फेब्राइल कनवल्शन्स शरीर मे उठी एंठन है जो की ऐसे बच्चों में देखी जाती हैं जिनके शरीर का तापमान बुखार की वजह से 39डिग्री सेल्सियस या 102.2 डिग्री फैरनहीट से ज्यादा हो। अक्सर यह खाँसी सर्दी जुकाम के शुरुआत में होता है जब बच्चे के शरीर का तापमान तेजी से बढ़ रहा होता है।
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एक नज़र में देखने पर स्थिति भयावह लग सकती है,किंतु विरले ही यह एक गँभीर समस्या बनती है।
पाँच साल से छोटे बच्चों में इसके पाये जाने की सँभावना सबसे अधिक होती है। बच्चों का दिमाग पूरी तरह विकसित और परिपक्व नहीं होता। अधिक तापमान से इनके दिमाग में ऐसे विद्युत के सिग्नल उत्पन्न हो सकते हैं की बच्चे के शरीर में ऐंठन और मरोड़ उठे । करीब तीन प्रतिशत बच्चे इस से प्रभावित हो सकते हैं। छह महीने से तीन साल की इम्र में इनके होने की सँभावना सबसे अधिक होती है। हालांकि छह साल तक इन्हे देखा गया है।
परिवार में अगर किसी को ऐसी तकलीफ रही हो तो इसके होने की सँभावना 20 प्रतिशत तक बढ़ सकती है।
लक्षण
-ऐंठन और मरोड़ बहुत कम समय के लिए होती है। यह कुछ सेकंड से कुछ मिनट तक रह सकती है( पाँच मिनट से कम)
-बच्चा बेहोश हो सकता है, शरीर सख्त पड़ सकता है,साँस 30 सेकंड के लिए बंद हो सकती है, और बच्चा पेशाब और दस्त अनजाने ही कर सकता है।
-हाथ और पाँव में झटके आ सकते हैं। कई बार चेहरे पर भी खिंचाव दिख सकता है। बच्चे की आँखें ऊपर चढ़ सकती है।
-कुछ मिनट बाद बच्चे को होश आ जाता है। होश आने पर बच्चा सुस्त होता है, नहीं तो चिड़चिड़ा हो जाता है। उसे अपने आसपास की बातों का ठीक होश नहीं रहता।
http://www.youtube.com/watch?v=pS6uZYcydRo
इलाज
- ऐंठन के समय बच्चे को चोट ना लगने दें। उनके मुँह में कुछ ना ड़ालें। बच्चे को रिकवरी पोसाशन में ड़ाल दें।
- बुखार को बहुत बढ़ने ना दें। पैरासिटामोल का इस्तेमाल करें।
- कमरा ठंडा करें, बच्चे के कपड़े ड़ीले करें।
- पानी में भिगो कर शरीर को स्पोंज करें। स्पोंज करते समय बच्चे की छाती, पीठ ,कक्ष और जाँघ में भी पोछे।
अगर ऐसा पहली बार देखने में आया है तो बच्चे का इलाज और ठीक से वजह जानने के लिए बाकी जाँच जरूरी है। हो सकता है बच्चे को डायज़ापॉम नाम की दवा देनी पड़े। निदान हो जाने पर यह दवा आप संडास की जगह से भी दे सकते हैं। अपने डॉक्टर से इस विषय में सही सलाह ली जानी चाहिए।
अगर तकलीफ एक साल की उम्र से पहले देखने में आई है , या परिवार में किसी और को भी है तो तकलीफ के बारबार होने की सँभावना ज्यादा है।
अधिकतर बच्चे पाँच साल बाद इस तकलीफ से उभर जाते हैं। किंतु करीबन 1 प्रतिशत बच्चों में आगे जाकर अपस्मार देखा जाता है।
बुखार में हुई ऐसी सामान्य बात को देख अपने या किसी दूसरे बच्चे पर अपस्मार का लेबल ना लगायें। चौकसी और सचेत होना आवश्यक है लेकिन फेब्राइल कनवल्शन्स चिंता का कारण ना बनायें।
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बीमार बच्चा देखकर हर माँ का दिल भर आता है। पापा का बस चले तो अपनी लाड़ली के लिए जान भी हाज़िर कर दे। पर कुछ दुख तो सह कर ही पार लगते हैं। सर्दी के लिए दवाओं से चाहे जितनी नाकाबंदी कर दें यह सता कर ही दम लेती है। कुछ ना कुछ कर के बीमार बच्चे की तकलीफ कम करने की कोशिश में अक्सर कई गैरजरूरी दवाईयाँ इस्तेमाल की जाती है। बात अगर यहीं तक सीमित होती तो भी चलता लेकिन इनमें से कई दवाईयाँ काफी हद तक नुकसान पहुँचा सकती हैं, जान भी जोखिम में ड़ाल सकती है।
यह हैं ओवर द काउंटर मिलने वाली असँख्य दवाईयाँ जिनपर मुस्कुराते बच्चों की तस्वीर हमें बढ़ कर इन्हे खरीदने को उकसाती है।
