Wednesday, 30 April 2008

स्तनपान




शिशु के जन्म होते ही पहले स्पर्श का भी समय हो जाता है। स्पर्श की तपिश और अनुरक्ति का अहसास इतने बचपन में भी होता है। माँ की गर्मी के पास और साथ रह कर शिशु एक जुड़ाव महसूस करता है, स्वयं को सुरक्षित महसूस करता है। शिशु को साफ और मुलायम कपड़ो में सही तरीके से लपेट कर जितनी जल्दी हो सके माँ को सौंप देना चाहिये। प्रसव के आधे घंटे के अंदर स्तनपान करवाना चाहिये। यह अवधि सीज़ेरियन प्रसव से हुए बच्चों के लिये एक घंटा मानी जा सकती है।

स्तनपान की बात आते ही हमारे प्रोफेसर की एक बात याद आती है। Cow's milk is for the calf....your child needs yours!! गाय का दूध बछड़े के लिये...तुम्हारे बच्चे को तुम्हारे दूध की जरूरत है।

माँ के दूध पर आधारित सभी कहावतों और डायलॉग्स के पीछे एक ठोस आधार है। हर माँ का दूध उसके शिशु के लिये एकदम उपयुक्त होता है। मतलब कि अगर शिशु 28 हफ्ते में ही जन्म ले तो उसके पाचन शक्ति और जरूरत के हिसाब का सही मात्रा में प्रोटीन्स, विटामिन्स और चर्बी दूध में होती है। जैसे उस शिशु के लिये उसके जरूरत के अनुसार खास ऑर्डर पर तैयार किया गया हो।

माँ का दूध मतलब माँ के आँचल में रह कर मिलने वाली खोराक- साफ, बिना झंझट, हमेशा फ्रेश, स्टेरिलाइसेशन की आवश्यकता से दूर, हमेशा माँ के पास, माँ के साथ...सही मात्रा में प्रोटीन, विटामिन्स,ग्लूकोस, फैट। साथ में रोग प्रतिकारक शक्ति। माँ से लगातार गहराता जुड़ाव। काउ मिल्क अलर्जी से दूर।

फायदें इतने हैं कि यह समझना कठिन है कि यहाँ भी फैशन ने बाजी मार ली है। फैशन, ट्रैन्ड, फिगर और कठिनाई जैसे बहानों का इस्तेमाल कर शिशु को इससे वँचित रखना दुखद है।

खैर।
नवजात शिशु को देखना हमेशा एक सुंदर अनुभव रहा है। माँ के पास गर्म , मुलायम कपड़ों में लिपटा शिशु जल्द ही बगल में मुड़कर माँ को तलाशना शुरु करता है। होठों पर जीभ फेरकर दूध की माँग रखता है। यही सही समय है स्तनपान शुरु करने का।

शिशु के लिये स्तनपान सीखी हुई एक बात है। किन्तु पहली बार बनी माँ के लिये यह एकदम नया अनुभव है। माँ को सहजता से इसकी शुरुआत करनी चाहिये। माँ की विकलता शिशु तुरंत भाँप लेता है...इसीलिये परेशान माँ का शिशु भी अक्सर चिढ़चिढ़ा हो जाता है।

पहली बार स्तन से लगाना अपने आप में एक प्रक्रिया है। इसे लैच्चिंग ऑन कहते हैं। अगर सही तरीके से स्तनपान की शुरुआत की जाये तो माँ और शिशु के बीच के रिश्ते को अच्छी और तनाव रहित शुरुआत मिल सकती है।
1.शिशु का मुँह पूरी तरह खुलवायें। हल्के से शिशु के होंठ स्तन पर लगाने से वह पूरा मुँह खोल देगा...ऐसे जैसे उबासी में खोलते हैं।
2. फिर जिस हाथ में शिशु को सँभाला है उसे पास लाकर शिशु को स्तन के पास लाना है। ध्यान रहना चाहिये कि शिशु को माँ की तरफ लाया जाये ना कि माँ को शिशु की तरफ।
ध्यान रहे कि शिशु के मसूड़े स्तन के आसपास के एरियोला (स्तन के पास गहरे रंग की त्वचा)को पूरी तरह से मुँह के अंदर लें। शिशु के होंठ बाहर की तरफ मुड़े हुए हों।
3. इतना करने पर शिशु स्तन चूस कर दूध पीने की कोशिश करेगा।

(स्तनपान का सही तरीका जानने के लिये नीचे दिये लिंक पर जायें)

http://www.youtube.com/watch?v=Zln0LTkejIs

अगर शिशु स्तन से सही तरीके से जुड़ा हो और सही तरह से चूस रहा हो तो इस प्रक्रिया में स्तन में दर्द नहीं उठना चाहिये। अगर दर्द उठे तो स्तनपान रोक कर फिर कोशिश करनी चाहिये। शिशु के स्तन पकड़ने पर वैक्यूम बनता है और सक्शन एफैक्ट से दूध खिंचता है। जब भी शिशु को स्तन से हटाना हो तो स्तन और मसूड़े के बीच उँगली ड़ाल कर पहले वैक्यूम खत्म करें। कभी भी गलत तरीके से स्तनपान जारी ना रखे। इससे स्तन पर चीरे पड़ने का डर रहता है और शिशु को भी पर्याप्त मात्रा में दूध नहीं मिलता।

माँ और शिशु के रिश्ते का एक अहम पहलू है स्तनपान। माँ की खुशबू, सपर्श की तपिश, और माँ की गोद की सुरक्षा...इन सबके लिये पहला अनुभव है स्तनपान। स्वाभाविक क्रिया है और जितना सहजता और आनंद से निभाया जाये उतनी ही संतुष्टि दोनो को मिलती है।

छह महीने तक शिशु को मात्र स्तनपान देने से उसकी सभी खोराक की जरूरत पूरी हो जाती है। सिर्फ माँ का दूध उसके लिये पर्याप्त है। इसे एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीड़िंग कहते हैं। छह महीने से माँ के दूध के अलावा कुछ और भी शुरू किया जाना चाहिये। स्तनपान मात्र खोराक ही नहीं पूरा करता किंतु इससे शिशु का पहला स्नेह संबंध बनता है।

(http://www.youtube.com/watch?v=cVbZmCQT6Ec&feature=related)


कहते हैं भगवान ने माँ को इसलिये बनाया क्योंकि हर जगह हर समय हर शिशु के पास नहीं रह सकता....काश हर शिशु के पास उसका अपना भगवान ......उसकी माँ हो....जो उसे ममता से सँभाल,दूध से सींच,स्नेह से छू....उसको उसकी अपनी पहचान दे.....





