Tuesday, 10 February 2009

रोटावायरस वैक्सीन



रोटावायरस पर पोस्ट लिखने के बाद महसूस किया कि रोटावायरस वैक्सीन के विषय में दी गई जानकारी बेहद संक्षिप्त है। और इसे लेकर कई सवाल अनुत्तरित रह गये।

तो प्रश्नोत्तर ही सही

1.पहली बार रोटावायरस वैक्सीन कब लोगों तक पहुँचा?
1998 में पहली बार वैयत्त कंपनी ने रोटाशील्ड़ के नाम से रोटावायरस का वैक्सीन उपलब्ध कराया। इसे बाज़ार में पहुँचाने से पहले किए गये शोध में कुछ हानिकारक नहीं पाया गया था। 1999 में इनेटससेप्शन (intussusception) ( आँत का एक तरह का जानलेवा अवरोध) की गुँजाइश बढ़ने की शंका के तहत इसे बाज़ार से हटा लिया गया। तब इसके फायदे को लेकर बहस गर्म हो गई।




फरवरी 2006 में FDA (Food and Drug Administration ) ने एक नये वैक्सीन RotaTeq (Merck) की अनुमति दी।




2.यह किस प्रकार की रस्सी (vaccine) है?
यह गाय और इंसान को ग्रसित करने वाले जीवित रोटावायरस से बना है। यह पाँच तरह के स्ट्रेन्स (serotypes G1, G2, G3, G4 and P1 )से सुरक्षा देता है।


3.इसे किस तरह दिया जाता है?
यह तरल है और मुँह से दिया जाता है


4.यह टीके किसे और कब लगने चाहिए?
Advisory Committee on Immunization Practices (ACIP) इसे एक साल के भीतर के बच्चों के देने की सिफारिश देती है।
इसके तीन डोस हैं जो की दूसरे, चौथे और छठे महीने में दिये जाते हैं। पहला डोस छह से बारह हफ्ते के बीच और आखिरी 32 हफ्ते से पहले दिया जाना चाहिए।
इसे बाकी टीकों के साथ दिया जा सकता है।

5.क्या ऐसे बच्चे को टीका लगाने की जरूरत है जो रोटावायरस से ग्रसित हो चुका है?
बच्चे को एक ही रोटावायरस के स्ट्रेन का संक्रमण हुआ होता है जबकि यह पाँच से सुरक्षा देता है। 32 हफ्ते से पहले इन्हे भी तीन टीके लगने चाहिए।


6.यह टीका कितना सुरक्षित है?
70000 बच्चों में रोग-विषयक जाँच में इसे सुरक्षित पाया गया है। किंतु इससे पहले के टीके के साथ कुछ शंकायें जुड़ी थी इसलिए इसकी जाँच और परीक्षण जारी है। इसे 32 हफ्ते के ऊपर के बच्चों में अभी देने की अनुमति नहीं है।

7.यह टीका रोग प्रतिरोध में कितना सक्षम है?
यह 74% रोटावायरस के मामले, 98% गँभीर संक्रमण, 96% अस्पताल के दाखिलों में कमी लाने में सक्षम है। दूसरे वायरस से होने वाले दस्त और उल्टी पर इसका कोई असर नहीं है।

8.किस तरह के दूसरे लक्षणों की इस वैक्सीन बतौर संभावना है?
कुछ बच्चों में (1%-3% ज्यादा संभावना) इसके देने पर सात दिन के भीतर दस्त और उल्टी देखा गया है।
और कोई गँभीर लक्षण नहीं देखा गया।

9.यह टीका किसे नहीं दिया जाना चाहिए?
- जिसे यह देने पर कोई रिएक्शन हुआ हो
- जिसे इसके किसी घटक से कोई जानलेवा अलर्जी हो
- जिन बच्चों को intussusception हुआ हो
-जो बच्चे बीमार हैं उन्हे कुछ रुककर वैक्सीन दिया जाना चाहिए।
-जिन बच्चों को HIV/AIDS हो, या जो स्टीरौयड्स पर हैं,जिनकी रोग प्रतिकारक क्षमता धटी हुई हो।
-जिन्हे हाल ही में खून या खून संबंधित कोई दवा दी गई हो।

10.क्या वैक्सीन से बीमारी हो सकती है?
नहीं

11.क्या रोटावायरस के लिए कोई और टीका भी है ?
हाँ रोटारिक्स (Rotarix)नाम का glaxo smithcline द्वारा निर्मित टीका भी है।







12.इसे कैसे और कब दिया जाता है?
इसके दो डोस है जिसे दूसरे और चौथे महीनों में दिया जा सकता है। पहला डोस छह हफ्ते के बाद और दूसरा कम से कम चार हफ्ते के अंतराल पर।

इसे भी मुँह से ही दिया जाता है और बाकी लक्षण रोटाटेक जैसे ही हैं।
कभी कभार चिड़चिड़ापन,भूख कम लगना,नाक का बहना और बुखार भी देखा गया है।


