Thursday, 27 August 2009

स्वाइन फ्लू

करीबन दो महीने से स्वाइन फ्लू पर लिखने की चेष्ठा कर रही हूँ। लिख नहीं रही। कहीं दूर से बैठे किसी ग्राफ का विश्लेषण करने जैसे लग रहा था। बच्चे रोज़ अस्पताल आ रहे थे। सर्दी खाँसी आम सी बात थी। पर स्वाइन फ्लू कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। आने वाली आफत और सामने वाली आफत में भारी फर्क है। एक को हम बिल्कुल नहीं जानते और दूसरे से जूझने के सिवा चारा नहीं होता। जिस बात से हम अनिभिज्ञ हैं हम उससे अपने सारे जाने अनजाने डर जोड़ देते हैं। स्वाइन फ्लू से जब नज़र मिलाई तो महसूस हुआ इसका चेहरा इतना विकृत भी नहीं।




सर्दी, खाँसी और फ्लू




साधारण सर्दी खाँसी और फ्लू में बहुत सारी बातें एक सी हैं। किसी भी वायरस के संक्रमण पर शरीर उसे बाहर फेंकने की कोशिश करता है। खाँसना, छींकना, जाड़ा, उल्टियाँ यह सब इसमें मदद करती हैं। साधारण सर्दी जुकाम के लक्षण नाक के आसपास होते हैं। इनके लिए जिम्मेदार होते हैं नोस वायरसस। रेस्पिरेटरी सिनसायटियल वायरस खास तौर पर जिम्मेदार माना गया है। कभी कबार इनफ्लूएंज़ा वायरस भी सर्दी खाँसी के जिम्मेदार हो सकते हैं। कॉमन कोल्ड के मुख्य लक्षण नाक बंद होना, छींके आना और नाक का बहना है। बड़े लोगों और बड़े बच्चों में बुखार अक्सर नहीं आता। छोटे बच्चों में 100 से 102 फैरनहीट जितना बुखार आता है। गले में खराश अक्सर पाई जाती है पर गला खराब नहीं होता और उसमे लाली नही दिखती। साल भर में बच्चों में तीन से आठ बार तक सर्दी खाँसी हो सकती है। ठंडी और बरसात के मौसम में इसकी संभावना अधिक हो जाती है। बहती हुई नाक में यह वायरस बड़ी संख्या मे होता है। खाँसने, छींकने, नाक साफ करने पर, किसी संक्रमित जगह छूने के बाद चेहरा छूने पर यह वायरस फैलता है। सर्दी के वायरस के संपर्क में आने के एक से पाँच दिन के भीतर लक्षण शुरु हो जाते हैं। एक से तीन दिन में नाक से बहता पानी, हरे या पीले रंग का हो जाता है। बच्चों के कान के पर्दे लाल हो जाते हैं। करीबन सात दिन में सर्दी का असर खत्म हो जाता है।

साधारण सर्दी के सभी लक्षण गले से ऊपर के हिस्से में होते हैं। फ्लू का असर पूरे शरीर पर होता है। फ्लू इन्फ्लूएंज़ा वायरस से होता है। अधिकतर सभी को साल में एक से तीन बार तक हो सकता है। साथ में तेज बुखार होता है - बच्चों में भी और बड़ों में भी। इसके लक्षणों से तकलीफ तो होती है किंतु यह कोई भयानक रोग नहीं है। फ्लू में अचानक से तेज़ बुखार आ जाता है (102-106), चेहरा लाल , गाल सुर्ख हो जाते हैं,शरीर में दर्द उठता है ,थकान होती है और ऊर्जा की कमी महसूस होती है। कभी कबार चक्कर भी आते हैं और उल्टियाँ भी हो सकती हैं। बुखार एक दो दिन तक रहता है और कभी कबार पाँच दिन तक भी। दूसरे दिन से शरीर की तकलीफ कम होने लगती है और श्वास से संबंधित तकलीफ बढ़ जाती है। यह वायरस जहाँ केन्द्रित होते है उसके अनुसार् सर्दी, खाँसी, गले मे दर्द ,कान मे इंफेक्श्न, ब्रोंकिओलिटिस या नयूमोनिया के लक्षण दर्दी मे पाये जाते है। फ्लू का सबसे आम लक्षण है सूखी खांसी आना। अधिकतर लोगो मे सरदर्द और गले का लाल होना भी शामिल है। नाक का बहना और छींके आना भी आम है। यह सभी लक्षण चार से सात दिन के भीतर बेह्तर हो जाते है। कभी कभी इस दौरान बुखार फिर चड़ने लगता है। हफ्तों तक फ्लू से उत्पन्न कमज़ोरी रह सकती है। दर्दी सर्दी, खांसी से इस वायरस के सपर्क मे आते है। एक से सात दिन मे लक्षण दिखने शुरु होते है। हवा मे फैलने की वजह से फ्लू की संक्रमण शक्ति बेहद अधिक होती है। देखते ही देखते बडी संख्या मे बहुत लोग एक साथ बीमार हो जाते है।

फ्लू वैक्सीन



फ्लू से जूझने के लिये फ्लू वैक्सीन उप्लब्ध है। यह वैक्सीन किसी भी साल मे हुए फ्लू वायरस के स्ट्रैन पर आधारित है। जब फ्लू के नये स्ट्रैन होते है तो यह वैक्सीन कारगर नही रहती। जाहिर है कुछ सालो मे यह वैक्सीन बाकी सालों के मुकाबले अधिक कारगर रहती है।
फ्लू के स्ट्रैन में परिवर्तन होने पर यह घातक रूप धारण कर सकती है। इस शतक के शुरु मे इससे काफी जानलेवा महामारी फैली थी। ऐसी ही महामारी बीच बीच मे फैलती रहती है। साधारण तौर पर भी अकेले अमेरिका मे ही करीबन तीस से चालीस हज़ार लोग इससे ग्रस्त होकर जान से हाथ धो बैठते है। जिन लोगो मे पहले से कोई कमज़ोरी होती है वो गभीर रूप से बीमार हो सकते है। अगर काफी कम या ज़्यादा उम्र , कैंसर या डायबिटिस जैसे रोग, श्वास संबंधित रोग वगैरह हों तो इसका संक्रमण अधिक जोर पकड़ता है।


फ्लू और फ्लू महामारी

जब से मेक्सिको में स्वाइन फ्लू वायरस की खबर मिली इसमें महामारी फैलाने की क्षमता का अंदेशा होने लगा। दक्षिणी और उत्तरी गोलार्ध में फ्लू का मौसम अलग अलग समय है। फ्लू वायरस लगातार बदलते हैं। और इसीलिए दोनो गोलार्ध में एक से वायरस नहीं पाये जाते। महामारी फैलाने वाले फ्लू वायरस का आचरण साधारण फ्लू वायरस की तरह नहीं होता। यह उससे अधिक घातक होते हैं। अधिक आसानी से संक्रमित करते हैं। सही परिस्थिति में चिड़िया, सूअर वदैरह के फ्लू वायरस के जीन ह्यूमन फ्लू वायरस का अंश बन जाते हैं। चूँकि हमारी रोगप्रतिकारक शक्ति को इसका कोई परिचय नहीं होता, उसका प्रतिकार सक्षम नहीं होता। ऐसे में फ्लू वायरस शरीर पर आसानी से कब्जा जमा सकता है।

फ्लू वायरस के कितने प्रकार

तीन प्रकार। ए, बी, सी। ए से अधिकतर फ्लू के केसस होते हैं। सी के लक्षण बेहद कम होते हैं और यह पाया भी सबसे कम जाता है।

ए- इसमें 16 H और 9 N प्रकार शामिल हैं। H का मतलब हीमअग्लूटिनिन, N का मतलब न्यूरामिनिडेस। यह वायरस पर पाये जाने वाले डाँचे हैं जिनसे इनकी पहचान सँभव है। बर्ड फ्लू का वायरस है H5N1 । मनुष्यों में फिलहाल जो तीन वायरस फ्लू फैला रहे हैं वे हैं ए वायरस( two A viruses) – (A) H1N1 और (A)H3N2 – तथा एक बी (B ) वायरस. इंसानों में जो H1N1 वायरस पाया जाता है वो सवाइन फ्लू के H1N1 वायरस से अलग है।

महामारी का मतलब जानलेवा नहीं

यह समझना बेहद जरूरी है कि महामारी का मतलब जानलेवा बीमारी नहीं है। WHO ने जब स्वाइन फ्लू को महामारी कहा उनका तात्पर्य इस वायरस के फैलने की तेज़ी और क्षमता से था। दोनो गोलार्ध में एक साथ पाया जाना, मौसम और तापमान से संबन्ध ना होना - यह बातें इसे महामारी बनाती हैं।

फ्लू सर्दी के मौसम में अधिक क्यों
-अधिक समय घर के अंदर, धूप से दूर
-विटामिन डी की कमी
-हवा में सीलन की कमी जिससे श्वास के अवयव शुष्क जाते हैं और रोगाणु आसानी से पकड़ पा लेते हैं

क्या हाल की फ्लू वैक्सीन आपकी रक्षा करने में सक्षम है

मनुष्यों और स्वाइन फ्लू में पाया गया H1N1 स्ट्रैन एक दूसरे से काफी अलग है इसलिए यह कहना मुष्किल है कि हाल की वैक्सीन कितनी सुरक्षा दे सकता है।

फिर भी 65 से ऊपर के सभी, आरोग्य कार्यकर्ता, हृदय संबंधित रोगों,डायबीटिस, अस्थमा से पीड़ित लोगों का, गर्भवति स्त्री वगैरह का इस वैक्सीन का लेना जायज़ है। CDC (Centre of Disease Control) के हाल के निर्देश के हिसाब से सभी को खास तौर से बच्चों को यह वैक्सीन लेनी चाहिए।

फ्लू से स्वस्थ नौजवानों की मृत्यु क्यों

सही कारण मालूम नहीं है। किंतु अंदेशा लगाया जाता है कि इसका कारण सायटोकीन स्टार्म (cytokine storm) है। फ्लू के वायरस के दावा बोलते ही रोग प्रतिकारक शक्ति पूरी सेना उसके खिलाफ छोड़ देती है। इससे बुखार, शरीर में दर्द और अवयवों का विफल होना शुरु हो जाता है। वायरस की साफ पहचान ना होने की वजह से उसका बाल भी बाँका नहीं होता।

फिर भी यह कहना गलत होगा कि फ्लू से अधिक नौजवानों की मौत होती है। मृत में 90 फीसदी लोग 65 की उम्र के ऊपर पाये जाते हैं।

क्या वजह है कि फ्लू वायरस की इतनी दहशत है

वायरस जीव और निर्जीव के बीच की एक अवस्था है। कालांतर से यह बदलते जा रहे हैं। खुद के जैसों के उत्पादन में यह लगातार भूल करते हैं। जो भूल जिंदा रहने में सक्षम होती है आगे बड़ जाती है। यह हवा में धूल की तरह फैल कर शरीर तक पहुँचते हैं और वहाँ पहुँच कर सँख्या में बढ़ते हैं और दावा बोल देते हैं। यह इतनी जल्दि और लगातार बदलते हैं कि शरीर के लिए इनकी पूरी पहचान सँभव नहीं हो पाती। शरीर हर बार इसका नया रूप देखता है। जब तक वह खुद को इससे लड़ने को तैयार करता है यह फिर बदल जाता है।
H प्रोटीन इसे गले, श्वास नलियों की कोशिकाओं में चिपकने में मदद करता है और N प्रोटीन इन कोशिकाओ में पनप कर इन्हे तोड़ कर बाहर निकल बाकी कोशिकाओं पर हमला करने में सँभव।

टैमीफ्लू जैसी दवा इन HN प्रोटीन्स पर हमला करते हैं । किंतु अगर इनका डाँचा और बदल जाये तो जरूरी नहीं कि यह सक्षम रह सके।


ये कहाँ आ गये हम साथ साथ चलते




स्वाइन फ्लू एक महामारी है
स्वाइन फ्लू साधारण तौर पर जानलेवा नहीं है
स्वाइन फ्लू जानलेवा बन सकती है
फ्लू के बाकी वायरस की तरह ही यह भी हवा में और हवा से फैलती है
खाँसने, छींकने और बहती नाक हाथ से पोँछने से वायरस को फैलने में आसानी होती है
कड़ी धूप में यह नहीं पनप सकती
साबुन और पानी के सामन नहीं टिक सकती
बंद कमरे , भीड़ , सफाई की कमी में यह जोर पकड़ती है
स्वस्थ शरीर में अक्सर नहीं टिक पाती है
यह बदल रही है....बुरे के लिए भी हो तसकता है और अच्छे के लिए भी
वैक्सीन की खोज समझो पूरी हुई
वैक्सीन के आते ही वायरस बदलेगा नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं

हम क्या करें...क्या कर सकते हैं










1. साफ सफाई रखें और नियमित हाथ धोये।
2.चेहरे पर बेवजह बार बार हाथ ना ले जाये
3. सर्दी खाँसी होने पर टिश्यू इस्तेमाल करें, नहीं तो बाँह ;और टिश्यू को लोगों के संपर्क में ना आने दें
4.सात से आठ घँटों की नींद, अच्छा भोजन जिसमें विटामिन सी और डी पर्याप्त मात्रा में हो
5.घर में धूप आने दें, ठंड से बचें और भीड़ में ना जायें
6.मास्क एक बैरियर का काम कर सकता है और भीड़ में आपके श्वास अवयवों तक वायरस को पहुँचने से रोक सकता है।
अगर घर में कोई स्वाइन फ्लू से ग्रसित है तो उसे एक कमरे तक सीमित रखें और कम से कम लोगों के संपर्क में उसे आने दें।
7. पर्याप्त मात्रा में पानी पियें।
8.हल्की सर्दी खाँसी का घर रह कर ही उपचार करें।
9. फ्लू के लक्षण दिखने पर अस्पताल से संपर्क करें और सिर्फ दर्दी को अस्पताल ले जायें।
10. स्वाइन फ्लू जानलेवा नहीं है और इसीलिए साधारण इलाज से भी बेहतर हो सकती है।
11. श्वास संबंधित लक्षणों के दिखने पर ( तेज साँस चलना, साँस लेने में तकलीफ होना), लगातार बहुत तेज बुखार होने पर, बेहोशी की अवस्था होने पर, या और कोई भी चिंताजनक गँभीर लक्षण दिखने पर देरी ना करें और डॉक्टर से मिलें।




स्वाइन फ्लू और मेरा अनुभव

स्वाइन फ्लू के केस अब नई बात नहीं रह गई है। करीबन पाँच कनफर्म्ड केस देखे हैं, सभी पाँच साल से छोटे, तीन बच्चे दो साल से छोटे। दो को टैमीफ्लू नहीं दिया गया था और बाकी को दिया गया था। सभी स्वस्थ हैं। मैं भी....अब तक। :-))

हर बीमारी हमारी अवस्था का बखान करती है। बीमारी से पता चलता है समाज की अवस्था का। प्लेग से दौड़ते चूहे याद आते हैं और एड्स से नैतिकता पर सवाल उठता है। कोलेरा से पीने के पानी की और ध्यान जाता है और मलेरिया से जमे हुए पानी पर। डायबिटिस और ब्लडप्रऐशर से जंक फुड्स की बाढ़ याद आती है।

स्वाइन फ्लू गरीबों और अमीरों दोनो पर हावी है-
गरीब कमज़ोर है, साफ नहीं है, भीड़ में रहता है, अच्छे खाने से वँचित है
अमीर ए सी गाड़ियों और घरों में रहता है,धूप से दूर रहता है हाथ धोने से ज्यादा टिश्यू पोंछने में विश्वास रखता है, देश विदेश जा सकता है और इन वायरस के संपर्क में आता है....

इलाज और रस्सी तक हम पहुँच ही गये हैं......हवादार कमरे, हाय से नमस्ते, साफ सुथरे हो जायें तो जीवित वायरस को निर्जीव करना इतना मुश्किल भी नहीं।

और जानकारी पाने के लिए http://www.cdc.gov/h1n1flu/

Monday, 27 April 2009

बच्चे के व्यक्तित्व के विकास में माता पिता का योगदान

किसी भी बच्चे का लालन पालन बेहद जिम्मेदारी का काम है। माता पिता की भूमिका इसलिए भी बहुत अहम है क्योंकि ना केवल हम बीज देते हैं बल्कि ज़मीन, हवा और ऱौशनी भी हमारी जिम्मेदारी है। एक शिशु ने किस माता पिता से जन्म लिया और किस घर और वातावरण में पला बड़ा ,दोनो बातें उसके व्यक्तित्व पर छाप छोड़ते हैं।

सायकोलोजी में एक बेहद दिलचस्प विषय है- ट्राँसैक्शनल अनालिसिस (TRANSACTIONAL aNALYSIS) । इसके अनुसार किसी भी व्यक्ति का व्यक्तित्व तीन खंड़ों ( इगो स्टेट्स) में बाँटा जा सकता है। एडल्ट(वयस्क),चाईल्ड(शिशु) और पेरन्ट(जनक)। 'चाईल्ड' हमारे व्यक्तित्व का शिशु है। नैसर्गिक, निर्दोष, मासूम। यह भावनाओं और अवस्था को ज्यों का त्यों महसूस करता है और उसी के अनुसार प्रतिक्रिया करता है। अनुभव से दूर , और दूरदर्शिता की चिंता बिना का व्यवहार कभी बहुत ही प्यारा और कभी बेहद लापरवाह लगता है।

कुछ लोग कभी बड़े नहीं होते। मस्त रहते हैं और किसी बात की जिम्मेदारी नहीं लेते। ऐसे लोगों के व्यक्तित्व का एक बड़ा हिस्सा चाईल्ड इगो स्टेट है । जहाँ इनका बिंदास होना सुहाता है,वहीं इनकी लापरवाही खलती है।

कुछ इस चाईल्ड को बहुत कम अहमियत देते हैं। वक्त से पहले संजीदा,गँभीर, बेहद जिम्मेदार हो जाते हैं। वे जीवन के बदलते रंगों में आत्मा नहीं डुबो पाते और मासूमियत और नये तरीके की सोच और खोज से दूर रहते हैं।

एडल्ट यानी वयस्क इगो स्टेट हमारे व्यक्तित्व का वह इगो स्टेट है जो समय के साथ बड़ा होता है। अनुभव को अपने व्यक्तित्व में समेट सोच समझ कर व्यवहार करता है।

पेरंट इगो स्टेट हमारे व्यक्तित्व का वो तिहाई हिस्सा है जो हमारे अंदर का जनक है। यह हिस्सा अक्सर बिना किसी फेर बदलाव के हम अपने माता पिता और उन लोगों से जिनका प्रभुत्व हम पर है उनसे ग्रहण करते हैं। और इसीलिए हम अपने माता पिता की तरह चलते हैं, हँसते हैं, खाँसते हैं, त्योहार में कोई खास मिठाई बनाते हैं..किसी खास अंदाज़ में तौलिया रखते हैं, खाने की मेज़ पर बैठते हैं।

माता पिता का एक तिहाई हिस्सा हम में यू ही शामिल हो जाता है। सोचने की बात है कि हम जो और जैसे हैं वह हमारे बच्चे का एक तिहाई व्यक्तित्व तय करता है। इसीलिए अपने व्यवहार से सही उदाहरण देना आवश्यक है। हमारे या उसके चाहे अनचाहे उसका व्यक्तित्व इसे आत्मसात कर लेता है।

हमारे बच्चों में हम जैसे व्यक्तित्व की कामना करते हैं, जरूरी है कि स्वयं हमारे अंदर वैसा व्यक्तित्व हो।

इन्ही इगो स्टेट्स के संदर्भ में समझा जा सकता है कि माता पिता की भूमिका एक शिशु को एक योग्य वयस्क बनाना है। और जहाँ हमारा व्यक्तित्व इस पर असर करता है वहीं हम किस वातावरण में इन्हे पालते हैं भी बेहद महत्वपूर्ण है।

बच्चों में माता पिता का अंश जरूर है किंतु वह हमारा हिस्सा या फैलाव नहीं हैं। उनकी अपनी एक अनुपम उपस्थिति है जो महज हमारे सपनों का विस्तार नहीं है। उनका अपना एक प्रवाह ,एक गति है.....हमारी जिम्मेदारी उसे सही दिशा और मजबूत किनारे देना है।

माता पिता जो कहते हैं वह किसी रेकॉर्डड टेप की तरह हमारे जहन में चलता रहता है। क्या करना चाहिए और क्या नहीं की एक लंबी लिस्ट हम सभी के पास रहती है। बचपन से कही सुनी कितनी बातें हमारे मस्तिष्क में चलती रहती हैं। घर के बाहर चप्पल उतारो,सच बोलो, खाना खाते वक्त बात मत करो, ऊपर बैठ कर पाँव मत हिलाओ, टी वी पास से नहीं देखो वगैरह। कई विचार भी हमें विरासत में मिलते हैं। लड़कियाँ ठहाके मार कर नहीं हँसती, लड़के खाना नहीं परोसेंगे, नैप्पी बदलने का काम माँ का है, माँ बाप से सवाल करना बदतमीज़ी है, औरतों के लिए सीट खाली करनी चाहिए, औरतें चुगली करती हैं,परीक्षा के पहले दही खाकर जाना चाहिए। धर्म, लिंग ,देश,रंग के कितने ही पूर्वाग्रह के लिए यह टेप जिम्मेदार हैं।

करेन होर्नी (Karen Horney)नाम की सायकोअनालिस्ट ने टायरेनी ऑफ शुड्स (Tyranny of Shoulds) का विचार रखा था। इसमें इसी टेप का जिक्र है जो हमारे व्यक्तित्व पर राज़ करता है। जाहिर है यह टेप कई गलत कामों को करने से रोकता है। वँही कई बार इस टेप के चलते हम समर्थ, उनमुक्त राय कायम करने में सक्षम नहीं रहते। अगर माँ और पिता की तरफ से मिला टेप अलग अलग बात कहता हो तो बच्चा उलझ भी सकता है।

माता पिता होने के नाते हमारा कर्तव्य बनता है कि सही टेप अपने बच्चे तक पहुँचायें। और उसे खुद सोचने और समझने और अपने निर्णय सही लेने में सक्षम बनाये।

टायरेनी ऑफ शुड्स की तरह उसके विचार और व्यक्तित्व को परीमित ना करें।

हमें हमारे बच्चे किस वक्त कहाँ और किस हाल में है जानना जरूरी है। आज़ादी की कोई भी गुहार की वजह से हमें इस बात पर लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए। बच्चा किस के साथ है, टी वी में क्या देख रहा है, कौन सी पुस्तक पढ़ रहा है, किस तरह का संगीत सुन रहा है ...सब जानकारी रखना ना केवल महत्वपूर्ण है बल्कि समय रहते सचेत होने के लिए आवश्यक भी।

अच्छे से अच्छा माता पिता भी कुछ भूल करता है। उसमें से एक है कि हम रोज़ किस तरह का संगीत अपने नन्हे मुन्ने के सुपुर्द करते हैं।
एक समय में काफी चला हुआ गाना ज़रा सुनें

http://www.youtube.com/watch?v=fxx8LA-O1HQ



अब यह सुनिये
http://www.youtube.com/watch?v=dJOTlpt2_5Y



संगीत में बहुत ताकत होती है। ऐडरेन फ्लेटची. एक स्कौटिश...कहते हैं...तुम इस देश के नियम लिखो...मैं इस देश का संगीत लिखूँगा....और तुम देखोगे कि इस देश पर मैं राज़ करूँगा।
लय और ताल पर सुर में कहे गये शब्दों में बहुत ताकत होती है। रूह में यह शब्द बस जाते हैं। अगर इनमें गलत संदेश है तो गलत संदेश आपका लाड़ला लगातार अपने सिस्टेम में ढ़ालता जाता है। वहीं सही संदेश लयबद्द करके सिखाया जाये तो भी बच्चे तक पहुँच जाता है।

ज़रा देखें

http://www.youtube.com/watch?v=amDp4ZQY6w0



विषय का विस्तार बहुत है। कहने समझने के लिए भी काफी सारे तथ्य। आज के समय इनको जानना बेहद आसान है। पर इन्हे जानकर सही का अनुसरण करना हमेशा की तरह कठिन।

सिर्फ समझ लेने से बात नहीं बनती। इन्हे जीवन में उतारने के लिए समय की आवश्यकता है। किसी भी बच्चे तक प्यार शॉर्टकट में नहीं पहुँचाया जा सकता। प्यार की एक अहम माँग समय है..., समय जो साथ बिताया जाये।

जिन बच्चों ने माँ या बाप खोया है, वह बदनसीब हैं। अनुसरण करने के लिए उनके पास उनके अंदर का शून्य नहीं तो कोई कल्पना या भ्रम ही होता है। भ्रम जो सच का स्थान नहीं ले सकता। वो बच्चे जिनके माँ बाप तो हैं पर जिनके पास अपने बच्चे से मिलने के लिए दिन में ज़रा भी समय नहीं और भी बदनसीब हैं क्योंकि उनके पास कोई मीठा भ्रम भी नहीं।

इतना यहाँ लिखने के पीछे सिर्फ एक ही आशय है कि हम जान सके हम हमारे बच्चे के विकास में कितने जिम्मेदार है। माता पिता के मुकाबले अच्छे स्कूल, ट्यूशन, खिलौने, प्लेस्टेशन वगैरह इस योगदान का एक बहुत छोटा हिस्सा हैं।


Children Learn What They Live
By Dorothy Law Nolte, Ph.D.


