नौ महीने का सफर समाप्त होते होते शिशु स्वतंत्र रूप से साँस लेने में सक्षम होता है। उसकी शारीरिक संरचना बाहर की दुनिया में आकर जीवित रहने के लिये पूर्ण। किन्तु कोख के अंदर से बाहर की यात्रा किसी भी दृष्टिकोण से एक दिलचस्प घटनाचक्र है। हिन्दी पिक्चरों में दिखाई जाने वाली इमोशनल प्रसव पीड़ा के बिहाइन्ड द सीन्स इतना कुछ हो रहा होता है कि हर बात अगर रेकार्ड की जाये तो एक पूरा उपन्यास लिखा जा सकता है।
हर मनुष्य की इससे अहम और मुश्किल यात्रा शायद ही कोई और हो। एक बेहद संकरा रास्ता, जीवन की खोराक पहुँचाने वाली धमनियों से अलगाव, स्वतंत्र साँस की शुरुआत और बेहद तेजी से होता आंतरिक बदलाव।
स्पर्श की तपिश की पहली चाह और माँ का वात्सल्यपूर्ण साथ।
माँ जो खुद शारीरिक और मानसिक बदलाव से गुजर रही है। शिशु को जन्म देने की पीड़ा और अपने जीवन से एक अलग अस्तित्व में देखने की अनुभूति....
एक ऐसा समय जब माँ और शिशु दोनों को शिशु के पिता के साथ और आश्वासन की जरूरत होती है। पिता के लिये भी भावनात्मक जुड़ाव बनाने का महत्वपूर्ण समय।
जन्म से पहले फेफड़े पानी से भरे होते हैं। औक्सीजन की आवश्यकता माँ नाल से पूरी करती है। अशुद्ध खून की सफाई भी आंवल(placenta) मे ही होती है। जब शिशु संकरे से योनिमार्ग से गुजरता है तो फेफड़ों से पानी निचुड़ जाता है। बाहर पहुँचे शिशु की नाल काट दी जाती है। एक ऐसा क्षण जो माँ से अलगाव और पहली साँस के बीच गुजरता है। लगातार घटता औक्सीजन, तापमान और रोशनी में परिवर्तन, स्पर्श और फेफडों में बढ़ने वाला नेगैटिव प्रेशर, इनका संयुक्त प्रभाव शिशु को साँस लेने की पहल करने को उकसाता है।
फेफड़ों का साँस लेना सीखना एक अत्यंत जटिल प्रकरण है।
नये अंकुरित पौधे को नई ज़मीन में रोपने जैसा। इस दौरान जड़े उखड़ जाती हैं और ज़मीन बदल जाती है।
इससे पहले कि हम शिशु में होते बदलाव जानें हमें एक सामान्य हृदय के कार्यप्रणाली से परीचित होना होगा। हृदय नाशपति के आकार का एक मांसपेशीय अव्यय है | दो फेफड़ों के बीच स्थित , शरीर के विभिन्न भागों में रक्त पहुँचाने के लिये जिम्मेदार होता है | यह चार प्रकोष्ठों मे बटाँ होता है। दाँये भाग में अशुद्ध (डिऔक्सीजनेटड) रक्त होता है और बाँये भाग में शुद्ध(औक्सीजनेटड)। दाँये और बाँये भाग ऐट्रियम और वेन्ट्रीकल में बँटे होते हैं। रक्त का प्रवाह एट्रियम से वैन्ट्रीकल( एक ही दिशा) में संभव है। दाँये भाग में ऐट्रियम और वेन्ट्रीकल के बीच ट्राइकस्पिड वाल्व होता है। और बाँये भाग में ऐट्रियम और वेन्ट्रीकल के बीच बाइकस्पिड वाल्व होता है। दाँये भाग में वैन्ट्रीकल से अशुद्ध रक्त फेफड़ों तक पलमनरी आर्टरी से पहुँचता है। वहाँ से शुद्ध होकर पलमोनरी वेइन्स से बाँये ऐट्रियम में लौटता है। ऐट्रियम से वेन्ट्रीकल फिर एओर्टा से शरीर के सभी हिस्सों तक । वहाँ औक्सीजन पहुँचा कर सुपीरियर और इनफीरियर वीना कैवा से दाँये ऐट्रियम में अशुद्ध रक्त पहुँचता है।