नोट


रोटावायरस का टीका लगना इसके नहीं होने की गारंटी नहीं देता। इसके इस्तेमाल से दुनियाभर में प्रतिवर्ष इससे ग्रसित होने वाले बच्चे और मृत्युदर को काफी हद तक घटाया जा सकता है।

32 हफ्ते से ऊपर के बच्चों में पर्याप्त जाँच की कमी होने की वजह से इसे अभी तक इनमें इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं है।






कोई भी टीका लगवाना या ना लगवाना माँ बाप तय कर सकते हैं।






अगर आप के बच्चे को वैक्सीन के बाद पेट में मरोड़, उल्टी,दस्त, दस्त में खून या पेट की किसी और प्रकार की तकलीफ उठे तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। इसे VAERS (The Vaccine Adverse Event Reporting System)(http://vaers.hhs.gov/)को भी सूचित करें। यह Intussusception के लक्षण हो सकते हैं। Intussusception का 24 घंटो के भीतर इलाज करने पर बच्चा पूरी तरह स्वस्थ हो सकता है।





(राधिका बुधकर जी के संशय पर ही यह पोस्ट लिखने की इच्छा हुई। उनका शुक्रिया।)

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Thursday, 29 January 2009

नर्स मेय्ड्स एल्बो (Nursemaid's Elbow,Pulled Elbow)






आज का विषय है नर्स मेय्ड्स एल्बो। पुल्ड एल्बो के नाम से भी यह जाना जाता है। सीधा अनुवाद होगा खिंची हुई कुहनी । बच्चों में इसके होने की सँभावना बहुत अधिक है । इस विषय में बात करने की इच्छा के पीछे का कारण भी यही है। जाने अनजाने हमारी गल्ती से बहुत आसानी से बच्चा इस स्थिति का शिकार हो जाता है। इलाज आसान है। और बचाव मुमकिन।

नर्स मेय्ड्स एल्बो कुहनी के नीचे की हड्डी का कुहनी के जोड़ से आंशिक हटाव है। रेडियस और अल्ना में से रेडियस नाम की हड्डी जोड़ से कुछ कारणवश खिसक जाती है।




कारण


यह सामान्यत: पाँच बरस के नीचे के बच्चों में पाया जाता है। जब बच्चे को हाथ या कलाई पकड़ कर ज़ोर से खींचा जाता है या एक हाथ से उठाया जाता है तो इसके होने की सँभावना बहुत बढ़ जाती है( जैसे की सीड़ीयों पर, सड़क पार करते हुए)। बच्चे को हाथों से पकड़ कर गोल घुमाने पर भी ऐसा होना सँभव है।

इसके होते ही बच्चा तुरंत दर्द से रोने लगता है और प्रभावित हाथ इस्तेमाल करने से इंकार कर देता है। बच्चा अपनी बाँह अपनी तरफ थोड़ा मोड़ कर, कुहनी पेट से चिपका कर रखता है। वह अपने कँधे का इस्तेमाल करता है पर कुहनी का नहीं। कुछ बच्चों में दर्द कम होता है और वे रोना तो बंद कर देते हैं पर कुहनी फिर भी इस्तेमाल नहीं करते।

एक बार ऐसा होने पर ऐसा फिर से होने की, कई बार महीने के अंदर ही सँभावना बहुत बढ़ जाती है।

अक्सर पाँच बरस के बाद यह देखने में नहीं आता। तब तक कुहनी का जोड़ और आसपास की माँसपेशियाँ मजबूत हो जाती हैं। फिर भी किसी चोट या फ्रैक्चर के बाद ऐसा होना सँभव है।




लक्षण

तकलीफ होते ही तुरंत रोना
कुहनी में दर्द
प्रभावित बाँह का उपयोग ना करना
कुहनी को हल्का सा मोड़कर रखना
निचले बाँह को और कुहनी को पेट पर सटाकर रखना
कँधे का हिला सकना और कुहनी का ना हिलाना


अगर आप को शंका है की आपके बच्चे को नर्स मेय्ड्स एल्बो है तो


- कुहनी पर खपच्ची बांधने से पहले बच्चे को ना हिलायें
- बाँह और कुहनी को खुद सीधा करने की कोशिश ना करें
- बर्फ के पैक कुहनी पर लगायें
-कुहनी जिस अवस्था में है वैसे ही खपच्ची बांधे
- कुहनी को ऊपर और नीचे से हिलने ना दे। हो सके तो कलाई और कँधा भी ना हिलायें।

- डॉक्टर के पास तुरंत ले जायें।


नर्स मेय्ड्स एल्बो के होने का संकेत और जाँच

डॉक्टर जाँच के समय पायेगा कि बच्चा कुहनी घुमा नहीं सकता। कुहनी को पूरी तरह मोड़ा भी नहीं जा सकता।

उपचार
डॉक्टर हल्के से कुहनी मोड़ते हुए अग्र बाहु (forearm) को इस तरह घुमायेंगे कि हथेली ऊपर की तरफ देखने लगे।

