Monday, 16 June 2008

सेरिब्रल पाल्सी (प्रमस्तिष्कीय लकवा)

http://www.youtube.com/watch?v=P8xOA8AXOVw



आज जिस विषय पर बात होगी वह है सेरीब्रल पाल्सी। यह विषय मेरे दिल के बेहद करीब है। और मैं मानती हूँ कि भले ही हमारा कोई अपना इस से ग्रसित हो कि नहीं हमें इसके बारे में जानना चाहिये। भगवान ने हमें बहुत सारी सौगातों से नवाज़ा है...इस बात का अंदाज़ा सबसे अधिक मुझे ऐसे बच्चे के सामने होता है। ऐसे बच्चे के सामने इस बात का भी अंदाज़ा होता है कि इतनी परिमितता के बावजूद यह नन्हे फरिश्ते अपार स्नेह और कोशिश के काबिल होते हैं ।आज की यह पोस्ट इन बच्चों को समर्पित....जिनके लिये मेडिकल साइंस बहुत कम कर सका है लेकिन जिन्होने जीवन के अमूल्य स्पंदन से मुझे अवगत कराया है।

क्या कभी अपनी माँ से अपने पहले कदम या पहले शब्द के बारे में पूछा है....शायद माँ ने बताया हो....

सेरीब्रल पाल्सी से ग्रसित बच्चे की माँ वह लम्हा कभी भूल नहीं सकती..ना जाने कितने इंतज़ार और तप के बाद नसीब होता है एक ऐसा खूबसूरत सा लम्हा...जिसे हम हमारे जीवन का साधारण और स्वाभाविक पड़ाव मानते हैं।
इन बच्चों में से कुछ व्हील चेयर का इस्तेमाल करते हैं,कुछ बैसाखी का, कोई ठीक से बात नहीं कर सकता तो कई खुद को किसी भी तरह व्यक्त करने में असमर्थ होते हैं।
हज़ारों की सँख्या में शिशु और बच्चे इससे हर साल ग्रसित हो जाते हैं। यह संक्रामक नहीं होता। पर यह लकवा है जो दिमाग और शरीर को मार जाता है।
ऐसे बच्चे का इसकी माँस पेशियों पर इच्छित नियंत्रण नहीं होता। मस्तिष्क ही हमें कौन सा काम, किस समय, किस तरह करना है बताता है। चूँकी सेरिब्रल पाल्सी (प्रमस्तिष्कीय लकवा) मस्तिष्क पर असर करता है , जिस हिस्से पर असर होता है उससे उसका प्रभाव निर्धारित होता है। अत: ऐसा बच्चा खाने पीने,खेलने कूदने, चलने -उठने मे असमर्थ हो सकता है।

सेरिब्रल पाल्सी (प्रमस्तिष्कीय लकवा) के प्रकार





http://www.youtube.com/watch?v=xXXH2a-thB4&feature=related




तीन प्रकार


स्पास्टिक


इससे ग्रसित बच्चा अपनी माँस पेशियों को ढ़ीला छोड़ने में असमर्थ होता है। माँस पेशियाँ सिंकुड़े हुए अवस्था में लगातार रहती हैं।

अथीटोइड

इससे ग्रसित बच्चा अपनी माँस पेशियों पर सही नियंत्रण नहीं रख पाता। लिहाजा ग्रसित माँस पेशियाँ अचानक से फड़फड़ा सकती हैं,उनमें कोई हरकत हो सकती है।

अटैक्सिक

इससे ग्रसित बच्चा संतुलन और सही तालमेल नहीं बना पाता।

मस्तिष्क का कितना और कौन सा हिस्सा ग्रसित हुआ है निर्धारित करता है कि बच्चे को तकलीफ कितनी होगी। अगर दोनो हाथ और पैर पर प्रभाव पड़े तो व्हील चेयर की आवश्यकता पड़ सकती है,अगर दिमाग का जो हिस्सा वार्तालाप का नियंत्रण करता है ग्रसित हो तो बच्चे के बात करने की क्षमता पर असर पड़ता है।

सेरिब्रल पाल्सी (प्रमस्तिष्कीय लकवा) के कारण


सही सही कारण ज्ञात नहीं है। कई बार जन्म के समय शिशु के मस्तिष्क पर आघात कारण बनता है। कई बार समय से पहले शिशु के प्रसव होने की वजह से अपूर्ण विकास कारण बनता है। जन्म पश्चात शिशु को हुई कोई तकलीफ की वजह से ऐसा हो सकता है। पर फिर भी अक्सर जन्म पूर्व मस्तिष्क को पहुँची हानि ही इसका कारण बनती है। इसकी कोई खास वजह अभी तक ढूँढ़ी नहीं जा सकी है।


डॉक्टर की भूमिका


डॉक्टर इसका निदान करने में सहायक होता है। इस बात का पता लगाता है कि शिशु किसी और रोग की वजह से ऐसा नहीं है। रोग के तीव्रता और असर का सही अंदाज़ा लगाता है। और बच्चे और माता पिता को इससे जूझने में मदद करता है। छोटी छोटी बातें, कुछ दवाइयाँ, कसरत, सही सहायक उपकरण, सीखने और सिखाने में मदद करता है। माँस पेशियों की विभिन्न तकलीफ को समझ उपयुक्त उपाय किया जाता है।

