिशु के पाँव के तलुओं पर हल्का सा खंरोच दो तो पाँव की उँगलियाँ फैला कर ऊपर की तरफ मुड़ जाते है। यह रिफ्लेक्स छह से नौ महीने पर गायब होता है जिसके बाद शिशु चलना सीखता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वाल्किंग रिफ्लेक्स&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिशु का पैर नीचे रखो तो शिशु चलने की तरह कदम बड़ाने लगता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="355"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/LT1tGMXFk5s&amp;hl=en"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="wmode" value="transparent"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/LT1tGMXFk5s&amp;hl=en" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent" width="425" height="355"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नवजात शिशु में इन रिफ्लेक्स का होना तस्सली देता है कि शिशु के नसों और दिमाग की व्यवस्था सही एवं संपूर्ण है।  इन रिफ्लेक्स का ठीक समय पर गायब होना और शिशु का अलग अलग कार्य इच्छानुसार कर सकना विकास की अगली सीढ़ी है। ऐसा नहीं कर पाना और इन रिफ्लेक्स का समय से अधिक रहना भी चेतने का विषय है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर माता पिता का इस विषय में प्राथमिक ज्ञान आवश्यक है। इससे वे ठीक समय पर ,"चलता है बच्चा है बड़ा हो जायेगा " वाली मानसिक स्थिति से सही समय पर निकल; जो भी सही और जरूरी उपाय है लेने में सक्षम होंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Note: The You Tube videos are used solely for educational purpose.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6012202322442671087-5970647883698650678?l=drbejisdesk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/feeds/5970647883698650678/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6012202322442671087&amp;postID=5970647883698650678&amp;isPopup=true' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/5970647883698650678'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/5970647883698650678'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/2008/05/blog-post.html' title='नवजात शिशु के सामान्य रिफ्लेक्सस एवं इनका महत्व'/><author><name>Beji</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16964389992273176028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://thumb18.webshots.net/t/16/16/4/0/43/2989400430101162518uaiKLi_th.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6012202322442671087.post-3554700509541342143</id><published>2008-04-30T04:06:00.000-07:00</published><updated>2008-04-30T10:47:39.604-07:00</updated><title type='text'>स्तनपान</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SBhHRWGZwuI/AAAAAAAAAzM/d65D3vHri5A/s1600-h/latch5.gif"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SBhHRWGZwuI/AAAAAAAAAzM/d65D3vHri5A/s320/latch5.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5194980533487649506" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिशु के जन्म होते ही पहले स्पर्श का भी समय हो जाता है। स्पर्श की तपिश और अनुरक्ति का अहसास इतने बचपन में भी होता है। माँ की गर्मी के पास और साथ रह कर शिशु एक जुड़ाव महसूस करता है, स्वयं को सुरक्षित महसूस करता है। शिशु को साफ और मुलायम कपड़ो में सही तरीके से लपेट कर जितनी जल्दी हो सके माँ को सौंप देना चाहिये। प्रसव के आधे घंटे के अंदर स्तनपान करवाना चाहिये। यह अवधि सीज़ेरियन प्रसव से हुए बच्चों के लिये एक घंटा मानी जा सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्तनपान की बात आते ही हमारे प्रोफेसर की एक बात याद आती है। Cow's milk is for the calf....your child needs yours!! गाय का दूध बछड़े के लिये...तुम्हारे बच्चे को तुम्हारे दूध की जरूरत है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माँ के दूध पर आधारित सभी कहावतों और डायलॉग्स के पीछे एक ठोस आधार है। हर माँ का दूध उसके शिशु के लिये एकदम उपयुक्त होता है। मतलब कि अगर शिशु 28 हफ्ते में ही जन्म ले तो उसके पाचन शक्ति और जरूरत के हिसाब का सही मात्रा में प्रोटीन्स, विटामिन्स और चर्बी दूध में होती है। जैसे उस शिशु के लिये उसके जरूरत के अनुसार खास ऑर्डर पर तैयार किया गया हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माँ का दूध मतलब माँ के आँचल में रह कर मिलने वाली खोराक- साफ, बिना झंझट, हमेशा फ्रेश, स्टेरिलाइसेशन की आवश्यकता से दूर, हमेशा माँ के पास, माँ के साथ...सही मात्रा में प्रोटीन, विटामिन्स,ग्लूकोस, फैट। साथ में रोग प्रतिकारक शक्ति। माँ से लगातार गहराता जुड़ाव। काउ मिल्क अलर्जी से दूर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फायदें इतने हैं कि यह समझना कठिन है कि यहाँ भी फैशन ने बाजी मार ली है। फैशन, ट्रैन्ड, फिगर और कठिनाई जैसे बहानों का इस्तेमाल कर शिशु को इससे वँचित रखना दुखद है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर।&lt;br /&gt;नवजात शिशु को देखना हमेशा एक सुंदर अनुभव रहा है। माँ के पास गर्म , मुलायम कपड़ों में लिपटा शिशु जल्द ही बगल में मुड़कर माँ को तलाशना शुरु करता है। होठों पर जीभ फेरकर दूध की माँग रखता है। यही सही समय है स्तनपान शुरु करने का।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिशु के लिये स्तनपान सीखी हुई एक बात है। किन्तु पहली बार बनी माँ के लिये यह एकदम नया अनुभव है। माँ को सहजता से इसकी शुरुआत करनी चाहिये। माँ की विकलता शिशु तुरंत भाँप लेता है...इसीलिये परेशान माँ का शिशु भी अक्सर चिढ़चिढ़ा हो जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहली बार स्तन से लगाना अपने आप में एक प्रक्रिया है। इसे लैच्चिंग ऑन कहते हैं। अगर सही तरीके से स्तनपान की शुरुआत की जाये तो माँ और शिशु के बीच के रिश्ते को अच्छी और तनाव रहित शुरुआत मिल सकती है।&lt;br /&gt;1.शिशु का मुँह पूरी तरह खुलवायें। हल्के से शिशु के होंठ स्तन पर लगाने से वह पूरा मुँह खोल देगा...ऐसे जैसे उबासी में खोलते हैं।&lt;br /&gt;2. फिर जिस हाथ में शिशु को सँभाला है उसे पास लाकर शिशु को स्तन के पास लाना है। ध्यान रहना चाहिये कि शिशु को माँ की तरफ लाया जाये ना कि माँ को शिशु की तरफ।&lt;br /&gt;ध्यान रहे कि शिशु के मसूड़े स्तन के आसपास के एरियोला (स्तन के पास गहरे रंग की त्वचा)को पूरी तरह से मुँह के अंदर लें। शिशु के होंठ बाहर की तरफ मुड़े हुए हों।&lt;br /&gt;3. इतना करने पर शिशु स्तन चूस कर दूध पीने की कोशिश करेगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(स्तनपान का सही तरीका जानने के लिये नीचे दिये लिंक पर जायें)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;http://www.youtube.com/watch?v=Zln0LTkejIs&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर शिशु स्तन से सही तरीके से जुड़ा हो और सही तरह से चूस रहा हो तो इस प्रक्रिया में स्तन में दर्द नहीं उठना चाहिये। अगर दर्द उठे तो स्तनपान रोक कर फिर कोशिश करनी चाहिये। शिशु के स्तन पकड़ने पर वैक्यूम बनता है और सक्शन एफैक्ट से दूध खिंचता है। जब भी शिशु को स्तन से हटाना हो तो स्तन और मसूड़े के बीच उँगली ड़ाल कर पहले वैक्यूम खत्म करें। कभी भी गलत तरीके से स्तनपान जारी ना रखे। इससे स्तन पर चीरे पड़ने का डर रहता है और शिशु को भी पर्याप्त मात्रा में दूध नहीं मिलता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माँ और शिशु के रिश्ते का एक अहम पहलू है स्तनपान। माँ की खुशबू, सपर्श की तपिश, और माँ की गोद की सुरक्षा...इन सबके लिये पहला अनुभव है स्तनपान। स्वाभाविक क्रिया है और जितना सहजता और आनंद से निभाया जाये उतनी ही संतुष्टि दोनो को मिलती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छह महीने तक शिशु को मात्र  स्तनपान देने से उसकी सभी खोराक की जरूरत पूरी हो जाती है। सिर्फ माँ का दूध उसके लिये पर्याप्त है। इसे एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीड़िंग कहते हैं। छह महीने से माँ के दूध के अलावा कुछ और भी शुरू किया जाना चाहिये। स्तनपान मात्र खोराक ही नहीं पूरा करता किंतु इससे शिशु का पहला स्नेह संबंध बनता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(http://www.youtube.com/watch?v=cVbZmCQT6Ec&amp;feature=related)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहते हैं भगवान ने माँ को इसलिये बनाया क्योंकि हर जगह हर समय हर शिशु के पास नहीं रह सकता....काश हर शिशु के पास उसका अपना भगवान ......