खुद ऐसी कोशिश करना जोखिम भरा हो सकता है। बच्चे को इससे नुकसान पहुँच सकता है।


कई बार बारंबार ऐसी अवस्था होने पर आपको यह विधि डॉक्टर ठीक तरह से सिखा सकता है।








नर्स मेय्ड्स एल्बो का इलाज ना करने पर स्थायी क्षति पहुँच सकती है। इलाज करने पर कुहनी पूरी तरह से ठीक भी हो जाती है।



समस्या

कुछ बच्चों में कुहनी के चलन में कमी आ सकती है।



बचाव

बचाव बहुत आसान है। ध्यान रखा जाये कि कुहनी खिंचने ना पायें। बच्चे को एक हाथ से खींचिये और उठाइये नहीं। हाथ से पकड़ कर घुमाइये नहीं। सड़क पार करते समय हाथ ज़ोर से ना खींचे।


नर्स मेय्ड्स एल्बो डॉक्टर की ओ पी डी में लगभग रोज़ देखने में आती है। किंतु इनका फ्रैक्चर व कुहनी की बाकी तकलीफों से भेद करना जरूरी है। एक डॉक्टर या जानकार व्यक्ति ही यह अंतर समझ सकता है।

माता पिता होने के नाते बचाव की कोशिश करना जरूरी है और सही समय सही जगह से सही सलाह लेना आवश्यक।


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Thursday, 15 January 2009

रोटावायरस से दस्त और उल्टी

आप लभी को नववर्ष की शुभकामनायें। काफी दिनों बाद इस चिट्ठे पर लिख रही हूँ। हाल ही में आराम का काम छोड़ मुश्किल काम हाथ लिया है। समय की व्यस्तता और नई जगह पाँव जमाने में स्पंदन में लिखना छूट गया। कोशिश रहेगी की नियमित लिख सकूँ।




दस्त और उल्टी की कई वजह है। रोटावायरस नाम का वायरस इसलिए विख्यात है क्योंकि यह अकेला संसार भर में बच्चों में इनका सबसे बड़ा कारण है। पाँच साल की उम्र तक पहुँचते पहुँचते दुनिया के हर बच्चे को कम से कम एक बार इसका चेप लग चुका होता है। हाँ बार बार भी बच्चा संक्रमित हो सकता है किंतु हर बार का संक्रमण का असर, रोग प्रतिकारक शक्ति की वजह से पिछली बार से कम होता है।
रोटावायरस डबल स्ट्रैन्डड(दुहरे रिबन जैसा) आर एन ए वायरस है। सात प्रकार के रोटावायरस- ए,बी,सी,डी ,ई,एफ और जी पाये जाते हैं। करीबन नब्बे प्रतिशत संक्रमण रोटावायरस ए से होता है।


अगर हम दुनिया भर में इससे पीड़ित बच्चे और मृत्युदर पर नज़र दौड़ायें तो इस रोग को समझने और सही उपाय करने की आवश्यकता से इंकार नहीं कर सकते। हमारे देश में लाखों की सँख्या में बच्चे साल भर इससे ग्रसित होकर मरते हैं।





कैसे फैलता है यह रोग

फीको-ओरल यानि की मल से मुख तक
जाहिर सी बात है हाथ धोने में लापरवाही, गंदा ( प्रदूषित) पानी या खाना खाने से, किसी रोगी के मल से किसी तरह संपर्क में आने से यह रोग फैलता है। इस वायरस की संक्रमण शक्ति लाजवाब है,ज़रा सी लापरवाही से रोग फैल जाता है।

आक्रमण प्रणाली
रोटावायरस सबसे पहले अंतड़ी के अस्तर पर लगी कोशिकाओं को संक्रामित करती हैं। वहाँ यह एन्डोटॉक्सिन बना कर दस्त की शुरुआत करती है। बच्चे को दस्त से पहले अक्सर उल्टी की शिकायत होती है। उल्टी और दस्त की बारंबारता इतनी अधिक होती है कि शरीर में पानी कम होने लगता है। पानी की कमी ही मृत्यु का मुख्य कारण बनती है। एंडोटॉक्सिन बना लेने पर बात खत्म नहीं होती। यह कोशिकाओं को इस तरह नुकसान पहुँचाती है कि सादा आहार भी पचा पाना मुश्किल हो जाता है। शरीर में यह बहुत तेज़ी से फैलती हैं और फिर दुगुने जोश से आक्रमण करती हैं।

अगर बच्चे को इससे पहले कभी यह संक्रमण हो चुका हो तो उसकी रोग प्रतिकारक शक्ति तुरंत पहचान लेती है। बचाव की रणनीति की वजह से पहली बार के संक्रमण जितना असर फिर नहीं दिखता। यही वजह है कि बड़ों में इसका असर होने पर भी तकलीफ कम होती है।




लक्षण

जुकाम जैसे लक्षण
हल्का बुखार
उल्टियाँ
दस्त

रोटावायरस की सबसे खास बात दस्त का बारंबार होना है...इतनी बार की पानी शरीर में कम हो जाता है। संक्रमित होने के दो दिन बाद लक्षण दिखने लगते हैं।