शिशु के करीबन अठारह महीने होने तक इस रोग की पुष्टी की जा सकती है। विकास की सीढीयों में कुछ असामान्य या देरी होना इसका परिचायक होते हैं।

सेरिब्रल पाल्सी (प्रमस्तिष्कीय लकवा)के साथ जीना

इस रोग से ग्रसित होना या ऐसे बच्चे की देखरेक करना काफी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।बच्चे के मस्तिष्क का दोष समय के साथ बिगड़ता नहीं है बल्कि ज्यों का त्यों रहता है। किंतु लगातार माँसपेशियों में तनाव या दूसरी तकलीफ की वजह से स्थिति बिगड़ सकती है। इसीलिये ऐसे बच्चे को उपचार की जरूरत होती है। यह उपचार शारीरिक, मानसिक, वाक शक्ति पर केंद्रित हो सकती है। कई बार शल्य क्रिया की भी जरूरत पड़ सकती है।

सेरिब्रल पाल्सी के होने का मतलब बच्चे के सार्थक जीवनयापन करने में असमर्थ होना नहीं है। यह बच्चा सोच सकता है, महसूस कर सकता है, समझ सकता है, दोस्त बना सकता है, खेलना चाहता है, हँस सकता है.....। हाँ उसकी अपनी सीमायें हैं....और बाकी बच्चों से फरक भी।

यह बच्चे और इनके माता पिता हमसे स्वीकृति चाहते हैं, थोड़ी संवेदनशीलता ...थोड़ी सी मदद और इनके बारे में थोड़ी सी समझ। वे अपनी खुद की जगह पूर्ण अधिकार से लेना चाहते हैं। जितनी कोशिश से वे अपनी बात कहते हैं...वे चाहते हैं कि हम थोड़े धीरज से उन्हे सुन लें। उन्हे अवसर दें और स्नेह भी।

पता नहीं क्यों पर हमेशा उनसे जो स्नेह मिला है हमेशा दिल भर गया है। आठ साल के पुलकित के असंतुलित हाथ से बने फूल और उनसे लिखे डगमगाये अक्षरों में मेरा नाम....उसकी वॉकर पर टिकी काया और चश्मे के पीछे से मुस्कुराता चेहरा...
ऐसे में जीवन से कई शिकायतें यूँ ही पिघल गई है ...और रूह आनन्दित हुई है।

http://www.youtube.com/watch?v=FDB8dCag3yk&feature=related




The videos here have been used solely for educational purposes.

Thursday, 29 May 2008

शिशु की त्वचा- भाग 2

पिछली कड़ी के आगे

डायपेर रैश



डायपेर रैश - नाम से ही जाहिर है कि डायपेर पहनने की वजह से और उस जगह पर होता है जहाँ डायपेर त्वचा के संपर्क में आता है। यह लाल और दुखदायी होता है। मलमूत्र से भीगा हुआ डायपेर जब काफी समय तक त्वचा के संपर्क में रहता है तो त्वचा पर इस तरह असर होने लगता है। ऐसे में शिशु को सूखा रखना (खास तौर से कूल्हा और प्राइवेट (गुप्त) भाग)बेहद जरूरी है। कई बार बैक्टीरिया और यीस्ट के चेप से भी हो सकता है। दो तीन दिन में अगर ठीक ना हो तो डॉक्टर को दिखाना चाहिये। साधारण तौर पर पावडर लगा कर, सही समय पर डायपेर बदल कर, कुछ समय शिशु को खुला रख हवा लगने देना चाहिये। जिस क्रीम में ज़िक ऑक्साइड हो वह फायदा करती है।


एटोपिक डर्मटाइटिस



यह एक तरह की स्किन अलर्जी है। अक्सर ऐसे शिशु के परिवार में किसी ना किसी को अलर्जी की शिकायत होती है। कुछ भाग पर त्वजा बेहद नाजुक, सूखी होती है और यहाँ खुजली उठती है। यह गालपर, कुहनियों और घुटनों के पीछे और कई बार शरीर में पूरी जगह हो सकती है। खाने में , पहनने में, लगाने में.....किसी में भी कोई ऐसी चीज़ हो सकती है जिससे शिशु में तकलीफ शुरु हो। ठंड के मौसम में तकलीफ के बढ़ने की आशंका रहती है। जिस शिशु में यह तकलीफ है उसके और उसके माता पिता के लिये इससे जूझना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। सही समय पर सही निदान, सही और पर्याप्त उपचार और बचाव महत्वपूर्ण है। इस पोस्ट में इस विषय में और कहना मुश्किल होगा किंतु सही निदान और पर्याप्त उपचार-ना कम ना ज्यादा- आवश्यक बातें है।


नवजात शिशु में पीलिया


माँ और शिशु के ब्लड़ ग्रूप के अलग होने की वजह से जो पीलिया होता है उसके बारे में पहले ही लिख चुकी हूँ।

पीलिया सामान्य तौर पर दूसरे तीसरे दिन दिख सकता है और एक हफ्ते तक रह सकता है। शिशु की आँखों में पीलापन गँभीर पीलिया ना होने पर भी दिख सकता है। इसमें चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है। अगर शिशु सचेत है, बराबर दूध पी रहा है, पेशाब समय से कर रहा है तो चिंता की आवश्यकता नहीं है।