सच तो यह है सर्दी जुकाम के लिए आज भी दादी माँ के नुस्खों से बेहतर उपाय नहीं। पैरासीटामोल, माँ की गोद, विक्स से मालिश, गुनगुने नमक के पानी से गरारे करना , अधरक की चाय, चिकन सूप....यही काफी है। छींकता खाँसता आपका दुलारा परेशान जरूर है....लेकिन आपके साथ और प्यार की मीठी यादें भी बना रहा है।
यू एस फुड़ ऐन्ड ड्रग ऐडमिनिस्ट्रेशन ने खास इस बात पर ज़ोर दिया है कि दो साल से छोटे बच्चों को ओवर द काउंटर मिलने वाली यह दवाईयाँ हरगिज़ नहीं देनी चाहिए। इनसे जान तक को खतरा हो सकता है। छह साल से छोटे बच्चों में इनकी उपयोगिता साबित नहीं है। इन्हे लेने पर मृत्यु, फिट्स(कंपकंपी),हृदय की गति तेज़ होना या अचेत होना रेकार्ड किया गया है। आम तौर पर यूँ बहुत देखने में ना भी आये तो भी छह साल से छोटे बच्चों में इनसे वाँछित लाभ भी नहीं मिलता।
बच्चों और बड़ो मे फर्क है। एक ही दवा की प्रतिक्रिया दोनो में अलग तरीके से होती है। जिस दवा से बड़ों मे कोई हानि नहीं होती बच्चों में वे गँभीर नुकसान पहुँचा सकते हैं।
एफ ड़ी ए ने दवाईयों के लेबल मे इन बातों को साफ करने की राय रखी है।
घरेलू नुस्खों के अलावा सलाइन नेसल ड्रॉप्स से फायदा भी होता है और नुकसान भी नहीं है।
अधिक जानकारी के लिए इस साइट पर जायें( www.aap.org/publiced/BR_Infections.htm http://www.aap.org/new/kidcolds.htm)
पिछले अक्टूबर में जो दवाइयाँ लौटा दी गई थी (Cough and cold medicines withdrawn in October 2007):
-लेबल हमेशा देखें। उसमें ऐक्टिव इनग्रीडियन्ट (“active ingredients”)देखें । कई बार कई सारी अलग अलग असर की दवाओं का काकटेल होती हैं ऐसी दवाईयाँ (an antihistamine, a decongestant, a cough suppressant, an expectorant, or a pain reliever/fever reducer)। आप अगर एक से अधिक ऐसी दवा दें तो शायद सेफ लिमिट से ज्यादा देकर बच्चे को नुकसान पहुँचा सकते हैं।
-दवा का लेबल खास चेक करें। उसके निर्देश का पालन करें। इसमें दी गई चम्मच या मेशरिंग कप से ही दवा दें। अंदाज़े से दवा कभी नहीं दे।
- बच्चों से दवा हमेशा दूर रखें। हो सके तो चाइल्ड सेफ ढक्कन वाली दवा ही खरीदें।
- कभी भी इन दवा का इस्तेमाल बच्चों को सुलाने के लिए ना करें।
- सर्दी जुकाम आम सी बिमारी है। अगर शंका हो कि तकलीफ कुछ और भी हो सकती है तो डॉक्टर तक पहुँचने में देर ना करें ।
कुछ समय से मेलामिन लगातार ध्यान खींच रहा है। मेलामिन जिससे खूबसूरत क्रौकरी तैयार होती है....बहुत ही अलग और गलत जगह में काफी मात्रा में पाया गया।
जगह थी पेट्स फूड...। अमेरिका में जब पालतू जानवर अचानक से किडनी फेल्यर से मरने लगे तो लगा कोई गंभीर महामारी फैल रही है। थोड़ा विश्लेषण करने पर इस तकलीफ की वजह मिली - चीन से एक्सपोर्ट हुए पेट्स फूड में मेलामिन की मिलावट। कई जानवर इंसानी लालच और पैसा कमाने के शार्टकट्स में शहीद हो गये।
http://www.youtube.com/watch?v=s8U9we0HEQg
अगर बात जानवरों के खाने तक सीमित होती तो फिर भी नुकसान की आशंका कम होती। पर चीन में हज़ारों की संख्या में बच्चे बीमार होने लगे। करीबन पचास हज़ार से अघिक बच्चे गुर्दे की निष्क्रियता की वजह से मर गये। सैंकड़ों अभी भी बीमार है।
सानलू नाम की कंपनी के मिल्क पावडर में मेलामिन पाया गया। यीली, जो की ओलंपिक गेम्स में बतौर स्पौंसर रही....उस के मिल्क पावडर में भी मेलामिन की मात्रा अधिक पाई गई। Nestle जैसे ब्रैन्ड्स भी यकीन से मेलामिन के होने को झुठला नहीं सकते।
जो कंपनियाँ अपनी प्रतिष्ठा को लेकर चिंतित थी...उन्होने बाज़ार से अपना पावडर उठवा लिया। छोटी कंपनियों के लिए यह बहुत ही बड़ा घाटा सिद्ध होता...तो वे अब भी बाज़ार में हैं।
http://www.youtube.com/watch?v=prLr1PNCeSg
बच्चों के दूध में आखिर कौन और क्यों मेलामिन मिला रहा है??