( photo courtesy breastfeeding.com)

Wednesday, 9 April 2008

विरासत में रोगाणु ?!

इस ब्लॉग के नियमित पाठकों से क्षमा। व्यस्तताओं के चलते थोड़ा विलम्ब हुआ।

शिशु माँ से खुराक, औक्सीजन जीन्स वगैरह पाता है। साथ ही अगर माँ किसी रोग से पीड़ित है तो कई बार रोग भी विरासत में पा लेता है। इसके बारे में जानना जरूरी है क्योंकि कोई माँ अपनी वजह से अपने शिशु में किसी प्रकार का रोग नहीं देखना चाहती।
सही जानकारी,जाँच और इलाज शिशु की रक्षा कर पाने में अधिकतर सक्षम होते हैं।

रोग किस प्रकार से माँ से शिशु तक पहुँच सकता है?

• नाल से। टौक्सोप्लास्मा, ट्रीपोनिमा पैलिडम(सिफिलिस के लिये जिम्मेदार),रुबेल्ला, सी एम वी(साय्टोमेगालेवायरस),लीस्टीरिया, फाल्सीपारम(मलेरिया)
• वर्द्धमान मातृक इनफेक्शन ( माँ से शिशु की ओर बढ़ता हुआ)-कोरियोएम्नियेनाइटिस
• प्रसव के दौरान- माँ के रक्त और योनि से संपर्क में आने पर। HIV (एड्स), HZV( चिकनपौक्स-माता), HBV (हैपाटाइटिस बी-जहरी कमळा) और क्लैमीडिया ट्रैकोमैटिस ( कनजंक्टिवाइटिस)
• प्रसव के बाद-स्तनपान से फैलने वाले


गर्भ से पहले और गर्भ के दौरान होने वाले परीक्षण से रोग के होने या हो सकने की सँभावना का पता लगाया जा सकता है। सही समय पर सही कदम लेने पर प्रतिकूल परिणाम से शिशु को बचाया जा सकता है।
TORCH के नाम से यह रोग जाने जाते रहे हैं। (टौक्सोप्लास्मा, रुबेल्ला, सी एम वी(साय्टोमेगालेवायरस), हर्पिस) ।
अक्सर गर्भ ठहरने के करीबन सोलहवें हफ्ते में इन रोगों के होने की जाँच की जाती है।


टौक्सोप्लास्मा

यह रोग अगर शिशु में हो तो शिशु के मानसिक विकास पर असर पड़ सकता है। शिशु अँधपन एवं अपस्मार का शिकार हो सकता है।
इससे बचाव के लिये इसके होने के तरीकों का जानना आवश्यक है। कच्चा गोश्त, मुर्गी, सीफुड़, बिना धोये फल और सब्जियाँ, बिल्ली या उसके मल से किसी प्रकार का संपर्क इस रोग को माँ तक पहुँचा सकता है। जाहिर है की कच्चा गोश्त ,मुर्गियों और बिल्लियों से दूर रहना चाहिये और फल और सब्जियाँ धोने के बाद ही हाथ लगानी चाहिये।


रुबेल्ला

रुबेल्ला से ग्रसित होने पर शिशु के पूरे विकास पर असर पड़ता है। मोतियाबिन्द, छोटी आँखें,हृदय की बनावट में बुनियादी खामी,(पैटेन्ट डक्टस आर्टिरियोसिस, पलमनरी आर्टरी स्टीनोसिस, बहरापन(सेन्सरी न्यूरल डैफनस), न्यूनमनस्क (मेन्टल रिटार्डेशन), थ्रौम्बोसायटोपीनिया , बच्चे का गिरना या मरा हुआ पैदा होना सँभव है।


एम एम आर इनजेक्शन एक आसान तरीका है बचने का। गर्भ ठहरने से पहले....हो सके तो यौवन में ही हर लड़की को रुबेल्ला का ठीका लगवा लेना चाहिये।


सी एम वी(साय्टोमेगालेवायरस)

इस रोग से ग्रसित नवजात का वजन कम हो सकता है, गुर्दे पर असर,कमळा, फेफड़ों में असर, अनीमिया और बहरापन हो सकता है।

जिन में इस के रोगाणु होते हैं उनके शरीर के सभी द्रव्य से यह रोग फैल सकता है। संसर्ग, स्तनपान,ब्लड ट्रान्सफ्यूशन और औरगेन ट्रान्सप्लान्ट से भी यह फैल सकता है।

जाहिर है की किसी भी दूसरे व्यक्ति के शरीर के द्रव्य के संपर्क में आने से इसकी सँभावना बढ़ सकती है। हाथ धोना, संसर्ग के दौरान कौन्डोम का इस्तेमाल, ब्लड ट्रान्सफ्यूशन के समय डॉक्टर से तसल्ली करना अहम भूमिका निभा सकता है। नन्हे बच्चों को पढ़ाने या सँभालने वाली स्त्रियों को इस बात को लेकर खास सचेत होना चाहिये। उन्हे बच्चों के थूक,मूत्र इत्यादि द्रव्यों के संपर्क में नहीं आना चाहिये। और आये तो तुरंत साबुन और पानी का इस्तेमाल करना चाहिये।