उसकी माँ हो....जो उसे ममता से सँभाल,दूध से सींच,स्नेह से छू....उसको उसकी अपनी पहचान दे.....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;( photo courtesy breastfeeding.com)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6012202322442671087-3554700509541342143?l=drbejisdesk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/feeds/3554700509541342143/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6012202322442671087&amp;postID=3554700509541342143&amp;isPopup=true' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/3554700509541342143'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/3554700509541342143'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/2008/04/blog-post_30.html' title='स्तनपान'/><author><name>Beji</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16964389992273176028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://thumb18.webshots.net/t/16/16/4/0/43/2989400430101162518uaiKLi_th.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_2YEocYO2Ps8/SBhHRWGZwuI/AAAAAAAAAzM/d65D3vHri5A/s72-c/latch5.gif' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6012202322442671087.post-1559533337152147423</id><published>2008-04-09T23:35:00.000-07:00</published><updated>2008-04-10T00:03:48.050-07:00</updated><title type='text'>विरासत में रोगाणु ?!</title><content type='html'>&lt;em&gt;इस ब्लॉग के नियमित पाठकों से  क्षमा। व्यस्तताओं के चलते थोड़ा विलम्ब हुआ।&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिशु माँ से खुराक, औक्सीजन जीन्स वगैरह पाता है। साथ ही अगर माँ किसी रोग से पीड़ित है तो कई बार रोग भी विरासत में पा लेता है। इसके बारे में जानना जरूरी है क्योंकि कोई माँ अपनी वजह से अपने शिशु में किसी प्रकार का रोग नहीं देखना चाहती।&lt;br /&gt;सही जानकारी,जाँच और इलाज शिशु की रक्षा कर पाने में अधिकतर सक्षम होते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रोग किस प्रकार से माँ से शिशु तक पहुँच सकता है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• नाल से। टौक्सोप्लास्मा, ट्रीपोनिमा पैलिडम(सिफिलिस के लिये जिम्मेदार),रुबेल्ला, सी एम वी(साय्टोमेगालेवायरस),लीस्टीरिया, फाल्सीपारम(मलेरिया)&lt;br /&gt;• वर्द्धमान मातृक इनफेक्शन ( माँ से शिशु की ओर बढ़ता हुआ)-कोरियोएम्नियेनाइटिस&lt;br /&gt;• प्रसव के दौरान- माँ के रक्त और योनि से संपर्क में आने पर। HIV (एड्स), HZV( चिकनपौक्स-माता), HBV (हैपाटाइटिस बी-जहरी कमळा) और क्लैमीडिया ट्रैकोमैटिस ( कनजंक्टिवाइटिस) &lt;br /&gt;• प्रसव के बाद-स्तनपान से फैलने वाले&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गर्भ से पहले और गर्भ के दौरान होने वाले परीक्षण से रोग के होने या हो सकने की सँभावना का पता लगाया जा सकता है। सही समय पर सही कदम लेने पर प्रतिकूल परिणाम से शिशु को बचाया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;TORCH&lt;/strong&gt; के नाम से यह रोग जाने जाते रहे हैं। (टौक्सोप्लास्मा, रुबेल्ला, सी एम वी(साय्टोमेगालेवायरस), हर्पिस) ।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अक्सर गर्भ ठहरने के करीबन सोलहवें हफ्ते में इन रोगों के होने की जाँच की जाती है।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;टौक्सोप्लास्मा&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह रोग अगर शिशु में हो तो शिशु के मानसिक विकास पर असर पड़ सकता है। शिशु अँधपन एवं अपस्मार का शिकार हो सकता है।&lt;br /&gt;इससे बचाव के लिये इसके होने के तरीकों का जानना आवश्यक है। कच्चा गोश्त, मुर्गी, सीफुड़, बिना धोये फल और सब्जियाँ, बिल्ली या उसके मल से किसी प्रकार का  संपर्क इस रोग को माँ तक पहुँचा सकता है। &lt;strong&gt;जाहिर है की कच्चा गोश्त ,मुर्गियों और बिल्लियों से दूर रहना चाहिये और फल और सब्जियाँ धोने के बाद ही हाथ लगानी चाहिये।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रुबेल्ला&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रुबेल्ला से ग्रसित होने पर शिशु के पूरे विकास पर असर पड़ता है। मोतियाबिन्द, छोटी आँखें,हृदय की बनावट में बुनियादी खामी,(पैटेन्ट डक्टस आर्टिरियोसिस, पलमनरी आर्टरी स्टीनोसिस, बहरापन(सेन्सरी न्यूरल डैफनस), न्यूनमनस्क (मेन्टल रिटार्डेशन), थ्रौम्बोसायटोपीनिया , बच्चे का गिरना या मरा हुआ पैदा होना सँभव है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;एम एम आर इनजेक्शन एक आसान तरीका है बचने का। गर्भ ठहरने से पहले....हो सके तो यौवन में ही हर लड़की को रुबेल्ला का ठीका लगवा लेना चाहिये।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सी एम वी(साय्टोमेगालेवायरस) &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस रोग से ग्रसित नवजात का वजन कम हो सकता है, गुर्दे पर असर,कमळा, फेफड़ों में असर, अनीमिया और बहरापन हो सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन में इस के रोगाणु होते हैं उनके शरीर के सभी द्रव्य से यह रोग फैल सकता है। संसर्ग, स्तनपान,ब्लड ट्रान्सफ्यूशन और औरगेन ट्रान्सप्लान्ट से भी यह फैल सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जाहिर है की किसी भी दूसरे व्यक्ति के शरीर के द्रव्य के संपर्क में आने से इसकी सँभावना बढ़ सकती है। हाथ धोना, संसर्ग के दौरान कौन्डोम का इस्तेमाल, ब्लड ट्रान्सफ्यूशन के समय डॉक्टर से तसल्ली करना अहम भूमिका निभा सकता है। &lt;/strong&gt; नन्हे बच्चों को पढ़ाने या सँभालने वाली स्त्रियों को इस बात को लेकर खास सचेत होना चाहिये। उन्हे बच्चों के थूक,मूत्र इत्यादि द्रव्यों के संपर्क में नहीं आना चाहिये। और आये तो तुरंत साबुन और पानी का इस्तेमाल करना चाहिये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हर्पिस&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="355"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/k6XmkJr2XFA&amp;hl=en"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="wmode" value="transparent"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/k6XmkJr2XFA&amp;hl=en" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent" width="425" height="355"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस रोग से ग्रसित अधिकतर बच्चों में बहुत कम तकलीफ होती है। दो-तीन प्रतिशत बच्चों में वैरिसेल्ला सिन्ड्रोम हो सकता है। दागदार त्वचा, अंग का अधूरा विकास,अव्ययों, आँख और न्यूरोलौजिकल कार्य में क्षति हो सकती है।&lt;br /&gt;माँ अगर चिकन पौक्स के संपर्क में प्रसव के पाँच दिन पूर्व से दो दिन पश्चात तक आये तो नियोनेटल झोस्टर की सँभावना बन जाती है। &lt;strong&gt;इसमें तीस प्रतिशत शिशु में जान खोने का जोखिम रहता है। इलाज( varicella-zoster immune globulin (VZIG) IM)तुरंत जरूरी है।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सभी गर्भवति स्त्रियों में HIV antibody(एड्स), Hepatitis B Surface antigen(जहरी कमळा),VDRL( सिफिलिस), मूत्र की जाँच वगैरह लाजिमी है। इन्हे करवाने के बाद डॉक्टर की सलाह आवश्यक है। स्वयं इन रिपोर्ट को पढ़ने की कोशिश कई बार गलत निष्कर्ष तक पहुँचा सकती है। परिणाम के अनुसार जरूरी दवा , नहीं तो पूर्वोपाय किये जा सकते हैं।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;HIV antibody के पौसिटिव होने पर कभी छिपाया नहीं जाना चाहिये। सही समय और सही तरीके से दवा करने पर शिशु को रोगमुक्त रखा जा सकता है।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="355"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/eV4cEt1ZFG8&amp;hl=en"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="wmode" value="transparent"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/eV4cEt1ZFG8&amp;hl=en" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent" width="425" height="355"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="355"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/xM36WaMy46w&amp;hl=en"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="wmode" value="transparent"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/xM36WaMy46w&amp;hl=en" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent" width="425" height="355"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मलेरिया, मूत्र में दोष का इलाज सही समय पर करने से शिशु के स्वास्थ्य को हानि से बचाया जा सकता है। योनिमार्ग मे कोई दोष, नहीं तो प्रसव के दौरान फैलने वाले रोग से शिशु को सीज़ेरियन का विकल्प चुन बचाया जा सकता है।