कौन का जवाब भी बहुत साफ नहीं है- शायद इन कंपनियों में दूध की आपूर्ति करने वाला नहीं तो स्वयं निर्माता।
क्यों- ताकि प्रोटीन की मात्रा अधिक दिख सके। प्रबंध कर्ताओं का ध्यान या संशय अब तक इस ओर नहीं था। इसीलिए क्वालिटी जाँच में मेलामिन आँकने का प्रावधान भी नहीं था।
आखिर मेलामिन क्या है और किस तरह पहुँचाता है नुकसान??
मेलामिन एक ऑर्गैनिक कंपाउन्ड है C3H6N6(1,3,5-triazine-2,4,6-triamine )। इसमें व्याप्त नाइट्रोजन की मात्रा की वजह से ही यह गलत प्रोटीन की रीड़िंग देता है। जो लोग मेलामिन जैसी चीज़ नवजात शिशु के दूध में मिलाने में हिचकिचाते नहीं....जाहिर है वे मेलामिन की शुद्धता पर भी घ्यान नहीं दे सकते। सायन्यूरिक एसिड़ जैसे ऐसिड के होने पर मेलामिन के नुकसान करने की क्षमता कई गुना बढ़ जाती है।
यह गुर्दे पर सीधा असर करती है। बहुत समय तक इस्तेमाल करने पर किड़नी स्टोन्स, मूत्राशय के कैन्सर , किड़नी फेल्यर और मौत तक हो सकती है।
बच्चों मे इस रोग के होने के लक्षण
किड़नी के फेल होने और किड़नी स्टोन्स के होने जैसे ही लक्षण देखने में आये हैं - बच्चे का बेहिसाब रोना, खास कर पेशाब करते समय। उल्टी के जैसा लगना - पेशाब में खून ( जाहिर या माइक्रोस्कोपिक) - पेशाब का कम होना या बिल्कुल बंद हो जाना - ब्लड प्रेशर का बढ़ना - पीठ पर किढनी की जगह पर थपथपाने पर दर्द का उठना - बुखार
अगर बच्चों में ऐसे लक्षण दिखें तो शक करने के लिए जानना जरूरी है कि पावड़र मिल्क का इस्तेमाल किया गया या नहीं। करीबन तीन महीने के लगातार इस्तेमाल के बाद ही अक्सर लक्षण दिखते हैं।
मेलामिन का दूध के पावडर में होने की जाँच आम लैबोरेटरी में नहीं की जा सकती। हालांकि,स्पेक्ट्रोमेट्री से बहुत आसानी से पता लगाया जा सकता है।
जो भी हो शक के घेरे में आई ऐसी बात सूचित करना जरूरी है।
समय बदल रहा है। कई लोग शॉर्टकट्स अपना कर हम आप की जान जोखिम में ड़ाल धनवान होने का प्रयत्न कर रहे हैं। वे हमारे भविष्य को बीमार कर रहे हैं।
कई बार तो लगता है काफी हद तक हम भी जिम्मेदार हैं। स्तनपान की जगह मिल्क पावड़र का चुनाव भी एक किस्म का शॉर्टकट ही है। छह महीने बाद भी सहूलियत के लिए जो माँये दूध के पावडर को ही मुख्य आहार रहने देती हैं...वह भी ऐसी स्थिति की जिम्मेदार हैं। हम सब जो हमारे सिस्टम को मिल्क पावड़र टेस्ट करने के लिए बाध्य नहीं कर सकते जिम्मेदार हैं।
....याद रहे बात बच्चों के दूध से सामने आई है। इस बात की गुंजाईश बहुक अधिक है कि आप खा रहे चॉकलेट, पी रहे चाय और मिठाइयों में मेलामिन है। इनमें इस्तेमाल हो रहे मिल्क पावड़र में मेलामिन की मात्रा की जाँच नहीं की गई है।
चीन के पेट फूड़ एक्सपोर्ट करने की वजह से स्पॉटलाइट उन पर है......जहाँ स्पॉटलाइट नहीं है...उस अँधेरे में पता नहीं हमारे और हमारे बच्चों के खाने में कौन सा जहर मिलाया जा रहा है।
क्या हम सचेत हैं??
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मुझे यकीन नहीं था ऑटिस्म मे सब इतनी दिलचस्पी लेंगे । पोस्ट लिखने में देरी हुई इसके लिये क्षमा चाहती हूँ।
पिछली पोस्ट में कई सवाल उठे,ऐसे सवाल जिन्हे संक्षिप्त में जवाब नहीं देना चाहती थी।
ऑटिस्म की वजह क्या है?
सच कहा जाये तो ठीक जानकारी नहीं है। अनुमान है की जेनिटिक्स का रोल है। कुछ परिवार के बच्चों में इससे ग्रसित होने की संभावना अधिक होती है। फिर भी एक सटीक वजह बता पाना संभव नहीं हुआ है। कुछ अनस्टेबल जीन्स से इसके होने की आशंका बढ़ जाती है। कुछ लोगों का मानना है की गर्भ के दौरान हुए वायरल इनफेक्शन्स, मेटाबोलिक डिसौर्डर्स या कुछ कैमिकल्स के संपर्क में आना इस रोग का कारण बन सकता है। फ्रैजाइल एक्स सिन्ड्रोम (Fragile X syndrome),ट्यूबरस स्क्लीरोसिस(tuberous sclerosis), कनजनाइटल रुबैल्ला सिन्ड्रोम( congenital rubella syndrome),ऐस्पर्जर्स सिन्ड्रोम (Asperger's syndrome)और फिनाइलकीटोनयूरिया untreated phenylketonuria ऐसी कुछ अवस्था हैं जिनमें ऑटिस्म की संभावना बढ़ जाती है।
परिवेश भी इसके लिए जिम्मेदार हो सकता है। कई भारी धातुओं को,जैसे की मरकुरी का एक मात्रा से अधिक संपर्क में आने को कुछ लोग दोषी मानते हैं। उनका कहना है की ऐसे बच्चों में इसको शरीर से दूर करने की पद्धति में खोट होता है और इनके रहने से जो रोग दबा हुआ होता है, वह जाहिर हो जाता है।
क्या टीकों का इनसे कोई संबंघ है?