हर्पिस





इस रोग से ग्रसित अधिकतर बच्चों में बहुत कम तकलीफ होती है। दो-तीन प्रतिशत बच्चों में वैरिसेल्ला सिन्ड्रोम हो सकता है। दागदार त्वचा, अंग का अधूरा विकास,अव्ययों, आँख और न्यूरोलौजिकल कार्य में क्षति हो सकती है।
माँ अगर चिकन पौक्स के संपर्क में प्रसव के पाँच दिन पूर्व से दो दिन पश्चात तक आये तो नियोनेटल झोस्टर की सँभावना बन जाती है। इसमें तीस प्रतिशत शिशु में जान खोने का जोखिम रहता है। इलाज( varicella-zoster immune globulin (VZIG) IM)तुरंत जरूरी है।



सभी गर्भवति स्त्रियों में HIV antibody(एड्स), Hepatitis B Surface antigen(जहरी कमळा),VDRL( सिफिलिस), मूत्र की जाँच वगैरह लाजिमी है। इन्हे करवाने के बाद डॉक्टर की सलाह आवश्यक है। स्वयं इन रिपोर्ट को पढ़ने की कोशिश कई बार गलत निष्कर्ष तक पहुँचा सकती है। परिणाम के अनुसार जरूरी दवा , नहीं तो पूर्वोपाय किये जा सकते हैं।

HIV antibody के पौसिटिव होने पर कभी छिपाया नहीं जाना चाहिये। सही समय और सही तरीके से दवा करने पर शिशु को रोगमुक्त रखा जा सकता है।








मलेरिया, मूत्र में दोष का इलाज सही समय पर करने से शिशु के स्वास्थ्य को हानि से बचाया जा सकता है। योनिमार्ग मे कोई दोष, नहीं तो प्रसव के दौरान फैलने वाले रोग से शिशु को सीज़ेरियन का विकल्प चुन बचाया जा सकता है।

रोगाणु बहुतेरे हैं...घात लगाये बैठे हुए....कई बार माँ के शरीर पर आक्रमण कर शिशु को स्वस्थ पैदा होने के विकल्प से वँचित कर देते हैं.

पर माँ और पिता इतने भी बेबस नहीं है। जरूरत है अग्रसक्रिय होने की। हर होने वाले पिता में अपने जीवनसाथी और संतान की तरफ चौकसी की जिम्मेदारी लेने की।

और माँ तो फिर माँ है....सिर्फ ममता लोरी और रात रात तक जागरण करने तक सीमित नहीं होनी चाहिये....किन्तु जिम्मेदारी सहित स्वयं को रोगाणु से मुक्त रख अगली पीड़ी की सृष्टि में अपना दायित्व निभाने की तरफ सजग होना चाहिये।




जानती हूँ काफी रूखा सूखा सा विषय है। लेकिन बहुत जरूरी और बेहद ध्यान से समझने जैसा।
बहुत छोटी बातों से बहुत बड़ी समस्या को मूल से ही उखाड़ दिया जा सकता है....
हाँ आम जिन्दगी में भी नियम अलग तो नहीं हैं... :)))

Monday, 31 March 2008

शिशु पर माता पिता के ब्लड ग्रूप का महत्व

"खून के रिश्ते" बोलते समय एक जबरदस्त सा जज़्बा मन में आता है।यूँ ही नहीं शायद। खून खून में थोड़ा थोड़ा फर्क है....और माँ के दूध की ही तरह माँ बाप के खून का भी महत्व है।

माता पिता का ब्लड ग्रूप शिशु का ब्लड ग्रूप तय करता है। और बात सिर्फ तय करने तक सीमित होती तो इसे नज़रंदाज़ भी कर सकते थे। किन्तु माँ अगर आर एच नेगाटिव(Rh-) हो तो शिशु पर इसके परिणाम विविध और घातक भी हो सकते हैं। इसीलिये हर दंपत्ति को अपना ब्लड ग्रूप ज्ञात होना चाहिये।

चार ब्लड ग्रूप होते हैं। ए (A),बी (B),O(ओ) और AB(एबी) । रक्त की लाल कोशिकाओं की सतह पर कुछ प्रोटीन, ग्रूप निर्धारित करते हैं। जिनमें 'ए' ऐन्टीजन होता है उसका ग्रूप 'ए और जिसमें 'बी' ऐन्टीजन होता है उसका ग्रूप 'बी'। जिसमें दोनो होते हैं 'एबी',जिसमें दोनो नहीं होते उनका ग्रूप 'ओ' होता है।

पूरी मानव जाति इन चार ब्लड टाइप्स में बँटी है। जैसा की सर आरनल्ड कहते हैं
There is no caste in blood.
- Sir Edwin Arnold



इसके अलावा एक 'आर एच'(Rh) नाम का और प्रोटीन होता है । यह भी रक्त की लाल कोशिकाओं के सतह पर ही होता हैं। जिनमें यह होता है वह आर एच पौसीटिव और जिनमें नहीं होता वह आर एच नैगाटिव होते है।

इनके होने या ना होने से रक्त की कोशिकाओं या रक्त के गुण पर खास असर नहीं होता। पर यह भी इंसान की पहचान का एक हिस्सा हैं। जरूरत पर सही मैच का ही खून चढ़ाया जा सकता है। अगर अलग ब्लड ग्रूप का खून चढ़ाया जाये तो परिणाम चिंताजनक हो सकते हैं। करीबन 85 प्रतिशत लोग आर एच पौसीटिव होते हैं। बाकी के आर एच नैगाटिव।