हाँ थोड़ा पेचिदा है।
लेकिन सोचने की बात है कि कुछ ही क्षणों में बिल्कुल काम नहीं करते हुए फेफड़े अचानक काम करना कैसे शुरु करते हैं।
जन्म पू्र्व शिशु में जो बातें अलग होती हैं-
नाल और आंवल के बीच की धमनियाँ अशुद्ध रक्त पहुँचा कर शुद्ध रक्त वापस ले जाती हैं।
• डक्टस आर्टिरियोसस- पलमनरी आर्टरी और एओर्टा के बीच
• फोरामेन ओवेल-दोनो वेन्ट्रीकल के बीच एक छेद।
• डक्टस विनोसस- जिगर(लिवर) और इनफीरियर वीना कैवा के बीच
• अंबीलीकल वेइन- नाल से शिशु के लिवर तक
• अंबिलिकल आर्टरी- शिशु से आंवल तक
इतनी धमनियों को जन्मउपरांत बंद हो जाना पड़ता है। और सामान्य हृदय की कार्यप्रणाली तक पहुँचना पड़ता है।
जानती हूँ कि समझने में बहुत आसान नहीं है। लेकिन इतने जटिल बदलाव करने के लिये निमिष मात्र का समय होता है। कहीं कोई छोटी सी चूक और वह हृदय के संरचना में त्रुटि के रूप में उभर आती है।
इतने बदलाव के बाद होता है बच्चे का पहला रूदन.....पहली साँस.....
पता नहीं क्यूँ फिर सभी हिन्दी पिक्चरों के सीन्स याद आ गये। जी हाँ...पहला रूदन वाकई खुशी की बात है....कुदरत के एक चमत्कार के संपूर्ण होने के उद्घोष जैसा....
कभी लगता है कुदरत ने हम में से हर एक के ऊपर कितनी मेहनत की है । कई बार जितना मोल आंक कर हमें कुदरत ने जीवन दिया है...हम उससे बहुत नीचे के स्तर पर जीवन निर्वाह करते हैं।
और माँ .... बीज, मिट्टी और हवा....तो जीवन है...
Thursday, 13 March 2008
Tuesday, 11 March 2008
नौ महीने गर्भ में
एक शिशु को संसार में लाना और फिर उसकी परवरिश का दायित्व सँभालना जिम्मेदारी का काम है। एक दम्पति के जीवन में यह एक ऐसा बदलाव है जिसके कई पहलू हैं।
अगर नवागंतुक का आगमन सोचा समझा ना गया हो,शुभ नहीं समझा जा रहा हो, किसी गल्ती का परिणाम हो तो इस पूरे प्रक्रिया में और भी कई पक्ष उभर आते हैं। आर्थिक परेशानियाँ, इसके पहले के गर्भ के समय आया कोई संकट, माँ की गर्भवति होने के समय की उम्र और उसके स्वयं के बचपन में सहे संघर्ष एवं द्वन्द्व...ऐसी कई बातें हैं जो कोख में पल रहे बच्चे और उस बच्चे को जनने वाली माँ पर असर कर सकती है।
एक औरत जब गर्भवति हो जाती है तो शारीरिक और मानसिक रूप से कई परिवर्तन के दौर से गुजरती है। एक नये जीवन को खोराक और पलने की जगह देना, उसे स्वतंत्र साँस तक लेकर पहुँचना और फिर उसके आत्मनिर्भर होने तक अपने खून से सींचना।
मानसिक रूप से भी तीन सीढ़ियाँ पार करती है।