If children live with criticism, they learn to condemn.
If children live with hostility, they learn to fight.
If children live with fear, they learn to be apprehensive.
If children live with pity, they learn to feel sorry for themselves.
If children live with ridicule, they learn to feel shy.
If children live with jealousy, they learn to feel envy.
If children live with shame, they learn to feel guilty.
If children live with encouragement, they learn confidence.
If children live with tolerance, they learn patience.
If children live with praise, they learn appreciation.
If children live with acceptance, they learn to love.
If children live with approval, they learn to like themselves.
If children live with recognition, they learn it is good to have a goal.
If children live with sharing, they learn generosity.
If children live with honesty, they learn truthfulness.
If children live with fairness, they learn justice.
If children live with kindness and consideration, they learn respect.
If children live with security, they learn to have faith in themselves and in those about them.
If children live with friendliness, they learn the world is a nice place in which to live

हम अपने बच्चों को बहुत कुछ बनाना चाहते हैं.....काश हम उसे कुछ भी बनाने की जगह....उसे अपने रंग और महक में खुशी खुशी फलने फूलने दें। उसे एक व्यक्ति बनने दें।

http://www.youtube.com/watch?v=9Ms_fYsUrnY

Saturday, 18 April 2009

एपन्डिसाइटिस (appendicitis)

आज एपन्डिसाइटिस पर चर्चा करेंगे। बच्चों में पेट के ऑपरेशन का एक मुख्य कारण। अक्सर मातापिता लक्षणों को पूरी गँभीरता से नहीं लेते और देर होने की वजह से एपन्डिक्स का रप्चर (फूट कर फट जाना)हो जाता है। बच्चों में बाकी कारणों से भी निदान इतना आसान नहीं होता और कई बार डॉक्टर की लापरवाही से भी देर हो जाती है। आईये हम इस विषय को लेकर सजग हों।



एपन्डिसाइटिस क्या है?


एपन्डिसाइटिस एपन्डिक्स का संक्रमण है जिसकी वजह से उसमें सूजन और दर्द उठता है।

एपन्डिक्स क्या है?


एपन्डिक्स उँगली के समान एक छोटी थैली है जो बड़ी आँत से जुड़ी होती है और पेट के दाँये निछले हिस्से में पाई जाती है। एपन्डिक्स के सही कार्य का अब तक भी ठीक पता नहीं है। इसे मानव विकास में अवशेष ही माना गया है। शरीर का एक ऐसा हिस्सा जो अपनी क्षमता और कार्य खो चुका है।
इसकी थैली के अंदर जो बलगम (श्लेम )उत्पन्न होता है वह बड़ी आँत में पहुँच कर शरीर से निवृत होता है।
एपन्डिक्स को शरीर से निकालने पर आँत की कार्यक्षमता मे कोई कमी नहीं आती।

http://www.youtube.com/watch?v=9fN6sm5hu48




एपन्डिसाइटिस की वजह क्या है?

कुछ वजहों से एपन्डिक्स की थैली के मुँह का रास्ता बंद हो जाता है। बलगम अंदर इकट्ठा होने लगता है। उसके अंदर स्वाभाविक तौर पर उपस्थित बैक्टीरिया सँख्या में बढ़ने लगते हैं। एपन्डिक्स में संक्रमण होता है। सूजन और दर्द उठता है।

इस रुकावट का कारण मल, लिम्फ टिश्यू, इन्फ्लमेटरी बावल डिसीस, आँत में कहीं और संक्रमण, नहीं तो शरीर में कहीं और संक्रमण हो सकता है।
संक्रमित एपन्डिक्स फूट सकता है। ऐसी स्थिति में पूरे पेट में संक्रमण फैल जाता है। पेरिटोनाइटिस नाम की गँभीर स्थिति उत्पन्न हो सकती है और यह जानलेवा हो सकती है।



एपन्डिसाइटिस किसे हो सकता है?

यह किसी को भी हो सकता है। 10 से तीस बरस में इसकी सँभावना अधिक देखी गई है। एपन्डिसाइटिस पेट के ऑपरेशन की सबसे अहम वजहों में से एक है।

इसके लक्षण क्या हैं


एपन्डिसाइटिस का मुख्य लक्षण है पेट में दर्द उठना

यह दर्द इतना तीव्र होता है कि अक्सर नींद से बच्चा उठ कर बैठ जाता है। पहले नाभि के आसपास दर्द उठता है और फिर धीरे धीरे दाँई तरफ केंध्रित होता जाता है। कुछ ही घंटों में इसकी तीव्रता काफी बड़ जाती है। यह चलने फिरने में, गहरी साँस लेते वक्त और खाँसने या छींकने पर असहनीय हो जाता है।

बाकी लक्षण जो पाये जाते हैं

भूख कम लगना
उल्टी और उबका
दस्त
कब्ज
हवा छोड़ सकने मे अक्षमता
बुखार
पेट में सूजन

यह सभी लक्षण बाकी स्थितियों में भी उभर सकते हैं। किंतु इनके पाये जाने पर डॉक्टरी सलाह लेना अत्यावश्यक है।

http://www.youtube.com/watch?v=_RhH2Y3fjYI






एपन्डिसाइटिस का निदान कैसे किया जाता है?

डॉक्टर दर्दी की पड़ताल और कुछ खून की जाँच और दूसरे टेस्ट्स करने पर इस नतीजे तक पहुँच सकता है। अगर दर्दी की जाँच से ठीक ठीक निदान का अंदाज़ा लगता है तो कई बार डॉक्टर बिना आगे के टेस्ट्स किये ही ऑपरेशन के लिए दर्दी को तैयार करता है। एपन्डिक्स का उसके फूटने के पहले निकालना बहुत जरूरी है। सोनोग्राफी और सी टी स्कैन करने पर सही निर्णय पर पहुँच सकते हैं।




दर्दी से पूछा जाता है कि दर्द कब और कहाँ से शुरु हुआ और किस तरफ बढ़ा और इसकी तीव्रता सबसे अधिक कहाँ है। इससे पहले कभी ऐसी तकलीफ हुई हो तो यह बताना भी आवश्यक है।

डॉक्टर जाँच करते वक्त खास चिन्हों को तलाशते हैं। एपन्डिक्स होने पर पेट में गॉर्डिंग पाई जाती है- दर्दी अपने पेट की माँसपेशियों को छूते ही कड़क कर देता है। रिबाउन्ड टेन्डरनेस, रोवसिंग साईन, सोआस साईन और औबचुरेटर साईन- यह कुछ ऐसे चिन्ह है जिसके लिए तपास की जाती है।

खून में व्हाईट ब्लड सेल्स(सफेद कोशिकाएँ) की गिनती 15000 से अधिक हो सकती है। पानी और नमक की मात्रा में फेरबदल हो सकता है। पेशाब में संक्रमण भी पाया जा सकता है।




एपन्डिसाइटिस से निज़ाद पाने के लिए अक्सर शल्य चिकित्सा की जाती है। जल्द से जल्द ऑपरेशन करने पर एपन्डिक्स के फूटने और पेट में संक्रमण फैलने की सँभावना बहुत कम रहती है। इसे लैपरोटोमी नहीं तो लैपरोस्कोपी से किया जा सकता है। लैपरोटोमी में पेट में एक चीरा लगा कर एपन्डिक्स काट कर अलग किया जाता है। लैपरोस्कोपी में एक छेद के अंदर से ही ऑपरेशन किया जाता है। लैपरोस्कोपी से की गई शल्य चिकित्सा के बाद फिर से तंदुरुस्त होने में कम समय लगता है।




कभीकबार पेट खोलने पर सामान्य एपन्डिक्स दिखाई पड़ता है। ऐसे में भी कई डॉक्टर भविष्य में तकलीफ ना हो इसलिए एपन्डिक्स निकाल देते हैं। कभी पेट के खोलने पर कोई और तकलीफ सामने आती है जिसेकि शल्य चिकित्सा के दौरान ठीक किया जा सकता है।


एपन्डिक्स के फूटने या रप्चर होने पर एपन्डिक्स के आसपास पस जमा हो सकता है। यह पेट में गोले की तरह महसूस हो सकता है। इस पस को ऑपरेशन से पहले निकालना जरूरी है। इसके लिए पेट में एक नली रखनी पड़ सकती है। यह नली दो हफ्ते तक रखनी पड़ सकती है जिस दौरान दर्दी को ऐन्टिबायोटिक्स दिए जाते हैं। छह से आठ हफ्ते बाद जब संक्रमण काबू में आ जाता है तब ऑपरेशन करके एपन्डिक्स निकाला जाता है।



बिना शल्यचिकित्सा के ऐन्टीबायोटिक्स देकर शायद ही ठीक हो सकता है। किंतु अगर शल्य चिकित्सा में देर लगे तो ऐन्टीबायोटिक्स देना जरूरी है।

शल्यचिकित्सा के चार से छह हफ्तों में दर्दी पूरी तरह ठीक हो जाता है।


याद रखें
एपन्डिसाईटिस एक आपातकालीन स्थिति है जिसपर जल्द से जल्द ध्यान देना आवश्यक है।



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Tuesday, 10 February 2009

रोटावायरस वैक्सीन



रोटावायरस पर पोस्ट लिखने के बाद महसूस किया कि रोटावायरस वैक्सीन के विषय में दी गई जानकारी बेहद संक्षिप्त है। और इसे लेकर कई सवाल अनुत्तरित रह गये।

तो प्रश्नोत्तर ही सही

1.पहली बार रोटावायरस वैक्सीन कब लोगों तक पहुँचा?
1998 में पहली बार वैयत्त कंपनी ने रोटाशील्ड़ के नाम से रोटावायरस का वैक्सीन उपलब्ध कराया। इसे बाज़ार में पहुँचाने से पहले किए गये शोध में कुछ हानिकारक नहीं पाया गया था। 1999 में इनेटससेप्शन (intussusception) ( आँत का एक तरह का जानलेवा अवरोध) की गुँजाइश बढ़ने की शंका के तहत इसे बाज़ार से हटा लिया गया। तब इसके फायदे को लेकर बहस गर्म हो गई।




फरवरी 2006 में FDA (Food and Drug Administration ) ने एक नये वैक्सीन RotaTeq (Merck) की अनुमति दी।




2.यह किस प्रकार की रस्सी (vaccine) है?
यह गाय और इंसान को ग्रसित करने वाले जीवित रोटावायरस से बना है। यह पाँच तरह के स्ट्रेन्स (serotypes G1, G2, G3, G4 and P1 )से सुरक्षा देता है।


3.इसे किस तरह दिया जाता है?
यह तरल है और मुँह से दिया जाता है


4.यह टीके किसे और कब लगने चाहिए?
Advisory Committee on Immunization Practices (ACIP) इसे एक साल के भीतर के बच्चों के देने की सिफारिश देती है।
इसके तीन डोस हैं जो की दूसरे, चौथे और छठे महीने में दिये जाते हैं। पहला डोस छह से बारह हफ्ते के बीच और आखिरी 32 हफ्ते से पहले दिया जाना चाहिए।
इसे बाकी टीकों के साथ दिया जा सकता है।

5.क्या ऐसे बच्चे को टीका लगाने की जरूरत है जो रोटावायरस से ग्रसित हो चुका है?
बच्चे को एक ही रोटावायरस के स्ट्रेन का संक्रमण हुआ होता है जबकि यह पाँच से सुरक्षा देता है। 32 हफ्ते से पहले इन्हे भी तीन टीके लगने चाहिए।


6.यह टीका कितना सुरक्षित है?
70000 बच्चों में रोग-विषयक जाँच में इसे सुरक्षित पाया गया है। किंतु इससे पहले के टीके के साथ कुछ शंकायें जुड़ी थी इसलिए इसकी जाँच और परीक्षण जारी है। इसे 32 हफ्ते के ऊपर के बच्चों में अभी देने की अनुमति नहीं है।

7.यह टीका रोग प्रतिरोध में कितना सक्षम है?
यह 74% रोटावायरस के मामले, 98% गँभीर संक्रमण, 96% अस्पताल के दाखिलों में कमी लाने में सक्षम है। दूसरे वायरस से होने वाले दस्त और उल्टी पर इसका कोई असर नहीं है।

8.किस तरह के दूसरे लक्षणों की इस वैक्सीन बतौर संभावना है?
कुछ बच्चों में (1%-3% ज्यादा संभावना) इसके देने पर सात दिन के भीतर दस्त और उल्टी देखा गया है।
और कोई गँभीर लक्षण नहीं देखा गया।

9.यह टीका किसे नहीं दिया जाना चाहिए?
- जिसे यह देने पर कोई रिएक्शन हुआ हो
- जिसे इसके किसी घटक से कोई जानलेवा अलर्जी हो
- जिन बच्चों को intussusception हुआ हो
-जो बच्चे बीमार हैं उन्हे कुछ रुककर वैक्सीन दिया जाना चाहिए।
-जिन बच्चों को HIV/AIDS हो, या जो स्टीरौयड्स पर हैं,जिनकी रोग प्रतिकारक क्षमता धटी हुई हो।
-जिन्हे हाल ही में खून या खून संबंधित कोई दवा दी गई हो।