एक दंपत्ति के लिये सचेत होने की शुरुआत पत्नि के 'आर एच नैगाटिव' होने पर होनी चाहिये। पति अगर 'आर अच पौसीटिव' है तो गर्भ के समय उपयुक्त उपाय करना जरूरी है। आर एच नैगाटिव माँ के गर्भ में पल रहे शिशु को 'आर एच फैक्टर ' पिता से विरासत में मिल सकता है। ऐसे दंपत्ति के आर एच पौसिटिव शिशु होने की सँभावना करीबन 50 प्रतिशत होती है।

पहले गर्भ में (जब शिशु आर एच पौसीटिव हो ),तब भी तकलीफ की गुँजाईश कम ही होती है। माँ के खून से शिशु के खून का संपर्क प्रसव के दौरान ही होता है। इस संपर्क से तात्कालिक कोई हानि नहीं होती। किन्तु शिशु के आर एच पौसीटिव खून के संपर्क में आते ही....माँ की इम्युनिटी कुदरती तौर पर इनसे लड़ने के लिये ऐन्टीबौडी की सेना तैयार करने लगती है। इन ऐन्टीबौड़ी से माँ को कोई हानि नहीं होती। किन्तु अगले गर्भ के समय भी अगर शिशु आर एच पौसीटिव हो तो यह बनी बनाई सेना शिशु पर हमला बोल देती है। यह ऐन्टीबौड़ी इतने सक्षम होते हैं कि शिशु की रक्त कोशिकाओं को तोड़ तितर बितर कर दें। इनके टूटने से बिलीरूबिन की मात्रा शिशु के रक्त में बढ़ने लगती है। नवजात शिशु को गँभीर पीलिया हो सकता है, शिशु के और कभी कभार माँ के जान को भी खतरा हो सकता है।





आर एच नैगाटिव स्त्री ब्लड ट्रान्सफ्यूशन, गर्भपात, और एक्टोपिक प्रेगनैन्सी से भी ऐसी स्थिति तक पहुँच सकती है।

इसका हल क्या है

• जागरुकता- हम सभी को अपना ब्लड ग्रूप मालूम होना चाहिये। अपने जीवन साथी की इस पहचान से अनभिज्ञ नहीं होना चाहिये।
• अगर स्त्री आर एच नैगाटिव है और पुरुष आर एच पौसीटिव तो डॉक्टर से सही समय पर सलाह और इन्जेक्शन लेने की तैयारी और तत्परता होनी चाहिये।।


आर एच इम्यूनोग्लोबिन इन्जेक्शन्स

गर्भ ठहरने के 28 हफ्ते में पहला इन्जेक्शन फिर प्रसव के 72 घंटे के भीतर दूसरा।

यह इन्जेक्शन माँ के शरीर में ऐन्टीबौडीज़ बनने से रोकते हैं। जाहिर है इसे पहले गर्भ मे ही लेना चाहिये। और चूंकि गर्भ में शिशु के ग्रूप पता लगाने की कौम्प्लीकेटड प्रोसीजर से बचना चाहिये ,यह इन्जेक्शन हर आर एच नैगाटिव स्त्री (जिसका पति आर एच पौसिटिव हो), को लेना चाहिये

अगर कुछ कारणों की वजह से यह इनजेक्शन नहीं लिये गये तो डॉक्टर से तुरंत संपर्क करें। ऐसे गर्भ को विशेष ध्यान की जरूरत है। अगर शिशु खतरे में हो तो एक्सचेंज ट्रांसफ्यूशन कर के इस शिशु के खून को आर एच नैगाटिव खून से बदला जा सकता हैं। ऐसा कई बार करने की जरूरत पड़ सकती हैं।

अगर ऐसा कुछ भी नहीं किया जा सका तो शिशु के दिमाग और किडनी पर असर पड़ सकता है। हार्ट फेल ( हृदय के पम्प करने की शक्ति विफल) हो सकता है। रक्त की कमी हो सकती है। गँभीर पीलिया हो सकता है। इन सबसे शिशु की जान जा सकती है।

समस्या गँभीर हो सकती है। पर हल कितना आसान है। ब्लड़ ग्रूप का पता होना। समय पर इंजेक्शन लेना।

किंतु दुख की बात है की भारत में अभी भी अक्सर गर्भवति स्त्री को उसके ब्लड ग्रूप के बारे में नही पता होता। इतनी सुलभता से जो बचाया जा सकता है ....उसे उतनी ही लापरवाही से हम खो आते हैं। जब तक बात पता चलती है तब तक देर हो चुकी होती है।

नवजात शिशु को कितने ही कारणों से खोया जा सकता है।

.....सुना हैं बचाने वाला मारने वाले से ज्यादा बलवान होता है...

पता नहीं......हम कब छोटी छोटी पहल कर बचाने वालों में अपना नाम दर्ज़ करायेंगे?!

Tuesday, 25 March 2008

गर्भ के दौरान मनोवैज्ञानिक परिवर्तन

पोपुलर सिनेमा में गर्भ धारण होने की खबर हिरोईन की बेहोशी के साथ होती है। फिर नब्ज़ पकड़ कर प्रेग्नेन्सी टेस्ट। इसके बाद खुथी की लहर। मिठाई। फिर बहु का चमकता लजीला चेहरा। और उसके बाद लोरी गा कर सुलाती माँ।

किन्तु यह परिवर्तन इतना सहज नहीं है ।

शिशु मनचाहा बदलाव है तो माँ का मन खुश....और नहीं तो तनावग्रस्त रहता है। गर्भ धारण करते ही स्त्री अत्यंत संवेदनशील हो जाती है। हर भाव की अत्युक्ति करना स्वभाव में शामिल हो जाता है। छोटी से छोटी बात रुला देती है, हँसा सकती है, डरा देती है।

गर्भ के समय को तीन महीने के अवधि अनुसार देखा जाये तो तीन भाग में बाँटा जा सकता है।