पीलिया होने पर धूप में शिशु को रखने की जो सलाह चली आ रही है वह गलत है। जिस वेवलैंग्थ की लाइट इस पीलिये पर असर कर सकती है वह साधारण धूप में नहीं मिल सकती। बल्कि धूप में शरीर के पानी के सूखने की वजह से पीलिया और बिगड़ सकता है।


जन्मचिह्न

नवजात शिशु में विविध प्रकार के जन्मचिह्न देखे जा सकते है। इनमें से कुछ ,थोड़े बरसों बाद गायब हो जाते हैं और कुछ जीवन भर रहते है।

कफै उ लैट



चाय कॉफी के गिरने के बाद जैसा निशान होता है। एक दो से अधिक या बड़े निशान को डॉक्टर को दिखाना जरूरी है। कभी कभार यह किसी और कमी की तरफ इशारा कर सकता है।

पोर्ट वाइन स्टेन



यह बड़े, बिना उभरे गहरे लाल या जामुनी धब्बे होते है। बहुत सारी शिराओं के त्वचा के नीचे इकट्ठा होने से यह बनते है। यह लुप्त नहीं होते।


स्ट्राबेरी हिमैन्जियोमा





स्ट्राबेरी की तरह दिखने वाले यह चिन्ह बहुत छोटे से बहुत बड़े तक हो सकते है। लाल रंग के उभरे हुए निशान होते है। असामान्य रक्तप्रवाह की वजह से यह बनते है। इसकी वजह से त्वचा फूलने लगती है और लाल दिखती है। यह जन्म के बाद बड़ने लगते है और अक्सर दस बरस तक गायब भी हो जाते है। अगर यह निशान चेहरे पर है, आँखों के पास है , नज़र पर असर करें है तो इसे उपचार की आवश्यकता है। अगर निशान लगातार बड़ रहा हो तो डॉक्टर को दिखाना आवश्यक है।

कैवर्नस हिमैन्जियोमा

काफी कुछ स्ट्राबेरी हिमैन्जियोमा की ही तरह होते है। इसमें त्वचा के नीचे की कई परतें भी अन्तर्ग्रस्त होती है। यह पहले बरस में बड़ कर पाँच से बारह बरस तक में लुप्त हो जाती है। कभी चाहो तो शल्यक्रिया से निकाली भी जा सकती है।


कब डॉक्टर को मिलें

-शिशु के व्यवहार में अंतर महसूस करें
-अगर किसी चेपी रोग के लक्षण महसूस हो
-निशान में दर्द इठे, सूजन आ जाये या गरम महसूस हो
-मध्य से लाल रेखायें जाती हुई दिखने लगे
-परू भर जाये
-गले, बगल या पेट और जाँघ के बीच के भाग में गिलटी उभर आये
-बुखार हो
-डायपेर रैश के दो तीन दिन तक ठीक ना होने पर
-कोई और नया चिन्ह उभरने पर

शिशु की त्वचा बेहद नाजुक होती है। कई परेशानियाँ महज उपयुक्त बचाव से सुलझ सकती है। बाकी जिन्हे इलाज की जरूरत है वह जादू टोना से नहीं सुलझ सकती। त्वचा का सही इलाज करवा पाना भी एक मुश्किल काम है। क्योंकि अक्सर यह धैर्य माँगती है....जो हममें नहीं होता....

कई बार ऐसे शिशु के माता पिता में हीन भावना पनप जाती है जो बिल्कुल जायज़ नहीं है। जरूरत है ऐसी स्थिति में विवेक और संवेदना की....

और अपनी सुंदरता की परिभाषा पर पुनर्विचार करने की.....





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Tuesday, 27 May 2008

ज़रा मुस्कुरा दो

ब्लॉग जगत में हर विवाद के बीच में कुछ कहने का मन हुआ है....आज सिर्फ अनुरोध है...ज़रा मुस्कुरा दो...एक मौका जिंदगी को दो...एक मासूमियत को... थोड़ी हँसी बहने दो....




(http://www.youtube.com/watch?v=mnbY2jALfqI)

कहीं सुना था....
If you HAVE to make a choice between being kind and being right....choose kindness

अगर कभी चुनाव के लिये दो ही विकल्प हो- सही साबित होना या उदार होना...उदारता चुनो

स्नेह से रहना और संयत होकर अपनी बात कहना इनके लिये तो मुश्किल नहीं लगता....

Monday, 26 May 2008

शिशु की त्वचा- भाग 1



टीवी और विज्ञापन में शिशु की त्वचा देखकर मन होता है काश ऐसी त्वचा हम सब को मिली होती। हर दूसरा तीसरा कॉस्मेटिक प्रोडेक्ट वादा करता है की आपकी त्वचा को फिर से शैशव की ताज़गी देगी। लेकिन जानकर अचरज होगा की शिशु की त्वचा में सामान्य तौर पर ही भिन्नता नज़र आती है। कई बार पर्याप्त ज्ञान ना होने की वजह से इन्हे रोग समझ इनका उपाय ढूँढा जाता है। कई बार इन उपायों से नुकसान ज्यादा और फायदा कम होता है।
आज ज़रा देखें सुंदरता स्किन डीप होती है या इसके और मायने हैं....