10.क्या वैक्सीन से बीमारी हो सकती है?
नहीं

11.क्या रोटावायरस के लिए कोई और टीका भी है ?
हाँ रोटारिक्स (Rotarix)नाम का glaxo smithcline द्वारा निर्मित टीका भी है।







12.इसे कैसे और कब दिया जाता है?
इसके दो डोस है जिसे दूसरे और चौथे महीनों में दिया जा सकता है। पहला डोस छह हफ्ते के बाद और दूसरा कम से कम चार हफ्ते के अंतराल पर।

इसे भी मुँह से ही दिया जाता है और बाकी लक्षण रोटाटेक जैसे ही हैं।
कभी कभार चिड़चिड़ापन,भूख कम लगना,नाक का बहना और बुखार भी देखा गया है।


नोट


रोटावायरस का टीका लगना इसके नहीं होने की गारंटी नहीं देता। इसके इस्तेमाल से दुनियाभर में प्रतिवर्ष इससे ग्रसित होने वाले बच्चे और मृत्युदर को काफी हद तक घटाया जा सकता है।

32 हफ्ते से ऊपर के बच्चों में पर्याप्त जाँच की कमी होने की वजह से इसे अभी तक इनमें इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं है।






कोई भी टीका लगवाना या ना लगवाना माँ बाप तय कर सकते हैं।






अगर आप के बच्चे को वैक्सीन के बाद पेट में मरोड़, उल्टी,दस्त, दस्त में खून या पेट की किसी और प्रकार की तकलीफ उठे तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। इसे VAERS (The Vaccine Adverse Event Reporting System)(http://vaers.hhs.gov/)को भी सूचित करें। यह Intussusception के लक्षण हो सकते हैं। Intussusception का 24 घंटो के भीतर इलाज करने पर बच्चा पूरी तरह स्वस्थ हो सकता है।





(राधिका बुधकर जी के संशय पर ही यह पोस्ट लिखने की इच्छा हुई। उनका शुक्रिया।)

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Thursday, 29 January 2009

नर्स मेय्ड्स एल्बो (Nursemaid's Elbow,Pulled Elbow)






आज का विषय है नर्स मेय्ड्स एल्बो। पुल्ड एल्बो के नाम से भी यह जाना जाता है। सीधा अनुवाद होगा खिंची हुई कुहनी । बच्चों में इसके होने की सँभावना बहुत अधिक है । इस विषय में बात करने की इच्छा के पीछे का कारण भी यही है। जाने अनजाने हमारी गल्ती से बहुत आसानी से बच्चा इस स्थिति का शिकार हो जाता है। इलाज आसान है। और बचाव मुमकिन।

नर्स मेय्ड्स एल्बो कुहनी के नीचे की हड्डी का कुहनी के जोड़ से आंशिक हटाव है। रेडियस और अल्ना में से रेडियस नाम की हड्डी जोड़ से कुछ कारणवश खिसक जाती है।




कारण


यह सामान्यत: पाँच बरस के नीचे के बच्चों में पाया जाता है। जब बच्चे को हाथ या कलाई पकड़ कर ज़ोर से खींचा जाता है या एक हाथ से उठाया जाता है तो इसके होने की सँभावना बहुत बढ़ जाती है( जैसे की सीड़ीयों पर, सड़क पार करते हुए)। बच्चे को हाथों से पकड़ कर गोल घुमाने पर भी ऐसा होना सँभव है।

इसके होते ही बच्चा तुरंत दर्द से रोने लगता है और प्रभावित हाथ इस्तेमाल करने से इंकार कर देता है। बच्चा अपनी बाँह अपनी तरफ थोड़ा मोड़ कर, कुहनी पेट से चिपका कर रखता है। वह अपने कँधे का इस्तेमाल करता है पर कुहनी का नहीं। कुछ बच्चों में दर्द कम होता है और वे रोना तो बंद कर देते हैं पर कुहनी फिर भी इस्तेमाल नहीं करते।

एक बार ऐसा होने पर ऐसा फिर से होने की, कई बार महीने के अंदर ही सँभावना बहुत बढ़ जाती है।

अक्सर पाँच बरस के बाद यह देखने में नहीं आता। तब तक कुहनी का जोड़ और आसपास की माँसपेशियाँ मजबूत हो जाती हैं। फिर भी किसी चोट या फ्रैक्चर के बाद ऐसा होना सँभव है।




लक्षण

तकलीफ होते ही तुरंत रोना
कुहनी में दर्द
प्रभावित बाँह का उपयोग ना करना
कुहनी को हल्का सा मोड़कर रखना
निचले बाँह को और कुहनी को पेट पर सटाकर रखना
कँधे का हिला सकना और कुहनी का ना हिलाना


अगर आप को शंका है की आपके बच्चे को नर्स मेय्ड्स एल्बो है तो


- कुहनी पर खपच्ची बांधने से पहले बच्चे को ना हिलायें
- बाँह और कुहनी को खुद सीधा करने की कोशिश ना करें
- बर्फ के पैक कुहनी पर लगायें
-कुहनी जिस अवस्था में है वैसे ही खपच्ची बांधे
- कुहनी को ऊपर और नीचे से हिलने ना दे। हो सके तो कलाई और कँधा भी ना हिलायें।

- डॉक्टर के पास तुरंत ले जायें।


नर्स मेय्ड्स एल्बो के होने का संकेत और जाँच

डॉक्टर जाँच के समय पायेगा कि बच्चा कुहनी घुमा नहीं सकता। कुहनी को पूरी तरह मोड़ा भी नहीं जा सकता।

उपचार
डॉक्टर हल्के से कुहनी मोड़ते हुए अग्र बाहु (forearm) को इस तरह घुमायेंगे कि हथेली ऊपर की तरफ देखने लगे।

खुद ऐसी कोशिश करना जोखिम भरा हो सकता है। बच्चे को इससे नुकसान पहुँच सकता है।


कई बार बारंबार ऐसी अवस्था होने पर आपको यह विधि डॉक्टर ठीक तरह से सिखा सकता है।








नर्स मेय्ड्स एल्बो का इलाज ना करने पर स्थायी क्षति पहुँच सकती है। इलाज करने पर कुहनी पूरी तरह से ठीक भी हो जाती है।



समस्या

कुछ बच्चों में कुहनी के चलन में कमी आ सकती है।



बचाव

बचाव बहुत आसान है। ध्यान रखा जाये कि कुहनी खिंचने ना पायें। बच्चे को एक हाथ से खींचिये और उठाइये नहीं। हाथ से पकड़ कर घुमाइये नहीं। सड़क पार करते समय हाथ ज़ोर से ना खींचे।


नर्स मेय्ड्स एल्बो डॉक्टर की ओ पी डी में लगभग रोज़ देखने में आती है। किंतु इनका फ्रैक्चर व कुहनी की बाकी तकलीफों से भेद करना जरूरी है। एक डॉक्टर या जानकार व्यक्ति ही यह अंतर समझ सकता है।

माता पिता होने के नाते बचाव की कोशिश करना जरूरी है और सही समय सही जगह से सही सलाह लेना आवश्यक।


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Thursday, 15 January 2009

रोटावायरस से दस्त और उल्टी

आप लभी को नववर्ष की शुभकामनायें। काफी दिनों बाद इस चिट्ठे पर लिख रही हूँ। हाल ही में आराम का काम छोड़ मुश्किल काम हाथ लिया है। समय की व्यस्तता और नई जगह पाँव जमाने में स्पंदन में लिखना छूट गया। कोशिश रहेगी की नियमित लिख सकूँ।




दस्त और उल्टी की कई वजह है। रोटावायरस नाम का वायरस इसलिए विख्यात है क्योंकि यह अकेला संसार भर में बच्चों में इनका सबसे बड़ा कारण है। पाँच साल की उम्र तक पहुँचते पहुँचते दुनिया के हर बच्चे को कम से कम एक बार इसका चेप लग चुका होता है। हाँ बार बार भी बच्चा संक्रमित हो सकता है किंतु हर बार का संक्रमण का असर, रोग प्रतिकारक शक्ति की वजह से पिछली बार से कम होता है।
रोटावायरस डबल स्ट्रैन्डड(दुहरे रिबन जैसा) आर एन ए वायरस है। सात प्रकार के रोटावायरस- ए,बी,सी,डी ,ई,एफ और जी पाये जाते हैं। करीबन नब्बे प्रतिशत संक्रमण रोटावायरस ए से होता है।


अगर हम दुनिया भर में इससे पीड़ित बच्चे और मृत्युदर पर नज़र दौड़ायें तो इस रोग को समझने और सही उपाय करने की आवश्यकता से इंकार नहीं कर सकते। हमारे देश में लाखों की सँख्या में बच्चे साल भर इससे ग्रसित होकर मरते हैं।





कैसे फैलता है यह रोग

फीको-ओरल यानि की मल से मुख तक
जाहिर सी बात है हाथ धोने में लापरवाही, गंदा ( प्रदूषित) पानी या खाना खाने से, किसी रोगी के मल से किसी तरह संपर्क में आने से यह रोग फैलता है। इस वायरस की संक्रमण शक्ति लाजवाब है,ज़रा सी लापरवाही से रोग फैल जाता है।

आक्रमण प्रणाली
रोटावायरस सबसे पहले अंतड़ी के अस्तर पर लगी कोशिकाओं को संक्रामित करती हैं। वहाँ यह एन्डोटॉक्सिन बना कर दस्त की शुरुआत करती है। बच्चे को दस्त से पहले अक्सर उल्टी की शिकायत होती है। उल्टी और दस्त की बारंबारता इतनी अधिक होती है कि शरीर में पानी कम होने लगता है। पानी की कमी ही मृत्यु का मुख्य कारण बनती है। एंडोटॉक्सिन बना लेने पर बात खत्म नहीं होती। यह कोशिकाओं को इस तरह नुकसान पहुँचाती है कि सादा आहार भी पचा पाना मुश्किल हो जाता है। शरीर में यह बहुत तेज़ी से फैलती हैं और फिर दुगुने जोश से आक्रमण करती हैं।

अगर बच्चे को इससे पहले कभी यह संक्रमण हो चुका हो तो उसकी रोग प्रतिकारक शक्ति तुरंत पहचान लेती है। बचाव की रणनीति की वजह से पहली बार के संक्रमण जितना असर फिर नहीं दिखता। यही वजह है कि बड़ों में इसका असर होने पर भी तकलीफ कम होती है।




लक्षण

जुकाम जैसे लक्षण
हल्का बुखार
उल्टियाँ
दस्त

रोटावायरस की सबसे खास बात दस्त का बारंबार होना है...इतनी बार की पानी शरीर में कम हो जाता है। संक्रमित होने के दो दिन बाद लक्षण दिखने लगते हैं।

कोशिकाओं को नुकसान पहुँचने की वजह से दूध पचाने वाले एन्ज़ाइम पर खास असर पड़ता है। ऐसे में दूध देने पर दस्त की तकलीफ बहुत बढ़ जाती है।
यह तकलीफ रोग के हटने के बाद भी एक दो हफ्ते तक देखी जा सकती है।



जाँच
दस्त में रोटावायरस ए की जाँच की जाती है। इसे अधिकतर स्थानें में एन्ज़ाइम इम्यूनऐसे नाम की तकनीक से करते हैं।


इलाज

इसका कोई खास इलाज सँभव नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण है शरीर में पानी की कमी ना होने देना। वक्त पर अस्पताल पहुँचना, ओ आर एस का घोल, उल्टी की दवा....वगैरह। बच्चे के अंदर नमक की मात्रा में फेर बदल, पानी की कमी और रक्त में ग्लूकोस की मात्रा पर विशेष ध्यान देना पड़ता है। चूँकि लक्षण बहुत तेज़ी से बढ़ते हैं समय पर अस्पताल पहुँचाना बहुत जरूरी है। कभी कबार इससे दिमाग पर भी असर पड़ सकता है। किंतु अधिकतर सही समय पर ध्यान देने पर जान बिना किसी और समस्या के बचाई जा सकती है

रोटावायरस कई देशों में डिसंबर से फरवरी के महीनों में होता है किंतु भारत में साल भर देखा जाता है।

http://www.youtube.com/watch?v=aaxcmEvfnDY


रोटावायरस की रस्सी (Rotavirus vaccine)

सन 2006 में इस रोग से लड़ने के लिए दो टीके बाज़ार में आये। ग्लैक्सोस्मितक्लाइन की रोटारिक्स और मर्क्ख की रोटाटेक़ (Rotarix by GlaxoSmithKline and RotaTeq by Merck) दोनो ही ओरल (मुँह से) लेने वाली हैं और इनमें रोगमुक्त जीवित वायरस हैं।