पहले त्रिमाही भाग में स्त्री अपने में बदलाव महसूस करती है। यह बदलाव बाकियों को नज़र ना भी आये वह लगातार इसका अनुभव करती है। ऐसे में अक्सर पत्नि अपने गर्भ के बारे में भूलती नहीं....और पति को कभी कभार ही याद आता है। कुछ स्त्रियाँ इस समय भावनात्मक स्तर पर बेहद परेशान हो जाती हैं। उल्टियों का होना और शरीर में जल्द होते बदलाव तनाव को और बढ़ा सकता है। कई बार शरीर की तकलीफ तनाव की वजह से भी बढ़ सकती है।

ऐसे में पति का रवैया, सखी सहेलियों का साथ और कामकाज़, गृह गृहस्थि में तनाव का असर स्त्री के स्वभाव पर असर करता है। रियायत और विश्राम काफी हद तक मदद कर सकते हैं।

दूसरे भाग में स्त्री अपने इस नई पहचान की तरफ थोड़ी सहज हो चुकी होती है। बीसवें हफ्ते से शिशु के उदर में हिलने को महसूस कर सकती है। उसे शिशु का अपने से अलग एक अस्तित्व के होने पर विश्वास होने लगता है। इस समय स्त्री का वज़न तेजी से बढ़ता है। उसे अपने सौंदर्य पर और आकर्षण पर संदेह होने लगता है। वह अपने पति को लगातार आँकती है कि उसकी नज़र में वह अब भी खूबसूरत है कि नहीं। अपने जीवन साथी पर उसकी निर्भरता बढ़ जाती है। वह हिम्मत चाहती है कि उसका जीवनसाथी जरूरत में उसके साथ होगा। उसमें रुचि लेगा। उसकी तकलीफ समझेगा। ऐसे में दंपति को एक दूसरे के साथ समय बिताना चाहिये। आगे आने वाले जीवन के बारे में बात करनी चाहिये। दूसरे त्रिमाही भाग में स्त्री में संभोग की इच्छा भी होती है और इससे नुकसान की सबसे कम सँभावना होती है।

तीसरे भाग तक स्त्री काफी हद तक संयत हो चुकी होती है। एक नये जीवन को सँभालने के लिये खुद को सक्षम पाती है। अगर गर्भ के समय उसे बाकी तकलीफ नहीं सहनी पड़ी हो तो वह बाकी लोगों का ध्यान और प्यार का आनंद लेती है। भरी बस में सीट दिया जाना....सभी के आदर से पेश आने से वह महत्वपूर्ण महसूस करती है।

इसी बात का कुछ कामकाज़ी स्त्रियों पर उल्टा असर भी होता है। उनके कार्यक्षमता को कम आँका जाता है। बीमार समझा जाता है। समय आने के पहले ही उनसे महत्व के काम ले लिये जाते हैं।

बाहरी व्यवस्थाओं का उसकी अवस्था पर सीधा असर पड़ता है। उसे किसी दूसरे स्त्री के सानिध्य की जरूरत महसूस होती है जो उसे इन परिवर्तनों की तरफ सहज कर सके।

जैसे जैसे समय करीब आता है उसके संशय बढ़ने लगते हैं।

स्त्री को गर्भवति होने पर साथ, प्यार, सानिध्य और सहानुभूति की जरूरत होती है। इस समय उसकी अतिसंवेदनशीलता को समझना और अनुरूप व्यवहार करना भी आवश्यक है।

दोनो स्त्री और पुरुष इस समय अपने बचपन के दिनों में लौटते हैं। उस समय की किसी बात पर हुई असंतुष्टता फिर उभरती है। अपनी नई पहचान कभी बहुत उल्लासित तो कभी दुखी करती है।

पुरुष अपनी पत्नि के बदले रूप से कम प्रभावित नहीं होता। उसका बदला स्वभाव उसके लिये कभी आश्चर्य तो कभी दुख और तनाव का कारण बनते हैं। स्त्री की अतिसंवेदनशीलता के सामने वह अपने आप को बेबस महसूस करता है। वह खुद अपनी योग्यता पर शक करता है। स्त्री के शारीरिक संरचना में आने वाले बदलाव भी उसको प्रभावित करते हैं।

इस दौरान एक दंपत्ति को लगातार एक दूसरे के साथ और विश्वास की जरूरत होती है।

गर्भवति होने पर अजीबोगरीब सपनों का आना भी सामान्य है। जागते हुए जिन बातों को लेकर संशय या डर होता है नींद में वही सपनों का रूप ले लेते हैं। अधिकतर सपनों में स्त्री को लगता है कि वो कहीं फँस गई है, उसका बच्चा खो गया है, जरूरत में बिल्कुल अकेली रह गई है, कोई उसके बच्चे को नुकसान पहुँचाना चाहता है...वगैरह।
यह सपने बिल्कुल सामान्य हैं। और इनका कोई गूढ़ अर्थ निकालकर उसका निदान करने की जरूरत नहीं है।

एक शिशु का मतलब क्या है.....
कुदरत का यह खूबसूरत करिश्मा जिसमें स्त्री पुरुष की साझेदारी है। ढ़ेर सारा अनुराग, अनुभूतियों का स्रोत....। इतनी मासूमियत की लगता है परम को छू लिया हो....।

एक शिशु का मतलब नींद में खलल, कई बार बीमार पड़ना, लगातार किसी का हम पर निर्भर रहना....सुसु, पौटी.....उल्टी, हिचकी, डकार, बेमतलब, बेहिसाब रोना, हँसना.....

इतने बदलाव के लिये सबसे जरूरी है कि स्त्री और पुरुष एक दूसरे का संबल बन सहजता से इस सौंदर्य को अपने जीवन में सहेजें......
कुछ किलकारियों से...कुछ लोरियों से...घर आँगन में तब हम मासूमियत भर सकते हैं...।



The most important thing a father can do for his children is to love their mother.
– Henry Ward Beecher

Monday, 17 March 2008

फोलिक ऐसिड़ क्यूँ?!