क्रैडल कैप



शिशु के सर पर जमी पपड़ी को क्रैडल कैप कहते हैं। यह शिशु के सर की त्वचा के छिल कर निकलने का लक्षण है। कई वजह समझाई जाती है लेकिन यह शिशु को नुकसान नहीं पहुँचाती। अक्सर थोड़ा तेल मालिश और स्नान से धीमे धीमे त्वचा ठीक हो जाती है। अगर पपड़ी बहुत ज्यादा है या निकल नहीं रही हो तो डॉक्टर की सलाह लेकर खास शौम्पू और औइन्टमेन्ट इस्तेमाल करना पड़ सकता है। कई बार यह महीनों तक रह सकती है। सही उपाय से हफ्ते में ठीक भी हो सकती है।


एरीदिमा टॉक्सीकम



जन्म लेने के दूसरे दिन से शरीर के ऊपर लाल धब्बे नज़र आ सकते हैं। यह शरीर में कहीं भी हो सकते है सिवाय हथेली और पाँव के तलुओं के। कई बार इन के बीच की जगह में पीली छोटी फुँसियों सी निकली होती हैं। यह नवजात शिशु में अक्सर देखा जा सकता है । पहले एक दो हफ्ते बाद यह आप ही चले जाते हैं। सामान्य है इसीलिये जाहिर है इनके लिये कुछ भी करने की जरूरत नहीं है।


मीलिया



यह बहुत छोटे सफेद मोती के रंग के मुँहासों की तरह शिशु के माथे, गाल और नाक पर हो सकते है । इनके बनने का कारण सीबम (चिकनाई बनाने वाले) ग्लैंड्स का अधूरा विकास है। इस वजह से सीबम या चिकनाई छोटे छोटे मोतियों से जमा हो जाते है। कुछ हफ्तों मे यह आप ही चले जाते है। इनके साथ छेड़कान नाकरने में ही समझदारी है।

मंगोलियन स्पॉट्स


मंगोलियन स्पॉट्स नीले, थोड़े हरे या स्लेटी रंग के निशान है जो उभरे नहीं होते। यह शिशु के पीठ और कूल्हे पर नज़र आता है। कुछ कुछ घाव के बाद पड़े नीले निशान जैसा। यह अफरीकन और एशिया के शिशुओं में सामान्य तौर पर देखने को मिलता है। जैसे जैसे शिशु बड़ा होता है यह निशान हल्के पड़ जाते है लेकिन पूरी तरह से गायब नहीं होते।
हाँ ,रोग तो ये बिल्कुल नहीं है।


पुस्चूलर मेलोनोसिस



पुस्चूलर मेलोनोसिस छोटे छोटे फफोलों की तरह उभरते है। जल्द ही सूख कर गिर जाते है। पीछे थोड़े गहरे रंग के निशान छोड़ते है। अक्सर काले शिशु में ज्यादा देखने को मिलते है।

मीलियारिया



मीलियारिया उभरे हुए द्रव से भरे छोटे फोफले होते है। यह द्रव साफ अथवा दूध सा सफेद होता है। यह पसीने की ग्रंथि के बंद होने की वजह से बनते है। यह अपने आप ही ठीक हो जाते है।

जाहिर है की उपरोक्त किसी भी बात के लिये परेशान होने की जरूरत नहीं है। इनमें से कोई भी रोग का लक्षण नहीं है। किंतु सुंदरता और शिशु के त्वचा को लेकर जो सामान्य धारणा है उससे भिन्न है। पहली बार बने माँ बाप अक्सर यह देख कर तनाव में आ जाते है। और जो समस्या ही नही उसके लिये उपाय ढूँढ़ते है।

चाहे आपके शिशु की त्वचा आपके परिभाषा अनुरूप प्रवीण ना भी हो....शिशु सुंदर ही है....

Afterall beauty is DEFINITELY NOT skin deep !!!






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Saturday, 10 May 2008

नवजात शिशु के सामान्य रिफ्लेक्सस एवं इनका महत्व

कुछ रिफ्लेक्सस नवजात शिशु में जन्म से ही पाये जाते है। यह प्रारम्भिक रिफ्लेक्सस शिशु जब उदर में होता है तब विकसित होते है। जन्म के समय इनका पूर्ण विकास होना आवश्यक है। जन्म के तीन माह पश्चात से बारह माह तक दिमाग का उच्चतर केन्द्र इन पर नकारात्मक दबाव ड़ालता है और इन पर वाँछित नियंत्रण विकसित करता है। जन्म के वक्त इनका होना शिशु के जीवित रहने के लिये जरूरी है।

इन रिफ्लेक्सस की अपनी समय सारिणी है। माता पिता को इसका थोड़ा बहुत ज्ञान होना आवश्यक है। इस समय सारिणी से अलग जब भी कोई महत्वपूर्ण फेर शिशु में दिखे तो चेतना आवश्यक है। सही समय पर छोटी बातों पर ध्यान आ जाये तो बड़ी मुसीबते बड़ी उलझने बनें इससे पहले उनका कोई उपाय किया जा सकता है।