• पहली बार यह जानकर कि वह माँ बनने वाली है,एक सुखद अनुभूति का अहसास होता है। किन्तु साथ ही अपने सामर्थ्य पर शक भी। अपने माता पिता के साथ अगर कोई भावनात्मक द्वन्द्व हो तो इस दौरान बाहर आ जाता है।
• करीबन बीस हफ्ते के आसपास, औरत की उपरोक्त भावनायें चरम सीमा पर पहुँच जाती हैं। उसे चिन्ता सताने लगती है कि कहीं उसका बच्चा शारीरिक और मानसिक रूप से विकलांग ना हो। उसे अहसास होने लगता है कि यह बच्चा उसके शरीर में है जरूर पर इसका अस्तित्व अलग है।
• गर्भ के अंत तक पहुँचते पहुँचते माँ अपने बच्चे को एक व्यक्तित्व से जोड़ देती है।
दो सूईयों को लेकर स्वेटर बुनती माँ वाली इमेज कितनी भी रूमानी क्यूँ ना हो...यह एक सच है कि इस दौरान वह विविध मानसिक और शारीरिक उतार चढ़ाव से गुजरती है। इस समय उसे समझना और स्वीकार करना उसके मानसिक संतुलन के लिये आवश्यक है।
यह कुदरत का एक करिश्मा ही है कि एक कोशिका से एक पूरा इंसान तैयार हो जाता है।
नियंत्रण एक डी एन ए कोड़ मे लिखा हुआ, जिसमें माता और पिता की बराबर की भागेदारी रहती है। इस कोड़ के अनुसार एक कोशिका ,रूप मे ढ़लने लगती है।
किसी कुशल निर्देशक के हाथ में एक सिम्फनी.....साधन माँ उपलब्ध कराती है...और जगह उसकी कोख।
विकास का क्रम
1. उर्वरण और कोख में स्थिर होना- भ्रूण जीवन की शुरुआत (पहला और दूसरा हफ्ता)
2. दो में संस्तरित होना
3. तीसरे स्तर का जुड़ाव- अव्ययों के निर्माण की शुरुआत (तीसरा, चैथा हफ्ता)
4. हृदय, आँख और एक नन्हा आकार- हाथ और पाँव के अंकुर (पाँचवा हफ्ता)
5. नन्हा सा मुँह
6. नाक और होंठ
7. पलक
8. ओवरीज़ और टेस्टिस
9. स्त्री या पुरुष विशेषता सूचक (नौवाँ हफ्ता)
10. खुली आँखें
11. हिलता , घूमता शिशु ( बीसवें हफ्ते से अढतीसवाँ हफ्ता)
मृत्यु दर और अस्वस्थता सबसे अधिक जन्म से पूर्व होती है। करीबन तीस प्रतिशत गर्भ स्वत: निष्फल हो जाते हैं। इनमें अक्सर कोई बुनियादी खोट होता है। दो प्रतिशत नवजात शिशु में कोई गँभीर शारीरिक विकलांगता होती है जिसे शल्य चिकित्सा की आवश्यकता पड़े। रोगाणू, रसायन,तापमान की विविधता और एक्स रेस का असर भी सबसे अधिक इसी दौरान होता है। माता या पिता के सिगरेट फूँकने का असर भी बच्चे में कम विकास का कारण बन सकता है।
माँ एक कोशिका को एक शिशु बनाने की प्रक्रिया में पूरी खोराक पहुँचाती है। सभी अव्ययों को विकसित करने के लिये विटामिन्स, मिनरल्स ,ऊर्जा ,कैल्सियम, लौह तत्व वगौरह की जरूरत पड़ती है। जो माँ को अपने खोराक से मिलता है, विकसित होते शिशु तक पहुँच जाता है। जो खोराक में नहीं होता पर उसके शरीर में हो....वो शरीर से सोंक लिया जाता है। अगर शरीर भी उस जरूरी खोराक से वँचित हो तो शिशु में असर दिखता है।
गर्भ ....शायद एकमात्र ऐसा समय जब एक ही शरीर में दो दिल साथ में धड़कते हैं....