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोगाणु बहुतेरे हैं...घात लगाये बैठे हुए....कई बार माँ के शरीर पर आक्रमण कर शिशु को स्वस्थ पैदा होने के विकल्प से वँचित कर देते हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर माँ और पिता इतने भी बेबस नहीं है। जरूरत है अग्रसक्रिय होने की। हर होने वाले पिता में अपने जीवनसाथी और संतान की तरफ चौकसी की जिम्मेदारी लेने की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और माँ तो फिर माँ है....सिर्फ ममता लोरी और रात रात तक जागरण करने तक सीमित नहीं होनी चाहिये....किन्तु जिम्मेदारी सहित स्वयं को रोगाणु से मुक्त रख अगली पीड़ी की सृष्टि में अपना दायित्व निभाने की तरफ सजग होना चाहिये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="355"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/_21qBZpD7FM&amp;hl=en"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="wmode" value="transparent"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/_21qBZpD7FM&amp;hl=en" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent" width="425" height="355"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जानती हूँ काफी रूखा सूखा सा विषय है। लेकिन बहुत जरूरी और बेहद ध्यान से समझने जैसा। &lt;br /&gt;बहुत छोटी बातों से बहुत बड़ी समस्या को मूल से ही उखाड़ दिया जा सकता है....&lt;br /&gt;हाँ आम जिन्दगी में भी नियम अलग तो नहीं हैं... :)))&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6012202322442671087-1559533337152147423?l=drbejisdesk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/feeds/1559533337152147423/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6012202322442671087&amp;postID=1559533337152147423&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/1559533337152147423'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/1559533337152147423'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/2008/04/blog-post.html' title='विरासत में रोगाणु ?!'/><author><name>Beji</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16964389992273176028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://thumb18.webshots.net/t/16/16/4/0/43/2989400430101162518uaiKLi_th.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6012202322442671087.post-3044236786785976981</id><published>2008-03-31T03:45:00.000-07:00</published><updated>2008-03-31T04:05:39.279-07:00</updated><title type='text'>शिशु पर माता पिता के ब्लड ग्रूप का महत्व</title><content type='html'>"खून के रिश्ते" बोलते समय एक जबरदस्त सा जज़्बा मन में आता है।यूँ ही नहीं शायद। खून खून में थोड़ा थोड़ा फर्क है....और माँ के दूध की ही तरह माँ बाप के खून का भी महत्व है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;माता पिता का ब्लड ग्रूप शिशु का ब्लड ग्रूप तय करता है। और बात सिर्फ तय करने तक सीमित होती तो इसे नज़रंदाज़ भी कर सकते थे। किन्तु माँ अगर आर एच नेगाटिव(Rh-) हो तो शिशु पर इसके परिणाम विविध और घातक भी हो सकते हैं। इसीलिये हर दंपत्ति को अपना ब्लड ग्रूप ज्ञात होना चाहिये। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चार ब्लड ग्रूप होते हैं। ए (A),बी (B),O(ओ) और AB(एबी) । रक्त की लाल कोशिकाओं की सतह पर कुछ प्रोटीन, ग्रूप निर्धारित करते हैं। जिनमें 'ए' ऐन्टीजन होता है उसका ग्रूप 'ए और जिसमें 'बी' ऐन्टीजन होता है उसका ग्रूप 'बी'। जिसमें दोनो होते हैं 'एबी',जिसमें दोनो नहीं होते उनका ग्रूप 'ओ' होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूरी मानव जाति इन चार ब्लड टाइप्स में बँटी है। जैसा की सर आरनल्ड कहते हैं&lt;br /&gt;There is no caste in blood.&lt;br /&gt;      - Sir Edwin Arnold &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके अलावा एक 'आर एच'(Rh) नाम का और प्रोटीन होता है । यह भी रक्त की लाल कोशिकाओं के सतह पर ही होता हैं। जिनमें यह होता है वह आर एच पौसीटिव और जिनमें नहीं होता वह आर एच नैगाटिव होते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनके होने या ना होने से रक्त की कोशिकाओं या रक्त के गुण पर खास असर नहीं होता। पर यह भी इंसान की पहचान का एक हिस्सा हैं। जरूरत पर सही मैच का ही खून चढ़ाया जा सकता है। अगर अलग ब्लड ग्रूप का खून चढ़ाया जाये तो परिणाम चिंताजनक हो सकते हैं। करीबन 85 प्रतिशत लोग आर एच पौसीटिव होते हैं। बाकी के आर एच नैगाटिव।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दंपत्ति के लिये सचेत होने की शुरुआत पत्नि के 'आर एच नैगाटिव' होने पर होनी चाहिये। पति अगर 'आर अच पौसीटिव' है तो गर्भ के समय उपयुक्त उपाय करना जरूरी है। आर एच नैगाटिव माँ के गर्भ में पल रहे शिशु को 'आर एच फैक्टर ' पिता से विरासत में मिल सकता है। ऐसे दंपत्ति के आर एच पौसिटिव शिशु होने की सँभावना करीबन 50 प्रतिशत होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले गर्भ में (जब शिशु आर एच पौसीटिव हो ),तब भी तकलीफ की गुँजाईश कम ही होती है। माँ के खून से शिशु के खून  का संपर्क प्रसव के दौरान ही होता है। इस संपर्क से तात्कालिक कोई हानि नहीं होती। किन्तु शिशु के आर एच पौसीटिव खून के संपर्क में आते ही....माँ की इम्युनिटी कुदरती तौर पर इनसे लड़ने के लिये ऐन्टीबौडी की सेना तैयार करने  लगती है। इन ऐन्टीबौड़ी से माँ को कोई हानि नहीं होती। किन्तु अगले गर्भ के समय भी अगर शिशु आर एच पौसीटिव हो तो यह बनी बनाई सेना शिशु पर हमला बोल देती है। यह ऐन्टीबौड़ी इतने सक्षम होते हैं कि शिशु की रक्त कोशिकाओं को तोड़ तितर बितर कर दें। इनके टूटने से बिलीरूबिन की मात्रा शिशु के रक्त में बढ़ने लगती है। नवजात शिशु को गँभीर पीलिया हो सकता है, शिशु के और कभी कभार माँ के जान को भी खतरा हो सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="355"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/7OWp8d8WKkg&amp;hl=en"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="wmode" value="transparent"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/7OWp8d8WKkg&amp;hl=en" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent" width="425" height="355"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आर एच नैगाटिव स्त्री ब्लड ट्रान्सफ्यूशन, गर्भपात, और एक्टोपिक  प्रेगनैन्सी से भी ऐसी स्थिति तक पहुँच सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसका हल क्या है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• जागरुकता- हम सभी को अपना ब्लड ग्रूप मालूम होना चाहिये। अपने जीवन साथी की इस पहचान से अनभिज्ञ नहीं होना चाहिये।&lt;br /&gt;• अगर स्त्री आर एच नैगाटिव है और पुरुष आर एच पौसीटिव तो डॉक्टर से सही समय पर सलाह और इन्जेक्शन लेने की तैयारी और तत्परता  होनी चाहिये।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आर एच इम्यूनोग्लोबिन इन्जेक्शन्स&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;गर्भ ठहरने के 28 हफ्ते में पहला इन्जेक्शन फिर प्रसव के 72 घंटे के भीतर दूस&lt;/strong&gt;रा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह इन्जेक्शन माँ के शरीर में ऐन्टीबौडीज़ बनने से रोकते हैं। जाहिर है इसे &lt;strong&gt;पहले गर्भ &lt;/strong&gt;मे ही लेना चाहिये। और चूंकि गर्भ में शिशु के ग्रूप पता लगाने की कौम्प्लीकेटड प्रोसीजर से बचना चाहिये ,यह इन्जेक्शन हर आर एच नैगाटिव स्त्री (जिसका पति आर एच पौसिटिव हो), को लेना चाहिये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; अगर कुछ कारणों की वजह से यह इनजेक्शन नहीं लिये गये तो डॉक्टर से तुरंत संपर्क करें। ऐसे गर्भ को विशेष ध्यान की जरूरत है। अगर शिशु खतरे में हो तो एक्सचेंज ट्रांसफ्यूशन कर के इस शिशु के खून को आर एच नैगाटिव खून से बदला जा सकता हैं। ऐसा कई बार करने की जरूरत पड़ सकती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर ऐसा कुछ भी नहीं किया जा सका तो शिशु के दिमाग और किडनी पर असर पड़ सकता है। हार्ट फेल ( हृदय के पम्प करने की शक्ति विफल) हो सकता है। रक्त की कमी हो सकती है। गँभीर पीलिया हो सकता है। इन सबसे शिशु की जान जा सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समस्या गँभीर हो सकती है। पर हल कितना आसान है। ब्लड़ ग्रूप का पता होना। समय पर इंजेक्शन लेना। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किंतु दुख की बात है की भारत में अभी भी अक्सर गर्भवति स्त्री को उसके ब्लड ग्रूप के बारे में नही पता होता। इतनी सुलभता से जो बचाया जा सकता है ....उसे उतनी ही लापरवाही से हम खो आते हैं। जब तक बात पता चलती है तब तक देर हो चुकी होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नवजात शिशु को कितने ही कारणों से खोया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.....सुना हैं बचाने वाला मारने वाले से ज्यादा बलवान होता है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पता नहीं......हम कब छोटी छोटी पहल कर बचाने वालों में अपना नाम दर्ज़ करायेंगे?!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6012202322442671087-3044236786785976981?l=drbejisdesk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/feeds/3044236786785976981/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6012202322442671087&amp;postID=3044236786785976981&amp;isPopup=true' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/3044236786785976981'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/3044236786785976981'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/2008/03/blog-post_31.html' title='शिशु पर माता पिता के ब्लड ग्रूप का महत्व'/><author><name>Beji</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16964389992273176028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://thumb18.webshots.net/t/16/16/4/0/43/2989400430101162518uaiKLi_th.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6012202322442671087.post-4848898905590274243</id><published>2008-03-25T05:14:00.000-07:00</published><updated>2008-03-25T10:32:08.148-07:00</updated><title type='text'>गर्भ के दौरान मनोवैज्ञानिक परिवर्तन</title><content type='html'>पोपुलर सिनेमा में गर्भ धारण होने की खबर हिरोईन की बेहोशी के साथ होती है। फिर नब्ज़ पकड़ कर प्रेग्नेन्सी टेस्ट। इसके बाद खुथी की लहर। मिठाई। फिर बहु का चमकता लजीला चेहरा। और उसके बाद लोरी गा कर सुलाती माँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किन्तु यह परिवर्तन इतना सहज नहीं है ।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;शिशु मनचाहा बदलाव है तो माँ का मन खुश....और नहीं तो तनावग्रस्त रहता है। गर्भ धारण करते ही स्त्री अत्यंत संवेदनशील हो जाती है। हर भाव की अत्युक्ति करना स्वभाव में शामिल हो जाता है। छोटी से छोटी बात रुला देती है, हँसा सकती है, डरा देती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गर्भ के समय को तीन महीने के अवधि अनुसार देखा जाये तो तीन भाग  में बाँटा जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले त्रिमाही भाग में स्त्री अपने में बदलाव महसूस करती है। यह बदलाव बाकियों को नज़र ना भी आये वह लगातार इसका अनुभव करती है। ऐसे में अक्सर पत्नि अपने गर्भ के बारे में भूलती नहीं....और पति को कभी कभार ही याद आता है। कुछ स्त्रियाँ इस समय भावनात्मक स्तर पर बेहद परेशान हो जाती हैं। उल्टियों का होना और  शरीर में जल्द होते बदलाव तनाव को और बढ़ा सकता है। कई बार शरीर की तकलीफ तनाव की वजह से भी बढ़ सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में पति का रवैया, सखी सहेलियों का साथ और कामकाज़, गृह गृहस्थि में तनाव का असर स्त्री के स्वभाव पर असर करता है। रियायत और विश्राम काफी हद तक मदद कर सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरे भाग में स्त्री अपने इस नई पहचान की तरफ थोड़ी सहज हो चुकी होती है। बीसवें हफ्ते से शिशु के उदर में हिलने को महसूस कर सकती है। उसे शिशु का अपने से अलग एक अस्तित्व के होने पर विश्वास होने लगता है। इस समय स्त्री का वज़न तेजी से बढ़ता है। उसे अपने सौंदर्य पर और आकर्षण पर संदेह होने लगता है। वह अपने पति को लगातार आँकती है कि उसकी नज़र में वह अब भी खूबसूरत है कि नहीं। अपने जीवन साथी पर उसकी निर्भरता बढ़ जाती है। वह हिम्मत चाहती है कि उसका जीवनसाथी जरूरत में उसके साथ होगा। उसमें रुचि लेगा। उसकी तकलीफ समझेगा। ऐसे में दंपति को एक दूसरे के साथ समय बिताना चाहिये। आगे आने वाले जीवन के बारे में बात करनी चाहिये। दूसरे त्रिमाही भाग में स्त्री में संभोग की इच्छा भी होती है और इससे नुकसान की सबसे कम सँभावना होती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीसरे भाग तक स्त्री काफी हद तक संयत हो चुकी होती है। एक नये जीवन को सँभालने के लिये खुद को सक्षम पाती है। अगर गर्भ के समय उसे बाकी तकलीफ नहीं सहनी पड़ी हो तो वह बाकी लोगों का ध्यान और प्यार का आनंद लेती है। भरी बस में सीट दिया जाना....सभी के आदर से पेश आने से वह महत्वपूर्ण महसूस करती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी बात का कुछ कामकाज़ी स्त्रियों पर उल्टा असर भी होता है। उनके कार्यक्षमता को कम आँका जाता है। बीमार समझा जाता है। समय आने के पहले ही उनसे महत्व के काम ले लिये जाते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाहरी व्यवस्थाओं का उसकी अवस्था पर सीधा असर पड़ता है। उसे किसी दूसरे स्त्री के सानिध्य की जरूरत महसूस होती है जो उसे इन परिवर्तनों की तरफ सहज कर सके। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे जैसे समय करीब आता है उसके संशय बढ़ने लगते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्त्री को गर्भवति होने पर साथ, प्यार, सानिध्य और सहानुभूति की जरूरत होती है। इस समय उसकी अतिसंवेदनशीलता  को समझना और अनुरूप व्यवहार करना भी आवश्यक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोनो स्त्री और पुरुष इस समय अपने बचपन के दिनों में लौटते हैं। उस समय की किसी बात पर हुई असंतुष्टता फिर उभरती है। अपनी नई पहचान कभी बहुत उल्लासित तो कभी दुखी करती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुरुष अपनी पत्नि के बदले रूप से कम प्रभावित नहीं होता। उसका बदला स्वभाव उसके लिये कभी आश्चर्य तो कभी दुख और तनाव का कारण बनते हैं। स्त्री की अतिसंवेदनशीलता के सामने वह अपने आप को बेबस महसूस करता है। वह खुद अपनी योग्यता पर शक करता है। स्त्री के शारीरिक संरचना में आने वाले बदलाव भी उसको प्रभावित करते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस दौरान एक दंपत्ति को लगातार एक दूसरे के साथ और विश्वास की जरूरत होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गर्भवति होने पर अजीबोगरीब सपनों का आना भी सामान्य है। जागते हुए जिन बातों को लेकर संशय या डर होता है नींद में वही सपनों का रूप ले लेते हैं। अधिकतर सपनों में स्त्री को लगता है कि वो कहीं फँस गई है, उसका बच्चा खो गया है, जरूरत में बिल्कुल अकेली रह गई है, कोई उसके बच्चे को नुकसान पहुँचाना चाहता है...वगैरह। &lt;br /&gt;यह सपने बिल्कुल सामान्य हैं। और इनका कोई गूढ़ अर्थ निकालकर उसका निदान करने की जरूरत नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक शिशु का मतलब क्या है.....&lt;br /&gt;कुदरत का यह खूबसूरत करिश्मा जिसमें स्त्री पुरुष की साझेदारी है। ढ़ेर सारा अनुराग, अनुभूतियों का स्रोत....। इतनी मासूमियत की लगता है परम को छू लिया हो....।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक शिशु का मतलब नींद में खलल, कई बार बीमार पड़ना, लगातार किसी का हम पर निर्भर रहना....सुसु, पौटी.....उल्टी, हिचकी, डकार, बेमतलब, बेहिसाब रोना, हँसना.....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने बदलाव के लिये सबसे जरूरी है कि स्त्री और पुरुष एक दूसरे का संबल बन सहजता से इस सौंदर्य को अपने जीवन में सहेजें......&lt;br /&gt;कुछ किलकारियों से...कुछ लोरियों से...घर आँगन में तब हम मासूमियत भर सकते हैं...।