यह रोग सभी देशों में पाया जाता है। साधारण तापमान में यह वायरस बचा रहता है। सामान्य साफ सफाई भी इसका नुकसान नहीं पहुँचाती। बहुत कम मात्रा में भी यह बच्चे को गँभीर तरह से संक्रमित कर सकता है।

हम क्या कर सकते हैं-
1. साबुन से ठीक से हाथ धोना

यह अकेली एक आदत इतनी आसानी से बचाव कर सकती है की आश्चर्य होता है। रोगी के घर पर होने पर खास ध्यान देना बेहद जरूरी है।

2.प्रदूषित पानी और खाने से दूर रहना
3. रोटावायरस का ठीका लगवाना

जाहिर है इस ठीके की अहमियत पाँच साल के भीतर सबसे अधिक है। (रोटावायरस का ठीका लगाने पर रोग की संक्रमण शक्ति घटती है। या तो बच्चा इससे ग्रसित नहीं होता या फिर इसके लक्षण इतने तीव्र नहीं होते।)
4. अगर इन सबके बावजूद भी अगर यह रोग हो जाये तो समय पर डॉक्टर की सलाह अत्यावश्यक है।

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Thursday, 20 November 2008

फेब्राइल कनवल्शन्स ( बुखार से उत्पन्न मिरगी जैसी ऐंठन )

फेब्राइल कनवल्शन्स शरीर मे उठी एंठन है जो की ऐसे बच्चों में देखी जाती हैं जिनके शरीर का तापमान बुखार की वजह से 39डिग्री सेल्सियस या 102.2 डिग्री फैरनहीट से ज्यादा हो। अक्सर यह खाँसी सर्दी जुकाम के शुरुआत में होता है जब बच्चे के शरीर का तापमान तेजी से बढ़ रहा होता है।


वीडियो देखने के लिए क्लिक करें
http://www.brightcove.tv/title.jsp?title=1078589570

एक नज़र में देखने पर स्थिति भयावह लग सकती है,किंतु विरले ही यह एक गँभीर समस्या बनती है।


पाँच साल से छोटे बच्चों में इसके पाये जाने की सँभावना सबसे अधिक होती है। बच्चों का दिमाग पूरी तरह विकसित और परिपक्व नहीं होता। अधिक तापमान से इनके दिमाग में ऐसे विद्युत के सिग्नल उत्पन्न हो सकते हैं की बच्चे के शरीर में ऐंठन और मरोड़ उठे । करीब तीन प्रतिशत बच्चे इस से प्रभावित हो सकते हैं। छह महीने से तीन साल की इम्र में इनके होने की सँभावना सबसे अधिक होती है। हालांकि छह साल तक इन्हे देखा गया है।

परिवार में अगर किसी को ऐसी तकलीफ रही हो तो इसके होने की सँभावना 20 प्रतिशत तक बढ़ सकती है।

लक्षण

-ऐंठन और मरोड़ बहुत कम समय के लिए होती है। यह कुछ सेकंड से कुछ मिनट तक रह सकती है( पाँच मिनट से कम)

-बच्चा बेहोश हो सकता है, शरीर सख्त पड़ सकता है,साँस 30 सेकंड के लिए बंद हो सकती है, और बच्चा पेशाब और दस्त अनजाने ही कर सकता है।

-हाथ और पाँव में झटके आ सकते हैं। कई बार चेहरे पर भी खिंचाव दिख सकता है। बच्चे की आँखें ऊपर चढ़ सकती है।

-कुछ मिनट बाद बच्चे को होश आ जाता है। होश आने पर बच्चा सुस्त होता है, नहीं तो चिड़चिड़ा हो जाता है। उसे अपने आसपास की बातों का ठीक होश नहीं रहता।

http://www.youtube.com/watch?v=pS6uZYcydRo



इलाज

- ऐंठन के समय बच्चे को चोट ना लगने दें। उनके मुँह में कुछ ना ड़ालें। बच्चे को रिकवरी पोसाशन में ड़ाल दें।



- बुखार को बहुत बढ़ने ना दें। पैरासिटामोल का इस्तेमाल करें।

- कमरा ठंडा करें, बच्चे के कपड़े ड़ीले करें।

- पानी में भिगो कर शरीर को स्पोंज करें। स्पोंज करते समय बच्चे की छाती, पीठ ,कक्ष और जाँघ में भी पोछे।

अगर ऐसा पहली बार देखने में आया है तो बच्चे का इलाज और ठीक से वजह जानने के लिए बाकी जाँच जरूरी है। हो सकता है बच्चे को डायज़ापॉम नाम की दवा देनी पड़े। निदान हो जाने पर यह दवा आप संडास की जगह से भी दे सकते हैं। अपने डॉक्टर से इस विषय में सही सलाह ली जानी चाहिए।


अगर तकलीफ एक साल की उम्र से पहले देखने में आई है , या परिवार में किसी और को भी है तो तकलीफ के बारबार होने की सँभावना ज्यादा है।

अधिकतर बच्चे पाँच साल बाद इस तकलीफ से उभर जाते हैं। किंतु करीबन 1 प्रतिशत बच्चों में आगे जाकर अपस्मार देखा जाता है।

बुखार में हुई ऐसी सामान्य बात को देख अपने या किसी दूसरे बच्चे पर अपस्मार का लेबल ना लगायें। चौकसी और सचेत होना आवश्यक है लेकिन फेब्राइल कनवल्शन्स चिंता का कारण ना बनायें।


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Wednesday, 15 October 2008

जुकाम की दवा और नुकसान

बीमार बच्चा देखकर हर माँ का दिल भर आता है। पापा का बस चले तो अपनी लाड़ली के लिए जान भी हाज़िर कर दे। पर कुछ दुख तो सह कर ही पार लगते हैं। सर्दी के लिए दवाओं से चाहे जितनी नाकाबंदी कर दें यह सता कर ही दम लेती है। कुछ ना कुछ कर के बीमार बच्चे की तकलीफ कम करने की कोशिश में अक्सर कई गैरजरूरी दवाईयाँ इस्तेमाल की जाती है।
बात अगर यहीं तक सीमित होती तो भी चलता लेकिन इनमें से कई दवाईयाँ काफी हद तक नुकसान पहुँचा सकती हैं, जान भी जोखिम में ड़ाल सकती है।


यह हैं ओवर द काउंटर मिलने वाली असँख्य दवाईयाँ जिनपर मुस्कुराते बच्चों की तस्वीर हमें बढ़ कर इन्हे खरीदने को उकसाती है।

सच तो यह है सर्दी जुकाम के लिए आज भी दादी माँ के नुस्खों से बेहतर उपाय नहीं। पैरासीटामोल, माँ की गोद, विक्स से मालिश, गुनगुने नमक के पानी से गरारे करना , अधरक की चाय, चिकन सूप....यही काफी है। छींकता खाँसता आपका दुलारा परेशान जरूर है....लेकिन आपके साथ और प्यार की मीठी यादें भी बना रहा है।


http://www.youtube.com/watch?v=fij-SnBOapQ



http://www.aap.org/advocacy/releases/jan08coughandcold.htm

यू एस फुड़ ऐन्ड ड्रग ऐडमिनिस्ट्रेशन ने खास इस बात पर ज़ोर दिया है कि दो साल से छोटे बच्चों को ओवर द काउंटर मिलने वाली यह दवाईयाँ हरगिज़ नहीं देनी चाहिए। इनसे जान तक को खतरा हो सकता है। छह साल से छोटे बच्चों में इनकी उपयोगिता साबित नहीं है। इन्हे लेने पर मृत्यु, फिट्स(कंपकंपी),हृदय की गति तेज़ होना या अचेत होना रेकार्ड किया गया है। आम तौर पर यूँ बहुत देखने में ना भी आये तो भी छह साल से छोटे बच्चों में इनसे वाँछित लाभ भी नहीं मिलता।

बच्चों और बड़ो मे फर्क है। एक ही दवा की प्रतिक्रिया दोनो में अलग तरीके से होती है। जिस दवा से बड़ों मे कोई हानि नहीं होती बच्चों में वे गँभीर नुकसान पहुँचा सकते हैं।

एफ ड़ी ए ने दवाईयों के लेबल मे इन बातों को साफ करने की राय रखी है।

घरेलू नुस्खों के अलावा सलाइन नेसल ड्रॉप्स से फायदा भी होता है और नुकसान भी नहीं है।



अधिक जानकारी के लिए इस साइट पर जायें( www.aap.org/publiced/BR_Infections.htm
http://www.aap.org/new/kidcolds.htm)

पिछले अक्टूबर में जो दवाइयाँ लौटा दी गई थी
(Cough and cold medicines withdrawn in October 2007):

Dimetapp(R) Decongestant Plus Cough Infant Drops,
Dimetapp(R) Decongestant Infant Drops,
Little Colds(R) Decongestant Plus Cough,
Little Colds(R) Multi-Symptom Cold Formula,
PEDIACARE(R) Infant Drops Decongestant (containing pseudoephedrine),
PEDIACARE(R) Infant Drops Decongestant & Cough (containing pseudoephedrine),
PEDIACARE(R) Infant Dropper Decongestant (containing phenylephrine),
PEDIACARE(R) Infant Dropper Long-Acting Cough,
PEDIACARE(R) Infant Dropper Decongestant & Cough (containing phenylephrine),
Robitussin(R) Infant Cough DM Drops,
Triaminic(R) Infant & Toddler Thin Strips(R) Decongestant,
Triaminic(R) Infant & Toddler Thin Strips(R) Decongestant Plus Cough,
TYLENOL(R) Concentrated Infants' Drops Plus Cold,
TYLENOL(R) Concentrated Infants' Drops Plus Cold & Cough



FDA की सलाह

-लेबल हमेशा देखें। उसमें ऐक्टिव इनग्रीडियन्ट (“active ingredients”)देखें । कई बार कई सारी अलग अलग असर की दवाओं का काकटेल होती हैं ऐसी दवाईयाँ (an antihistamine, a decongestant, a cough suppressant, an expectorant, or a pain reliever/fever reducer)। आप अगर एक से अधिक ऐसी दवा दें तो शायद सेफ लिमिट से ज्यादा देकर बच्चे को नुकसान पहुँचा सकते हैं।


-दवा का लेबल खास चेक करें। उसके निर्देश का पालन करें। इसमें दी गई चम्मच या मेशरिंग कप से ही दवा दें। अंदाज़े से दवा कभी नहीं दे।


- बच्चों से दवा हमेशा दूर रखें। हो सके तो चाइल्ड सेफ ढक्कन वाली दवा ही खरीदें।

- कभी भी इन दवा का इस्तेमाल बच्चों को सुलाने के लिए ना करें।

- सर्दी जुकाम आम सी बिमारी है। अगर शंका हो कि तकलीफ कुछ और भी हो सकती है तो डॉक्टर तक पहुँचने में देर ना करें ।


http://www.youtube.com/watch?v=zE6rYqaWjkU

Sunday, 5 October 2008

बच्चे के दूध में मेलामिन!!

कुछ समय से मेलामिन लगातार ध्यान खींच रहा है। मेलामिन जिससे खूबसूरत क्रौकरी तैयार होती है....बहुत ही अलग और गलत जगह में काफी मात्रा में पाया गया।

जगह थी पेट्स फूड...। अमेरिका में जब पालतू जानवर अचानक से किडनी फेल्यर से मरने लगे तो लगा कोई गंभीर महामारी फैल रही है। थोड़ा विश्लेषण करने पर इस तकलीफ की वजह मिली - चीन से एक्सपोर्ट हुए पेट्स फूड में मेलामिन की मिलावट। कई जानवर इंसानी लालच और पैसा कमाने के शार्टकट्स में शहीद हो गये।

http://www.youtube.com/watch?v=s8U9we0HEQg



अगर बात जानवरों के खाने तक सीमित होती तो फिर भी नुकसान की आशंका कम होती। पर चीन में हज़ारों की संख्या में बच्चे बीमार होने लगे। करीबन पचास हज़ार से अघिक बच्चे गुर्दे की निष्क्रियता की वजह से मर गये। सैंकड़ों अभी भी बीमार है।

सानलू नाम की कंपनी के मिल्क पावडर में मेलामिन पाया गया। यीली, जो की ओलंपिक गेम्स में बतौर स्पौंसर रही....उस के मिल्क पावडर में भी मेलामिन की मात्रा अधिक पाई गई। Nestle जैसे ब्रैन्ड्स भी यकीन से मेलामिन के होने को झुठला नहीं सकते।

जो कंपनियाँ अपनी प्रतिष्ठा को लेकर चिंतित थी...उन्होने बाज़ार से अपना पावडर उठवा लिया। छोटी कंपनियों के लिए यह बहुत ही बड़ा घाटा सिद्ध होता...तो वे अब भी बाज़ार में हैं।




http://www.youtube.com/watch?v=prLr1PNCeSg




बच्चों के दूध में आखिर कौन और क्यों मेलामिन मिला रहा है??