कुदरत कितने निपुणता से हर अंग को रूप में ढ़ाल देती है।
....इतनी खूबसूरती,श्रम और परम के आशा के चिन्ह को.....कितनी आसानी से कुछ लोग भ्रूण हत्या के हेडलाइन्स के नीचे समाप्त कर देते हैं.....
जैसा कि मार्टिन कहते हैं
God's interest in the human race is nowhere better evidenced than in obstetrics.
Martin H. Fischer
भगवान का मनुष्य जाति से लगाव औबस्ट्रैटिक्स (गर्भ संबंधित विज्ञान) से ज्यादा और कहीं नज़र नहीं आता।
फिर रवीन्द्र नाथ टैगोर ने कहा ही है
Every child comes with the message that God is not yet discouraged of man.
काश हम थोड़ी कोशिश कर परम का हौसला बनाये रखें......।
अगर नवागंतुक का आगमन सोचा समझा ना गया हो,शुभ नहीं समझा जा रहा हो, किसी गल्ती का परिणाम हो तो इस पूरे प्रक्रिया में और भी कई पक्ष उभर आते हैं। आर्थिक परेशानियाँ, इसके पहले के गर्भ के समय आया कोई संकट, माँ की गर्भवति होने के समय की उम्र और उसके स्वयं के बचपन में सहे संघर्ष एवं द्वन्द्व...ऐसी कई बातें हैं जो कोख में पल रहे बच्चे और उस बच्चे को जनने वाली माँ पर असर कर सकती है।
एक औरत जब गर्भवति हो जाती है तो शारीरिक और मानसिक रूप से कई परिवर्तन के दौर से गुजरती है। एक नये जीवन को खोराक और पलने की जगह देना, उसे स्वतंत्र साँस तक लेकर पहुँचना और फिर उसके आत्मनिर्भर होने तक अपने खून से सींचना।
मानसिक रूप से भी तीन सीढ़ियाँ पार करती है।
• पहली बार यह जानकर कि वह माँ बनने वाली है,एक सुखद अनुभूति का अहसास होता है। किन्तु साथ ही अपने सामर्थ्य पर शक भी। अपने माता पिता के साथ अगर कोई भावनात्मक द्वन्द्व हो तो इस दौरान बाहर आ जाता है।
• करीबन बीस हफ्ते के आसपास, औरत की उपरोक्त भावनायें चरम सीमा पर पहुँच जाती हैं। उसे चिन्ता सताने लगती है कि कहीं उसका बच्चा शारीरिक और मानसिक रूप से विकलांग ना हो। उसे अहसास होने लगता है कि यह बच्चा उसके शरीर में है जरूर पर इसका अस्तित्व अलग है।
• गर्भ के अंत तक पहुँचते पहुँचते माँ अपने बच्चे को एक व्यक्तित्व से जोड़ देती है।
दो सूईयों को लेकर स्वेटर बुनती माँ वाली इमेज कितनी भी रूमानी क्यूँ ना हो...यह एक सच है कि इस दौरान वह विविध मानसिक और शारीरिक उतार चढ़ाव से गुजरती है। इस समय उसे समझना और स्वीकार करना उसके मानसिक संतुलन के लिये आवश्यक है।
यह कुदरत का एक करिश्मा ही है कि एक कोशिका से एक पूरा इंसान तैयार हो जाता है।
नियंत्रण एक डी एन ए कोड़ मे लिखा हुआ, जिसमें माता और पिता की बराबर की भागेदारी रहती है। इस कोड़ के अनुसार एक कोशिका ,रूप मे ढ़लने लगती है।
किसी कुशल निर्देशक के हाथ में एक सिम्फनी.....साधन माँ उपलब्ध कराती है...और जगह उसकी कोख।
विकास का क्रम
1. उर्वरण और कोख में स्थिर होना- भ्रूण जीवन की शुरुआत (पहला और दूसरा हफ्ता)
2. दो में संस्तरित होना
3. तीसरे स्तर का जुड़ाव- अव्ययों के निर्माण की शुरुआत (तीसरा, चैथा हफ्ता)
4. हृदय, आँख और एक नन्हा आकार- हाथ और पाँव के अंकुर (पाँचवा हफ्ता)
5. नन्हा सा मुँह
6. नाक और होंठ
7. पलक
8. ओवरीज़ और टेस्टिस
9. स्त्री या पुरुष विशेषता सूचक (नौवाँ हफ्ता)
10. खुली आँखें