इन रिफ्लेक्सस में उल्लेखनीय है चूसना, निगलना, आँखें मीचना, मलमूत्र क्रिया, हिचकी आना...वगैरह। जैसा की पहले भी बताया इनका होना शिशु के जीवित रहने के लिये अत्यावश्यक है।

शिशु का उदर में विकास संपू्र्ण होने के लिये उसे उदर में 37 हफ्ते से 40 हफ्ते तक बिताने जरूरी है। ऐसे शिशु के प्रसव को फुल टर्म डेलिवरी कहते हैं।

जन्म होते ही शिशु को पाँच बड़े बदलाव से सामना करना पड़ता है-
• शिशु जो उदर के अंदर जलचर होता है वह पहली बार स्वतंत्र साँस लेता है।
• पहली बार खुराक मुँह से लेकर पचाना सीखता है
• मलमूत्र क्रिया पहली बार संपन्न करता है
• अपने शरीर का तापमान बनाये रखता है
• रक्त से निरंतर खुराक मिलने की जगह भोजन अंतराल पर मिलने की आदत ड़ालता है


शिशु के लिये यह बदलाव छोटे नहीं है। इस बदलाव से सहजता से गुजरने के लिये रिफ्लेक्सेस जरूरी है।

दिमाग, रीढ़ और नसों की व्यवस्था सही तरह से विकसित होने का एक महत्वपूर्ण लक्षण है सामान्य रिफ्लेक्सेस का होना।

ऱिफ्लेक्स को टेस्ट करने की क्रिया को स्टिमुलेस और उस स्टिमुलेस की प्रतिक्रिया को रेस्पौन्स कहते हैं।

रूटिंग रिफ्लेक्स
इस रिफ्लेक्स को पर्दर्शित करने के लिये शिशु के गाल पर या मुँह के कोने पर हल्का सा सहलाने पर शिशु तुरंत मुँह फेर कर सहलाये गई जगह की तरफ मुँफ फेर कर और खोलकर स्टिमुलेस की तलाश करने लगता है। अक्सर यह माँ के स्तन के छूने पर होता है। और स्तन से संपर्क में आते ही शिशु तुरंत मुँफ फेर कर,स्तन तलाश , मुँह खोल स्तन को मुँह में ले लेता है। यह रिफ्लेक्स पैदाइशी रहता है और तीन चार माह जन्म पश्चात गायब हो जाता है।




सक्खिंग रिफ्लेक्स (चूसना)

इस रिफ्लेक्स को पर्दर्शित करने के लिये उँगली से शिशु के तालू में सहलायें तो शिशु तुरंत उँगली चूसने लगता है। यह क्रिया तुक में और बलपूर्वक तरीके से की जाती है। चूसने के बाद निगलने की कर्िया शामिल है।रूटिंग रिफ्लेक्स की ही तरह यह भी पैदाइशी रहता है और तीन चार माह जन्म पश्चात गायब हो जाता है। जाहिर है कि इससे शिशु माँ का दूध चूस पाने में सक्षम होता है।



मोरोस रिफ्लेक्स

शिशु जब अपने पीठ के बल लेटा हुआ हो तब कोई अचानक से की गई ऊँची आवाज़ या गरदन पर दिया सहारा आकस्मिक तरीके से छोड़ने की प्रतिक्रिया में शिशु सहसा ही अपना सर हिला देता है।शिशु अपने दोनो हाथ और पैर पहले फैला देता है और फिर मोड़ लेता है। अंत में शिशु चिल्ला कर रो पड़ता है।शरीर के दोनो भागों में अगर यह प्रतिक्रिया एक समान ना हो तो घ्यान देना और चिकित्सक के ध्यान में लाना जरूरी है।

अगर यह रिफ्लेक्स शिशु में नहीं हो तो शिशु की जाँच आवश्यक है क्योंकि इसका इशारा नसों या दिमाग में कमजोरी की तरफ हो सकता है।



ऐसा ही एक और रिफ्लेक्स है टोनिक नेक रिफ्लेक्स

Tonic Neck Reflex


यह लगभग छह सात महीने तक गायब हो जाता है। इसके गायब होने पर ही शिशु घुटनों पर चलना सीखता है।

ग्रास्पिंग रिफ्लेक्स
शिशु की हथेली में उँगली ड़ालो तो शिशु तुरंत उँगली पर पकड़ मजबूत कर देता है। करीबन छह महीने तक यह रिफ्लेक्स रहता है जिसके बाद शिशु अपनी इच्छा से पकड़ना और छोड़ना सीखता है।



बैबिन्सकी रिफ्लेक्स

शिशु के पाँव के तलुओं पर हल्का सा खंरोच दो तो पाँव की उँगलियाँ फैला कर ऊपर की तरफ मुड़ जाते है। यह रिफ्लेक्स छह से नौ महीने पर गायब होता है जिसके बाद शिशु चलना सीखता है।

वाल्किंग रिफ्लेक्स

शिशु का पैर नीचे रखो तो शिशु चलने की तरह कदम बड़ाने लगता है।




नवजात शिशु में इन रिफ्लेक्स का होना तस्सली देता है कि शिशु के नसों और दिमाग की व्यवस्था सही एवं संपूर्ण है। इन रिफ्लेक्स का ठीक समय पर गायब होना और शिशु का अलग अलग कार्य इच्छानुसार कर सकना विकास की अगली सीढ़ी है। ऐसा नहीं कर पाना और इन रिफ्लेक्स का समय से अधिक रहना भी चेतने का विषय है।

हर माता पिता का इस विषय में प्राथमिक ज्ञान आवश्यक है। इससे वे ठीक समय पर ,"चलता है बच्चा है बड़ा हो जायेगा " वाली मानसिक स्थिति से सही समय पर निकल; जो भी सही और जरूरी उपाय है लेने में सक्षम होंगे।




Note: The You Tube videos are used solely for educational purpose.