सबसे पहले सबसे अहम बात
अगर शिशु का आग्रह हो तो गर्भ ठहरने के पहले से ही फोलिक ऐसिड. 400 mcg नियमित रोज़ ।

गर्भवति स्त्री को सब तरफ से सलाह और मशवरा मिलता है। ठंडा, गरम, सही, गलत.....बच्चे को सुंदर,सुशील और पता नहीं क्या क्या बना सकने के गूढ़ मंत्र सिखाये जाते हैं।

अगर मुझसे सिर्फ एक सलाह देने को कहा जाये तो मैं फोलिक ऐसिड़ के सेवन की सलाह दूँगी। वजह है।

• यह बच्चे के रीढ़ के विकास में आवश्यक है।
• अक्सर इसकी मात्रा आहार में कम होती है।
• कमी से रीढ और रीढ़ की हड्डी में गंभीर त्रुटि हो सकती है।
• यह किसी में भी हो सकती है।
• इस त्रुटि को 70 प्रतिशत तक मात्र फोलिक ऐसिड़ के सेवन से घटाया जा सकता है।

अक्सर स्त्री को अपने गर्भ की स्थिति के अंदाजे से पहले ही रीढ़ का विकास काफी हद तक संपूर्ण हो चुका होता है। यही वजह है कि गर्भ धारण करने की इच्छा हो तब से ही इसका सेवन शुरु करना जरूरी है।


खुली त्रुटि में दिमाग और/या रीढ़ के साथ हड्डी पर भी असर पड़ता है। रीढ़ और दिमाग का भाग अपनी परत के साथ या बगैर पीठ से बाहर आ सकता है। इन त्रुटियों को न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट के अंतर्गत माना जाता है। सपाइना बाइफिड़ा, मेनिंगोसील, एनेनकेफाली, एनकेफालोसील वगैरह इसके अंतर्गत आते हैं। गले के ऊपर के भाग से कमर के नीचे तक कहीं भी त्रुटि संभव है। त्रुटि की जगह की नसें प्रभावित होती हैं। उन नसों से जो क्रिया जुड़ी होती है वह भी प्रभावित होती है। उदाहरण के तौर पर अगर कमर में त्रुटि हुई तो दस्त और मूत्र का नियंत्रण नहीं रहता। शरीर के निचले हिस्से को लकवा मार जाता है।
जेनेटिक खामी भी इस त्रुटि के रूप में सामने आ सकती है। (ट्राइसोमी 13 और 18) कई बार अगर माँ अपस्मार के लिये दवा ले रही हो या इनसुलिन डिपेंडेंट डाइबेटिस से पीड़ित हो तब भी इस त्रुटि की सँभावना बढ़ जाती है।
गर्भ धारण करने के 28 दिन के भीतर ही यह भ्रूण में स्थापित हो जाती है।

सामान्य जनसँख्या में इस त्रुटि की सँभावना 0.1% होती है यानि की 1000 में से एक में सँभावना होती है।

त्रुटि की जाँच 16-18 हफ्ते में सँभव है।
• माता का सीरम आल्फा फीटोप्रोटीन टेस्ट(16-18 हफ्ता)
• हाई रेसोल्यूशन अल्ट्रासाउन्ड (18 हफ्ता)
• ऐम्नियोसेंटेसिस (15 हफ्ते के बाद)
इन जाँच प्रक्रिया का अपना जोखिम है । इनके लिये मंजूरी देने से पहले इन्हे समझना जरूरी है।
अगर पहले गर्भ में यह कमी पाई गई हो तो दूसरे में इसकी सँभावना और भी बढ़ जाती है। फोलिक ऐसिड़ की मात्रा भी बढ़ाने की जरूरत होती है।

निष्कर्ष यह कि
• शादीशुदा स्त्री को फोलिक ऐसिड नियमित लेना चाहिये।
• गर्भ धारण करने पर भी इसका सेवन जारी रहना चाहिये।
• किसी भी फार्मसी से 400mcg फोलिक ऐसिड़ ओवर द काउंटर मिल सकता है। रोज़ एक नियमित।


शारीरिक संरचना मे कोई भी त्रुटि हो....किसी भी कमी को व्यक्ति या शिशु में त्रुटि नहीं माना जा सकता। सभी त्रुटियों और कमियों के बावजूद....अगर किसी जीव में जीवन है तो वह अलग हो सकता है किन्तु संपूर्ण है।

कुदरत का ऐसा कोई निर्णय अगर हमारे हाथ आ जाये तो उसे स्वीकार कर परवरिश करना माता पिता का कर्तव्य ही नहीं....माता और पिता के अर्थ को सार्थक करने के लिये जरूरी भी है।

Sunday, 16 March 2008

सिज़ेरियन से प्रसव

कुदरती तरीके से हुए शिशु कुदरत की हिफाजत में संसार में आ जाते हैं। किन्तु कुछ कारणों की वजह से सीज़ेरियन का विकल्प रखना पड़ता है। सीज़ेरियन से हुए शिशु का सफर अलग होता है। नौ महीने माँ की कोख में पलने के बाद....जब एक शल्यक्रिया का निर्णय लिया जाता है तब कुदरत की बागड़ोर कुछ इंसानों के हाथ चली जाती है। कई बार जरूरी और कई बार बिना किसी खास अनुरूप तर्क के यह विकल्प चुना जाता है।

जब शिशु योनिमार्ग से नहीं गुजरता तो उसके फेफड़े का पानी ठीक से नहीं निचुड़ पाता। कुछ शिशु यह सामान्य तरीके से सहन कर लेते हैं। कुछ की साँस ज्यादा चलने लगती है। शिशु को इससे तकलीफ हो सकती है। इस स्थिति को ट्रान्सियन्ट टैकिप्निया ऑफ न्यूबॉर्न कहते हैं। योनिमार्ग से नहीं निकलने की वजह से सर पर कोन(कैपुट) भी नहीं बनता है।