कोशिकाओं को नुकसान पहुँचने की वजह से दूध पचाने वाले एन्ज़ाइम पर खास असर पड़ता है। ऐसे में दूध देने पर दस्त की तकलीफ बहुत बढ़ जाती है।
यह तकलीफ रोग के हटने के बाद भी एक दो हफ्ते तक देखी जा सकती है।



जाँच
दस्त में रोटावायरस ए की जाँच की जाती है। इसे अधिकतर स्थानें में एन्ज़ाइम इम्यूनऐसे नाम की तकनीक से करते हैं।


इलाज

इसका कोई खास इलाज सँभव नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण है शरीर में पानी की कमी ना होने देना। वक्त पर अस्पताल पहुँचना, ओ आर एस का घोल, उल्टी की दवा....वगैरह। बच्चे के अंदर नमक की मात्रा में फेर बदल, पानी की कमी और रक्त में ग्लूकोस की मात्रा पर विशेष ध्यान देना पड़ता है। चूँकि लक्षण बहुत तेज़ी से बढ़ते हैं समय पर अस्पताल पहुँचाना बहुत जरूरी है। कभी कबार इससे दिमाग पर भी असर पड़ सकता है। किंतु अधिकतर सही समय पर ध्यान देने पर जान बिना किसी और समस्या के बचाई जा सकती है

रोटावायरस कई देशों में डिसंबर से फरवरी के महीनों में होता है किंतु भारत में साल भर देखा जाता है।

http://www.youtube.com/watch?v=aaxcmEvfnDY


रोटावायरस की रस्सी (Rotavirus vaccine)

सन 2006 में इस रोग से लड़ने के लिए दो टीके बाज़ार में आये। ग्लैक्सोस्मितक्लाइन की रोटारिक्स और मर्क्ख की रोटाटेक़ (Rotarix by GlaxoSmithKline and RotaTeq by Merck) दोनो ही ओरल (मुँह से) लेने वाली हैं और इनमें रोगमुक्त जीवित वायरस हैं।


यह रोग सभी देशों में पाया जाता है। साधारण तापमान में यह वायरस बचा रहता है। सामान्य साफ सफाई भी इसका नुकसान नहीं पहुँचाती। बहुत कम मात्रा में भी यह बच्चे को गँभीर तरह से संक्रमित कर सकता है।

हम क्या कर सकते हैं-
1. साबुन से ठीक से हाथ धोना

यह अकेली एक आदत इतनी आसानी से बचाव कर सकती है की आश्चर्य होता है। रोगी के घर पर होने पर खास ध्यान देना बेहद जरूरी है।

2.प्रदूषित पानी और खाने से दूर रहना
3. रोटावायरस का ठीका लगवाना

जाहिर है इस ठीके की अहमियत पाँच साल के भीतर सबसे अधिक है। (रोटावायरस का ठीका लगाने पर रोग की संक्रमण शक्ति घटती है। या तो बच्चा इससे ग्रसित नहीं होता या फिर इसके लक्षण इतने तीव्र नहीं होते।)
4. अगर इन सबके बावजूद भी अगर यह रोग हो जाये तो समय पर डॉक्टर की सलाह अत्यावश्यक है।

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Thursday, 20 November 2008

फेब्राइल कनवल्शन्स ( बुखार से उत्पन्न मिरगी जैसी ऐंठन )

फेब्राइल कनवल्शन्स शरीर मे उठी एंठन है जो की ऐसे बच्चों में देखी जाती हैं जिनके शरीर का तापमान बुखार की वजह से 39डिग्री सेल्सियस या 102.2 डिग्री फैरनहीट से ज्यादा हो। अक्सर यह खाँसी सर्दी जुकाम के शुरुआत में होता है जब बच्चे के शरीर का तापमान तेजी से बढ़ रहा होता है।


वीडियो देखने के लिए क्लिक करें
http://www.brightcove.tv/title.jsp?title=1078589570

एक नज़र में देखने पर स्थिति भयावह लग सकती है,किंतु विरले ही यह एक गँभीर समस्या बनती है।


पाँच साल से छोटे बच्चों में इसके पाये जाने की सँभावना सबसे अधिक होती है। बच्चों का दिमाग पूरी तरह विकसित और परिपक्व नहीं होता। अधिक तापमान से इनके दिमाग में ऐसे विद्युत के सिग्नल उत्पन्न हो सकते हैं की बच्चे के शरीर में ऐंठन और मरोड़ उठे । करीब तीन प्रतिशत बच्चे इस से प्रभावित हो सकते हैं। छह महीने से तीन साल की इम्र में इनके होने की सँभावना सबसे अधिक होती है। हालांकि छह साल तक इन्हे देखा गया है।

परिवार में अगर किसी को ऐसी तकलीफ रही हो तो इसके होने की सँभावना 20 प्रतिशत तक बढ़ सकती है।

लक्षण

-ऐंठन और मरोड़ बहुत कम समय के लिए होती है। यह कुछ सेकंड से कुछ मिनट तक रह सकती है( पाँच मिनट से कम)

-बच्चा बेहोश हो सकता है, शरीर सख्त पड़ सकता है,साँस 30 सेकंड के लिए बंद हो सकती है, और बच्चा पेशाब और दस्त अनजाने ही कर सकता है।