इसका भी साफ साफ जवाब नहीं है। लेकिन कुछ टीकों को दोषी माना गया था। कुछ समय पहले यह वात काफी चर्चा में थी। खास तौर पर एम एम आर (MMR) इसकी वजह इन टीकों में प्रस्तुत मरकुरी को माना गया था। ठीक ठीक ऐसी बात का सबूत नहीं है।
जो भी है शोध जारी है।
http://www.youtube.com/watch?v=zN20SkRgGz0
एक खास चौकसी की आवश्यकता फ्लू वैक्सीन्स को लेकर है। इसमें मरकुरी की मात्रा 25 माइक्रो ग्राम है। यह मात्रा बाकी सभी टीकों को मिलाकर भी देखा जाये तो ज्यादा है (0.4 माइक्रो ग्राम)
जब तक इस बात की पुष्टी नहीं हो जाती कुछ भी पक्के तौर पर कहना गलत होगा। किंतु जिन बच्चों को ऑटिस्म है उनके भाई बहन मे, या जिन में जेनिटिकली ऐसे रोग की सँभावना है वहाँ सावधानी बरतना ही बेहतर होगा।
क्या ऑटिस्म वास्तव में इतनी शीघ्रता से बढ़ रहा है? अगर हाँ तो क्यों?
अगर अंकों पर जाये तो हाँ ही जवाब होगा। किंतु एक खास बात जिसे नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता वो यह है की ऑटिस्म की परिभाषा, उसके प्रति सतर्कता, उसपर लगे अंकुश,उसकी विविघता की स्वीकृति, समाज और पाठशाला में खास ध्यान -इन बातों में तेजी से बदलाव आया है। हो सकता है की अंकों पर इन बातो का असर पड़ा हो। फिर भी यह भी सच है की इतने बच्चों को ऐसी तकलीफ है और उन्हे और उनके परिवार को हमारे स्वीकृति और दिलासे की जरूरत।
ऑटिस्म से ग्रसित होने की उम्र कब है? क्या किसी व्यस्क को किसी ट्रौमा के बाद ऑटिस्म हो सकता है?
जिन बच्चो को ऑटिस्म होती है उनमें ऐसी प्रवृति रहती है। कई बार कुछ वक्त गुजरने के बाद ही इसके लक्षण समझ आते हैं। कुछ में टीकों के बाद प्रवृति में खास गिरावट देखी गई है। कुछ के कारण उनमें मौजूद जेनेटिक रोग हैं।
कुल मिलाकर बात यह है की जो रोग उपस्थित है ,इसका निदान कब हो पाता है।
किसी ट्रौमा के बाद ऐसे लक्षण दिख सकते हैं। मनुष्य के दिमाग के कनेक्शन्स इतने जटिल है की कहीं कोई केबल के टूट जाने पर ऐसे लक्षण जाहिर हो सकते हैं। किंतु इन्हे ऑटिस्म नहीं कह सकते।
हाँ जिन्हे ऑटिस्म है...वह व्यस्क हो जाये तब भी ऑटिस्टिक ही रहते हैं। कोई और मानसिक दबाव इनपर ज्यादा बुरा असर दिखाता है।
हम सब कई बार अपने स्वस्थ, सामान्य बच्चों से परेशान हो जाते हैं। उनकी नादानियों कभी परेशान करती है, उनकी जरूरतें कभीकबार हमारे समय पर एक डिमांड सा महसूस होती हैं....। थकान, तनाव और रोज़मर्रा की जिन्दगी के अपने अलग किस्से हैं...ऐसे में ऐसे बच्चों की परवरिश करना आसान नहीं है।
आज की यह पोस्ट ऐसे बच्चों और उनसे जुड़े हर माता पिता और केयरगीवर को समर्पित।
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जिस विषय पर आज चर्चा करना चाहती हूँ....उसके लिए थोड़ा समय निकाल कर चिंतन करना जरूरी है। हर बीस मिनट में एक बच्चा ऑटिस्म लेबल्ड। इसके विषय में हमारी जानकारी सीमित। अगर हम अमेरिका और आसपास की जगह के सर्वे पर एक नज़र ड़ालें तो महसूस होता है की यह एक ऐसी अवस्था है जो दिन ब दिन बढ़ती जा रही है। एक ऐसी चुनौती है जिसके बारे में जानना हमारे लिए आवश्यक है।
http://www.fightingautism.org/idea/autism.php