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="355"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/PQfNfJSRajA&amp;hl=en"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="wmode" value="transparent"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/PQfNfJSRajA&amp;hl=en" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent" width="425" height="355"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;em&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;The most important thing a father can do for his children is to love their mother. &lt;br /&gt;– Henry Ward Beecher&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="355"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/P6z08NDJrT4&amp;hl=en"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="wmode" value="transparent"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/P6z08NDJrT4&amp;hl=en" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent" width="425" height="355"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6012202322442671087-4848898905590274243?l=drbejisdesk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/feeds/4848898905590274243/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6012202322442671087&amp;postID=4848898905590274243&amp;isPopup=true' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/4848898905590274243'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/4848898905590274243'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/2008/03/blog-post_25.html' title='गर्भ के दौरान मनोवैज्ञानिक परिवर्तन'/><author><name>Beji</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16964389992273176028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://thumb18.webshots.net/t/16/16/4/0/43/2989400430101162518uaiKLi_th.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6012202322442671087.post-1257078611021007581</id><published>2008-03-17T03:59:00.000-07:00</published><updated>2008-03-17T04:01:06.954-07:00</updated><title type='text'>फोलिक ऐसिड़ क्यूँ?!</title><content type='html'>सबसे पहले सबसे अहम बात&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अगर शिशु का आग्रह हो तो गर्भ ठहरने के पहले से ही फोलिक ऐसिड. 400 mcg  नियमित रोज़ ।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गर्भवति स्त्री को  सब तरफ से सलाह और मशवरा मिलता है। ठंडा, गरम, सही, गलत.....बच्चे को सुंदर,सुशील और पता नहीं क्या क्या बना सकने के गूढ़ मंत्र सिखाये जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर मुझसे सिर्फ एक सलाह देने को कहा जाये तो मैं फोलिक ऐसिड़ के सेवन की सलाह दूँगी। वजह है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• यह बच्चे के रीढ़ के विकास में आवश्यक है।&lt;br /&gt;• अक्सर इसकी मात्रा आहार में कम होती है।&lt;br /&gt;• कमी से रीढ और रीढ़ की हड्डी में गंभीर त्रुटि हो सकती है।&lt;br /&gt;• यह किसी में भी हो सकती है।&lt;br /&gt;• इस त्रुटि को 70 प्रतिशत तक मात्र फोलिक ऐसिड़ के सेवन से घटाया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अक्सर स्त्री को अपने गर्भ की स्थिति के अंदाजे से पहले ही रीढ़ का विकास काफी हद तक संपूर्ण हो चुका होता है। यही वजह है कि गर्भ धारण करने की इच्छा हो तब से ही इसका सेवन शुरु करना जरूरी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="355"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/Ah5gBtx9jVI&amp;hl=en"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="wmode" value="transparent"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/Ah5gBtx9jVI&amp;hl=en" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent" width="425" height="355"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;खुली त्रुटि में दिमाग और/या रीढ़ के साथ हड्डी पर भी असर पड़ता है। रीढ़ और दिमाग का भाग अपनी परत के साथ या बगैर पीठ  से बाहर आ सकता है। इन त्रुटियों को न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट के अंतर्गत माना जाता है। सपाइना बाइफिड़ा, मेनिंगोसील, एनेनकेफाली,  एनकेफालोसील वगैरह इसके अंतर्गत आते हैं। गले के ऊपर के भाग से कमर के नीचे तक कहीं भी त्रुटि संभव है। त्रुटि की जगह की नसें प्रभावित होती हैं। उन नसों से जो क्रिया जुड़ी होती है वह भी प्रभावित होती है। उदाहरण के तौर पर अगर कमर में त्रुटि हुई तो दस्त और मूत्र का नियंत्रण नहीं रहता। शरीर के निचले हिस्से को लकवा मार जाता है।&lt;br /&gt;जेनेटिक खामी भी इस त्रुटि के रूप में सामने आ सकती है। (ट्राइसोमी 13 और 18) कई बार अगर &lt;strong&gt;माँ अपस्मार के लिये दवा ले रही हो या इनसुलिन डिपेंडेंट डाइबेटिस &lt;/strong&gt;से पीड़ित हो तब भी इस त्रुटि की सँभावना बढ़ जाती है।&lt;br /&gt;गर्भ धारण करने के 28 दिन के भीतर ही यह भ्रूण में स्थापित हो जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सामान्य जनसँख्या में इस त्रुटि की सँभावना 0.1% होती है यानि की 1000 में से एक में सँभावना होती है।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;त्रुटि की जाँच 16-18 हफ्ते में सँभव है।&lt;br /&gt;• माता का सीरम आल्फा फीटोप्रोटीन टेस्ट(16-18 हफ्ता)&lt;br /&gt;• हाई रेसोल्यूशन अल्ट्रासाउन्ड (18 हफ्ता)&lt;br /&gt;• ऐम्नियोसेंटेसिस (15 हफ्ते के बाद)&lt;br /&gt;इन जाँच प्रक्रिया का अपना जोखिम है । &lt;strong&gt;इनके लिये मंजूरी देने से पहले इन्हे समझना जरूरी है।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;अगर पहले गर्भ में यह कमी पाई गई हो तो दूसरे में इसकी सँभावना और भी बढ़ जाती है। फोलिक ऐसिड़ की मात्रा भी बढ़ाने की जरूरत होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;निष्कर्ष यह कि&lt;br /&gt;• शादीशुदा स्त्री को फोलिक ऐसिड नियमित लेना चाहिये।&lt;br /&gt;• गर्भ धारण करने पर भी इसका सेवन जारी रहना चाहिये।&lt;br /&gt;• किसी भी फार्मसी से 400mcg फोलिक ऐसिड़ ओवर द काउंटर मिल सकता है। रोज़ एक नियमित।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शारीरिक संरचना मे कोई भी त्रुटि हो....किसी भी कमी को व्यक्ति या शिशु में त्रुटि नहीं माना जा सकता। सभी त्रुटियों और कमियों के बावजूद....अगर किसी जीव में जीवन है तो वह अलग हो सकता है किन्तु संपूर्ण है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कुदरत का ऐसा कोई निर्णय अगर हमारे हाथ आ जाये तो उसे स्वीकार कर परवरिश करना माता पिता का कर्तव्य ही नहीं....माता और पिता के अर्थ को सार्थक करने के लिये जरूरी भी है।&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6012202322442671087-1257078611021007581?l=drbejisdesk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/feeds/1257078611021007581/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6012202322442671087&amp;postID=1257078611021007581&amp;isPopup=true' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/1257078611021007581'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/1257078611021007581'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/2008/03/blog-post_17.html' title='फोलिक ऐसिड़ क्यूँ?!'/><author><name>Beji</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16964389992273176028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://thumb18.webshots.net/t/16/16/4/0/43/2989400430101162518uaiKLi_th.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6012202322442671087.post-7281895850656748988</id><published>2008-03-16T04:01:00.000-07:00</published><updated>2008-03-16T04:08:46.155-07:00</updated><title type='text'>सिज़ेरियन से प्रसव</title><content type='html'>कुदरती तरीके से हुए शिशु कुदरत की हिफाजत में संसार में आ जाते हैं। किन्तु कुछ कारणों की वजह से सीज़ेरियन का विकल्प रखना पड़ता है। सीज़ेरियन से हुए शिशु का सफर अलग होता है। नौ महीने माँ की कोख में पलने के बाद....जब एक शल्यक्रिया का निर्णय लिया जाता है तब कुदरत की बागड़ोर कुछ इंसानों के हाथ चली जाती है। कई बार जरूरी और कई बार बिना किसी खास अनुरूप तर्क के यह विकल्प चुना जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब शिशु योनिमार्ग से नहीं गुजरता तो उसके फेफड़े का पानी ठीक से नहीं निचुड़ पाता। कुछ शिशु यह सामान्य तरीके से सहन कर लेते हैं। कुछ की साँस ज्यादा चलने लगती है। शिशु को इससे तकलीफ हो सकती है। इस स्थिति को ट्रान्सियन्ट टैकिप्निया ऑफ न्यूबॉर्न कहते हैं। योनिमार्ग से नहीं निकलने की वजह से सर पर कोन(कैपुट) भी नहीं बनता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सीज़ेरियन एक अहम शल्यक्रिया है। अन्य किसी भी शल्यक्रिया की ही तरह इसमें उतना ही खतरा है। यह खतरा कोई सर्जीकल या अनेस्थेटिक कौम्प्लीकेशन, करने वाले डॉक्टर के हुनर की कमी, बच्चे में किसी त्रुटि या फिर स्त्री के शरीर के किसी प्रतिकूल अनुक्रिया की वजह से हो सकती है। &lt;strong&gt;किन्तु जब यह आवश्यक हो तब माँ और शिशु दोनों के लिये जीवनदायिनी भी है।