कौन का जवाब भी बहुत साफ नहीं है- शायद इन कंपनियों में दूध की आपूर्ति करने वाला नहीं तो स्वयं निर्माता।

क्यों-
ताकि प्रोटीन की मात्रा अधिक दिख सके। प्रबंध कर्ताओं का ध्यान या संशय अब तक इस ओर नहीं था। इसीलिए क्वालिटी जाँच में मेलामिन आँकने का प्रावधान भी नहीं था।


आखिर मेलामिन क्या है और किस तरह पहुँचाता है नुकसान??


मेलामिन एक ऑर्गैनिक कंपाउन्ड है C3H6N6(1,3,5-triazine-2,4,6-triamine )। इसमें व्याप्त नाइट्रोजन की मात्रा की वजह से ही यह गलत प्रोटीन की रीड़िंग देता है। जो लोग मेलामिन जैसी चीज़ नवजात शिशु के दूध में मिलाने में हिचकिचाते नहीं....जाहिर है वे मेलामिन की शुद्धता पर भी घ्यान नहीं दे सकते। सायन्यूरिक एसिड़ जैसे ऐसिड के होने पर मेलामिन के नुकसान करने की क्षमता कई गुना बढ़ जाती है।

यह गुर्दे पर सीधा असर करती है। बहुत समय तक इस्तेमाल करने पर किड़नी स्टोन्स, मूत्राशय के कैन्सर , किड़नी फेल्यर और मौत तक हो सकती है।


बच्चों मे इस रोग के होने के लक्षण

किड़नी के फेल होने और किड़नी स्टोन्स के होने जैसे ही लक्षण देखने में आये हैं
- बच्चे का बेहिसाब रोना, खास कर पेशाब करते समय। उल्टी के जैसा लगना
- पेशाब में खून ( जाहिर या माइक्रोस्कोपिक)
- पेशाब का कम होना या बिल्कुल बंद हो जाना
- ब्लड प्रेशर का बढ़ना
- पीठ पर किढनी की जगह पर थपथपाने पर दर्द का उठना
- बुखार




अगर बच्चों में ऐसे लक्षण दिखें तो शक करने के लिए जानना जरूरी है कि पावड़र मिल्क का इस्तेमाल किया गया या नहीं।
करीबन तीन महीने के लगातार इस्तेमाल के बाद ही अक्सर लक्षण दिखते हैं।

मेलामिन का दूध के पावडर में होने की जाँच आम लैबोरेटरी में नहीं की जा सकती। हालांकि,स्पेक्ट्रोमेट्री से बहुत आसानी से पता लगाया जा सकता है।

जो भी हो शक के घेरे में आई ऐसी बात सूचित करना जरूरी है।

समय बदल रहा है। कई लोग शॉर्टकट्स अपना कर हम आप की जान जोखिम में ड़ाल धनवान होने का प्रयत्न कर रहे हैं। वे हमारे भविष्य को बीमार कर रहे हैं।

कई बार तो लगता है काफी हद तक हम भी जिम्मेदार हैं। स्तनपान की जगह मिल्क पावड़र का चुनाव भी एक किस्म का शॉर्टकट ही है। छह महीने बाद भी सहूलियत के लिए जो माँये दूध के पावडर को ही मुख्य आहार रहने देती हैं...वह भी ऐसी स्थिति की जिम्मेदार हैं। हम सब जो हमारे सिस्टम को मिल्क पावड़र टेस्ट करने के लिए बाध्य नहीं कर सकते जिम्मेदार हैं।

....याद रहे बात बच्चों के दूध से सामने आई है। इस बात की गुंजाईश बहुक अधिक है कि आप खा रहे चॉकलेट, पी रहे चाय और मिठाइयों में मेलामिन है। इनमें इस्तेमाल हो रहे मिल्क पावड़र में मेलामिन की मात्रा की जाँच नहीं की गई है।

चीन के पेट फूड़ एक्सपोर्ट करने की वजह से स्पॉटलाइट उन पर है......जहाँ स्पॉटलाइट नहीं है...उस अँधेरे में पता नहीं हमारे और हमारे बच्चों के खाने में कौन सा जहर मिलाया जा रहा है।

क्या हम सचेत हैं??




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Thursday, 11 September 2008

ऑटिस्म- पिछली चर्चा के आगे

मुझे यकीन नहीं था ऑटिस्म मे सब इतनी दिलचस्पी लेंगे । पोस्ट लिखने में देरी हुई इसके लिये क्षमा चाहती हूँ।

पिछली पोस्ट में कई सवाल उठे,ऐसे सवाल जिन्हे संक्षिप्त में जवाब नहीं देना चाहती थी।

ऑटिस्म की वजह क्या है?

सच कहा जाये तो ठीक जानकारी नहीं है। अनुमान है की जेनिटिक्स का रोल है। कुछ परिवार के बच्चों में इससे ग्रसित होने की संभावना अधिक होती है। फिर भी एक सटीक वजह बता पाना संभव नहीं हुआ है। कुछ अनस्टेबल जीन्स से इसके होने की आशंका बढ़ जाती है। कुछ लोगों का मानना है की गर्भ के दौरान हुए वायरल इनफेक्शन्स, मेटाबोलिक डिसौर्डर्स या कुछ कैमिकल्स के संपर्क में आना इस रोग का कारण बन सकता है।
फ्रैजाइल एक्स सिन्ड्रोम (Fragile X syndrome),ट्यूबरस स्क्लीरोसिस(tuberous sclerosis), कनजनाइटल रुबैल्ला सिन्ड्रोम( congenital rubella syndrome),ऐस्पर्जर्स सिन्ड्रोम (Asperger's syndrome)और फिनाइलकीटोनयूरिया untreated phenylketonuria ऐसी कुछ अवस्था हैं जिनमें ऑटिस्म की संभावना बढ़ जाती है।

परिवेश भी इसके लिए जिम्मेदार हो सकता है। कई भारी धातुओं को,जैसे की मरकुरी का एक मात्रा से अधिक संपर्क में आने को कुछ लोग दोषी मानते हैं। उनका कहना है की ऐसे बच्चों में इसको शरीर से दूर करने की पद्धति में खोट होता है और इनके रहने से जो रोग दबा हुआ होता है, वह जाहिर हो जाता है।


क्या टीकों का इनसे कोई संबंघ है?

इसका भी साफ साफ जवाब नहीं है। लेकिन कुछ टीकों को दोषी माना गया था। कुछ समय पहले यह वात काफी चर्चा में थी। खास तौर पर एम एम आर (MMR) इसकी वजह इन टीकों में प्रस्तुत मरकुरी को माना गया था। ठीक ठीक ऐसी बात का सबूत नहीं है।

जो भी है शोध जारी है।

http://www.youtube.com/watch?v=zN20SkRgGz0


एक खास चौकसी की आवश्यकता फ्लू वैक्सीन्स को लेकर है। इसमें मरकुरी की मात्रा 25 माइक्रो ग्राम है। यह मात्रा बाकी सभी टीकों को मिलाकर भी देखा जाये तो ज्यादा है (0.4 माइक्रो ग्राम)

जब तक इस बात की पुष्टी नहीं हो जाती कुछ भी पक्के तौर पर कहना गलत होगा। किंतु जिन बच्चों को ऑटिस्म है उनके भाई बहन मे, या जिन में जेनिटिकली ऐसे रोग की सँभावना है वहाँ सावधानी बरतना ही बेहतर होगा।

क्या ऑटिस्म वास्तव में इतनी शीघ्रता से बढ़ रहा है? अगर हाँ तो क्यों?

अगर अंकों पर जाये तो हाँ ही जवाब होगा। किंतु एक खास बात जिसे नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता वो यह है की ऑटिस्म की परिभाषा, उसके प्रति सतर्कता, उसपर लगे अंकुश,उसकी विविघता की स्वीकृति, समाज और पाठशाला में खास ध्यान -इन बातों में तेजी से बदलाव आया है। हो सकता है की अंकों पर इन बातो का असर पड़ा हो। फिर भी यह भी सच है की इतने बच्चों को ऐसी तकलीफ है और उन्हे और उनके परिवार को हमारे स्वीकृति और दिलासे की जरूरत।

ऑटिस्म से ग्रसित होने की उम्र कब है? क्या किसी व्यस्क को किसी ट्रौमा के बाद ऑटिस्म हो सकता है?




जिन बच्चो को ऑटिस्म होती है उनमें ऐसी प्रवृति रहती है। कई बार कुछ वक्त गुजरने के बाद ही इसके लक्षण समझ आते हैं। कुछ में टीकों के बाद प्रवृति में खास गिरावट देखी गई है। कुछ के कारण उनमें मौजूद जेनेटिक रोग हैं।

कुल मिलाकर बात यह है की जो रोग उपस्थित है ,इसका निदान कब हो पाता है।

किसी ट्रौमा के बाद ऐसे लक्षण दिख सकते हैं। मनुष्य के दिमाग के कनेक्शन्स इतने जटिल है की कहीं कोई केबल के टूट जाने पर ऐसे लक्षण जाहिर हो सकते हैं। किंतु इन्हे ऑटिस्म नहीं कह सकते।

हाँ जिन्हे ऑटिस्म है...वह व्यस्क हो जाये तब भी ऑटिस्टिक ही रहते हैं। कोई और मानसिक दबाव इनपर ज्यादा बुरा असर दिखाता है।

हम सब कई बार अपने स्वस्थ, सामान्य बच्चों से परेशान हो जाते हैं। उनकी नादानियों कभी परेशान करती है, उनकी जरूरतें कभीकबार हमारे समय पर एक डिमांड सा महसूस होती हैं....। थकान, तनाव और रोज़मर्रा की जिन्दगी के अपने अलग किस्से हैं...ऐसे में ऐसे बच्चों की परवरिश करना आसान नहीं है।

आज की यह पोस्ट ऐसे बच्चों और उनसे जुड़े हर माता पिता और केयरगीवर को समर्पित।


http://www.youtube.com/watch?v=03bcE9xYKos&feature=related







Refeences
www.autism-society.org
www.autismkey.net
http://www.time.com/time/magazine/article/0,9171,1576829,00.html


All pictures and videos have been used only for educational purposes, in case any copyright violation is done, notify the picture or video will be removed immediately.

Tuesday, 26 August 2008

ऑटिस्म

जिस विषय पर आज चर्चा करना चाहती हूँ....उसके लिए थोड़ा समय निकाल कर चिंतन करना जरूरी है। हर बीस मिनट में एक बच्चा ऑटिस्म लेबल्ड। इसके विषय में हमारी जानकारी सीमित।
अगर हम अमेरिका और आसपास की जगह के सर्वे पर एक नज़र ड़ालें तो महसूस होता है की यह एक ऐसी अवस्था है जो दिन ब दिन बढ़ती जा रही है। एक ऐसी चुनौती है जिसके बारे में जानना हमारे लिए आवश्यक है।






http://www.fightingautism.org/idea/autism.php


ऑटिस्म यानि आत्मानुचिंतन या स्वलीनता ।
एक नज़र में ऑटिस्म से ग्रसित बच्चे बाकी बच्चों से अलग नहीं दिखते। इसी वजह से इन बच्चों को अक्सर ज्यादा शैतान और जाहिल समझा जा सकता है।

http://www.youtube.com/watch?v=IWyrit6i9aI&feature=related






ऑटिस्म आखिर है क्या ?! यह एक ऐसी अवस्था है जो मस्तिष्क के सामर्थ्य को कम करती है। इससे ग्रसित व्यक्ति की अपने आसपास की बात की समझ और उस पर प्रतिक्रिया अनुपयुक्त होती है। इस कारण उनका स्वभाव बाकियों से भिन्न होता है।
उन्हे जरूरत और चाह के हिसाब से उपयुक्त शब्द नहीं मिलते। कई बार सही शब्द की तलाश में एक ही शब्द या वाक्य दोहराते जाते हैं। लोगों की बात ना समझ पाना एक बड़ी उलझन होती है। हर शब्द साफ सुनने के बावजूद वे उसका सही अर्थ समझने में असमर्थ होते हैं। ऐसे बच्चे के मन के भाव तेजी से बदलते हैं। जो बच्चा हाल में प्रसन्न दिखता है अगले ही क्षण दुखी, खीजा हुआ, गुस्सैल हो सकता है। कोशिश करने पर भी अपनी बात व्यक्त ना कर पाने की बेबसी इसकी वजह हो सकती है। कई बार वजह समझ पाना मुश्किल होता है। सच तो यह है की वजह बहुत कुछ और कुछ भी हो सकता है। इन वजहों की लिस्ट बनाना नामुमकिन ना सही बहुत ही मुश्किल साबित होता है। यह अपने आप में इन बच्चों और इनका ध्यान रखने वाले और परवरिश करने वालों के लिए चुनौती साबित होता है। उलझनें, भ्रांतियाँ,निराशा और कुण्ठा बढ़ती जाती है। बहुत बच्चे एक ही पद्धति से कार्य करते हैं। इसमें ज़रा भी फेर करने पर स्वभाव बदल जाता है। कई गुस्सैल, परेशान, निराश हो जाते हैं नहीं तो डर जाते हैं। हर चीज़ अगर एक निर्धारित क्रम में चलता रहे तो वे संतुष्ट रहते हैं और अगर परिस्थिति का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सके तो स्वयं को असुरक्षित पाते हैं। एक अवस्था से दूसरे तक जाने में भी उनका संतुलन खोता है।
हकीकत इन्हे भ्रमित करती है। एक बात और चीज़ को दूसरे से जोड़ कर देखना इनके लिए बहुत मुश्किल होता है।