Wednesday, 30 April 2008

स्तनपान




शिशु के जन्म होते ही पहले स्पर्श का भी समय हो जाता है। स्पर्श की तपिश और अनुरक्ति का अहसास इतने बचपन में भी होता है। माँ की गर्मी के पास और साथ रह कर शिशु एक जुड़ाव महसूस करता है, स्वयं को सुरक्षित महसूस करता है। शिशु को साफ और मुलायम कपड़ो में सही तरीके से लपेट कर जितनी जल्दी हो सके माँ को सौंप देना चाहिये। प्रसव के आधे घंटे के अंदर स्तनपान करवाना चाहिये। यह अवधि सीज़ेरियन प्रसव से हुए बच्चों के लिये एक घंटा मानी जा सकती है।

स्तनपान की बात आते ही हमारे प्रोफेसर की एक बात याद आती है। Cow's milk is for the calf....your child needs yours!! गाय का दूध बछड़े के लिये...तुम्हारे बच्चे को तुम्हारे दूध की जरूरत है।

माँ के दूध पर आधारित सभी कहावतों और डायलॉग्स के पीछे एक ठोस आधार है। हर माँ का दूध उसके शिशु के लिये एकदम उपयुक्त होता है। मतलब कि अगर शिशु 28 हफ्ते में ही जन्म ले तो उसके पाचन शक्ति और जरूरत के हिसाब का सही मात्रा में प्रोटीन्स, विटामिन्स और चर्बी दूध में होती है। जैसे उस शिशु के लिये उसके जरूरत के अनुसार खास ऑर्डर पर तैयार किया गया हो।

माँ का दूध मतलब माँ के आँचल में रह कर मिलने वाली खोराक- साफ, बिना झंझट, हमेशा फ्रेश, स्टेरिलाइसेशन की आवश्यकता से दूर, हमेशा माँ के पास, माँ के साथ...सही मात्रा में प्रोटीन, विटामिन्स,ग्लूकोस, फैट। साथ में रोग प्रतिकारक शक्ति। माँ से लगातार गहराता जुड़ाव। काउ मिल्क अलर्जी से दूर।

फायदें इतने हैं कि यह समझना कठिन है कि यहाँ भी फैशन ने बाजी मार ली है। फैशन, ट्रैन्ड, फिगर और कठिनाई जैसे बहानों का इस्तेमाल कर शिशु को इससे वँचित रखना दुखद है।

खैर।
नवजात शिशु को देखना हमेशा एक सुंदर अनुभव रहा है। माँ के पास गर्म , मुलायम कपड़ों में लिपटा शिशु जल्द ही बगल में मुड़कर माँ को तलाशना शुरु करता है। होठों पर जीभ फेरकर दूध की माँग रखता है। यही सही समय है स्तनपान शुरु करने का।

शिशु के लिये स्तनपान सीखी हुई एक बात है। किन्तु पहली बार बनी माँ के लिये यह एकदम नया अनुभव है। माँ को सहजता से इसकी शुरुआत करनी चाहिये। माँ की विकलता शिशु तुरंत भाँप लेता है...इसीलिये परेशान माँ का शिशु भी अक्सर चिढ़चिढ़ा हो जाता है।

पहली बार स्तन से लगाना अपने आप में एक प्रक्रिया है। इसे लैच्चिंग ऑन कहते हैं। अगर सही तरीके से स्तनपान की शुरुआत की जाये तो माँ और शिशु के बीच के रिश्ते को अच्छी और तनाव रहित शुरुआत मिल सकती है।
1.शिशु का मुँह पूरी तरह खुलवायें। हल्के से शिशु के होंठ स्तन पर लगाने से वह पूरा मुँह खोल देगा...ऐसे जैसे उबासी में खोलते हैं।
2. फिर जिस हाथ में शिशु को सँभाला है उसे पास लाकर शिशु को स्तन के पास लाना है। ध्यान रहना चाहिये कि शिशु को माँ की तरफ लाया जाये ना कि माँ को शिशु की तरफ।
ध्यान रहे कि शिशु के मसूड़े स्तन के आसपास के एरियोला (स्तन के पास गहरे रंग की त्वचा)को पूरी तरह से मुँह के अंदर लें। शिशु के होंठ बाहर की तरफ मुड़े हुए हों।
3. इतना करने पर शिशु स्तन चूस कर दूध पीने की कोशिश करेगा।