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="355"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/j8Gcompf1hk&amp;hl=en"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="wmode" value="transparent"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/j8Gcompf1hk&amp;hl=en" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent" width="425" height="355"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;जब भी योनिमार्ग से प्रसव का विकल्प शिशु या माँ के जीवन को खतरा बन सकता हो तब इस विकल्प का चुनाव किया जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विशेष कारण&lt;br /&gt;• बहुमूल्य गर्भ&lt;br /&gt;• दीर्ध एवं विषम प्रसव&lt;br /&gt;• विपत्ति में शिशु ( फीटल डिस्ट्रस)&lt;br /&gt;• विपत्ति में माता ( मैटर्नल डिस्ट्रस)&lt;br /&gt;• समस्या जैसे प्री एकलम्पसिया( अधिक रक्तचाप), हर्पिस&lt;br /&gt;• आपत्ति जैसे कि नाल का उतरना(कौर्ड प्रोलैप्स), उदर पर चीर पड़ना&lt;br /&gt;• एक से अधिक गर्भ&lt;br /&gt;• अस्वाभाविक गर्भस्थिति&lt;br /&gt;• विफल गर्भ प्रवेशन&lt;br /&gt;• सहायक विफल प्रसव (फेल्ड इन्स्ट्रूमेन्टल  डेलिवरी)&lt;br /&gt;• बड़ा शिशु&lt;br /&gt;• आंवल संबंधित त्रुटि&lt;br /&gt;• नाल संबंधित त्रुटि&lt;br /&gt;• संविदागत(कोन्ट्राक्टड) पेल्विस&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे जैसे चिकित्सा ज्ञान ने प्रगति करी है,वैसे वैसे सीज़ेरियन  सुरक्षित होता गया है। किन्तु जिस गति से इस हुनर का विकास हुआ है उससे काफी अधिक गति से इसके संख्या में वृद्धि हुई है। करीबन दस से पचास प्रतिशत प्रसव अब सीजेरियन से होने लगे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोच कर थोड़ी हैरानी होती है कि अचानक इतनी वृद्धि के पीछे क्या शिशु और माँ के स्वास्थ्य और जीवन का लाभ ही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कारण कई हैं-&lt;br /&gt;• सुविधा का सुलभ होना&lt;br /&gt;• कारणों का गलत आंकलन&lt;br /&gt;• डॉक्टर्स का ज्यादा फीस लेना का तरीका&lt;br /&gt;• दर्दी का योनिमार्ग से प्रसव करने से इंकार &lt;br /&gt;• महुरत और फैशनेबल ट्रैन्ड&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वजह जो भी हो यह एक अत्यंत चिंता का विषय है। कुदरत का हाथ बँटाना और उसके साथ खिलवाड़ करना दो अलग बातें हैं।  सीजेरियन से जन्मे बच्चों में  शर्तिया तकलीफ अधिक होने की सँभावना ज्यादा होती है। यह तकलीफ इनफेक्शन, खून का अधिक बहाव, अगले गर्भ में तकलीफ, उदर में चीर पड़ने की सँभावना....वगैरह कुछ भी हो सकती है। &lt;strong&gt;वैसे भी आज भी कुदरत इंसान से अधिक निपुण है।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर रिमोट कंट्रोल हमारे हाथ में नहीं है। जहाँ कुदरती  तरीके से प्रसव हो वहाँ कुदरत ध्यान रखती है कि शिशु प्रसव के बाद रोये, माँ आंवल के बाहर आते ही शिशु को दूध देने में सक्षम हो,  माँ का स्तन भी उपयुक्त समय पर भर जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब यह कंट्रोल इंसान के हाथ आता है तो सब कुछ हमेशा निर्विघ्न नहीं हो पाता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिज़ेरियन के पश्चात माँ को एक शल्यक्रिया के बाद मिलने वाली चौकसी की जरूरत होती है। दो हफ्ते तक माँ स्वतंत्र रूप से शिशु को देखने में पूरी तरह समर्थ नहीं होती। उदर और पेट पर जो चीर पड़ता है , वह भी भरने में समय लेता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिज़ेरियन के बाद एक माँ कुदरती प्रसव और सिजेरियन...दोनो की तकलीफ सहती है। जहाँ सामान्य प्रसव एक फिसियोलौजिकल प्रोसेस है....सिज़ेरियन एक कृत्रिम अवस्था है....जिसकी जटिलताओं का ज्ञान आवश्यक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने डॉक्टर का चुनाव हमेशा सोच समझ कर करना चाहिये।  डॉक्टर का समय पर सही फैसला लेने के लिये सचेत रहना जरूरी है....किन्तु व्यर्थ में कुदरती क्रिया में हस्तक्षेप गलत है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दर्दी और उसके साथ के लोग अक्सर भावनात्मक स्तर पर ऐसे समय में इतने कमज़ोर होते हैं कि कई बार एकदम सही फैसला नहीं कर पाते। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक चिकित्सक लेकिन संयत होना चाहिये कि सोच समझ सके कि उसके निर्णय का असर दर्दी पर क्या होगा-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Surgeons must be very careful&lt;br /&gt;When they take the knife!&lt;br /&gt;Underneath their fine incisions&lt;br /&gt;Stirs the Culprit - Life!&lt;br /&gt;~Emily Dickinson&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6012202322442671087-7281895850656748988?l=drbejisdesk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/feeds/7281895850656748988/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6012202322442671087&amp;postID=7281895850656748988&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/7281895850656748988'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/7281895850656748988'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/2008/03/blog-post_16.html' title='सिज़ेरियन से प्रसव'/><author><name>Beji</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16964389992273176028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://thumb18.webshots.net/t/16/16/4/0/43/2989400430101162518uaiKLi_th.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6012202322442671087.post-1875144211119605447</id><published>2008-03-13T00:45:00.000-07:00</published><updated>2008-03-13T05:50:24.948-07:00</updated><title type='text'>उत्पत्ति</title><content type='html'>नौ महीने का सफर समाप्त होते होते शिशु स्वतंत्र रूप से साँस लेने में सक्षम होता है। उसकी शारीरिक संरचना बाहर की दुनिया में आकर जीवित रहने के लिये पूर्ण। किन्तु कोख के अंदर से बाहर की यात्रा किसी भी दृष्टिकोण से एक दिलचस्प घटनाचक्र है। हिन्दी पिक्चरों में दिखाई जाने वाली इमोशनल प्रसव पीड़ा के बिहाइन्ड द सीन्स इतना कुछ हो रहा होता है कि हर बात अगर रेकार्ड की जाये तो एक पूरा उपन्यास लिखा जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर मनुष्य की इससे अहम और मुश्किल यात्रा शायद ही कोई और हो। एक बेहद संकरा रास्ता, जीवन की खोराक पहुँचाने वाली धमनियों से अलगाव, स्वतंत्र साँस की शुरुआत और बेहद तेजी से होता आंतरिक बदलाव।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="355"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/Xath6kOf0NE&amp;hl=en"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="wmode" value="transparent"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/Xath6kOf0NE&amp;hl=en" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent" width="425" height="355"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;स्पर्श की तपिश की पहली चाह और माँ का वात्सल्यपूर्ण साथ। &lt;br /&gt;माँ जो खुद शारीरिक और मानसिक बदलाव से गुजर रही है। शिशु को जन्म देने की पीड़ा और अपने जीवन से एक अलग अस्तित्व में देखने की अनुभूति....&lt;br /&gt;एक ऐसा समय जब माँ और शिशु दोनों को शिशु के पिता के साथ और आश्वासन की जरूरत होती है। पिता के लिये भी भावनात्मक जुड़ाव बनाने का महत्वपूर्ण समय।&lt;br /&gt;जन्म से पहले फेफड़े पानी से भरे होते हैं। औक्सीजन की आवश्यकता माँ नाल से पूरी करती है। अशुद्ध खून की सफाई भी आंवल(placenta) मे ही होती है। जब शिशु संकरे से योनिमार्ग से गुजरता है तो फेफड़ों से पानी निचुड़ जाता है। बाहर पहुँचे शिशु की नाल काट दी जाती है। एक ऐसा क्षण जो माँ से अलगाव और पहली साँस के बीच गुजरता है। लगातार घटता औक्सीजन, तापमान और रोशनी में परिवर्तन, स्पर्श और फेफडों में बढ़ने वाला नेगैटिव प्रेशर, इनका संयुक्त प्रभाव शिशु को साँस लेने की पहल करने को उकसाता है।&lt;br /&gt;फेफड़ों का साँस लेना सीखना एक अत्यंत जटिल प्रकरण है। &lt;br /&gt;नये अंकुरित पौधे को नई ज़मीन में रोपने जैसा। इस दौरान जड़े उखड़ जाती हैं और ज़मीन बदल जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे पहले कि हम शिशु में होते बदलाव जानें हमें एक सामान्य हृदय के कार्यप्रणाली से परीचित होना होगा। हृदय नाशपति के आकार का एक मांसपेशीय अव्यय  है |  दो फेफड़ों के बीच स्थित , शरीर के विभिन्न भागों में रक्त पहुँचाने के लिये जिम्मेदार होता है | यह चार प्रकोष्ठों मे बटाँ होता है। दाँये भाग में अशुद्ध (डिऔक्सीजनेटड) रक्त होता है और बाँये भाग में शुद्ध(औक्सीजनेटड)। दाँये और बाँये भाग ऐट्रियम और वेन्ट्रीकल में बँटे होते हैं। रक्त का प्रवाह एट्रियम से वैन्ट्रीकल( एक ही दिशा) में संभव है। दाँये भाग में ऐट्रियम और वेन्ट्रीकल के बीच ट्राइकस्पिड वाल्व होता है। और बाँये भाग में ऐट्रियम और वेन्ट्रीकल के बीच बाइकस्पिड वाल्व होता है। दाँये भाग में वैन्ट्रीकल से  अशुद्ध रक्त फेफड़ों तक पलमनरी आर्टरी से पहुँचता है। वहाँ से शुद्ध होकर पलमोनरी वेइन्स से बाँये ऐट्रियम में लौटता है। ऐट्रियम से वेन्ट्रीकल फिर एओर्टा से शरीर के सभी हिस्सों तक । वहाँ औक्सीजन पहुँचा कर सुपीरियर और इनफीरियर वीना कैवा से दाँये ऐट्रियम में अशुद्ध रक्त पहुँचता है।