-हाथ और पाँव में झटके आ सकते हैं। कई बार चेहरे पर भी खिंचाव दिख सकता है। बच्चे की आँखें ऊपर चढ़ सकती है।

-कुछ मिनट बाद बच्चे को होश आ जाता है। होश आने पर बच्चा सुस्त होता है, नहीं तो चिड़चिड़ा हो जाता है। उसे अपने आसपास की बातों का ठीक होश नहीं रहता।

http://www.youtube.com/watch?v=pS6uZYcydRo



इलाज

- ऐंठन के समय बच्चे को चोट ना लगने दें। उनके मुँह में कुछ ना ड़ालें। बच्चे को रिकवरी पोसाशन में ड़ाल दें।



- बुखार को बहुत बढ़ने ना दें। पैरासिटामोल का इस्तेमाल करें।

- कमरा ठंडा करें, बच्चे के कपड़े ड़ीले करें।

- पानी में भिगो कर शरीर को स्पोंज करें। स्पोंज करते समय बच्चे की छाती, पीठ ,कक्ष और जाँघ में भी पोछे।

अगर ऐसा पहली बार देखने में आया है तो बच्चे का इलाज और ठीक से वजह जानने के लिए बाकी जाँच जरूरी है। हो सकता है बच्चे को डायज़ापॉम नाम की दवा देनी पड़े। निदान हो जाने पर यह दवा आप संडास की जगह से भी दे सकते हैं। अपने डॉक्टर से इस विषय में सही सलाह ली जानी चाहिए।


अगर तकलीफ एक साल की उम्र से पहले देखने में आई है , या परिवार में किसी और को भी है तो तकलीफ के बारबार होने की सँभावना ज्यादा है।

अधिकतर बच्चे पाँच साल बाद इस तकलीफ से उभर जाते हैं। किंतु करीबन 1 प्रतिशत बच्चों में आगे जाकर अपस्मार देखा जाता है।

बुखार में हुई ऐसी सामान्य बात को देख अपने या किसी दूसरे बच्चे पर अपस्मार का लेबल ना लगायें। चौकसी और सचेत होना आवश्यक है लेकिन फेब्राइल कनवल्शन्स चिंता का कारण ना बनायें।


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Wednesday, 15 October 2008

जुकाम की दवा और नुकसान

बीमार बच्चा देखकर हर माँ का दिल भर आता है। पापा का बस चले तो अपनी लाड़ली के लिए जान भी हाज़िर कर दे। पर कुछ दुख तो सह कर ही पार लगते हैं। सर्दी के लिए दवाओं से चाहे जितनी नाकाबंदी कर दें यह सता कर ही दम लेती है। कुछ ना कुछ कर के बीमार बच्चे की तकलीफ कम करने की कोशिश में अक्सर कई गैरजरूरी दवाईयाँ इस्तेमाल की जाती है।
बात अगर यहीं तक सीमित होती तो भी चलता लेकिन इनमें से कई दवाईयाँ काफी हद तक नुकसान पहुँचा सकती हैं, जान भी जोखिम में ड़ाल सकती है।


यह हैं ओवर द काउंटर मिलने वाली असँख्य दवाईयाँ जिनपर मुस्कुराते बच्चों की तस्वीर हमें बढ़ कर इन्हे खरीदने को उकसाती है।

सच तो यह है सर्दी जुकाम के लिए आज भी दादी माँ के नुस्खों से बेहतर उपाय नहीं। पैरासीटामोल, माँ की गोद, विक्स से मालिश, गुनगुने नमक के पानी से गरारे करना , अधरक की चाय, चिकन सूप....यही काफी है। छींकता खाँसता आपका दुलारा परेशान जरूर है....लेकिन आपके साथ और प्यार की मीठी यादें भी बना रहा है।


http://www.youtube.com/watch?v=fij-SnBOapQ



http://www.aap.org/advocacy/releases/jan08coughandcold.htm

यू एस फुड़ ऐन्ड ड्रग ऐडमिनिस्ट्रेशन ने खास इस बात पर ज़ोर दिया है कि दो साल से छोटे बच्चों को ओवर द काउंटर मिलने वाली यह दवाईयाँ हरगिज़ नहीं देनी चाहिए। इनसे जान तक को खतरा हो सकता है। छह साल से छोटे बच्चों में इनकी उपयोगिता साबित नहीं है। इन्हे लेने पर मृत्यु, फिट्स(कंपकंपी),हृदय की गति तेज़ होना या अचेत होना रेकार्ड किया गया है। आम तौर पर यूँ बहुत देखने में ना भी आये तो भी छह साल से छोटे बच्चों में इनसे वाँछित लाभ भी नहीं मिलता।

बच्चों और बड़ो मे फर्क है। एक ही दवा की प्रतिक्रिया दोनो में अलग तरीके से होती है। जिस दवा से बड़ों मे कोई हानि नहीं होती बच्चों में वे गँभीर नुकसान पहुँचा सकते हैं।