(स्तनपान का सही तरीका जानने के लिये नीचे दिये लिंक पर जायें)

http://www.youtube.com/watch?v=Zln0LTkejIs

अगर शिशु स्तन से सही तरीके से जुड़ा हो और सही तरह से चूस रहा हो तो इस प्रक्रिया में स्तन में दर्द नहीं उठना चाहिये। अगर दर्द उठे तो स्तनपान रोक कर फिर कोशिश करनी चाहिये। शिशु के स्तन पकड़ने पर वैक्यूम बनता है और सक्शन एफैक्ट से दूध खिंचता है। जब भी शिशु को स्तन से हटाना हो तो स्तन और मसूड़े के बीच उँगली ड़ाल कर पहले वैक्यूम खत्म करें। कभी भी गलत तरीके से स्तनपान जारी ना रखे। इससे स्तन पर चीरे पड़ने का डर रहता है और शिशु को भी पर्याप्त मात्रा में दूध नहीं मिलता।

माँ और शिशु के रिश्ते का एक अहम पहलू है स्तनपान। माँ की खुशबू, सपर्श की तपिश, और माँ की गोद की सुरक्षा...इन सबके लिये पहला अनुभव है स्तनपान। स्वाभाविक क्रिया है और जितना सहजता और आनंद से निभाया जाये उतनी ही संतुष्टि दोनो को मिलती है।

छह महीने तक शिशु को मात्र स्तनपान देने से उसकी सभी खोराक की जरूरत पूरी हो जाती है। सिर्फ माँ का दूध उसके लिये पर्याप्त है। इसे एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीड़िंग कहते हैं। छह महीने से माँ के दूध के अलावा कुछ और भी शुरू किया जाना चाहिये। स्तनपान मात्र खोराक ही नहीं पूरा करता किंतु इससे शिशु का पहला स्नेह संबंध बनता है।

(http://www.youtube.com/watch?v=cVbZmCQT6Ec&feature=related)


कहते हैं भगवान ने माँ को इसलिये बनाया क्योंकि हर जगह हर समय हर शिशु के पास नहीं रह सकता....काश हर शिशु के पास उसका अपना भगवान ......उसकी माँ हो....जो उसे ममता से सँभाल,दूध से सींच,स्नेह से छू....उसको उसकी अपनी पहचान दे.....





( photo courtesy breastfeeding.com)

Wednesday, 9 April 2008

विरासत में रोगाणु ?!

इस ब्लॉग के नियमित पाठकों से क्षमा। व्यस्तताओं के चलते थोड़ा विलम्ब हुआ।

शिशु माँ से खुराक, औक्सीजन जीन्स वगैरह पाता है। साथ ही अगर माँ किसी रोग से पीड़ित है तो कई बार रोग भी विरासत में पा लेता है। इसके बारे में जानना जरूरी है क्योंकि कोई माँ अपनी वजह से अपने शिशु में किसी प्रकार का रोग नहीं देखना चाहती।
सही जानकारी,जाँच और इलाज शिशु की रक्षा कर पाने में अधिकतर सक्षम होते हैं।

रोग किस प्रकार से माँ से शिशु तक पहुँच सकता है?

• नाल से। टौक्सोप्लास्मा, ट्रीपोनिमा पैलिडम(सिफिलिस के लिये जिम्मेदार),रुबेल्ला, सी एम वी(साय्टोमेगालेवायरस),लीस्टीरिया, फाल्सीपारम(मलेरिया)
• वर्द्धमान मातृक इनफेक्शन ( माँ से शिशु की ओर बढ़ता हुआ)-कोरियोएम्नियेनाइटिस
• प्रसव के दौरान- माँ के रक्त और योनि से संपर्क में आने पर। HIV (एड्स), HZV( चिकनपौक्स-माता), HBV (हैपाटाइटिस बी-जहरी कमळा) और क्लैमीडिया ट्रैकोमैटिस ( कनजंक्टिवाइटिस)
• प्रसव के बाद-स्तनपान से फैलने वाले


गर्भ से पहले और गर्भ के दौरान होने वाले परीक्षण से रोग के होने या हो सकने की सँभावना का पता लगाया जा सकता है। सही समय पर सही कदम लेने पर प्रतिकूल परिणाम से शिशु को बचाया जा सकता है।
TORCH के नाम से यह रोग जाने जाते रहे हैं। (टौक्सोप्लास्मा, रुबेल्ला, सी एम वी(साय्टोमेगालेवायरस), हर्पिस) ।
अक्सर गर्भ ठहरने के करीबन सोलहवें हफ्ते में इन रोगों के होने की जाँच की जाती है।


टौक्सोप्लास्मा

यह रोग अगर शिशु में हो तो शिशु के मानसिक विकास पर असर पड़ सकता है। शिशु अँधपन एवं अपस्मार का शिकार हो सकता है।
इससे बचाव के लिये इसके होने के तरीकों का जानना आवश्यक है। कच्चा गोश्त, मुर्गी, सीफुड़, बिना धोये फल और सब्जियाँ, बिल्ली या उसके मल से किसी प्रकार का संपर्क इस रोग को माँ तक पहुँचा सकता है। जाहिर है की कच्चा गोश्त ,मुर्गियों और बिल्लियों से दूर रहना चाहिये और फल और सब्जियाँ धोने के बाद ही हाथ लगानी चाहिये।