&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="355"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/xagOnC6sZEU&amp;hl=en"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="wmode" value="transparent"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/xagOnC6sZEU&amp;hl=en" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent" width="425" height="355"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;हाँ थोड़ा पेचिदा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन सोचने की बात है कि कुछ ही क्षणों में बिल्कुल काम नहीं करते हुए फेफड़े अचानक काम करना कैसे शुरु करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जन्म पू्र्व शिशु में जो बातें अलग होती हैं-&lt;br /&gt;नाल और आंवल के बीच की धमनियाँ अशुद्ध रक्त  पहुँचा कर शुद्ध रक्त वापस ले जाती हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;• डक्टस आर्टिरियोसस- पलमनरी आर्टरी और एओर्टा के बीच&lt;br /&gt;• फोरामेन ओवेल-दोनो वेन्ट्रीकल के बीच एक छेद। &lt;br /&gt;• डक्टस विनोसस- जिगर(लिवर) और इनफीरियर वीना कैवा के बीच&lt;br /&gt;• अंबीलीकल वेइन- नाल से शिशु के लिवर तक&lt;br /&gt;• अंबिलिकल आर्टरी- शिशु से आंवल तक&lt;br /&gt;इतनी धमनियों को जन्मउपरांत बंद हो जाना पड़ता है।  और सामान्य हृदय की कार्यप्रणाली तक पहुँचना पड़ता है। &lt;br /&gt;जानती हूँ कि समझने में बहुत आसान नहीं है। लेकिन इतने जटिल बदलाव करने के लिये निमिष मात्र का समय होता है। कहीं कोई छोटी सी चूक और वह हृदय के संरचना में त्रुटि के रूप में उभर आती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="355"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/T79sMqvN3BE&amp;hl=en"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="wmode" value="transparent"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/T79sMqvN3BE&amp;hl=en" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent" width="425" height="355"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;इतने बदलाव के बाद होता है बच्चे का  पहला रूदन.....पहली साँस.....&lt;br /&gt;पता नहीं क्यूँ फिर सभी हिन्दी पिक्चरों के सीन्स याद आ गये। जी हाँ...पहला रूदन वाकई खुशी की बात है....कुदरत के एक चमत्कार  के संपूर्ण होने के उद्घोष जैसा....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी लगता है कुदरत ने हम में से हर एक के ऊपर कितनी मेहनत की है । कई बार जितना मोल आंक कर हमें कुदरत ने जीवन दिया है...हम उससे बहुत नीचे के स्तर पर जीवन निर्वाह करते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="355"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/iEubCq5KYv0&amp;hl=en"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="wmode" value="transparent"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/iEubCq5KYv0&amp;hl=en" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent" width="425" height="355"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और माँ .... बीज, मिट्टी और हवा....तो जीवन है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6012202322442671087-1875144211119605447?l=drbejisdesk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/feeds/1875144211119605447/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6012202322442671087&amp;postID=1875144211119605447&amp;isPopup=true' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/1875144211119605447'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/1875144211119605447'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/2008/03/blog-post_13.html' title='उत्पत्ति'/><author><name>Beji</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16964389992273176028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://thumb18.webshots.net/t/16/16/4/0/43/2989400430101162518uaiKLi_th.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6012202322442671087.post-4287829487045549434</id><published>2008-03-11T05:12:00.001-07:00</published><updated>2008-03-11T05:12:48.052-07:00</updated><title type='text'>नौ महीने गर्भ में</title><content type='html'>एक शिशु को संसार में लाना और फिर उसकी परवरिश का दायित्व सँभालना जिम्मेदारी का काम है। एक दम्पति के जीवन में यह एक ऐसा बदलाव है जिसके कई पहलू हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर नवागंतुक का आगमन सोचा समझा ना गया हो,शुभ नहीं समझा जा रहा हो, किसी गल्ती का परिणाम हो तो इस पूरे प्रक्रिया में और भी कई पक्ष उभर आते हैं। आर्थिक परेशानियाँ, इसके पहले के गर्भ के समय आया कोई संकट, माँ की गर्भवति होने के समय की उम्र और उसके स्वयं के बचपन में सहे संघर्ष एवं द्वन्द्व...ऐसी कई बातें हैं जो कोख में पल रहे बच्चे और उस बच्चे को जनने वाली माँ पर असर कर सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक औरत जब गर्भवति हो जाती है तो शारीरिक और मानसिक रूप से कई परिवर्तन के दौर से गुजरती है। एक नये जीवन को खोराक और पलने की जगह देना,  उसे स्वतंत्र साँस तक लेकर पहुँचना और फिर उसके आत्मनिर्भर होने तक अपने खून से सींचना। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मानसिक रूप से भी तीन सीढ़ियाँ पार करती है।&lt;br /&gt;• पहली बार यह जानकर कि वह माँ बनने वाली है,एक सुखद अनुभूति का अहसास होता है। किन्तु साथ ही अपने सामर्थ्य पर शक भी। अपने माता पिता के साथ अगर कोई भावनात्मक द्वन्द्व हो तो इस दौरान बाहर आ जाता है।&lt;br /&gt;• करीबन बीस हफ्ते के आसपास, औरत की उपरोक्त भावनायें चरम सीमा पर पहुँच जाती हैं। उसे चिन्ता सताने लगती है कि कहीं उसका बच्चा शारीरिक और मानसिक रूप से विकलांग ना हो। उसे अहसास होने लगता है कि यह बच्चा उसके शरीर में है जरूर पर इसका अस्तित्व अलग है।&lt;br /&gt;• गर्भ के अंत तक पहुँचते पहुँचते माँ अपने बच्चे को एक व्यक्तित्व से जोड़ देती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो सूईयों को लेकर स्वेटर बुनती माँ वाली इमेज कितनी भी रूमानी क्यूँ ना हो...यह एक सच है कि इस दौरान वह विविध मानसिक और शारीरिक उतार चढ़ाव से गुजरती है। इस समय उसे समझना और स्वीकार करना उसके मानसिक संतुलन के लिये आवश्यक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कुदरत का एक करिश्मा ही है कि एक कोशिका से एक पूरा इंसान तैयार हो जाता है। &lt;br /&gt;नियंत्रण एक डी एन ए कोड़ मे लिखा हुआ, जिसमें माता और पिता की बराबर की भागेदारी रहती है। इस कोड़ के अनुसार एक कोशिका ,रूप मे ढ़लने लगती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी कुशल निर्देशक के हाथ में एक सिम्फनी.....साधन माँ उपलब्ध कराती है...और जगह उसकी कोख।