एफ ड़ी ए ने दवाईयों के लेबल मे इन बातों को साफ करने की राय रखी है।

घरेलू नुस्खों के अलावा सलाइन नेसल ड्रॉप्स से फायदा भी होता है और नुकसान भी नहीं है।



अधिक जानकारी के लिए इस साइट पर जायें( www.aap.org/publiced/BR_Infections.htm
http://www.aap.org/new/kidcolds.htm)

पिछले अक्टूबर में जो दवाइयाँ लौटा दी गई थी
(Cough and cold medicines withdrawn in October 2007):

Dimetapp(R) Decongestant Plus Cough Infant Drops,
Dimetapp(R) Decongestant Infant Drops,
Little Colds(R) Decongestant Plus Cough,
Little Colds(R) Multi-Symptom Cold Formula,
PEDIACARE(R) Infant Drops Decongestant (containing pseudoephedrine),
PEDIACARE(R) Infant Drops Decongestant & Cough (containing pseudoephedrine),
PEDIACARE(R) Infant Dropper Decongestant (containing phenylephrine),
PEDIACARE(R) Infant Dropper Long-Acting Cough,
PEDIACARE(R) Infant Dropper Decongestant & Cough (containing phenylephrine),
Robitussin(R) Infant Cough DM Drops,
Triaminic(R) Infant & Toddler Thin Strips(R) Decongestant,
Triaminic(R) Infant & Toddler Thin Strips(R) Decongestant Plus Cough,
TYLENOL(R) Concentrated Infants' Drops Plus Cold,
TYLENOL(R) Concentrated Infants' Drops Plus Cold & Cough



FDA की सलाह

-लेबल हमेशा देखें। उसमें ऐक्टिव इनग्रीडियन्ट (“active ingredients”)देखें । कई बार कई सारी अलग अलग असर की दवाओं का काकटेल होती हैं ऐसी दवाईयाँ (an antihistamine, a decongestant, a cough suppressant, an expectorant, or a pain reliever/fever reducer)। आप अगर एक से अधिक ऐसी दवा दें तो शायद सेफ लिमिट से ज्यादा देकर बच्चे को नुकसान पहुँचा सकते हैं।


-दवा का लेबल खास चेक करें। उसके निर्देश का पालन करें। इसमें दी गई चम्मच या मेशरिंग कप से ही दवा दें। अंदाज़े से दवा कभी नहीं दे।


- बच्चों से दवा हमेशा दूर रखें। हो सके तो चाइल्ड सेफ ढक्कन वाली दवा ही खरीदें।

- कभी भी इन दवा का इस्तेमाल बच्चों को सुलाने के लिए ना करें।

- सर्दी जुकाम आम सी बिमारी है। अगर शंका हो कि तकलीफ कुछ और भी हो सकती है तो डॉक्टर तक पहुँचने में देर ना करें ।


http://www.youtube.com/watch?v=zE6rYqaWjkU

Sunday, 5 October 2008

बच्चे के दूध में मेलामिन!!

कुछ समय से मेलामिन लगातार ध्यान खींच रहा है। मेलामिन जिससे खूबसूरत क्रौकरी तैयार होती है....बहुत ही अलग और गलत जगह में काफी मात्रा में पाया गया।

जगह थी पेट्स फूड...। अमेरिका में जब पालतू जानवर अचानक से किडनी फेल्यर से मरने लगे तो लगा कोई गंभीर महामारी फैल रही है। थोड़ा विश्लेषण करने पर इस तकलीफ की वजह मिली - चीन से एक्सपोर्ट हुए पेट्स फूड में मेलामिन की मिलावट। कई जानवर इंसानी लालच और पैसा कमाने के शार्टकट्स में शहीद हो गये।

http://www.youtube.com/watch?v=s8U9we0HEQg



अगर बात जानवरों के खाने तक सीमित होती तो फिर भी नुकसान की आशंका कम होती। पर चीन में हज़ारों की संख्या में बच्चे बीमार होने लगे। करीबन पचास हज़ार से अघिक बच्चे गुर्दे की निष्क्रियता की वजह से मर गये। सैंकड़ों अभी भी बीमार है।

सानलू नाम की कंपनी के मिल्क पावडर में मेलामिन पाया गया। यीली, जो की ओलंपिक गेम्स में बतौर स्पौंसर रही....उस के मिल्क पावडर में भी मेलामिन की मात्रा अधिक पाई गई। Nestle जैसे ब्रैन्ड्स भी यकीन से मेलामिन के होने को झुठला नहीं सकते।

जो कंपनियाँ अपनी प्रतिष्ठा को लेकर चिंतित थी...उन्होने बाज़ार से अपना पावडर उठवा लिया। छोटी कंपनियों के लिए यह बहुत ही बड़ा घाटा सिद्ध होता...तो वे अब भी बाज़ार में हैं।




http://www.youtube.com/watch?v=prLr1PNCeSg




बच्चों के दूध में आखिर कौन और क्यों मेलामिन मिला रहा है??