ऑटिस्म यानि आत्मानुचिंतन या स्वलीनता । एक नज़र में ऑटिस्म से ग्रसित बच्चे बाकी बच्चों से अलग नहीं दिखते। इसी वजह से इन बच्चों को अक्सर ज्यादा शैतान और जाहिल समझा जा सकता है।
ऑटिस्म आखिर है क्या ?! यह एक ऐसी अवस्था है जो मस्तिष्क के सामर्थ्य को कम करती है। इससे ग्रसित व्यक्ति की अपने आसपास की बात की समझ और उस पर प्रतिक्रिया अनुपयुक्त होती है। इस कारण उनका स्वभाव बाकियों से भिन्न होता है। उन्हे जरूरत और चाह के हिसाब से उपयुक्त शब्द नहीं मिलते। कई बार सही शब्द की तलाश में एक ही शब्द या वाक्य दोहराते जाते हैं। लोगों की बात ना समझ पाना एक बड़ी उलझन होती है। हर शब्द साफ सुनने के बावजूद वे उसका सही अर्थ समझने में असमर्थ होते हैं। ऐसे बच्चे के मन के भाव तेजी से बदलते हैं। जो बच्चा हाल में प्रसन्न दिखता है अगले ही क्षण दुखी, खीजा हुआ, गुस्सैल हो सकता है। कोशिश करने पर भी अपनी बात व्यक्त ना कर पाने की बेबसी इसकी वजह हो सकती है। कई बार वजह समझ पाना मुश्किल होता है। सच तो यह है की वजह बहुत कुछ और कुछ भी हो सकता है। इन वजहों की लिस्ट बनाना नामुमकिन ना सही बहुत ही मुश्किल साबित होता है। यह अपने आप में इन बच्चों और इनका ध्यान रखने वाले और परवरिश करने वालों के लिए चुनौती साबित होता है। उलझनें, भ्रांतियाँ,निराशा और कुण्ठा बढ़ती जाती है। बहुत बच्चे एक ही पद्धति से कार्य करते हैं। इसमें ज़रा भी फेर करने पर स्वभाव बदल जाता है। कई गुस्सैल, परेशान, निराश हो जाते हैं नहीं तो डर जाते हैं। हर चीज़ अगर एक निर्धारित क्रम में चलता रहे तो वे संतुष्ट रहते हैं और अगर परिस्थिति का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सके तो स्वयं को असुरक्षित पाते हैं। एक अवस्था से दूसरे तक जाने में भी उनका संतुलन खोता है। हकीकत इन्हे भ्रमित करती है। एक बात और चीज़ को दूसरे से जोड़ कर देखना इनके लिए बहुत मुश्किल होता है।
ऑटिस्म को स्पेक्ट्रम डिसॉर्डर कहते हैं। हर बच्चे को यह अलग मात्रा में ग्रसित करती है । कुछ को कम, कुछ को ज्यादा। हर बच्चा अलग।
आम तौर पर तीन बातों में कमी पाई जाती है संवाद कल्पना अंतःक्रिया
जितनी आसानी से एक आम बच्चे के लिए दुनिया का होना है....उतना ही मुश्किल है ऐसे बच्चे का दुनिया की साधारण बातों को समझना।
कुछ आम तौर पर दिखने वाले लक्षण
बोलचाल का कम होना भाषा से अलग आवाज़ निकालना देर से बोलना सीखना एक ही शब्द,वाक्य बार बार बोलना मैं और तुम जैसे सर्वनाम के प्रयोग में गलती करना मेलमिलाप कम करना और नापसंद करना आँख ना मिलाना पूछी बात पर प्रतिक्रिया ना देना चिढ़चिढ़ा पहना हाथों से विशेष लगाव हाथ हिलाते रहना,कूदना,गोल घूमना, बैलेंस बनाने की कोशिश करना,ऐड़ी पर चलना कुछ आवाज़ों को सख्त नापसंद करना कुछ कपड़ों, खाने की चीज़ों को नापसंद करना पैटर्न्स में बात दुहराना अनिच्छुक रहना खुद को नुकसान पहुँचाना
इनमें से कई बातें हो सकती है और कई नहीं भी। हर बात की तीव्रता भी अलग हो सकती है। हर बच्चा अलग होता है...और उसका सामर्थ्य भी।
हमारे पास एक ही विकल्प है....सही दृष्टिकोण चुनने का....