ऑटिस्म को स्पेक्ट्रम डिसॉर्डर कहते हैं। हर बच्चे को यह अलग मात्रा में ग्रसित करती है । कुछ को कम, कुछ को ज्यादा। हर बच्चा अलग।

आम तौर पर तीन बातों में कमी पाई जाती है
संवाद
कल्पना
अंतःक्रिया


जितनी आसानी से एक आम बच्चे के लिए दुनिया का होना है....उतना ही मुश्किल है ऐसे बच्चे का दुनिया की साधारण बातों को समझना।



कुछ आम तौर पर दिखने वाले लक्षण

बोलचाल का कम होना
भाषा से अलग आवाज़ निकालना
देर से बोलना सीखना
एक ही शब्द,वाक्य बार बार बोलना
मैं और तुम जैसे सर्वनाम के प्रयोग में गलती करना
मेलमिलाप कम करना और नापसंद करना
आँख ना मिलाना
पूछी बात पर प्रतिक्रिया ना देना
चिढ़चिढ़ा पहना
हाथों से विशेष लगाव
हाथ हिलाते रहना,कूदना,गोल घूमना, बैलेंस बनाने की कोशिश करना,ऐड़ी पर चलना
कुछ आवाज़ों को सख्त नापसंद करना
कुछ कपड़ों, खाने की चीज़ों को नापसंद करना
पैटर्न्स में बात दुहराना
अनिच्छुक रहना
खुद को नुकसान पहुँचाना

इनमें से कई बातें हो सकती है और कई नहीं भी। हर बात की तीव्रता भी अलग हो सकती है। हर बच्चा अलग होता है...और उसका सामर्थ्य भी।



हमारे पास एक ही विकल्प है....सही दृष्टिकोण चुनने का....

http://www.youtube.com/watch?v=_IhG9CgQ49g







कुछ गलत धारणायें
1. ऑटिस्म से ग्रसित बच्चे कभी आँख नहीं मिलाते।
ऐसा नहीं है। और काफी बच्चे निरंतर प्रयास करने के बाद सीखते भी हैं।

2.ऐसा बच्चा जीनियस होता है।
हर आई क्यू का बच्चा ऑटिस्टिक हो सकता है।

3.ऐसा बच्चा प्यार नहीं दिखाता, समझता।
प्यार की अभिव्यक्ति इन बच्चों के लिए मुश्किल जरूर है...असँभव नहीं। लगातार कोशिश के बाद बच्चे प्यार जताना और दिखाना सीख जाते हैं।

4.बच्चे में सुधार का मतलब बच्चे को तकलीफ नहीं है।
सुधार का मतलब प्रयास, स्नेह और साँत्वना है।

5.मुस्कुराते बच्चे का मतलब वह ऑटिस्टिक नहीं है।
गलत। हर लक्षण की तीव्रता अलग हो सकती है।

6.समय के साथ ऑटिस्म पीछे छूट जाता है।
नहीं।इसे उपचार और लगातार प्रयास की जरूरत है। जिसके बाद ऐसे बच्चे अर्थपूर्ण जीवन पा सकते हैं।

7.खराब परवरिश इसके लिए जिम्मेदार है।
गलत

http://www.youtube.com/watch?v=eoUx4D4rdro&feature=related



दो तरह के टेस्ट हैं जिनसे ऑटिस्म के होने की आशंका जताई जा सकती है।

CHAT(Checklist for Autism in Toddlers test)
http://www.paains.org.uk/Autism/chat.htm

ATEC Test(Autism Treatment Evaluation Checklist )
http://www.autism.com/ari/atec/

कोई भी शंका के होने पर बाल रोग विशेषज्ञ नहीं तो चाइल्ड सायकोलोजिस्ट से मिलें। किसी निश्चय पर स्वयं पहुँचने के अपने खतरे हैं। इस अवस्था के होने पर सही निदान और उपचार और लगातार प्रयास जरूरी है। सही दृष्टिकोण हो तो ऐसे बच्चे अर्थपूर्ण अस्तित्व पा सकते हैं। ऐसे बच्चे निर्धारित लक्ष्य पा सकते हैं। जीवन में कुछ बन सकते हैं।

ऑटिस्म अभिव्यक्ति के गूंगेपन जैसी अवस्था है । व्यक्तित्व पर एक ऐसा ताला जिसकी चाभी गुम हो। एक व्यक्ति स्वयं अपने शरीर मे कैद। ऐसी बेबसी की कल्पना भी हमारे लिए मुश्किल है। इस रोग से जूझते बच्चे और उनका परिवार हमसे सिर्फ स्वीकृति चाहते हैं। यह अलग हैं..बुरे नहीं।

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Wednesday, 13 August 2008

जुड़वा बच्चे


जुड़वा बच्चों ने हमेशा आकर्षित किया है। बचपन में हमेशा सोचती थी कितना अच्छा होता मेरी भी कोई जुड़वा बहन होती। एक शरीर में तीन दिल....कुदरत का करिश्मा ही है।

जब सगर्भा स्त्री को बताया जाता है तो अक्सर वह खुश से ज्यादा आशंकित हो जाती है। आने वाली कई परेशानियों को सोच कई सवाल उसके मन में उठते हैं। जहाँ तक मैं समझती हूँ कुछ बातों का ध्यान रखा जाये तो यह दुगुने खुशी का अवसर बन सकता है।

साधारण गर्भ में जहाँ 9-10 कंसल्टेशन काफी होते हैं वहीं जुडुवा बच्चों के साथ इससे ज्यादा की जरूरत है। दो अल्ट्रासाउंड भी काफी नहीं है।

कोई भी निश्चित की गई डॉक्टर से मुलाकात नहीं चूकनी चाहिए। रक्तचाप, खून में शक्कर, अनीमिया वगैरह के लिए नियमित जाँच जरूरी है।

जहाँ जुड़वा बच्चों का गर्भ एक सामान्य बात है वहीं इसमें अधिक सावधानी की जरूरत से इंकार नहीं किया जा सकता।
डॉक्टर और सगर्भा की कोशिश होनी चाहिए की गर्भ निर्धारित समय तक टिक सके। अधिकतर 37वे हफ्ते तक ही शिशु गर्भाशय मे रह पाता है। कोशिश होनी चाहिए की किसी भी कारण से शिशु का जन्म समय से पहले ना हो। कई सगर्भा सत्रियाँ पूरे 40 हफ्ते पूरा करती है और सामान्य प्रसव से ही इन शिशुओं का जन्म भी होता है। 40 वे हफ्ते के बाद भी अगर सामान्य तरीके से प्रसव ना हो तो कुछ डॉक्टर सिज़ेरियन करना पसंद करते हैं।



दो तरह के जुड़वा बच्चे होते हैं। आइडेन्टिकल और नान आइडेन्टिकल( फ्रैटर्नल) । आईडेन्टिकल जुड़वा बच्चे लिंग, रूप रंग, स्वभाव मे एक से होते हैं। आइडेन्टिकल जुड़वा बच्चों के बीच एक ही आँवल (प्लासेंटा)होता हैं।



आइडेन्टिकल बच्चों में ट्विन ट्राँसफ्यूशन सिंड्रोम का खतरा अधिक होता है। इसमें एक बच्चे का विकास दूसरे के व्यय से जुड़ जाता है।

अल्ट्रासाउंड की सँख्या सामान्य गर्भ से अधिक होनी चाहिए। खास तौर पर 28 से 40 हफ्ते के बीच चौकसी रखना जरूरी है। शिशु का गर्भाशय में स्थान, आँवल का स्थान, दोनो शिशु का विकास वगैरह ऐसी बातें हैं जिस पर नज़र रखी जानी चाहिए।
अगर सगर्भा स्त्री को डायबेटिस या अपस्मार की बिमारी हो तो खास सावधानी बरतनी जरूरी है।

इस बात पर जोर देना जरूरी है कि ऐसे में खोराक, पर्याप्त आराम और सही व्यायाम (जैसे की योगा) पर ध्यान अत्यंत आवश्यक है। गर्भ के साथ जुड़ी बाकी परेशानियाँ भी अधिक महसूस हो सकती है। परिवार का सहयोग ऐसे में अहम भूमिका अदा करता है।

http://www.youtube.com/watch?v=tLPZa4Ydayw&feature=related





समस्यायें

कुछ समस्यायें खास इस अवस्था से जुड़ी है। समस्या के बारे में पता होगा तो ही समाधान के प्रति सजग हो सकेंगे।

वैनिशिंग ट्विन सिंड्रोम
कभी कभार जुड़वा में से एक बच्चा गायब हो जाता है। वजह आँवल, कोई आंतरिक त्रुटि या विकास में कोई अन्य त्रुटि हो सकती है। जो भी हो इससे माँ को बहुत तकलीफ नहीं होती। अल्ट्रासाउंड कर के पता लग सकता है। और यह शुरुआती महीनों में ही अक्सर होता है।


मिसकैरेज
इसकी सँभावना सामान्य गर्भ से लगभग दुगुनी होती है। पर सँभावना फिर भी सँभावना ही है। सही देखभाल से इसका होना काफी हद तक कम किया जा सकता है। और कभी अगर एक शिशु गिर भी जाये कोई जरूरी नहीं दूसरे के साथ भी ऐसा हो। अक्सर दूसरा शिशु स्वस्थ पैदा होता है।

प्रीएकलम्पसिया (सगर्भा अवस्था से बढ़ा रक्तचाप) और डायबेटिस की सँभावना और कठोरता दोनो इस अवस्था मे अधिक होती है। किंतु नियमित डॉक्टर से मिलना और समय पर इलाज इनको नियंत्रण में रख सकता है।


प्लासेंटल एबरप्शन
आँवल पर दरार पडकर टूटना एक गँभीर बात हो सकती है। सही खोराक की कमी और घुम्रपान इसकी कारण बन सकते हैं। इसकी वजह से समय से पहले प्रसव होने की सँभावना भी रहती है।

फीटल ग्रोत रेस्ट्रिक्शन

शिशु का विकास अपेक्षा से कम होने की सँभावना।


ट्विन ट्राँसफ्यूशन सिंड्रोम

इसके लिए सजग रहना आवश्यक है। नियमित जाँच से इसका पता लगाया जा सकता है। निदान होने पर तुरंत सलाह और उपचार जरूरी है।


एकार्डियाक ट्विन
इसकी सँभावना 1:35000 है। निदान अल्ट्रासाइंड से हो सकता है।

इन सभी से अधिक सँभावना समय से पहले प्रसव की है। अस्पताल जाने की तैयारी हमेशा रहनी चाहिए। प्रसव के समय होने वाले बदलाव का सही ज्ञान होना चाहिए। ऐसे किसी भी लक्षण के होने पर तुरंत अस्पताल जाना चाहिए।

जुड़वा बच्चों के बारे में बताते हुए महसूस हो रहा है जैसे मैं ऐसी सगर्भा माँ को सचेत और सजग करने से ज्यादा आतंकित कर रही हूँ। पर मेरी मंशा जहाँ आपकी बेफिक्री हटाने की है आपको फिक्रमंद करने की नहीं है। बिंदास रहने वाला रवैया
नहीं चल सकता और अगर आप सजग हैं और जिम्मेदार भी तो कुदरत का यह करिश्मा आपकी गोदी में पलेगा...स्वस्थ और तंदुरुस्त

http://www.youtube.com/watch?v=3meRrmsZKnM




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Monday, 16 June 2008

सेरिब्रल पाल्सी (प्रमस्तिष्कीय लकवा)

http://www.youtube.com/watch?v=P8xOA8AXOVw



आज जिस विषय पर बात होगी वह है सेरीब्रल पाल्सी। यह विषय मेरे दिल के बेहद करीब है। और मैं मानती हूँ कि भले ही हमारा कोई अपना इस से ग्रसित हो कि नहीं हमें इसके बारे में जानना चाहिये। भगवान ने हमें बहुत सारी सौगातों से नवाज़ा है...इस बात का अंदाज़ा सबसे अधिक मुझे ऐसे बच्चे के सामने होता है। ऐसे बच्चे के सामने इस बात का भी अंदाज़ा होता है कि इतनी परिमितता के बावजूद यह नन्हे फरिश्ते अपार स्नेह और कोशिश के काबिल होते हैं ।आज की यह पोस्ट इन बच्चों को समर्पित....जिनके लिये मेडिकल साइंस बहुत कम कर सका है लेकिन जिन्होने जीवन के अमूल्य स्पंदन से मुझे अवगत कराया है।

क्या कभी अपनी माँ से अपने पहले कदम या पहले शब्द के बारे में पूछा है....शायद माँ ने बताया हो....