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="355"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/qhrZj2RuNgQ"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="wmode" value="transparent"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/qhrZj2RuNgQ" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent" width="425" height="355"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="355"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/2eelyg_k5iw"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="wmode" value="transparent"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/2eelyg_k5iw" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent" width="425" height="355"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object width="425" height="355"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/aR-Qa_LD2m4"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="wmode" value="transparent"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/aR-Qa_LD2m4" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent" width="425" height="355"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विकास का क्रम&lt;br /&gt;1. उर्वरण और कोख में स्थिर होना- भ्रूण जीवन की शुरुआत (पहला और दूसरा हफ्ता)&lt;br /&gt;2. दो में संस्तरित होना &lt;br /&gt;3. तीसरे स्तर का जुड़ाव-  अव्ययों के निर्माण की शुरुआत (तीसरा, चैथा हफ्ता)&lt;br /&gt;4. हृदय, आँख और एक नन्हा आकार- हाथ और पाँव के अंकुर (पाँचवा हफ्ता)&lt;br /&gt;5. नन्हा सा मुँह&lt;br /&gt;6. नाक और होंठ&lt;br /&gt;7. पलक&lt;br /&gt;8. ओवरीज़ और टेस्टिस&lt;br /&gt;9. स्त्री या पुरुष विशेषता सूचक (नौवाँ हफ्ता)&lt;br /&gt;10. खुली आँखें&lt;br /&gt;11. हिलता , घूमता शिशु ( बीसवें हफ्ते से अढतीसवाँ हफ्ता)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मृत्यु दर और अस्वस्थता सबसे अधिक जन्म से पूर्व होती है। करीबन तीस प्रतिशत गर्भ स्वत: निष्फल हो जाते हैं। इनमें अक्सर कोई बुनियादी खोट होता है। दो प्रतिशत नवजात शिशु में कोई गँभीर शारीरिक विकलांगता होती है जिसे शल्य चिकित्सा की आवश्यकता पड़े। रोगाणू, रसायन,तापमान की विविधता और एक्स रेस का असर भी सबसे अधिक इसी दौरान होता है। माता या पिता के सिगरेट फूँकने का असर भी बच्चे में कम विकास का कारण बन सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माँ एक कोशिका को एक शिशु बनाने की प्रक्रिया में पूरी खोराक पहुँचाती है। सभी अव्ययों को विकसित करने के लिये विटामिन्स, मिनरल्स ,ऊर्जा ,कैल्सियम, लौह तत्व वगौरह की जरूरत पड़ती है। जो माँ को अपने खोराक से मिलता है, विकसित होते शिशु तक पहुँच जाता है। जो खोराक में नहीं होता पर उसके शरीर में हो....वो शरीर से सोंक लिया जाता है। अगर शरीर भी उस जरूरी खोराक से वँचित हो तो शिशु में असर दिखता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गर्भ ....शायद एकमात्र ऐसा समय जब एक ही शरीर में दो दिल साथ में धड़कते हैं....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुदरत कितने निपुणता से हर अंग को रूप में ढ़ाल देती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;....इतनी खूबसूरती,श्रम और परम के आशा के चिन्ह को.....कितनी आसानी से कुछ लोग भ्रूण हत्या के हेडलाइन्स के नीचे समाप्त कर देते हैं.....&lt;br /&gt;जैसा कि मार्टिन कहते हैं&lt;br /&gt;God's interest in the human race is nowhere better evidenced than in obstetrics.&lt;br /&gt;Martin H. Fischer&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भगवान का मनुष्य जाति से लगाव औबस्ट्रैटिक्स (गर्भ संबंधित विज्ञान) से ज्यादा और कहीं नज़र नहीं आता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर रवीन्द्र नाथ टैगोर ने कहा ही है &lt;br /&gt;Every child comes with the message that God is not yet discouraged of man. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काश हम थोड़ी कोशिश कर परम का हौसला बनाये रखें......।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6012202322442671087-4287829487045549434?l=drbejisdesk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/feeds/4287829487045549434/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6012202322442671087&amp;postID=4287829487045549434&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/4287829487045549434'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/4287829487045549434'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/2008/03/blog-post_11.html' title='नौ महीने गर्भ में'/><author><name>Beji</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16964389992273176028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://thumb18.webshots.net/t/16/16/4/0/43/2989400430101162518uaiKLi_th.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6012202322442671087.post-1131397967202545479</id><published>2008-03-09T11:01:00.000-07:00</published><updated>2008-03-09T11:02:16.992-07:00</updated><title type='text'>आरंभ</title><content type='html'>उदर में एक नन्हे से जीवन की पहल होते ही अनंत सँभावनाओं को मुट्टी में पकड़ एक स्वप्न रूप लेता है। नौ महीने परम के हाथ से माँ की कोख में अंग को पूर्ण करता हुआ लगातार एक स्वतंत्र अस्तित्व की ओर विकसित होता है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जन्म पश्चात शिशु अपना जीवनकाल आरंभ करता है। जन्म,शैशव, बाल्यकाल, फिर तरुणाई। हर विकास के पड़ाव से गुजरता हुआ एक व्यक्ति बनता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सफर आसान नहीं है। कई बातों की सही समझ माँ बाप को नहीं होती। बहुत सी असामान्य  बातें रीत रिवाज़ और रस्म की आड़ में छिपी रह जाती हैं। और बहुत सी सामान्य बातों को रोग का नाम दिया जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे तो हर शिशु का व्यक्तित्व काफी कुछ तय होता है लेकिन परिवेश के असर से इंकार नहीं किया जा सकता। माता पिता उस कुम्हार की तरह हैं जो कच्ची मिट्टी को मनचाहा स्वरूप देने में सक्षम हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस जगह में मेरी कोशिश रहेगी कि मैं शैशव से तरुणाई तक के विभिन्न पहलुओं पर रोशनी ड़ाल सकूँ। विविध विषयों का विश्लेषण करना चाहती हूँ कि मार्गदर्शन कर सकूँ कि कहाँ हमें स्वीकार करने की जरूरत है और कहाँ हम सकारात्मक हस्तक्षेप कर सकते हैं । &lt;br /&gt;खलिल गिबरान कहते हैं कि माता पिता परम के हाथ में कमान की तरह होते हैं,जिसके सही झुकाव से बच्चे तीर की तरह सीधा सही रास्ते से गुजर लक्ष्य तक पहुँचते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Your children are not your children.&lt;br /&gt;They are the sons and daughters of Life's longing for itself.&lt;br /&gt;They come through you but not from you,&lt;br /&gt;And though they are with you yet they belong not to you.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;You may give them your love but not your thoughts,&lt;br /&gt;For they have their own thoughts.&lt;br /&gt;You may house their bodies but not their souls,&lt;br /&gt;For their souls dwell in the house of tomorrow,&lt;br /&gt;which you cannot visit, not even in your dreams.&lt;br /&gt;You may strive to be like them,&lt;br /&gt;but seek not to make them like you.&lt;br /&gt;For life goes not backward nor tarries with yesterday.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;You are the bows from which your children&lt;br /&gt;as living arrows are sent forth.&lt;br /&gt;The archer sees the mark upon the path of the infinite,&lt;br /&gt;and He bends you with His might&lt;br /&gt;that His arrows may go swift and far.&lt;br /&gt;Let our bending in the archer's hand be for gladness;&lt;br /&gt;For even as He loves the arrow that flies,&lt;br /&gt;so He loves also the bow that is stable.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे इस सफर में उम्मीद है आप मेरे साथ होंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6012202322442671087-1131397967202545479?l=drbejisdesk.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/feeds/1131397967202545479/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6012202322442671087&amp;postID=1131397967202545479&amp;isPopup=true' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/1131397967202545479'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6012202322442671087/posts/default/1131397967202545479'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://drbejisdesk.blogspot.com/2008/03/blog-post_09.html' title='आरंभ'/><author><name>Beji</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16964389992273176028</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://thumb18.webshots.net/t/16/16/4/0/43/2989400430101162518uaiKLi_th.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6012202322442671087.post-9086029085771663948</id><published>2008-03-03T02:54:00.000-08:00</published><updated>2008-03-04T03:01:35.090-08:00</updated><title type='text'>वात्सल्य</title><content type='html'>नींव का पहला पत्थर.....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' 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