http://www.youtube.com/watch?v=_IhG9CgQ49g
कुछ गलत धारणायें 1. ऑटिस्म से ग्रसित बच्चे कभी आँख नहीं मिलाते। ऐसा नहीं है। और काफी बच्चे निरंतर प्रयास करने के बाद सीखते भी हैं।
2.ऐसा बच्चा जीनियस होता है। हर आई क्यू का बच्चा ऑटिस्टिक हो सकता है।
3.ऐसा बच्चा प्यार नहीं दिखाता, समझता। प्यार की अभिव्यक्ति इन बच्चों के लिए मुश्किल जरूर है...असँभव नहीं। लगातार कोशिश के बाद बच्चे प्यार जताना और दिखाना सीख जाते हैं।
4.बच्चे में सुधार का मतलब बच्चे को तकलीफ नहीं है। सुधार का मतलब प्रयास, स्नेह और साँत्वना है।
5.मुस्कुराते बच्चे का मतलब वह ऑटिस्टिक नहीं है। गलत। हर लक्षण की तीव्रता अलग हो सकती है।
6.समय के साथ ऑटिस्म पीछे छूट जाता है। नहीं।इसे उपचार और लगातार प्रयास की जरूरत है। जिसके बाद ऐसे बच्चे अर्थपूर्ण जीवन पा सकते हैं।
कोई भी शंका के होने पर बाल रोग विशेषज्ञ नहीं तो चाइल्ड सायकोलोजिस्ट से मिलें। किसी निश्चय पर स्वयं पहुँचने के अपने खतरे हैं। इस अवस्था के होने पर सही निदान और उपचार और लगातार प्रयास जरूरी है। सही दृष्टिकोण हो तो ऐसे बच्चे अर्थपूर्ण अस्तित्व पा सकते हैं। ऐसे बच्चे निर्धारित लक्ष्य पा सकते हैं। जीवन में कुछ बन सकते हैं।
ऑटिस्म अभिव्यक्ति के गूंगेपन जैसी अवस्था है । व्यक्तित्व पर एक ऐसा ताला जिसकी चाभी गुम हो। एक व्यक्ति स्वयं अपने शरीर मे कैद। ऐसी बेबसी की कल्पना भी हमारे लिए मुश्किल है। इस रोग से जूझते बच्चे और उनका परिवार हमसे सिर्फ स्वीकृति चाहते हैं। यह अलग हैं..बुरे नहीं।
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जुड़वा बच्चों ने हमेशा आकर्षित किया है। बचपन में हमेशा सोचती थी कितना अच्छा होता मेरी भी कोई जुड़वा बहन होती। एक शरीर में तीन दिल....कुदरत का करिश्मा ही है।
जब सगर्भा स्त्री को बताया जाता है तो अक्सर वह खुश से ज्यादा आशंकित हो जाती है। आने वाली कई परेशानियों को सोच कई सवाल उसके मन में उठते हैं। जहाँ तक मैं समझती हूँ कुछ बातों का ध्यान रखा जाये तो यह दुगुने खुशी का अवसर बन सकता है।
साधारण गर्भ में जहाँ 9-10 कंसल्टेशन काफी होते हैं वहीं जुडुवा बच्चों के साथ इससे ज्यादा की जरूरत है। दो अल्ट्रासाउंड भी काफी नहीं है।
कोई भी निश्चित की गई डॉक्टर से मुलाकात नहीं चूकनी चाहिए। रक्तचाप, खून में शक्कर, अनीमिया वगैरह के लिए नियमित जाँच जरूरी है।
जहाँ जुड़वा बच्चों का गर्भ एक सामान्य बात है वहीं इसमें अधिक सावधानी की जरूरत से इंकार नहीं किया जा सकता। डॉक्टर और सगर्भा की कोशिश होनी चाहिए की गर्भ निर्धारित समय तक टिक सके। अधिकतर 37वे हफ्ते तक ही शिशु गर्भाशय मे रह पाता है। कोशिश होनी चाहिए की किसी भी कारण से शिशु का जन्म समय से पहले ना हो। कई सगर्भा सत्रियाँ पूरे 40 हफ्ते पूरा करती है और सामान्य प्रसव से ही इन शिशुओं का जन्म भी होता है। 40 वे हफ्ते के बाद भी अगर सामान्य तरीके से प्रसव ना हो तो कुछ डॉक्टर सिज़ेरियन करना पसंद करते हैं।
दो तरह के जुड़वा बच्चे होते हैं। आइडेन्टिकल और नान आइडेन्टिकल( फ्रैटर्नल) । आईडेन्टिकल जुड़वा बच्चे लिंग, रूप रंग, स्वभाव मे एक से होते हैं। आइडेन्टिकल जुड़वा बच्चों के बीच एक ही आँवल (प्लासेंटा)होता हैं।
आइडेन्टिकल बच्चों में ट्विन ट्राँसफ्यूशन सिंड्रोम का खतरा अधिक होता है। इसमें एक बच्चे का विकास दूसरे के व्यय से जुड़ जाता है।