सीज़ेरियन एक अहम शल्यक्रिया है। अन्य किसी भी शल्यक्रिया की ही तरह इसमें उतना ही खतरा है। यह खतरा कोई सर्जीकल या अनेस्थेटिक कौम्प्लीकेशन, करने वाले डॉक्टर के हुनर की कमी, बच्चे में किसी त्रुटि या फिर स्त्री के शरीर के किसी प्रतिकूल अनुक्रिया की वजह से हो सकती है। किन्तु जब यह आवश्यक हो तब माँ और शिशु दोनों के लिये जीवनदायिनी भी है।


जब भी योनिमार्ग से प्रसव का विकल्प शिशु या माँ के जीवन को खतरा बन सकता हो तब इस विकल्प का चुनाव किया जाता है।

विशेष कारण
• बहुमूल्य गर्भ
• दीर्ध एवं विषम प्रसव
• विपत्ति में शिशु ( फीटल डिस्ट्रस)
• विपत्ति में माता ( मैटर्नल डिस्ट्रस)
• समस्या जैसे प्री एकलम्पसिया( अधिक रक्तचाप), हर्पिस
• आपत्ति जैसे कि नाल का उतरना(कौर्ड प्रोलैप्स), उदर पर चीर पड़ना
• एक से अधिक गर्भ
• अस्वाभाविक गर्भस्थिति
• विफल गर्भ प्रवेशन
• सहायक विफल प्रसव (फेल्ड इन्स्ट्रूमेन्टल डेलिवरी)
• बड़ा शिशु
• आंवल संबंधित त्रुटि
• नाल संबंधित त्रुटि
• संविदागत(कोन्ट्राक्टड) पेल्विस

जैसे जैसे चिकित्सा ज्ञान ने प्रगति करी है,वैसे वैसे सीज़ेरियन सुरक्षित होता गया है। किन्तु जिस गति से इस हुनर का विकास हुआ है उससे काफी अधिक गति से इसके संख्या में वृद्धि हुई है। करीबन दस से पचास प्रतिशत प्रसव अब सीजेरियन से होने लगे हैं।

सोच कर थोड़ी हैरानी होती है कि अचानक इतनी वृद्धि के पीछे क्या शिशु और माँ के स्वास्थ्य और जीवन का लाभ ही है।

कारण कई हैं-
• सुविधा का सुलभ होना
• कारणों का गलत आंकलन
• डॉक्टर्स का ज्यादा फीस लेना का तरीका
• दर्दी का योनिमार्ग से प्रसव करने से इंकार
• महुरत और फैशनेबल ट्रैन्ड

वजह जो भी हो यह एक अत्यंत चिंता का विषय है। कुदरत का हाथ बँटाना और उसके साथ खिलवाड़ करना दो अलग बातें हैं। सीजेरियन से जन्मे बच्चों में शर्तिया तकलीफ अधिक होने की सँभावना ज्यादा होती है। यह तकलीफ इनफेक्शन, खून का अधिक बहाव, अगले गर्भ में तकलीफ, उदर में चीर पड़ने की सँभावना....वगैरह कुछ भी हो सकती है। वैसे भी आज भी कुदरत इंसान से अधिक निपुण है।

फिर रिमोट कंट्रोल हमारे हाथ में नहीं है। जहाँ कुदरती तरीके से प्रसव हो वहाँ कुदरत ध्यान रखती है कि शिशु प्रसव के बाद रोये, माँ आंवल के बाहर आते ही शिशु को दूध देने में सक्षम हो, माँ का स्तन भी उपयुक्त समय पर भर जाता है।

जब यह कंट्रोल इंसान के हाथ आता है तो सब कुछ हमेशा निर्विघ्न नहीं हो पाता।

सिज़ेरियन के पश्चात माँ को एक शल्यक्रिया के बाद मिलने वाली चौकसी की जरूरत होती है। दो हफ्ते तक माँ स्वतंत्र रूप से शिशु को देखने में पूरी तरह समर्थ नहीं होती। उदर और पेट पर जो चीर पड़ता है , वह भी भरने में समय लेता है।

सिज़ेरियन के बाद एक माँ कुदरती प्रसव और सिजेरियन...दोनो की तकलीफ सहती है। जहाँ सामान्य प्रसव एक फिसियोलौजिकल प्रोसेस है....सिज़ेरियन एक कृत्रिम अवस्था है....जिसकी जटिलताओं का ज्ञान आवश्यक है।

अपने डॉक्टर का चुनाव हमेशा सोच समझ कर करना चाहिये। डॉक्टर का समय पर सही फैसला लेने के लिये सचेत रहना जरूरी है....किन्तु व्यर्थ में कुदरती क्रिया में हस्तक्षेप गलत है।

दर्दी और उसके साथ के लोग अक्सर भावनात्मक स्तर पर ऐसे समय में इतने कमज़ोर होते हैं कि कई बार एकदम सही फैसला नहीं कर पाते।

एक चिकित्सक लेकिन संयत होना चाहिये कि सोच समझ सके कि उसके निर्णय का असर दर्दी पर क्या होगा-

Surgeons must be very careful
When they take the knife!
Underneath their fine incisions
Stirs the Culprit - Life!
~Emily Dickinson

Thursday, 13 March 2008

उत्पत्ति

नौ महीने का सफर समाप्त होते होते शिशु स्वतंत्र रूप से साँस लेने में सक्षम होता है। उसकी शारीरिक संरचना बाहर की दुनिया में आकर जीवित रहने के लिये पूर्ण। किन्तु कोख के अंदर से बाहर की यात्रा किसी भी दृष्टिकोण से एक दिलचस्प घटनाचक्र है। हिन्दी पिक्चरों में दिखाई जाने वाली इमोशनल प्रसव पीड़ा के बिहाइन्ड द सीन्स इतना कुछ हो रहा होता है कि हर बात अगर रेकार्ड की जाये तो एक पूरा उपन्यास लिखा जा सकता है।