कौन का जवाब भी बहुत साफ नहीं है- शायद इन कंपनियों में दूध की आपूर्ति करने वाला नहीं तो स्वयं निर्माता।

क्यों-
ताकि प्रोटीन की मात्रा अधिक दिख सके। प्रबंध कर्ताओं का ध्यान या संशय अब तक इस ओर नहीं था। इसीलिए क्वालिटी जाँच में मेलामिन आँकने का प्रावधान भी नहीं था।


आखिर मेलामिन क्या है और किस तरह पहुँचाता है नुकसान??


मेलामिन एक ऑर्गैनिक कंपाउन्ड है C3H6N6(1,3,5-triazine-2,4,6-triamine )। इसमें व्याप्त नाइट्रोजन की मात्रा की वजह से ही यह गलत प्रोटीन की रीड़िंग देता है। जो लोग मेलामिन जैसी चीज़ नवजात शिशु के दूध में मिलाने में हिचकिचाते नहीं....जाहिर है वे मेलामिन की शुद्धता पर भी घ्यान नहीं दे सकते। सायन्यूरिक एसिड़ जैसे ऐसिड के होने पर मेलामिन के नुकसान करने की क्षमता कई गुना बढ़ जाती है।

यह गुर्दे पर सीधा असर करती है। बहुत समय तक इस्तेमाल करने पर किड़नी स्टोन्स, मूत्राशय के कैन्सर , किड़नी फेल्यर और मौत तक हो सकती है।


बच्चों मे इस रोग के होने के लक्षण

किड़नी के फेल होने और किड़नी स्टोन्स के होने जैसे ही लक्षण देखने में आये हैं
- बच्चे का बेहिसाब रोना, खास कर पेशाब करते समय। उल्टी के जैसा लगना
- पेशाब में खून ( जाहिर या माइक्रोस्कोपिक)
- पेशाब का कम होना या बिल्कुल बंद हो जाना
- ब्लड प्रेशर का बढ़ना
- पीठ पर किढनी की जगह पर थपथपाने पर दर्द का उठना
- बुखार




अगर बच्चों में ऐसे लक्षण दिखें तो शक करने के लिए जानना जरूरी है कि पावड़र मिल्क का इस्तेमाल किया गया या नहीं।
करीबन तीन महीने के लगातार इस्तेमाल के बाद ही अक्सर लक्षण दिखते हैं।

मेलामिन का दूध के पावडर में होने की जाँच आम लैबोरेटरी में नहीं की जा सकती। हालांकि,स्पेक्ट्रोमेट्री से बहुत आसानी से पता लगाया जा सकता है।

जो भी हो शक के घेरे में आई ऐसी बात सूचित करना जरूरी है।

समय बदल रहा है। कई लोग शॉर्टकट्स अपना कर हम आप की जान जोखिम में ड़ाल धनवान होने का प्रयत्न कर रहे हैं। वे हमारे भविष्य को बीमार कर रहे हैं।

कई बार तो लगता है काफी हद तक हम भी जिम्मेदार हैं। स्तनपान की जगह मिल्क पावड़र का चुनाव भी एक किस्म का शॉर्टकट ही है। छह महीने बाद भी सहूलियत के लिए जो माँये दूध के पावडर को ही मुख्य आहार रहने देती हैं...वह भी ऐसी स्थिति की जिम्मेदार हैं। हम सब जो हमारे सिस्टम को मिल्क पावड़र टेस्ट करने के लिए बाध्य नहीं कर सकते जिम्मेदार हैं।

....याद रहे बात बच्चों के दूध से सामने आई है। इस बात की गुंजाईश बहुक अधिक है कि आप खा रहे चॉकलेट, पी रहे चाय और मिठाइयों में मेलामिन है। इनमें इस्तेमाल हो रहे मिल्क पावड़र में मेलामिन की मात्रा की जाँच नहीं की गई है।

चीन के पेट फूड़ एक्सपोर्ट करने की वजह से स्पॉटलाइट उन पर है......जहाँ स्पॉटलाइट नहीं है...उस अँधेरे में पता नहीं हमारे और हमारे बच्चों के खाने में कौन सा जहर मिलाया जा रहा है।

क्या हम सचेत हैं??




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Thursday, 11 September 2008

ऑटिस्म- पिछली चर्चा के आगे

मुझे यकीन नहीं था ऑटिस्म मे सब इतनी दिलचस्पी लेंगे । पोस्ट लिखने में देरी हुई इसके लिये क्षमा चाहती हूँ।

पिछली पोस्ट में कई सवाल उठे,ऐसे सवाल जिन्हे संक्षिप्त में जवाब नहीं देना चाहती थी।

ऑटिस्म की वजह क्या है?