सेरीब्रल पाल्सी से ग्रसित बच्चे की माँ वह लम्हा कभी भूल नहीं सकती..ना जाने कितने इंतज़ार और तप के बाद नसीब होता है एक ऐसा खूबसूरत सा लम्हा...जिसे हम हमारे जीवन का साधारण और स्वाभाविक पड़ाव मानते हैं।
इन बच्चों में से कुछ व्हील चेयर का इस्तेमाल करते हैं,कुछ बैसाखी का, कोई ठीक से बात नहीं कर सकता तो कई खुद को किसी भी तरह व्यक्त करने में असमर्थ होते हैं।
हज़ारों की सँख्या में शिशु और बच्चे इससे हर साल ग्रसित हो जाते हैं। यह संक्रामक नहीं होता। पर यह लकवा है जो दिमाग और शरीर को मार जाता है।
ऐसे बच्चे का इसकी माँस पेशियों पर इच्छित नियंत्रण नहीं होता। मस्तिष्क ही हमें कौन सा काम, किस समय, किस तरह करना है बताता है। चूँकी सेरिब्रल पाल्सी (प्रमस्तिष्कीय लकवा) मस्तिष्क पर असर करता है , जिस हिस्से पर असर होता है उससे उसका प्रभाव निर्धारित होता है। अत: ऐसा बच्चा खाने पीने,खेलने कूदने, चलने -उठने मे असमर्थ हो सकता है।

सेरिब्रल पाल्सी (प्रमस्तिष्कीय लकवा) के प्रकार





http://www.youtube.com/watch?v=xXXH2a-thB4&feature=related




तीन प्रकार


स्पास्टिक


इससे ग्रसित बच्चा अपनी माँस पेशियों को ढ़ीला छोड़ने में असमर्थ होता है। माँस पेशियाँ सिंकुड़े हुए अवस्था में लगातार रहती हैं।

अथीटोइड

इससे ग्रसित बच्चा अपनी माँस पेशियों पर सही नियंत्रण नहीं रख पाता। लिहाजा ग्रसित माँस पेशियाँ अचानक से फड़फड़ा सकती हैं,उनमें कोई हरकत हो सकती है।

अटैक्सिक

इससे ग्रसित बच्चा संतुलन और सही तालमेल नहीं बना पाता।

मस्तिष्क का कितना और कौन सा हिस्सा ग्रसित हुआ है निर्धारित करता है कि बच्चे को तकलीफ कितनी होगी। अगर दोनो हाथ और पैर पर प्रभाव पड़े तो व्हील चेयर की आवश्यकता पड़ सकती है,अगर दिमाग का जो हिस्सा वार्तालाप का नियंत्रण करता है ग्रसित हो तो बच्चे के बात करने की क्षमता पर असर पड़ता है।

सेरिब्रल पाल्सी (प्रमस्तिष्कीय लकवा) के कारण


सही सही कारण ज्ञात नहीं है। कई बार जन्म के समय शिशु के मस्तिष्क पर आघात कारण बनता है। कई बार समय से पहले शिशु के प्रसव होने की वजह से अपूर्ण विकास कारण बनता है। जन्म पश्चात शिशु को हुई कोई तकलीफ की वजह से ऐसा हो सकता है। पर फिर भी अक्सर जन्म पूर्व मस्तिष्क को पहुँची हानि ही इसका कारण बनती है। इसकी कोई खास वजह अभी तक ढूँढ़ी नहीं जा सकी है।


डॉक्टर की भूमिका


डॉक्टर इसका निदान करने में सहायक होता है। इस बात का पता लगाता है कि शिशु किसी और रोग की वजह से ऐसा नहीं है। रोग के तीव्रता और असर का सही अंदाज़ा लगाता है। और बच्चे और माता पिता को इससे जूझने में मदद करता है। छोटी छोटी बातें, कुछ दवाइयाँ, कसरत, सही सहायक उपकरण, सीखने और सिखाने में मदद करता है। माँस पेशियों की विभिन्न तकलीफ को समझ उपयुक्त उपाय किया जाता है।

शिशु के करीबन अठारह महीने होने तक इस रोग की पुष्टी की जा सकती है। विकास की सीढीयों में कुछ असामान्य या देरी होना इसका परिचायक होते हैं।

सेरिब्रल पाल्सी (प्रमस्तिष्कीय लकवा)के साथ जीना

इस रोग से ग्रसित होना या ऐसे बच्चे की देखरेक करना काफी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।बच्चे के मस्तिष्क का दोष समय के साथ बिगड़ता नहीं है बल्कि ज्यों का त्यों रहता है। किंतु लगातार माँसपेशियों में तनाव या दूसरी तकलीफ की वजह से स्थिति बिगड़ सकती है। इसीलिये ऐसे बच्चे को उपचार की जरूरत होती है। यह उपचार शारीरिक, मानसिक, वाक शक्ति पर केंद्रित हो सकती है। कई बार शल्य क्रिया की भी जरूरत पड़ सकती है।

सेरिब्रल पाल्सी के होने का मतलब बच्चे के सार्थक जीवनयापन करने में असमर्थ होना नहीं है। यह बच्चा सोच सकता है, महसूस कर सकता है, समझ सकता है, दोस्त बना सकता है, खेलना चाहता है, हँस सकता है.....। हाँ उसकी अपनी सीमायें हैं....और बाकी बच्चों से फरक भी।

यह बच्चे और इनके माता पिता हमसे स्वीकृति चाहते हैं, थोड़ी संवेदनशीलता ...थोड़ी सी मदद और इनके बारे में थोड़ी सी समझ। वे अपनी खुद की जगह पूर्ण अधिकार से लेना चाहते हैं। जितनी कोशिश से वे अपनी बात कहते हैं...वे चाहते हैं कि हम थोड़े धीरज से उन्हे सुन लें। उन्हे अवसर दें और स्नेह भी।

पता नहीं क्यों पर हमेशा उनसे जो स्नेह मिला है हमेशा दिल भर गया है। आठ साल के पुलकित के असंतुलित हाथ से बने फूल और उनसे लिखे डगमगाये अक्षरों में मेरा नाम....उसकी वॉकर पर टिकी काया और चश्मे के पीछे से मुस्कुराता चेहरा...
ऐसे में जीवन से कई शिकायतें यूँ ही पिघल गई है ...और रूह आनन्दित हुई है।

http://www.youtube.com/watch?v=FDB8dCag3yk&feature=related




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Thursday, 29 May 2008

शिशु की त्वचा- भाग 2

पिछली कड़ी के आगे

डायपेर रैश



डायपेर रैश - नाम से ही जाहिर है कि डायपेर पहनने की वजह से और उस जगह पर होता है जहाँ डायपेर त्वचा के संपर्क में आता है। यह लाल और दुखदायी होता है। मलमूत्र से भीगा हुआ डायपेर जब काफी समय तक त्वचा के संपर्क में रहता है तो त्वचा पर इस तरह असर होने लगता है। ऐसे में शिशु को सूखा रखना (खास तौर से कूल्हा और प्राइवेट (गुप्त) भाग)बेहद जरूरी है। कई बार बैक्टीरिया और यीस्ट के चेप से भी हो सकता है। दो तीन दिन में अगर ठीक ना हो तो डॉक्टर को दिखाना चाहिये। साधारण तौर पर पावडर लगा कर, सही समय पर डायपेर बदल कर, कुछ समय शिशु को खुला रख हवा लगने देना चाहिये। जिस क्रीम में ज़िक ऑक्साइड हो वह फायदा करती है।


एटोपिक डर्मटाइटिस



यह एक तरह की स्किन अलर्जी है। अक्सर ऐसे शिशु के परिवार में किसी ना किसी को अलर्जी की शिकायत होती है। कुछ भाग पर त्वजा बेहद नाजुक, सूखी होती है और यहाँ खुजली उठती है। यह गालपर, कुहनियों और घुटनों के पीछे और कई बार शरीर में पूरी जगह हो सकती है। खाने में , पहनने में, लगाने में.....किसी में भी कोई ऐसी चीज़ हो सकती है जिससे शिशु में तकलीफ शुरु हो। ठंड के मौसम में तकलीफ के बढ़ने की आशंका रहती है। जिस शिशु में यह तकलीफ है उसके और उसके माता पिता के लिये इससे जूझना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। सही समय पर सही निदान, सही और पर्याप्त उपचार और बचाव महत्वपूर्ण है। इस पोस्ट में इस विषय में और कहना मुश्किल होगा किंतु सही निदान और पर्याप्त उपचार-ना कम ना ज्यादा- आवश्यक बातें है।


नवजात शिशु में पीलिया


माँ और शिशु के ब्लड़ ग्रूप के अलग होने की वजह से जो पीलिया होता है उसके बारे में पहले ही लिख चुकी हूँ।

पीलिया सामान्य तौर पर दूसरे तीसरे दिन दिख सकता है और एक हफ्ते तक रह सकता है। शिशु की आँखों में पीलापन गँभीर पीलिया ना होने पर भी दिख सकता है। इसमें चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है। अगर शिशु सचेत है, बराबर दूध पी रहा है, पेशाब समय से कर रहा है तो चिंता की आवश्यकता नहीं है।

पीलिया होने पर धूप में शिशु को रखने की जो सलाह चली आ रही है वह गलत है। जिस वेवलैंग्थ की लाइट इस पीलिये पर असर कर सकती है वह साधारण धूप में नहीं मिल सकती। बल्कि धूप में शरीर के पानी के सूखने की वजह से पीलिया और बिगड़ सकता है।


जन्मचिह्न

नवजात शिशु में विविध प्रकार के जन्मचिह्न देखे जा सकते है। इनमें से कुछ ,थोड़े बरसों बाद गायब हो जाते हैं और कुछ जीवन भर रहते है।

कफै उ लैट



चाय कॉफी के गिरने के बाद जैसा निशान होता है। एक दो से अधिक या बड़े निशान को डॉक्टर को दिखाना जरूरी है। कभी कभार यह किसी और कमी की तरफ इशारा कर सकता है।

पोर्ट वाइन स्टेन



यह बड़े, बिना उभरे गहरे लाल या जामुनी धब्बे होते है। बहुत सारी शिराओं के त्वचा के नीचे इकट्ठा होने से यह बनते है। यह लुप्त नहीं होते।


स्ट्राबेरी हिमैन्जियोमा





स्ट्राबेरी की तरह दिखने वाले यह चिन्ह बहुत छोटे से बहुत बड़े तक हो सकते है। लाल रंग के उभरे हुए निशान होते है। असामान्य रक्तप्रवाह की वजह से यह बनते है। इसकी वजह से त्वचा फूलने लगती है और लाल दिखती है। यह जन्म के बाद बड़ने लगते है और अक्सर दस बरस तक गायब भी हो जाते है। अगर यह निशान चेहरे पर है, आँखों के पास है , नज़र पर असर करें है तो इसे उपचार की आवश्यकता है। अगर निशान लगातार बड़ रहा हो तो डॉक्टर को दिखाना आवश्यक है।

कैवर्नस हिमैन्जियोमा

काफी कुछ स्ट्राबेरी हिमैन्जियोमा की ही तरह होते है। इसमें त्वचा के नीचे की कई परतें भी अन्तर्ग्रस्त होती है। यह पहले बरस में बड़ कर पाँच से बारह बरस तक में लुप्त हो जाती है। कभी चाहो तो शल्यक्रिया से निकाली भी जा सकती है।


कब डॉक्टर को मिलें

-शिशु के व्यवहार में अंतर महसूस करें
-अगर किसी चेपी रोग के लक्षण महसूस हो
-निशान में दर्द इठे, सूजन आ जाये या गरम महसूस हो
-मध्य से लाल रेखायें जाती हुई दिखने लगे
-परू भर जाये
-गले, बगल या पेट और जाँघ के बीच के भाग में गिलटी उभर आये
-बुखार हो
-डायपेर रैश के दो तीन दिन तक ठीक ना होने पर
-कोई और नया चिन्ह उभरने पर

शिशु की त्वचा बेहद नाजुक होती है। कई परेशानियाँ महज उपयुक्त बचाव से सुलझ सकती है। बाकी जिन्हे इलाज की जरूरत है वह जादू टोना से नहीं सुलझ सकती। त्वचा का सही इलाज करवा पाना भी एक मुश्किल काम है। क्योंकि अक्सर यह धैर्य माँगती है....जो हममें नहीं होता....

कई बार ऐसे शिशु के माता पिता में हीन भावना पनप जाती है जो बिल्कुल जायज़ नहीं है। जरूरत है ऐसी स्थिति में विवेक और संवेदना की....

और अपनी सुंदरता की परिभाषा पर पुनर्विचार करने की.....





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