11. हिलता , घूमता शिशु ( बीसवें हफ्ते से अढतीसवाँ हफ्ता)
मृत्यु दर और अस्वस्थता सबसे अधिक जन्म से पूर्व होती है। करीबन तीस प्रतिशत गर्भ स्वत: निष्फल हो जाते हैं। इनमें अक्सर कोई बुनियादी खोट होता है। दो प्रतिशत नवजात शिशु में कोई गँभीर शारीरिक विकलांगता होती है जिसे शल्य चिकित्सा की आवश्यकता पड़े। रोगाणू, रसायन,तापमान की विविधता और एक्स रेस का असर भी सबसे अधिक इसी दौरान होता है। माता या पिता के सिगरेट फूँकने का असर भी बच्चे में कम विकास का कारण बन सकता है।
माँ एक कोशिका को एक शिशु बनाने की प्रक्रिया में पूरी खोराक पहुँचाती है। सभी अव्ययों को विकसित करने के लिये विटामिन्स, मिनरल्स ,ऊर्जा ,कैल्सियम, लौह तत्व वगौरह की जरूरत पड़ती है। जो माँ को अपने खोराक से मिलता है, विकसित होते शिशु तक पहुँच जाता है। जो खोराक में नहीं होता पर उसके शरीर में हो....वो शरीर से सोंक लिया जाता है। अगर शरीर भी उस जरूरी खोराक से वँचित हो तो शिशु में असर दिखता है।
गर्भ ....शायद एकमात्र ऐसा समय जब एक ही शरीर में दो दिल साथ में धड़कते हैं....
कुदरत कितने निपुणता से हर अंग को रूप में ढ़ाल देती है।
....इतनी खूबसूरती,श्रम और परम के आशा के चिन्ह को.....कितनी आसानी से कुछ लोग भ्रूण हत्या के हेडलाइन्स के नीचे समाप्त कर देते हैं.....
जैसा कि मार्टिन कहते हैं
God's interest in the human race is nowhere better evidenced than in obstetrics.
Martin H. Fischer
भगवान का मनुष्य जाति से लगाव औबस्ट्रैटिक्स (गर्भ संबंधित विज्ञान) से ज्यादा और कहीं नज़र नहीं आता।
फिर रवीन्द्र नाथ टैगोर ने कहा ही है
Every child comes with the message that God is not yet discouraged of man.
काश हम थोड़ी कोशिश कर परम का हौसला बनाये रखें......।
Sunday, 9 March 2008
आरंभ
उदर में एक नन्हे से जीवन की पहल होते ही अनंत सँभावनाओं को मुट्टी में पकड़ एक स्वप्न रूप लेता है। नौ महीने परम के हाथ से माँ की कोख में अंग को पूर्ण करता हुआ लगातार एक स्वतंत्र अस्तित्व की ओर विकसित होता है।
जन्म पश्चात शिशु अपना जीवनकाल आरंभ करता है। जन्म,शैशव, बाल्यकाल, फिर तरुणाई। हर विकास के पड़ाव से गुजरता हुआ एक व्यक्ति बनता है।
यह सफर आसान नहीं है। कई बातों की सही समझ माँ बाप को नहीं होती। बहुत सी असामान्य बातें रीत रिवाज़ और रस्म की आड़ में छिपी रह जाती हैं। और बहुत सी सामान्य बातों को रोग का नाम दिया जाता है।
वैसे तो हर शिशु का व्यक्तित्व काफी कुछ तय होता है लेकिन परिवेश के असर से इंकार नहीं किया जा सकता। माता पिता उस कुम्हार की तरह हैं जो कच्ची मिट्टी को मनचाहा स्वरूप देने में सक्षम हैं।
इस जगह में मेरी कोशिश रहेगी कि मैं शैशव से तरुणाई तक के विभिन्न पहलुओं पर रोशनी ड़ाल सकूँ। विविध विषयों का विश्लेषण करना चाहती हूँ कि मार्गदर्शन कर सकूँ कि कहाँ हमें स्वीकार करने की जरूरत है और कहाँ हम सकारात्मक हस्तक्षेप कर सकते हैं ।
खलिल गिबरान कहते हैं कि माता पिता परम के हाथ में कमान की तरह होते हैं,जिसके सही झुकाव से बच्चे तीर की तरह सीधा सही रास्ते से गुजर लक्ष्य तक पहुँचते हैं।
Your children are not your children.