अल्ट्रासाउंड की सँख्या सामान्य गर्भ से अधिक होनी चाहिए। खास तौर पर 28 से 40 हफ्ते के बीच चौकसी रखना जरूरी है। शिशु का गर्भाशय में स्थान, आँवल का स्थान, दोनो शिशु का विकास वगैरह ऐसी बातें हैं जिस पर नज़र रखी जानी चाहिए। अगर सगर्भा स्त्री को डायबेटिस या अपस्मार की बिमारी हो तो खास सावधानी बरतनी जरूरी है।
इस बात पर जोर देना जरूरी है कि ऐसे में खोराक, पर्याप्त आराम और सही व्यायाम (जैसे की योगा) पर ध्यान अत्यंत आवश्यक है। गर्भ के साथ जुड़ी बाकी परेशानियाँ भी अधिक महसूस हो सकती है। परिवार का सहयोग ऐसे में अहम भूमिका अदा करता है।
कुछ समस्यायें खास इस अवस्था से जुड़ी है। समस्या के बारे में पता होगा तो ही समाधान के प्रति सजग हो सकेंगे।
वैनिशिंग ट्विन सिंड्रोम कभी कभार जुड़वा में से एक बच्चा गायब हो जाता है। वजह आँवल, कोई आंतरिक त्रुटि या विकास में कोई अन्य त्रुटि हो सकती है। जो भी हो इससे माँ को बहुत तकलीफ नहीं होती। अल्ट्रासाउंड कर के पता लग सकता है। और यह शुरुआती महीनों में ही अक्सर होता है।
मिसकैरेज इसकी सँभावना सामान्य गर्भ से लगभग दुगुनी होती है। पर सँभावना फिर भी सँभावना ही है। सही देखभाल से इसका होना काफी हद तक कम किया जा सकता है। और कभी अगर एक शिशु गिर भी जाये कोई जरूरी नहीं दूसरे के साथ भी ऐसा हो। अक्सर दूसरा शिशु स्वस्थ पैदा होता है।
प्रीएकलम्पसिया (सगर्भा अवस्था से बढ़ा रक्तचाप) और डायबेटिस की सँभावना और कठोरता दोनो इस अवस्था मे अधिक होती है। किंतु नियमित डॉक्टर से मिलना और समय पर इलाज इनको नियंत्रण में रख सकता है।
प्लासेंटल एबरप्शन आँवल पर दरार पडकर टूटना एक गँभीर बात हो सकती है। सही खोराक की कमी और घुम्रपान इसकी कारण बन सकते हैं। इसकी वजह से समय से पहले प्रसव होने की सँभावना भी रहती है।
फीटल ग्रोत रेस्ट्रिक्शन
शिशु का विकास अपेक्षा से कम होने की सँभावना।
ट्विन ट्राँसफ्यूशन सिंड्रोम
इसके लिए सजग रहना आवश्यक है। नियमित जाँच से इसका पता लगाया जा सकता है। निदान होने पर तुरंत सलाह और उपचार जरूरी है।
एकार्डियाक ट्विन इसकी सँभावना 1:35000 है। निदान अल्ट्रासाइंड से हो सकता है।
इन सभी से अधिक सँभावना समय से पहले प्रसव की है। अस्पताल जाने की तैयारी हमेशा रहनी चाहिए। प्रसव के समय होने वाले बदलाव का सही ज्ञान होना चाहिए। ऐसे किसी भी लक्षण के होने पर तुरंत अस्पताल जाना चाहिए।
जुड़वा बच्चों के बारे में बताते हुए महसूस हो रहा है जैसे मैं ऐसी सगर्भा माँ को सचेत और सजग करने से ज्यादा आतंकित कर रही हूँ। पर मेरी मंशा जहाँ आपकी बेफिक्री हटाने की है आपको फिक्रमंद करने की नहीं है। बिंदास रहने वाला रवैया नहीं चल सकता और अगर आप सजग हैं और जिम्मेदार भी तो कुदरत का यह करिश्मा आपकी गोदी में पलेगा...स्वस्थ और तंदुरुस्त
http://www.youtube.com/watch?v=3meRrmsZKnM
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आज जिस विषय पर बात होगी वह है सेरीब्रल पाल्सी। यह विषय मेरे दिल के बेहद करीब है। और मैं मानती हूँ कि भले ही हमारा कोई अपना इस से ग्रसित हो कि नहीं हमें इसके बारे में जानना चाहिये। भगवान ने हमें बहुत सारी सौगातों से नवाज़ा है...इस बात का अंदाज़ा सबसे अधिक मुझे ऐसे बच्चे के सामने होता है। ऐसे बच्चे के सामने इस बात का भी अंदाज़ा होता है कि इतनी परिमितता के बावजूद यह नन्हे फरिश्ते अपार स्नेह और कोशिश के काबिल होते हैं ।आज की यह पोस्ट इन बच्चों को समर्पित....जिनके लिये मेडिकल साइंस बहुत कम कर सका है लेकिन जिन्होने जीवन के अमूल्य स्पंदन से मुझे अवगत कराया है।
क्या कभी अपनी माँ से अपने पहले कदम या पहले शब्द के बारे में पूछा है....शायद माँ ने बताया हो....