हर मनुष्य की इससे अहम और मुश्किल यात्रा शायद ही कोई और हो। एक बेहद संकरा रास्ता, जीवन की खोराक पहुँचाने वाली धमनियों से अलगाव, स्वतंत्र साँस की शुरुआत और बेहद तेजी से होता आंतरिक बदलाव।


स्पर्श की तपिश की पहली चाह और माँ का वात्सल्यपूर्ण साथ।
माँ जो खुद शारीरिक और मानसिक बदलाव से गुजर रही है। शिशु को जन्म देने की पीड़ा और अपने जीवन से एक अलग अस्तित्व में देखने की अनुभूति....
एक ऐसा समय जब माँ और शिशु दोनों को शिशु के पिता के साथ और आश्वासन की जरूरत होती है। पिता के लिये भी भावनात्मक जुड़ाव बनाने का महत्वपूर्ण समय।
जन्म से पहले फेफड़े पानी से भरे होते हैं। औक्सीजन की आवश्यकता माँ नाल से पूरी करती है। अशुद्ध खून की सफाई भी आंवल(placenta) मे ही होती है। जब शिशु संकरे से योनिमार्ग से गुजरता है तो फेफड़ों से पानी निचुड़ जाता है। बाहर पहुँचे शिशु की नाल काट दी जाती है। एक ऐसा क्षण जो माँ से अलगाव और पहली साँस के बीच गुजरता है। लगातार घटता औक्सीजन, तापमान और रोशनी में परिवर्तन, स्पर्श और फेफडों में बढ़ने वाला नेगैटिव प्रेशर, इनका संयुक्त प्रभाव शिशु को साँस लेने की पहल करने को उकसाता है।
फेफड़ों का साँस लेना सीखना एक अत्यंत जटिल प्रकरण है।
नये अंकुरित पौधे को नई ज़मीन में रोपने जैसा। इस दौरान जड़े उखड़ जाती हैं और ज़मीन बदल जाती है।

इससे पहले कि हम शिशु में होते बदलाव जानें हमें एक सामान्य हृदय के कार्यप्रणाली से परीचित होना होगा। हृदय नाशपति के आकार का एक मांसपेशीय अव्यय है | दो फेफड़ों के बीच स्थित , शरीर के विभिन्न भागों में रक्त पहुँचाने के लिये जिम्मेदार होता है | यह चार प्रकोष्ठों मे बटाँ होता है। दाँये भाग में अशुद्ध (डिऔक्सीजनेटड) रक्त होता है और बाँये भाग में शुद्ध(औक्सीजनेटड)। दाँये और बाँये भाग ऐट्रियम और वेन्ट्रीकल में बँटे होते हैं। रक्त का प्रवाह एट्रियम से वैन्ट्रीकल( एक ही दिशा) में संभव है। दाँये भाग में ऐट्रियम और वेन्ट्रीकल के बीच ट्राइकस्पिड वाल्व होता है। और बाँये भाग में ऐट्रियम और वेन्ट्रीकल के बीच बाइकस्पिड वाल्व होता है। दाँये भाग में वैन्ट्रीकल से अशुद्ध रक्त फेफड़ों तक पलमनरी आर्टरी से पहुँचता है। वहाँ से शुद्ध होकर पलमोनरी वेइन्स से बाँये ऐट्रियम में लौटता है। ऐट्रियम से वेन्ट्रीकल फिर एओर्टा से शरीर के सभी हिस्सों तक । वहाँ औक्सीजन पहुँचा कर सुपीरियर और इनफीरियर वीना कैवा से दाँये ऐट्रियम में अशुद्ध रक्त पहुँचता है।

हाँ थोड़ा पेचिदा है।

लेकिन सोचने की बात है कि कुछ ही क्षणों में बिल्कुल काम नहीं करते हुए फेफड़े अचानक काम करना कैसे शुरु करते हैं।

जन्म पू्र्व शिशु में जो बातें अलग होती हैं-
नाल और आंवल के बीच की धमनियाँ अशुद्ध रक्त पहुँचा कर शुद्ध रक्त वापस ले जाती हैं।

• डक्टस आर्टिरियोसस- पलमनरी आर्टरी और एओर्टा के बीच
• फोरामेन ओवेल-दोनो वेन्ट्रीकल के बीच एक छेद।
• डक्टस विनोसस- जिगर(लिवर) और इनफीरियर वीना कैवा के बीच
• अंबीलीकल वेइन- नाल से शिशु के लिवर तक
• अंबिलिकल आर्टरी- शिशु से आंवल तक
इतनी धमनियों को जन्मउपरांत बंद हो जाना पड़ता है। और सामान्य हृदय की कार्यप्रणाली तक पहुँचना पड़ता है।
जानती हूँ कि समझने में बहुत आसान नहीं है। लेकिन इतने जटिल बदलाव करने के लिये निमिष मात्र का समय होता है। कहीं कोई छोटी सी चूक और वह हृदय के संरचना में त्रुटि के रूप में उभर आती है।


इतने बदलाव के बाद होता है बच्चे का पहला रूदन.....पहली साँस.....
पता नहीं क्यूँ फिर सभी हिन्दी पिक्चरों के सीन्स याद आ गये। जी हाँ...पहला रूदन वाकई खुशी की बात है....कुदरत के एक चमत्कार के संपूर्ण होने के उद्घोष जैसा....

कभी लगता है कुदरत ने हम में से हर एक के ऊपर कितनी मेहनत की है । कई बार जितना मोल आंक कर हमें कुदरत ने जीवन दिया है...हम उससे बहुत नीचे के स्तर पर जीवन निर्वाह करते हैं।



और माँ .... बीज, मिट्टी और हवा....तो जीवन है...