They are the sons and daughters of Life's longing for itself.
They come through you but not from you,
And though they are with you yet they belong not to you.
You may give them your love but not your thoughts,
For they have their own thoughts.
You may house their bodies but not their souls,
For their souls dwell in the house of tomorrow,
which you cannot visit, not even in your dreams.
You may strive to be like them,
but seek not to make them like you.
For life goes not backward nor tarries with yesterday.
You are the bows from which your children
as living arrows are sent forth.
The archer sees the mark upon the path of the infinite,
and He bends you with His might
that His arrows may go swift and far.
Let our bending in the archer's hand be for gladness;
For even as He loves the arrow that flies,
so He loves also the bow that is stable.
मेरे इस सफर में उम्मीद है आप मेरे साथ होंगे।
जन्म पश्चात शिशु अपना जीवनकाल आरंभ करता है। जन्म,शैशव, बाल्यकाल, फिर तरुणाई। हर विकास के पड़ाव से गुजरता हुआ एक व्यक्ति बनता है।
यह सफर आसान नहीं है। कई बातों की सही समझ माँ बाप को नहीं होती। बहुत सी असामान्य बातें रीत रिवाज़ और रस्म की आड़ में छिपी रह जाती हैं। और बहुत सी सामान्य बातों को रोग का नाम दिया जाता है।
वैसे तो हर शिशु का व्यक्तित्व काफी कुछ तय होता है लेकिन परिवेश के असर से इंकार नहीं किया जा सकता। माता पिता उस कुम्हार की तरह हैं जो कच्ची मिट्टी को मनचाहा स्वरूप देने में सक्षम हैं।
इस जगह में मेरी कोशिश रहेगी कि मैं शैशव से तरुणाई तक के विभिन्न पहलुओं पर रोशनी ड़ाल सकूँ। विविध विषयों का विश्लेषण करना चाहती हूँ कि मार्गदर्शन कर सकूँ कि कहाँ हमें स्वीकार करने की जरूरत है और कहाँ हम सकारात्मक हस्तक्षेप कर सकते हैं ।
खलिल गिबरान कहते हैं कि माता पिता परम के हाथ में कमान की तरह होते हैं,जिसके सही झुकाव से बच्चे तीर की तरह सीधा सही रास्ते से गुजर लक्ष्य तक पहुँचते हैं।
Your children are not your children.
They are the sons and daughters of Life's longing for itself.
They come through you but not from you,
And though they are with you yet they belong not to you.
You may give them your love but not your thoughts,
For they have their own thoughts.
You may house their bodies but not their souls,
For their souls dwell in the house of tomorrow,
which you cannot visit, not even in your dreams.
You may strive to be like them,
but seek not to make them like you.
For life goes not backward nor tarries with yesterday.
You are the bows from which your children
as living arrows are sent forth.
The archer sees the mark upon the path of the infinite,
and He bends you with His might
that His arrows may go swift and far.
Let our bending in the archer's hand be for gladness;
For even as He loves the arrow that flies,
so He loves also the bow that is stable.
मेरे इस सफर में उम्मीद है आप मेरे साथ होंगे।
Monday, 3 March 2008
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