रुबेल्ला

रुबेल्ला से ग्रसित होने पर शिशु के पूरे विकास पर असर पड़ता है। मोतियाबिन्द, छोटी आँखें,हृदय की बनावट में बुनियादी खामी,(पैटेन्ट डक्टस आर्टिरियोसिस, पलमनरी आर्टरी स्टीनोसिस, बहरापन(सेन्सरी न्यूरल डैफनस), न्यूनमनस्क (मेन्टल रिटार्डेशन), थ्रौम्बोसायटोपीनिया , बच्चे का गिरना या मरा हुआ पैदा होना सँभव है।


एम एम आर इनजेक्शन एक आसान तरीका है बचने का। गर्भ ठहरने से पहले....हो सके तो यौवन में ही हर लड़की को रुबेल्ला का ठीका लगवा लेना चाहिये।


सी एम वी(साय्टोमेगालेवायरस)

इस रोग से ग्रसित नवजात का वजन कम हो सकता है, गुर्दे पर असर,कमळा, फेफड़ों में असर, अनीमिया और बहरापन हो सकता है।

जिन में इस के रोगाणु होते हैं उनके शरीर के सभी द्रव्य से यह रोग फैल सकता है। संसर्ग, स्तनपान,ब्लड ट्रान्सफ्यूशन और औरगेन ट्रान्सप्लान्ट से भी यह फैल सकता है।

जाहिर है की किसी भी दूसरे व्यक्ति के शरीर के द्रव्य के संपर्क में आने से इसकी सँभावना बढ़ सकती है। हाथ धोना, संसर्ग के दौरान कौन्डोम का इस्तेमाल, ब्लड ट्रान्सफ्यूशन के समय डॉक्टर से तसल्ली करना अहम भूमिका निभा सकता है। नन्हे बच्चों को पढ़ाने या सँभालने वाली स्त्रियों को इस बात को लेकर खास सचेत होना चाहिये। उन्हे बच्चों के थूक,मूत्र इत्यादि द्रव्यों के संपर्क में नहीं आना चाहिये। और आये तो तुरंत साबुन और पानी का इस्तेमाल करना चाहिये।


हर्पिस





इस रोग से ग्रसित अधिकतर बच्चों में बहुत कम तकलीफ होती है। दो-तीन प्रतिशत बच्चों में वैरिसेल्ला सिन्ड्रोम हो सकता है। दागदार त्वचा, अंग का अधूरा विकास,अव्ययों, आँख और न्यूरोलौजिकल कार्य में क्षति हो सकती है।
माँ अगर चिकन पौक्स के संपर्क में प्रसव के पाँच दिन पूर्व से दो दिन पश्चात तक आये तो नियोनेटल झोस्टर की सँभावना बन जाती है। इसमें तीस प्रतिशत शिशु में जान खोने का जोखिम रहता है। इलाज( varicella-zoster immune globulin (VZIG) IM)तुरंत जरूरी है।



सभी गर्भवति स्त्रियों में HIV antibody(एड्स), Hepatitis B Surface antigen(जहरी कमळा),VDRL( सिफिलिस), मूत्र की जाँच वगैरह लाजिमी है। इन्हे करवाने के बाद डॉक्टर की सलाह आवश्यक है। स्वयं इन रिपोर्ट को पढ़ने की कोशिश कई बार गलत निष्कर्ष तक पहुँचा सकती है। परिणाम के अनुसार जरूरी दवा , नहीं तो पूर्वोपाय किये जा सकते हैं।

HIV antibody के पौसिटिव होने पर कभी छिपाया नहीं जाना चाहिये। सही समय और सही तरीके से दवा करने पर शिशु को रोगमुक्त रखा जा सकता है।








मलेरिया, मूत्र में दोष का इलाज सही समय पर करने से शिशु के स्वास्थ्य को हानि से बचाया जा सकता है। योनिमार्ग मे कोई दोष, नहीं तो प्रसव के दौरान फैलने वाले रोग से शिशु को सीज़ेरियन का विकल्प चुन बचाया जा सकता है।

रोगाणु बहुतेरे हैं...घात लगाये बैठे हुए....कई बार माँ के शरीर पर आक्रमण कर शिशु को स्वस्थ पैदा होने के विकल्प से वँचित कर देते हैं.

पर माँ और पिता इतने भी बेबस नहीं है। जरूरत है अग्रसक्रिय होने की। हर होने वाले पिता में अपने जीवनसाथी और संतान की तरफ चौकसी की जिम्मेदारी लेने की।

और माँ तो फिर माँ है....सिर्फ ममता लोरी और रात रात तक जागरण करने तक सीमित नहीं होनी चाहिये....किन्तु जिम्मेदारी सहित स्वयं को रोगाणु से मुक्त रख अगली पीड़ी की सृष्टि में अपना दायित्व निभाने की तरफ सजग होना चाहिये।




जानती हूँ काफी रूखा सूखा सा विषय है। लेकिन बहुत जरूरी और बेहद ध्यान से समझने जैसा।
बहुत छोटी बातों से बहुत बड़ी समस्या को मूल से ही उखाड़ दिया जा सकता है....
हाँ आम जिन्दगी में भी नियम अलग तो नहीं हैं... :)))