सेरीब्रल पाल्सी से ग्रसित बच्चे की माँ वह लम्हा कभी भूल नहीं सकती..ना जाने कितने इंतज़ार और तप के बाद नसीब होता है एक ऐसा खूबसूरत सा लम्हा...जिसे हम हमारे जीवन का साधारण और स्वाभाविक पड़ाव मानते हैं। इन बच्चों में से कुछ व्हील चेयर का इस्तेमाल करते हैं,कुछ बैसाखी का, कोई ठीक से बात नहीं कर सकता तो कई खुद को किसी भी तरह व्यक्त करने में असमर्थ होते हैं। हज़ारों की सँख्या में शिशु और बच्चे इससे हर साल ग्रसित हो जाते हैं। यह संक्रामक नहीं होता। पर यह लकवा है जो दिमाग और शरीर को मार जाता है। ऐसे बच्चे का इसकी माँस पेशियों पर इच्छित नियंत्रण नहीं होता। मस्तिष्क ही हमें कौन सा काम, किस समय, किस तरह करना है बताता है। चूँकी सेरिब्रल पाल्सी (प्रमस्तिष्कीय लकवा) मस्तिष्क पर असर करता है , जिस हिस्से पर असर होता है उससे उसका प्रभाव निर्धारित होता है। अत: ऐसा बच्चा खाने पीने,खेलने कूदने, चलने -उठने मे असमर्थ हो सकता है।
इससे ग्रसित बच्चा अपनी माँस पेशियों को ढ़ीला छोड़ने में असमर्थ होता है। माँस पेशियाँ सिंकुड़े हुए अवस्था में लगातार रहती हैं।
अथीटोइड
इससे ग्रसित बच्चा अपनी माँस पेशियों पर सही नियंत्रण नहीं रख पाता। लिहाजा ग्रसित माँस पेशियाँ अचानक से फड़फड़ा सकती हैं,उनमें कोई हरकत हो सकती है।
अटैक्सिक
इससे ग्रसित बच्चा संतुलन और सही तालमेल नहीं बना पाता।
मस्तिष्क का कितना और कौन सा हिस्सा ग्रसित हुआ है निर्धारित करता है कि बच्चे को तकलीफ कितनी होगी। अगर दोनो हाथ और पैर पर प्रभाव पड़े तो व्हील चेयर की आवश्यकता पड़ सकती है,अगर दिमाग का जो हिस्सा वार्तालाप का नियंत्रण करता है ग्रसित हो तो बच्चे के बात करने की क्षमता पर असर पड़ता है।
सेरिब्रल पाल्सी (प्रमस्तिष्कीय लकवा) के कारण
सही सही कारण ज्ञात नहीं है। कई बार जन्म के समय शिशु के मस्तिष्क पर आघात कारण बनता है। कई बार समय से पहले शिशु के प्रसव होने की वजह से अपूर्ण विकास कारण बनता है। जन्म पश्चात शिशु को हुई कोई तकलीफ की वजह से ऐसा हो सकता है। पर फिर भी अक्सर जन्म पूर्व मस्तिष्क को पहुँची हानि ही इसका कारण बनती है। इसकी कोई खास वजह अभी तक ढूँढ़ी नहीं जा सकी है।
डॉक्टर की भूमिका
डॉक्टर इसका निदान करने में सहायक होता है। इस बात का पता लगाता है कि शिशु किसी और रोग की वजह से ऐसा नहीं है। रोग के तीव्रता और असर का सही अंदाज़ा लगाता है। और बच्चे और माता पिता को इससे जूझने में मदद करता है। छोटी छोटी बातें, कुछ दवाइयाँ, कसरत, सही सहायक उपकरण, सीखने और सिखाने में मदद करता है। माँस पेशियों की विभिन्न तकलीफ को समझ उपयुक्त उपाय किया जाता है।
शिशु के करीबन अठारह महीने होने तक इस रोग की पुष्टी की जा सकती है। विकास की सीढीयों में कुछ असामान्य या देरी होना इसका परिचायक होते हैं।
सेरिब्रल पाल्सी (प्रमस्तिष्कीय लकवा)के साथ जीना
इस रोग से ग्रसित होना या ऐसे बच्चे की देखरेक करना काफी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।बच्चे के मस्तिष्क का दोष समय के साथ बिगड़ता नहीं है बल्कि ज्यों का त्यों रहता है। किंतु लगातार माँसपेशियों में तनाव या दूसरी तकलीफ की वजह से स्थिति बिगड़ सकती है। इसीलिये ऐसे बच्चे को उपचार की जरूरत होती है। यह उपचार शारीरिक, मानसिक, वाक शक्ति पर केंद्रित हो सकती है। कई बार शल्य क्रिया की भी जरूरत पड़ सकती है।
सेरिब्रल पाल्सी के होने का मतलब बच्चे के सार्थक जीवनयापन करने में असमर्थ होना नहीं है। यह बच्चा सोच सकता है, महसूस कर सकता है, समझ सकता है, दोस्त बना सकता है, खेलना चाहता है, हँस सकता है.....। हाँ उसकी अपनी सीमायें हैं....और बाकी बच्चों से फरक भी।
यह बच्चे और इनके माता पिता हमसे स्वीकृति चाहते हैं, थोड़ी संवेदनशीलता ...थोड़ी सी मदद और इनके बारे में थोड़ी सी समझ। वे अपनी खुद की जगह पूर्ण अधिकार से लेना चाहते हैं। जितनी कोशिश से वे अपनी बात कहते हैं...वे चाहते हैं कि हम थोड़े धीरज से उन्हे सुन लें। उन्हे अवसर दें और स्नेह भी।
पता नहीं क्यों पर हमेशा उनसे जो स्नेह मिला है हमेशा दिल भर गया है। आठ साल के पुलकित के असंतुलित हाथ से बने फूल और उनसे लिखे डगमगाये अक्षरों में मेरा नाम....उसकी वॉकर पर टिकी काया और चश्मे के पीछे से मुस्कुराता चेहरा... ऐसे में जीवन से कई शिकायतें यूँ ही पिघल गई है ...और रूह आनन्दित हुई है।
I passed out from Government Medical college Surat. After my MBBS, I did MD Pediatrics from the same college. My first three jobs were in Bharuch and SEWA rural Jhagadia and covered the troubled time of riots , cyclone and Narmada Bachao andolan. Having closely worked in rural Gujarat ,coming and settling in Dubai was an altogether different experience. After working in a polyclinic I worked in a school as school doctor. It was interesting to pick sick kids from healthy which was diagonally opposite of what I practised in a hospital. The school was an eye opener of how difficult school could be for kids with chronic problems.
Currently back in a hospital...where I hope to heal...