सच कहा जाये तो ठीक जानकारी नहीं है। अनुमान है की जेनिटिक्स का रोल है। कुछ परिवार के बच्चों में इससे ग्रसित होने की संभावना अधिक होती है। फिर भी एक सटीक वजह बता पाना संभव नहीं हुआ है। कुछ अनस्टेबल जीन्स से इसके होने की आशंका बढ़ जाती है। कुछ लोगों का मानना है की गर्भ के दौरान हुए वायरल इनफेक्शन्स, मेटाबोलिक डिसौर्डर्स या कुछ कैमिकल्स के संपर्क में आना इस रोग का कारण बन सकता है।
फ्रैजाइल एक्स सिन्ड्रोम (Fragile X syndrome),ट्यूबरस स्क्लीरोसिस(tuberous sclerosis), कनजनाइटल रुबैल्ला सिन्ड्रोम( congenital rubella syndrome),ऐस्पर्जर्स सिन्ड्रोम (Asperger's syndrome)और फिनाइलकीटोनयूरिया untreated phenylketonuria ऐसी कुछ अवस्था हैं जिनमें ऑटिस्म की संभावना बढ़ जाती है।

परिवेश भी इसके लिए जिम्मेदार हो सकता है। कई भारी धातुओं को,जैसे की मरकुरी का एक मात्रा से अधिक संपर्क में आने को कुछ लोग दोषी मानते हैं। उनका कहना है की ऐसे बच्चों में इसको शरीर से दूर करने की पद्धति में खोट होता है और इनके रहने से जो रोग दबा हुआ होता है, वह जाहिर हो जाता है।


क्या टीकों का इनसे कोई संबंघ है?

इसका भी साफ साफ जवाब नहीं है। लेकिन कुछ टीकों को दोषी माना गया था। कुछ समय पहले यह वात काफी चर्चा में थी। खास तौर पर एम एम आर (MMR) इसकी वजह इन टीकों में प्रस्तुत मरकुरी को माना गया था। ठीक ठीक ऐसी बात का सबूत नहीं है।

जो भी है शोध जारी है।

http://www.youtube.com/watch?v=zN20SkRgGz0


एक खास चौकसी की आवश्यकता फ्लू वैक्सीन्स को लेकर है। इसमें मरकुरी की मात्रा 25 माइक्रो ग्राम है। यह मात्रा बाकी सभी टीकों को मिलाकर भी देखा जाये तो ज्यादा है (0.4 माइक्रो ग्राम)

जब तक इस बात की पुष्टी नहीं हो जाती कुछ भी पक्के तौर पर कहना गलत होगा। किंतु जिन बच्चों को ऑटिस्म है उनके भाई बहन मे, या जिन में जेनिटिकली ऐसे रोग की सँभावना है वहाँ सावधानी बरतना ही बेहतर होगा।

क्या ऑटिस्म वास्तव में इतनी शीघ्रता से बढ़ रहा है? अगर हाँ तो क्यों?

अगर अंकों पर जाये तो हाँ ही जवाब होगा। किंतु एक खास बात जिसे नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता वो यह है की ऑटिस्म की परिभाषा, उसके प्रति सतर्कता, उसपर लगे अंकुश,उसकी विविघता की स्वीकृति, समाज और पाठशाला में खास ध्यान -इन बातों में तेजी से बदलाव आया है। हो सकता है की अंकों पर इन बातो का असर पड़ा हो। फिर भी यह भी सच है की इतने बच्चों को ऐसी तकलीफ है और उन्हे और उनके परिवार को हमारे स्वीकृति और दिलासे की जरूरत।

ऑटिस्म से ग्रसित होने की उम्र कब है? क्या किसी व्यस्क को किसी ट्रौमा के बाद ऑटिस्म हो सकता है?




जिन बच्चो को ऑटिस्म होती है उनमें ऐसी प्रवृति रहती है। कई बार कुछ वक्त गुजरने के बाद ही इसके लक्षण समझ आते हैं। कुछ में टीकों के बाद प्रवृति में खास गिरावट देखी गई है। कुछ के कारण उनमें मौजूद जेनेटिक रोग हैं।

कुल मिलाकर बात यह है की जो रोग उपस्थित है ,इसका निदान कब हो पाता है।

किसी ट्रौमा के बाद ऐसे लक्षण दिख सकते हैं। मनुष्य के दिमाग के कनेक्शन्स इतने जटिल है की कहीं कोई केबल के टूट जाने पर ऐसे लक्षण जाहिर हो सकते हैं। किंतु इन्हे ऑटिस्म नहीं कह सकते।

हाँ जिन्हे ऑटिस्म है...वह व्यस्क हो जाये तब भी ऑटिस्टिक ही रहते हैं। कोई और मानसिक दबाव इनपर ज्यादा बुरा असर दिखाता है।

हम सब कई बार अपने स्वस्थ, सामान्य बच्चों से परेशान हो जाते हैं। उनकी नादानियों कभी परेशान करती है, उनकी जरूरतें कभीकबार हमारे समय पर एक डिमांड सा महसूस होती हैं....। थकान, तनाव और रोज़मर्रा की जिन्दगी के अपने अलग किस्से हैं...ऐसे में ऐसे बच्चों की परवरिश करना आसान नहीं है।

आज की यह पोस्ट ऐसे बच्चों और उनसे जुड़े हर माता पिता और केयरगीवर को समर्पित।


http://www.youtube.com/watch?v=03bcE9xYKos&feature=related







Refeences
www.autism-society.org
www.autismkey.net
http://www.time.com/time/magazine/article/0,9171,1576829,00.html


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